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  • कथा-कहानी
  • हिन्दी के विद्वान और ‘कौन बनेगा करोड़पति’

    कल हिन्दी दिवस है। हिन्दी का उत्सव मनाने या इसकी उपयोगिता बताने से पहले सवाल यह उठता है कि हमें कितनी हिन्दी आती है? अगर ‘कौन बनेगा करोड़पति’ केवल हिन्दी के विद्वानों के लिए हिन्दी भाषा सम्बन्धित प्रश्न से ही खेला जाए, क्या तब भी जीतना किसी के लिए आसान होगा? प्रचण्ड प्रवीर की नवीनतम कथा कौन बनेगा करोड़पति’ में कुछ मूलभूत प्रश्न उठाए गए हैं। उनके निशाने पर ‘केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय’ और ‘हिन्दी वर्तनी का मानकीकरण’ हैं। यह कथा गम्भीर विमर्श की माँग करती है। — मॉडरेटर

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    हिन्दी के विद्वान और ‘कौन बनेगा करोड़पति’

    भूमिका

    हिन्दी के प्रोफेसर सतीश शाह को बातोँ-बातोँ मेँ पता चला कि गुरुग्राम मेँ एक कसीनो चलता है। उन्होँने वहाँ अपनी किस्मत आजमाने की सोची। दुर्भाग्य से वहाँ जुआ खेलने से पहले उनकी मुलाकात हिन्दी के ब्रिटिश विद्वान ‘डैनी डोरबेल’ से हुई। जब कोई विदेशी हो तो अपने-आप विद्वान हो जाता है क्योँकि साहित्य का सर्वोच्च मानदण्ड वाला बुकर प्राइज वहीँ से आता है।
    डैनी डोरबेल ने सतीश शाह पर हँसते हुए कहा, “हम आपकी विद्वत्ता की कद्र करते हैँ। आप जुए मेँ पैसा क्योँ लुटाना चाहते हैँ। आइए हम और आप खेलते हैँ, ‘कौन बनेगा करोड़पति’। वैसे हिन्दुस्तान वाले तो नकलची होते ही हैँ। आपलोग ने ‘हू वान्ट्स टू ब अ मिलियनअर’ की तर्ज पर ‘कौन बनेगा करोड़पति’ बना दिया। पर हम जैसे दयालु आप से लूटे हुए पैसोँ को आप पर ही लुटाएँगे। सिर्फ और सिर्फ आपके लिए हम इस खेल को बड़ा आसान बना देते हैँ। आपसे आपकी पसन्द के विषय का सवाल पूछा जाएगा। गलत जवाब पर भी खेल से बाहर नहीँ किया जाएगा, बल्कि सही जवाब की प्रतीक्षा मेँ और प्रश्न किए जाएँगे।”
    सतीश शाह ने अपनी विद्वत्ता का दावा ठोँकते हुए कहा, “आप मुझसे मेरे विषय का सवाल पूछिए। हिन्दी का सवाल। देखिए मैँ कैसे चुटकियोँ मेँ करोड़ रुपए जीत जाऊँगा, बिल्कुल उसी तरह जिस तरह मैँने चुटकियोँ मेँ डिजिटल अरेस्ट मेँ अपने पचहत्तर लाख गँवा दिए थे।”
    डैनी डोरबेल ने हँस कर पूछा, “क्या आप अपने विद्यार्थियोँ से इम्तिहान मेँ वह पूछते हैँ जो उन्होँने रट रखे होते हैँ या फिर वह पूछते हैँ जो आप ठीक समझते हैँ?”
    “सिलेबस से ही सवाल पूछा जाता है।” कह कर सतीश शाह अपनी विद्वत्ता पर मुस्कुराए। “अब देखिए मुझसे ‘जन-गण-मन’ या ‘वन्दे मातरम’ पूरा सुनाने को नहीँ कहिएगा। भले ही राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत मुझे याद नहीँ, इसका यह मतलब नहीँ कि मैँ देशभक्त नहीँ हूँ। विद्वानोँ की अनभिज्ञता क्षम्य ही माननी चाहिए। उनका तिरस्कार नहीँ करना चाहिए क्योँकि सर्वज्ञ कोई हो ही नहीँ सकता।”
    “कौन कमबख्त देशभक्ति के बारे मेँ पूछ रहा है? मैँ तो आपसे केवल हिन्दी के सवाल ही पूछूँगा जिसके जवाब, कायदे से किसी विद्वान को आने ही चाहिए। चलिए शुरू करते हैँ ‘कौन बनेगा करोड़पति’।”

