अरुंधति रॉय से उनकी नई पुस्तक पर बातचीत

“मैं साहसी नहीं थी, लेकिन मेरे पास कोई विकल्प भी नहीं था” अपने नए प्रकाशित संस्मरण “मदर मेरी कम्स टू मी’ के बारे में बात करते हुए अरुंधति रॉय का कुछ ऐसा ही कहना है। उनसे यह बातचीत की है नेहा दीक्षित ने, जो 28 अगस्त को दि हिंदू में अंग्रेज़ी में प्रकाशित हुई थी। इसका हिन्दी अनुवाद आपके लिए, दि हिंदू से साभार। अनुवाद किया है कुमारी रोहिणी ने- मॉडरेटर

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प्रश्न: एक ऐसी दुनिया जिसमें हर चीज और हर व्यक्ति के लिए कोई न कोई शब्द तय है और जिसमें केवल शुद्ध क्रांतिकारियों को ही स्वीकृति मिल पाती हैं, उसमें अपनी माँ मेरी रॉय के बारे में लिखना कितना महत्त्वपूर्ण है?

उत्तर: लोग अब बहुत हिंसक हो गए हैं, अब हर आदमी किसी न किसी फ़ैसले पर पहुँचने की जल्दी में है। जब मैं यह किताब लिख रही थी तब ऐसा कई बार महसूस हुआ कि अपने अतीत में भोगे हुए कुछ दुखों को लेकर मेरे भीतर शर्मिंदगी का भाव है। वह जब इस दुनिया से गईं तब 89 साल की थीं और मैं साठ एक साल की। मैंने सोचा क्यों? और यह समझ पाना कि सिर्फ़ किसी को अपनी ज़िंदगी में बनाए रखने के लिए आपको ख़ुद को एक अजीब सी शक्ल में ढालना पड़ा था और अब वही शक्ल पूरी तरह से बेमानी लगने लगती है। मसलन, कोई आदमी कई मायनों में बहुत अधिक प्रगतिशील और बेबाक़ हो सकता है और फिर अचानक ही वह एक पूरी तरह से जातिवादी विचारधारा का रुख़ कर लेता है और आप इन सभी चीजों को एक खाँचें में कैसे देख और समझ पाएँगे? लेकिन यही तो इंसान होना है। लोग ऐसे ही होते हैं। वे अलग-अलग बिखरे हुए टुकड़ों की तरह हैं जिन्हें उनकी मांसपेशियों और खून ने एक दूसरे से बांध और जोड़कर रखा है।

प्रश्न: अपने माता-पिता को उनके वास्तविक रूप में यानी जैसे वे हैं उसी रूप में स्वीकार कर लेने के लिए क्या चाहिए होता है?

उत्तर: एक दिन मैं किसी से कह रही थी कि मुझे लगता है कि सच यह है कि मैं उनकी यानी अपनी माँ की माँ थी। वो मैं ही थी जो उस हिंसक, प्रतिभाशाली, कठोर, निर्दयी और अद्भुत बच्चे को सहन करती रही। वो मैं ही थी जिसे उनकी बीमारी की वजह से शांत और चुप रहना पड़ता था। कई मायनों में, हमारी भूमिकाएँ एक दूसरे से सर्वथा विपरीत थीं। मुझे ऐसा महसूस हुआ कि अंततः हम दोनों दो ऐसे वयस्क थे जिन्हें किसी ना किसी तरह एक दूसरे को झेलना और एक दूसरे से निपटना था। बहुत पहले ही अपना बचपना त्याग कर उनसे अपनी माँ होने की उम्मीद छोड़ चुकी थी। मैं दूर हो गई। क्योंकि अगर मैं ऐसा नहीं करती तो टूट जाती…लेकिन मैंने कभी नहीं चाहा कि वह मुझसे हार जाएँ। ना मैं यही चाहती थी कि मैं जीत जाऊँ। मैं चाहती थी कि वह इस दुनिया से एक रानी की तरह विदा लें। और उन्होंने ऐसा ही किया…