    कौन बनेगा करोड़पति

    पहला सवाल : डैनी डोरबेल ने पहला सवाल पूछा, “चूँकि आप हिन्दी के विद्वान हैँ इसलिए आपको हिन्दी वर्णमाला आती ही होगी। ये मत कहिएगा कि रस सिद्धान्त और ध्वनि सिद्धान्त की तरह मैँने आखिरी बार एम.ए. मेँ पढ़ा था। आप दिए गए चार विकल्पोँ मेँ चुन कर बताइए कि हिन्दी के स्वर वर्ण कौन से हैँ?”

    सतीश शाह ने अपने कम्प्यूटर की स्क्रीन पर विकल्प चुना, “अ आ इ ई उ ऊ ऋ ए ऐ ओ औ अं अः”।
    डैनी डोरबेल ने मुस्कुरा कर कहा, “गलत जवाब। अनुस्वार ( ं ) और विसर्ग ( ः) स्वर वर्ण मेँ नहीँ आते। लानत है आप पर कि आप को यह मामूली जवाब नहीँ मालूम।”
    सतीश शाह घबरा कर बोल उठे, “जिस चीज की उपयोगिता न हो, वह छूट जाती है। यह ज्ञान नहीँ, तथ्य है। यदि मुझे यह तथ्य नहीँ पता तो इससे मेरे ज्ञानी होने पर या विद्वान होने पर कोई संशय उठाता है तो वह मक्कार है।”
    डैनी डोरबेल ने उन्हेँ शान्त कराया, “घबराए नहीँ। इस खेल मेँ अभी आप खेल से बाहर नहीँ हुए हैँ। हमारे खेल मेँ आप अपनी इच्छा से ही बाहर जाएँगे। मैँ तो बस आपको इतना याद दिलाना चाहूँगा कि करीब-करीब हिन्दुस्तान के सभी पढ़े-लिखे लोग को अंग्रेजी का ‘अल्फाबेट’ याद होगा पर उनमेँ से चौथाई से भी कम को हिन्दी वर्णमाला कण्ठस्थ है। कभी दिल करे तो छोटा सा ‘सर्वे’ कर के देख लीजिए कि कितनोँ को वर्णमाला आती है। अच्छा, ये बताइए कि आपका यहाँ आना कैसे हुआ? आप कुछ डिजिटल अरेस्ट की बात कर रहे थे?”
    सतीश शाह ने कहा, “दरअसल बहुत से विद्वान भी कभी-कभी धोखा खा जाते हैँ। मैँ भी डिजिटल अरेस्ट का शिकार हु। सामने वाला इंस्पेक्टर बनकर मुझे मेरे ही घर के कमरे मेँ बन्द कर तीन दिन तक डराता रहा। उसने कहा कि सरकार का विरोध करने के कारण मेरा जेल जाना तय है। मैँ उनका मनोरञ्जन करने के लिए अपनी कच्ची-पक्की कविताएँ और उर्दू की ग़ज़लेँ सुनाता रहा। लेकिन इससे कुछ खास न हुआ और विधाता के विधान से, कुछ अपने अज्ञान से और कुछ फ्रॉडस्टर्स के बाण से पचहत्तर लाख रुपए किसी और के अकाउण्ट मेँ चले गए।”
    डैनी डोरबेल ने कहा, ”आगे क्या हुआ होगा, मुझसे सुनिए। जब आपको यह मालूम हुआ कि आप उल्लू बन गए हैँ तब आपने असली वाले थाने मेँ अपने उल्लू बनने की शिकायत की होगी। शायद फिर आपने कहा होगा कि पुलिस बीसवीँ सदी की है और फ्रॉडस्टर को तुरन्त पकड़ क्योँ नहीँ लेती। जाहिर है कि असली वाले इंस्पेक्टर ने वहीँ बजा फरमाया होगा कि बनाने वाला तो ऊपर वाला है, नीचे वाले केवल साबित करते हैँ। अगर पुलिस बीसवीँ सदी की है तो आपका भोलापन भी तो उन्नीसवीँ सदी का है।”
    सतीश शाह कमजोर दिल वाले थे। एक तो उन्हेँ इस नुकसान का बड़ा सदमा लगा था, दूसरा सामने बैठा ब्रिटिश विद्वान उनका अपमान कर रहा था। वे बिचारे कैसे बताते कि रुपए की क्षति की भरपायी करने के लिए उन्होँने ऑनलाइन गेम्स खेलने शुरू किया था ताकि जल्दी से पैसा बने। लेकिन दशक भर की नीँद के बाद जागी सरकार ने वे भी आनन-फानन मेँ बन्द करवा दिए। इस तरह वे अपनी बेबसी जाहिर न कर सके।

    दूसरा सवाल : डैनी डोरबेल ने दूसरा सवाल किया, “इन चारोँ मेँ से कौन ‘अयोगवाह’ नहीँ है?
    विकल्प — १) यम २) अनुस्वार ३) विसर्ग ४) सन्ध्यक्षर।”

    सतीश शाह ने थोड़ा सोचा और पहला विकल्प ‘यम’ को चुन लिया। डैनी डोरबेल ने कहा, “फिर से गलत जवाब। सही उत्तर है– सन्ध्यक्षर। ये तो आपको पता ही होगा कि सन्ध्यक्षर किसे कहते हैँ। वही अंग्रेजी मेँ जिसे डिफ्थॉङ् कहते हैँ।”
    लज्जित सतीश शाह डैनी डोरबेल का मुँह ताकने लगे। डैनी डोरबेल ने कहा, “हम ब्रिटिश के विद्वानोँ को ही हिन्दुस्तानियोँ को अब हिन्दी सिखानी पड़ेगी। चलिए आपकी जानकारी के लिए बता दूँ कि अयोगवाह उन वर्णोँ को कहते हैँ कि जिनका स्वतन्त्र उच्चारण नहीँ होता। अयोगवाह अपने आश्रयभूत वर्ण का स्थान पा लेते हैँ। तात्पर्य यह कि जो स्थान इनके आश्रयभूत वर्ण का हो, वही इनका भी हो जाता है।
    दरअसल बहुत से हिन्दी के विद्वानोँ को शब्द-योजना और अनुस्वार का ठीक से पता ही नहीँ है। अनुस्वार स्वर भी है और व्यञ्जन भी। पञ्चमाक्षर के विरुद्ध हिन्दी विद्वानोँ के सौतेले व्यवहार का औचित्य समझ से परे है। यदि हम — पंकज -> पङ्कज, गंगा -> गङ्गा, चंचल -> चञ्चल, मंजूषा -> मञ्जूषा, कंठ -> कण्ठ, संत -> सन्त, संध्या -> सन्ध्या, मंदिर -> मन्दिर, संपादक -> सम्पादक, संबंध -> सम्बन्ध — लिखने लगे, उस स्थिति मेँ हम हिन्दी की उस मूल स्थिति मेँ पहुँचेँगे जहाँ जैसा लिखा गया हो, वैसा ही पढ़ा जाए। यह हिन्दी भाषा का मौलिक स्वरूप है जिसमेँ अबीगुदा लिपि, उसे ‘अल्फाबेट’ और ‘अबजद’ लिपियोँ से अलग करती है। अंग्रेजी फोनेटिक भाषा नहीँ है किन्तु हिन्दी बहुत हद तक फोनेटिक है। यहाँ के अक्षर दरअसल ‘फोनीम’ हैँ, पर वह सब कभी और।
    दरअसल पञ्चामक्षर के प्रति इस तरह व्यवहार का उत्स वर्णमाला मेँ ‘ङ’, ‘ञ’ और ‘ण’ जैसे वर्णोँ से प्रारम्भ न होने वाले शब्दोँ के कारण अधिक जान पड़ता है। यहाँ तक कि बहुत कम लोग ही ‘ङ’ का स्वतन्त्र उच्चारण कर पाते हैँ। यह हमारा दुर्भाग्य है कि हिन्दी के बड़े से बड़े प्राध्यापक भी ‘श’, ‘ष’ और ‘स’ का उच्चारण भेद नहीँ कर सकते। यही स्थिति सतीश शाह आप की भी है।”
    सतीश शाह ने अपने अपमान का घूँट पी लिया क्योँकि उन्हेँ करोड़ रुपए जीतने का लालच था।