प्रश्न: आपने अपने पिता के साथ भी ऐसा ही किया, जब आप उनसे पहली बार मिलीं तो उन्हें वैसे ही रहने दिया, जैसे वे हैं।

उत्तर: जैसा कि मैंने इस किताब में लिखा भी है, मैंने पूरी रात ख़ुद को देखते हुए गुज़ार दी, यह सोचते हुए कि भगवान, मुझे क्या चाहिए और फिर सब कुछ कल्पना और उम्मीद से परे था। मेरी उम्र तब 25 साल थी। मैं तब तक एक ऐसे व्यक्ति में तब्दील हो चुकी थी जिसकी अपनी एक राजनीतिक सोच थी। मुझे बस तीन सेकंड लगे थे उस झटके से बाहर आने में, जब मैंने उन्हें उस हाल में देखा था – पेशाब से लथपथ कपड़े, यहाँ-वहाँ से कटे हुए कान, पूरी तरह से अस्त-व्यस्त। और फिर अचानक मेरे मन में आया – शुक्र है कि वे एक सीईओ नहीं है! क्योंकि तब उनसे निपट पाना मेरे लिए ज़्यादा मुश्किल होता।

प्रश्न: आपने अपनी माँ के बारे में लिखा है कि अपने पिता की हिंसा से बचने के लिए उन्होंने अपने जीवन में शादी का प्रस्ताव लेकर आने वाले पहले ही व्यक्ति से शादी कर ली। यह बात पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलने वाली हिंसा के बारे में क्या बताती है? इस तरह की परिस्थिति से किस प्रकार के व्यक्ति और समाज का निर्माण होता है?

उत्तर: केवल इतना ही नहीं है कि मेरी माँ ने अपने पिता द्वारा की गई हिंसा झेली, बल्कि उस हिंसा ने उनके भीतर अपनी स्थाई जगह बना ली थी। उन्होंने उसे आत्मसात् कर लिया था। यह उस हिंसा की प्रतिक्रिया मात्र नहीं थी। बल्कि वह ख़ुद भी वैसी ही बन गई थीं। मुझे याद आता है कि किस तरह मेरे दोनों भाई और मैं, तीनों ही इसके लिए सचेत प्रयास करते रहते कि हम उस हिंसा को ना दोहराएँ। लेकिन मेरा मानना है कि पीढ़िगत हिंसा और ट्रामा एक वास्तविक चीज है। यह केवल परिवार के भीतर ही नहीं होती बल्कि जातीय, नस्लीय और धार्मिक, सभी स्तरों पर मौजूद होती है।

कभी-कभी आपको महसूस होता है कि आप अपने शरीर के जाल में ही फँसे हुए हैं। मुझे ऐसा लगता है कि अगर कभी हिंसा हुई और आप उससे भावनात्मक, शारीरिक, यौनिक या सामाजिक किसी भी स्तर पर उससे पीड़ित रहे तो उस स्थिति में ख़ुद को एक पीड़ित के रूप में नहीं देखने के लिए आपको बहुत ताक़त जुटानी पड़ती है। जैसे ही आप ख़ुद को एक पीड़ित मान लेते हैं, वैसे ही आपकी सीमाएँ तय हो जाती हैं। जैसी हमारी सामाजिक संरचनाएँ हैं उसमें यह कर पाना आसान नहीं है। आज के भारत में तो – चाहे आप मुसलमान हों, औरत हों या कुछ और – यह और भी कठिन है। लेकिन कठिन होने के बावजूद, यही वह काम है जो आपको करना है। कोई और आकर आपको इससे बाहर नहीं निकाल सकता।

प्रश्न: आपका व्यक्तित्व बहुत बड़ा है। भला किसने सोचा होगा कि एक छोटे से शहर से बड़े शहर में ख़ुद को स्थापित करने के बीच आपके भी अपने संघर्ष रहे होंगे। इस पर कुछ कहना चाहेंगी?