    तीसरा सवाल : डैनी डोरबेल ने तीसरे सवाल की भूमिका बाँधी। “हिन्दी मेँ वर्तनी के मानकीकरण और शब्दकोश के लिए बहुत से प्रयास हुए हैँ। चूँकि आप हिन्दी के विद्वान हैँ, अतः बताएँ कि ‘देवनागरी लिपि एवं हिन्दी वर्तनी का मानकीकरण’ पुस्तक किस संस्था के द्वारा निर्गत है?”
    विकल्प — १) महात्मा गान्धी अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा २) काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी ३) केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय, नई दिल्ली ४) केन्द्रीय हिन्दी संस्थान, आगरा
    सतीश शाह ने चौथे विकल्प का बटन दबा दिया। डैनी डोरबेल ने उनका हौसला बढ़ाते हुए कहा, “कोशिश करते रहिए। एक दिन आप सही उत्तर दे ही देँगे। इसका सही उत्तर कोई सजग विद्यार्थी भी बता ही देता, पर गुरु गुड़ रह गया और चेला चीनी हो गया। सही उत्तर है – ‘केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय, नई दिल्ली’। मैँ आपको एक लिङ्क दे रहा हूँ, जिस पर यह पुस्तक देखी और डाउनलोड की जा सकती है। केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय समय-समय पर हिन्दी के मानकीकरण के लिए दिशा-निर्देश देता रहा है तथा लिङ्क पर उपलब्ध अद्यतन संस्करण सन् 2024 का है। लिङ्क है:– देवनागरी लिपि एवं हिन्दी वर्तनी का मानकीकरण
    समस्या यह है कि इस पुस्तिका को कोई लेखक, कवि, सम्पादक, प्रोफेसर, मीडिया संस्थान देखना नहीँ चाहता। सब इस मुगालते मेँ हैँ कि उन्हेँ हिन्दी आती है और यदि वे ‘कौन बनेगा करोड़पति’ खेलने बैठ जाएँ तो बड़े बे-आबरू होके हमारे कूचे से निकलेँगे।

    [[ नोट : सतीश शाह हिन्दी के विद्वान थे। यहाँ चुटकुला नहीँ सुनाया जा रहा है। वे सचमुच मेँ विद्वान कहे जाते थे, इसलिए उनको हिन्दी का प्रोफेसर होना ही था। बहुत मेहनत करके उन्होँने डिग्री हासिल की थी। बीसवीँ सदी के उस दौर का चलन था कि किसी नाम वाले आदमी के चरण-चापन करने से (ही) नौकरियाँ मिलती थी। सो उनको भी नौकरी मिल गयी। दिन-रात हिन्दी का अध्ययन करके इस निष्कर्ष पर पहुँचे के हिन्दी के पठन-पाठन से काव्य-मीमांसा का विषय निकाल बाहर देना चाहिए क्योँकि वह दर्शन का विषय है; भाषातत्त्वशास्त्र की अलग पढ़ाई होनी चाहिए, क्योँकि वह अलग विषय समझा जाना चाहिए; रीतिकाल-भक्तिकाल जैसे साम्प्रदायिक विषय भी तत्काल साहित्य से बेदखल कर देना चाहिए; कुछ भी जो डेढ़ सौ साल से पुराना है, वह अविलम्ब कूड़ेदान मेँ जाना चाहिए। वे अपने निष्कर्ष को अन्तिम सत्य मान बैठे, जैसा कि बहुत से हिन्दी के सम्पादक प्रायः करते ही हैँ।
    ऐसा हुआ कि सतीश शाह ने यह अन्तिम सत्य निकाला कि हिंदी कभी भी एक स्वाभाविक साहित्यिक भाषा थी ही नहीँ। हम जो हिन्दी में लिखते पढ़ते हैं वह असल मेँ उर्दू या हिन्दुस्तानी की प्रतिक्रिया में जबरन गढ़ी गई साहित्यिक भाषा है जिसका अपना कोई जन समाज ही नहीँ है। आज भी इस जन समाज की कविता की भाषा उर्दू ही है इसमें शायद ही किसी को सन्देह न होगा। जिसे सन्देह हो वह कहीँ भी चार लोगों के बीच फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ या अली सरदार ज़ाफरी का एक शेर सुनाए और शैलेन्द्र की हिन्दी कविता की चार पंक्तियाँ सुनाकर देख ले। पता चलेगा कि किसी को शैलेन्द्र, नीरज, दुष्यन्त, दिनकर, विष्णु खरे समझ नहीँ आते हैँ किन्तु ‘क़ैफ़ी आज़मी’ और ‘दाग़ देहलवी’ सबके गले से उतर रहा है।
    खैर सतीश शाह की जितनी समझ थी, वह थी ही। उसमेँ हम और आप क्या कर सकते हैँ। थे तो वे विद्वान ही। अभी डैनी डोरबेल उनकी विद्वत्ता को चुनौती दे रहे थे। ]]

    चौथा सवाल : डैनी डोरबेल सतीश शाह के चेहरे पर आए पसीने का निर्बाध आनन्द ले रहे थे। इस बार सतीश शाह कुछ चौकन्ने बैठे थे। उन्हेँ क्या मालूम था कि यह पूरा सवाल-जवाब छुपे कैमरोँ से रेकॉर्ड किया जा रहा था, जिसके लिप्यान्तरण और टिप्पणी से यह कथा कही जा रही है। चौथा सवाल स्क्रीन पर आया। “इनमेँ से किस विकल्प की वर्तनी अशुद्ध है:–
    विकल्प — १) मैँ, २) नहीँ, ३) विकल्प १ और २, ४) सभी विकल्प शुद्ध।”
    सतीश शाह ने विकल्प ३ चुना। डैनी डोरबेल ने कहा, “गलत जवाब। सही उत्तर है– ‘सभी विकल्प शुद्ध।’ सतीश शाह उखड़ गए और एकदम से खड़े होकर बिलबिलाते हुए बोले, “हम जीवन भर हिन्दी पढ़-पढ़ा रहे हैँ, और आप हमेँ बताएँगे कि शुद्ध क्या है और अशुद्ध क्या है? व्यञ्जन वर्णोँ पर लगी स्वर वर्ण की मात्राओँ मेँ कभी चन्द्रबिन्दु लगता है? वहाँ केवल बिन्दी लगनी चाहिए। एक तो हम हर जगह से चन्द्रबिन्दु हटा कर, पूर्णविराम हटा कर हिन्दी को उर्दू बनाए जा रहे हैँ कि हंस और ‘हँस’ मेँ कोई भेद न हो, आप पिछड़ेपन का सुर छेड़ रहे हैँ। आप प्रगतिशीलता नहीँ समझ पा रहे हैँ। आपकी समझ ही कम है। पर यहाँ तो मामला एकदम अलग है। यह तो सरासर मूर्खता है। यह तो सीधे-सीधे गलत वर्तनी का मामला है। ”
    डैनी डोरबेल ने कहा, “एक गिलास ठण्डा पानी पीजिए। पहले केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय द्वारा जारी पुस्तिका पढ़िए। आपको तकलीफ है तो मैँ पढ़ देता हूँ। आप कम से कम उनकी बात तो मानेँगे?

    मानकीकरण का सिद्धान्त

    डैनी डोरबेल की बात सुन कर सतीश शाह शान्त हुए। डैनी डोरबेल ने “देवनागरी लिपि एवं हिन्दी वर्तनी का मानकीकरण” से एक अंश पढ़ना शुरू किया :—

    3.6 अनुस्वार ( ं ) तथा चंद्रबिंदु (ँ )

    3.6.1 अनुस्वार (शिरोबिन्दु)
    3.6.1.1 संस्कृत शब्दोँ मेँ अनुस्वार का प्रयोग अन्य वर्गीय वर्णों (‘य’ से ‘ह’ तक) से पहले यथावत् रहेगा, जैसे—संयोग, संरक्षण, संलग्न, अंश, कंस, सिंह।
    3.6.1.2 संयुक्त व्यंजन के रूप में जहाँ पंचम वर्ण (पंचमाक्षर) के बाद सवर्गीय शेष चार वर्णों में से कोई वर्ण हो तो एकरूपता के लिए अनुस्वार का ही प्रयोग करना चाहिए, जैसे—पंकज, गंगा, चंचल, मंजूषा, कंठ, संत, संध्या, मंदिर, संपादक, संबंध आदि।
    3.6.1.3 यदि पंचमाक्षर के बाद किसी अन्य वर्ग का कोई वर्ण आए तो पंचमाक्षर अनुस्वार के रूप में परिवर्तित नहीं होगा। जैसे—उन्मुख, वाङ्मय, अन्य, चिन्मय।
    3.6.1.4 पंचम वर्ण यदि द्वित्व रूप में (साथ-साथ) आए तो वह अनुस्वार में परिवर्तित नहीं होगा। जैसे अन्न, सम्मेलन, सम्मति आदि।
    3.6.1.5 संस्कृत के कुछ तत्सम शब्दों के अंत में अनुस्वार का प्रयोग ‘म्’ का सूचक है, जैसे—अहं (अहम् ) एवं (एवम्) शिवं (शिवम् )।