उत्तर: मुझे हमेशा ही एक सिद्धांत से आगे का रास्ता मिलता रहा- सच्ची आज़ादी, असली स्वतंत्रता की खोज का रास्ता। ज़ाहिर है, घर में जो कुछ भी चल रहा था उससे आज़ादी। लोग कहते हैं—“तुम बहुत बहादुर थीं।” लेकिन मैं कहती हूँ—“नहीं, मैं बहादुर नहीं थी। मेरे पास कोई दूसरा विकल्प नहीं था। मेरे सामने या तो टूटकर बिखर जाने का विकल्प था या फिर वहाँ से बाहर निकल जाने का रास्ता।” इसलिए यह बहादुरी नहीं थी, इसे आप मजबूरी कह सकते हैं। लेकिन एक बार जब आप उस रास्ते को चुन लेते हैं तब क्यों का प्रश्न आपके सामने खड़ा हो जाता है। और इस क्यों के उत्तर में मैं कहती हूँ क्योंकि मैं खुश होना चाहती हूँ, क्योंकि मैं दुख नहीं झेलना चाहती।

यह आपके दिमाग़ में लगातार चलने वाली एक खोज रही है। ऐसा लगता है जैसे मेरे दिमाग़ में कुछ रासायनिक प्रतिक्रियाएँ होती रहती हैं और मैं उनके गंध का पीछा करते हुए ही आज़ादी तलाशती रहती हूँ। इस मतलब है लगाव-जुड़ाव से पैदा होने वाले बंधनों से आज़ाद होना। पैसे की लालसा से, हमेशा मशहूर रहने की चाह से, या हमेशा जवान दिखने की चाह से—यहाँ तक कि बोटॉक्स लगाकर जवानी बनाए रखने की कोशिश से भी मुक्त होना। मुझे ये सब नहीं चाहिए। मैं केवल बने रहना चाहती हूँ, मैं चाहती हूँ कि मुझे रहने दिया जाए जैसी हूँ उसी रूप में।

प्रश्न: आप कई बार यह बात कहती हैं कि “मैं अपनी सबसे सुरक्षित जगह को सबसे ख़तरनाक बना देती हूँ। और जब वह जगह ख़तरनाक नहीं होती, तो भी मैं उसे वैसा बना लेती हूँ।” इसका क्या मतलब है?

उत्तर: जब आपका बचपन पूरी तरह से असुरक्षित रहा हो…कहने का मतलब यह है कि मान लीजिए आपका जीवन कश्मीर में बिता हो या आपने सड़कों पर ही ज़िंदगी गुज़ारी है और ऐसे में आपको बाहरी चीजों का ख़तरा होता है। लेकिन मामला बिलकुल अलग हो जाता है जब वह ख़तरा ख़ुद आपकी माँ ही हो। तब आपको किसी भी चीज़ पर भरोसा नहीं हो पाता। मैं हमेशा ही असुरक्षा की तरफ़ खींची चली जाती हूँ। मैं असुरक्षा को बेहद आसानी से समझ लेती हूँ। एक सुखी परिवार जैसी बकवास अवधारणा मेरे पल्ले नहीं पड़ती। इसलिए कभी-कभी, जब कोई रिश्ता बहुत सुरक्षित दिखता और महसूस होता है तब मुझे घुटन होने लगती है। मेरा दिमाग़ उस ‘ख़तरे’ को खोजने में लग जाता है। मैं सोचने लगती हूँ “ख़तरा कहाँ है? मुझे यहाँ से निकलना होगा!”

प्रश्न: इस संदर्भ में प्यार को कैसे समझा जा सकता है? केवल मनुष्यों से ही नहीं बल्कि उन जीवों से भी जिनका ज़िक्र अपने किताब में किया है – गिलहरियों, कुत्तों, खिड़की से बाहर दिखने वाले पेड़-पौधों से भी?

उत्तर: मुझे लगता है कि यह एक विकल्प है जो इंसान ख़ुद चुनता है। एक पारंपरिक प्यार होता है — जैसे माँ-बाप का, बेटे का, या बच्चों का। लेकिन, अगर यह आपके हिस्से नहीं आया है या फिर आपने इसका चुनाव नहीं किया है तो फिर क्या आप अपना पूरा जीवन कड़वाहट में गुज़ार देंगे? या आप उसके बाहर निकलकर अपने लिए एक ऐसी समग्र दुनिया की तलाश करेंगे जिनमें दोस्त होंगे, प्रकृति होगी, एक अलग और नया संसार होगा, जो धीरे-धीरे आपकी बहुत प्रिय और निजी चीज बन जाएगी। मेरे लिए तो राजनीति से जुड़े वे विषय भी ऐसी ही चीजों की श्रेणी में आते हैं जिनके बारे में और जिन पर मैं लिखती रहती हूँ। या यह किताब, जो गाज़ा की पृष्ठभूमि में लिखी गई है – वह मेरे लिए उतनी ही व्यक्तिगत है, जितनी कोई दूसरी चीज हो सकती है। और ख़ासकर औरतों को मैं किसी तरह का उपदेश नहीं देती कि ‘ये मत करो’, ‘शादी मत करो’। नहीं। पर हाँ, यह ज़रूर कहती हूँ कि और भी बहुत सारे रास्ते हैं। ज़िंदगी जीने के ढेरों अन्य तरीक़े हैं। उन तयशुदा छोटे-छोटे नक्शों से अलग, जो समाज आपके हाथ में थमा देता है।

प्रश्न: आपने किताब में ज़िक्र किया है कि कैसे बुकर पुरस्कार जीतने के बाद लोग ‘द गॉड ऑफ़ स्मॉल थिंग्स’ के बारे में अलग-अलग तरह से बात करने लगे और उसे उसकी राजनीति से अलग करने लगे। क्या कोई ऐसी मशीनरी काम कर रही है जो साहित्य से राजनीति या ज़मीनी हक़ीक़त को मिटाना चाहती है?

उत्तर: मुझे लगता है कि निश्चित ही तौर पर ऐसा कुछ है। लेकिन इसका यह मतलब भी बिलकुल नहीं है कि यह हमेशा ही कारगर होता है लेकिन हाँ प्रयासरत ज़रूर रहता है। पाँच-छह साल पहले, लोगों की शायद ऐसी समझ थी कि साहित्य कुछ और है और राजनीति कुछ और। अब मुझे लगता है कि चीजें बदल गई हैं क्योंकि पूरी की पूरी दुनिया ही एक अलग ही देस-काल में जा चुकी है। हम इस बात से इनकार नहीं कर सकते हैं कि साहित्य और राजनीति को दो अलग-अलग चीज मानने वाले साहित्यकारों, लेखकों का एक पूरा समूह था, लेकिन असलियत यह है कि चाहे आप कितना भी सोचें कि आप गैर-राजनीतिक लिख रहे हैं, आपकी राजनीति तो उसमें झलक ही जाती है।

प्रश्न: सन् 2000 के दशक में जब आप लोगों के आंदोलनों की बात कर रही थीं तब आप पर “सेलिब्रिटी” होने का आरोप लगता था। लेकिन अब हम सभी एक ऐसी दुनिया में जी रहे हैं जहां सोशल मीडिया इंफ्ल्युएंसर्स का दबदबा है, और अब हर कोई सेलिब्रिटी होना चाहता है। ऐसे में आप इस नई दुनिया का मूल्यांकन कैसे करती हैं? उसे कैसे देखती हैं?

उत्तर: जब मैंने दी गॉड ऑफ स्मॉल थिंग्स लिखा, तब अचानक ही लगभग सभी पत्रिकाओं के कवर पर मेरी तस्वीर छपने लगी और मैं एक सेलिब्रिटी बन गई। उसके बाद जब मैंने दी एंड ऑफ़ इमेजिनेशन लिखा और नर्मदा पर लिखने लगी तब ग़ुस्से की एक लहर उठ गई।

आपको ऐसे दौर से गुजरना ही होता है जब लोग आपको ग़लत समझ लेते हैं, आपको तरह-तरह के नाम देने लगते हैं, आपके इरादों पर सवाल उठाने लगते हैं। मुझे लगता है कि मेरी माँ मेरी रॉय के साथ रहने के दौरान जो ट्रेनिंग मिली उससे मुझे अपने हिस्से के इस दौर से निकलने में मदद मिली। मैंने ठान लिया कि मैं केवल वही करती रहूँगी जो मुझे करना है, तब तक, जब तक कि लोग थक न जाएँ, ऊब न जाएँ, या फिर कम से कम इस बात को ना समझ लें कि उनके लगाए आरोप सच नहीं हैं। मज़ेदार बात यह है कि जब मैं उन निबंधों को लिख रही थी तब मुझे पता था कि मुझे लोगों की नफ़रत का सामना करना पड़ेगा। लेकिन मैं वैसे भी पसंद किए जाने के लिए नहीं लिख रही थी। उस समय लाइक बटन जैसी कोई चीज नहीं थी। मुझे तो हैरानी होती है कि कभी ऐसा भी था। क्योंकि आज तो भले ही आप वैकल्पिक मीडिया में ही क्यों ना हों, आपको लोगों को पसंद आना ही होता है, यह एक तरह की मजबूरी हो गई है। आपको किसी ना किसी समूह का हिस्सा बनना ही पड़ता है। जबकि तब मैं कहीं की नहीं थी – मैं तो बस वही कह रही थी जो मुझे सही लगता था।

अब स्थिति बदली है, ऑनलाइन की वजह से एक स्तर पर लोकतांत्रिकरण तो हुआ है। लेकिन यह भी सच है कि यह पूरी तरह कॉर्पोरेट के नियंत्रण में है। सबको ऑनलाइन धकेल दिया जाता है, और फिर महीनों तक इंटरनेट बंद कर दिया जाता है। जैसा कि कश्मीर में किया गया। यह कुछ कुछ ऐसा है कि आप आर्थिक रूप से, मीडिया के स्तर पर सबको ऑनलाइन जाने को मजबूर कर देते हैं और फिर बटन दबाकर उसे अपने नियंत्रण में ले लेते हैं। और जैसे ही चीजें आपकी पसंद से अलग होने लगती हैं आप स्विच ऑफ कर देते हैं। और हम सब सोचते रहते हैं कि हम आज़ाद हैं… जबकि सच कुछ और ही है।

प्रश्न: किताब में आपने लिखा है कि आप अकेले सोचना चाहती थीं। लेकिन क्या सोशल मीडिया के समय में अकेले सोचना आसान है?

उत्तर: मैं तो कहूँगी कि हफ़्ते में कुछ दिन इसे पूरी तरह से स्विच ऑफ़ कर देना चाहिए। मुझे सोशल मीडिया से कोई व्यक्तिगत दुश्मनी नहीं है। मैं फ़ेसबुक या किसी और से (मार्क ज़करबर्ग की राजनीति अलग बात है) कोई समस्या नहीं है। मैं सोशल मिडिया पर इसलिए नहीं हूँ क्योंकि मुझे इस बात का डर रहता है कि मेरा दिमाग़ हमेशा ही बेवजह के शोर से भरा रहेगा, और यह भी कि मुझे ठहरने और ठहर कर सोचने तक का समय भी नहीं मिलेगा। क्योंकि जब आप अकेले भी होते हैं तब भी आप कभी अकेले नहीं होते।

जैसा कि मैंने अपनी किताब में लिखा ही है, मेरा बचपन नदी किनारे बीता, गिलहरियों के साथ, जहां ना तो कोई दुकान थी और ना ही रेस्टोरेंट और ना ही कोई सिनेमा हॉल ही, फ़ोन भी नहीं था। यही मेरी शख़्सियत की बुनियाद है, और मैं मानती हूँ कि यह मेरा सौभाग्य था। आज तो लोग अपना दिमाग़ विकसित होने से पहले ही हाथों में फ़ोन थाम ले रहे हैं और उसके साथ ही बड़े हो रहे हैं। लोगों के सामने जानकारियों और सूचनाओं का अंबार है, इतनी जानकारियाँ जितना कोई इंसानी दिमाग़ कभी सम्हाल ही नहीं सकता।
इसलिए मुझे लगता है कि हम एक बड़े मानसिक स्वास्थ्य संकट की ओर बढ़ रहे हैं। पहले कहा जाता था कि पागलपन का संबंध दिमाग़ में सुनाई देनी वाली आवाज़ों से होता है। लेकिन अब स्थिति ऐसी है कि आप कभी अकेले नहीं होते। ये आवाज़ें, ये शोर हमेशा ही आपके साथ होती हैं।

प्रश्न: हमें उस ट्रस्ट के बारे में बताइए, जिसे आपने पैसे बाँटने के लिए बनाया। आप उस काम की बात करती हैं, जिसे किया जाना ज़रूरी है लेकिन जिसे फंडिंग नहीं मिलती।

उत्तर: मैंने एक लेख लिखा था – ‘कैपिटलिज़्म: द घोस्ट स्टोरी’ के नाम से। इसमें मैंने यह बताया था कि चैरिटी असल में वह तरीक़ा है जिसका इस्तेमाल बड़े-बड़े कॉर्पोरेट हाउस अपनी पकड़ को मज़बूत बनाने के लिए करते हैं। वे न सिर्फ असर डालते हैं बल्कि पॉलिसी बनाने की प्रक्रिया को अपने क़ब्ज़े में भी ले लेते हैं। इसलिए एक मज़बूत आलोचना और इन कॉरपोरेट संस्थाओं के प्रति गहरी नाराज़गी विकसित हुई। पता था कि वे अधिकारों को चैरिटी में बदल रहे हैं, कार्यकर्ताओं को कर्मचारी बना रहे हैं, यह सब चल रहा था।

जब मुझे अपनी किताबों से मेरी ज़रूरत से ज़्यादा पैसा आने लगा तब पहला विचार जो मेरे मन में आया वह यह था कि लोग इस बात को कह ही नहीं पाते हैं कि मुझे इतने पैसों की ज़रूरत नहीं है। मैं खुश हूँ। मैं किसी तरह का कोई त्याग नहीं कर रही। मैं मनचाहे कपड़े पहनती हूँ, मौज-मस्ती करती हूँ तो फिर जो अधिक है उसे दूसरे के साथ क्यों ना बाटूँ?

लेकिन अब यह एक नाज़ुक प्रक्रिया हो गई है कि इस काम को कैसे किया जाए। कैसे स्पष्ट किया जाए कि यह एक राजनीतिक एकजुटता का काम है, न कि दान या खैरात। यह किसी अपराधबोध से किया गया काम नहीं है।
यह मेरे बाप का पैसा नहीं है, यह मैंने अपनी मेहनत से कमाया है। यह वही बात है जैसे कि राजनीतिक चीज़ें व्यक्तिगत होती हैं और व्यक्तिगत चीज़ें राजनीतिक।
इसी सोच के साथ हमने यह ट्रस्ट बनाया – उन लोगों के साथ मिलकर जिन्हें मैं प्यार करती हूँ और जिनकी राजनीतिक समझ मेरी राजनीतिक समझ से मेल खाती है। इसका पूरा मक़सद यही था कि हम किसी पर सिर्फ़ पैसा नहीं फेंकेंगे। अगर कोई पहले से कुछ काम कर रहा है और उसे थोड़ा सहारा चाहिए, तभी मदद करेंगे। लेकिन सिर्फ़ पैसे देकर किसी को नया काम शुरू कराने की बात नहीं थी। शर्त यही थी कि वह आदमी या संस्था पहले से ही उस काम में लगा हो।

दूसरी बात, बहुत सारे लोग ऐसे हैं जिन्हें यह एनजीओ वाली मशीनरी चलाना नहीं आता, न प्रस्ताव लिखना आता है, न अंग्रेज़ी में काग़ज़ तैयार करना ही। लेकिन वे सभी लोग बहुत अच्छा काम कर रहे हैं, उन्हें बस थोड़ी सी मदद चाहिए – कभी सफ़र का ख़र्च, कभी ज़िंदा रहने भर की सहूलियत।

यह कोई अपने लिए किया जाने वाला काम नहीं है। यह जनता का पैसा है, और इसे ज़िम्मेदारी से इस्तेमाल करना ज़रूरी है। और मुझे लगता है कि लोग  – लेखक वग़ैरह – पैसों के बारे में लिखते ही नहीं हैं।

प्रश्न: आप हिंदू राष्ट्रवाद और कॉर्पोरेट हितों के मेल के मिश्रधातु (alloy) के बारे लिखती हैं। पिछले 11-12 वर्षों में इसने न सिर्फ़ भारत, बल्कि हमारे आसपास की दुनिया को कैसे आकार दिया है?

उत्तर: “द डॉक्टर एंड द सेंट” में मैंने लिखा था, अगर आप ज़रा गौर से देखेंगे कि ये निगम कौन हैं और ये परिवार किस जाति से हैं…तो इससे क्या पता चलता है?

यह सिर्फ़ हिंदू राष्ट्रवाद की बात नहीं है। यह तो एक तरह से जाति को आधुनिक और कॉर्पोरेट रूप में ढालने जैसा है। यह बिल्कुल चौंकाने वाली बात है। फिर आप न्यायाधीशों को देखिए, मीडिया को देखिए, उसके मालिकान को देखिए — सब मिलाकर यह ऐसा है जैसे आप एक रंगभेदी (अपार्थाइड) समाज चला रहे हों, लेकिन वह रंग पर आधारित नहीं है, बल्कि किसी और कोड पर आधारित है। इसका मक़सद क्या है? इसका मक़सद केवल इतना है कि राष्ट्रवाद के भेस में, कुछ ख़ास जातियाँ, सत्ता पर क़ाबिज़ बनी रहें। और धन-संपत्ति धीरे-धीरे और भी कम लोगों के हाथों में सिमटती चली जाए।

 

प्रश्न: हाल ही में आपकी किताब “आज़ादी” पर कश्मीर में प्रतिबंध लगा दिया गया। आपके ख़िलाफ़ यूएपीए (UAPA) के मुक़दमे हुए, आप जेल भी गईं। लेकिन फिर भी आप किताब में लिखती हैं “जितना मुझे देशद्रोही कहकर सताया गया, उतना ही मुझे यक़ीन होता गया कि भारत ही वह जगह है जिसे मैं प्यार करती हूँ, भारत ही मेरी अपनी जगह है।” इस पर क्या कहेंगी?

उत्तर: पश्चिमी देशों में रहने वाले बहुत सारे लोग थोड़ा अभिमान के साथ मुझसे पूछते हैं कि “तुम इस जगह को छोड़ क्यों नहीं देती? या क्या तुम इस जगह को छोड़ने के बारे में सोचती हो?” अब आप ही सोचिए कि यह कैसा सवाल है? वहाँ जाकर मैं क्या करूँगी? एक चूहे की तरह अपना जीवन बिताऊँगी, चुपचाप रहूँगी, बिना कुछ किए?

यहाँ रहकर आप कम से कम ऐसी चीज के लिए लड़ रहे हैं जिससे आपको प्यार है। इस जगह के बारे में बहुत-सी बातें हैं जिन्हें इंसान सचमुच प्यार करता है। वही गुस्से को ऊर्जा देती हैं। ऐसा नहीं है कि आपको कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। और हम सबको याद है कि अच्छे दिनों में इज़्ज़त का क्या मतलब हुआ करता था, जो अब ग़ायब हो चुका है — सामाजिक रूप से भी, राजनीतिक रूप से भी। अब लोग बिना वजह इतराते-घूमते हैं और यह बेहद शर्मनाक है। मुझे किसी तरह का कोई राष्ट्रीय गर्व नहीं है। जब तक कोई मुझे यह न बता देता कि आखिर किस बात पर मुझे गर्व होना चाहिए। मुझे इस जगह से बहुत प्यार है, लेकिन राष्ट्रीय गर्व जैसा कोई भाव मेरे भीतर नहीं है।

इस बातचीत को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।

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