    3.6.2 चंद्रबिंदु (अनुनासिकता का चिह्न)
    3.6.2.1 हिंदी के शब्दों में उचित ढंग से चंद्रबिंदु का प्रयोग अनिवार्य होगा।
    3.6.2.2 अनुनासिक चिह्न व्यंजन नहीं है, स्वरों का ध्वनिगुण है। उदाहरण —आँ, ऊँ, एँ, माँ, हूँ, माँगें।
    3.6.2.3 चंद्रबिंदु के प्रयोग के बिना प्रायः अर्थ में भ्रम की संभावना रहती है , जैसे—हंस/ हँस, अंगना/अँगना आदि में। अतएव ऐसे भ्रम को दूर करने के लिए चंद्रबिंदु का प्रयोग अवश्य किया जाना चाहिए।
    3.6.2.4 हिंदी में चंद्रबिंदु का प्रयोग केवल तद्भव और देशज शब्दों के साथ होता है जैसे—आँख, चाँद, आँत, दाँत, गाँठ।
    3.6.2.5 अनुस्वार एवं चंद्रबिंदु के प्रयोग में आधारभूत अंतर
    अनुस्वार और चंद्रबिंदु के प्रयोग को लेकर बहुधा भ्रम की स्थिति रहती है और इसलिए समाचारपत्रों, पत्रिकाओं और कभी-कभी तो पाठ्यपुस्तकों में भी अनुनासिक के स्थान पर भी अनुस्वार का प्रयोग किया जाता है।
    (क) इन नासिक्य व्यंजनों (ङ, ञ, ण, न, म) के बाद यदि कोई सवर्गीय वर्ण आए तो नासिक्य व्यंजन अनुस्वार के रूप में अपने पूर्ववर्ती वर्ण के ऊपर आ जाते हैं।
    जैसे — चञ्चल -> चंचल, गङ्गा -> गंगा; पण्डित -> पंडित।
    (ख) वहीं हिंदी में चंद्रबिंदु का प्रयोग हिंदी में देशज और तद्भव शब्दों में प्रयोग किया जाता है।
    जैसे — आँख, माँ, साँस, यहाँ, वहाँ, हँसनाा।
    ऐसे शब्दों में जहाँ स्वरमात्राएँ शिरोरेखा के ऊपर लगती हों वहाँ स्थानलाघव के लिए चंद्रबिंदु के स्थान पर केवल बिंदु का प्रयोग होता है।
    जैसे— मे + ँ = में। इसी प्रकार खिंचाई, खींचना, बेंत, भैंस, चोंच, भौंरा इत्यादि।
    हिंदी में अकारांत, आकारांत, इकारांत, ईकारांत, उकारांत एवं ऊकारांत स्त्रीलिंग शब्दों के बहुवचन रूपों में चंद्रबिंदु का ही प्रयोग होता है। जैसे — लड़कियाँ, लताएँ, चींटियाँ, नदियाँ, महिलाएँ, ऋतुएँ, वस्तुएँ, वधुएँ, रीतियाँ।
    (ग) अनुस्वार और चंद्रबिंदु की उच्चारण प्रक्रिया भिन्न है। अनुस्वार में प्रश्वास जहाँ नासिका से निकलता है, वहीं अनुनासिक में नासिक और मुँह दोनों से निकलता है।

    मानकीकरण पर विमर्श

    सतीश शाह विजयी मुस्कान से बोले, “देखा, लिखा हुआ है ना कि जहाँ स्वरमात्राएँ शिरोरेखा के ऊपर लगती हों वहाँ स्थानलाघव के लिए चन्द्रबिन्दु के स्थान पर केवल बिंदु का प्रयोग होता है।”
    डैनी डोरबेल ने कहा, “बिल्कुल लिखा हुआ है। पर यह ‘मैँ’ और ‘नहीँ’ की वर्तनी को अशुद्ध कैसे कह रहा है, आपका यह तर्क समझ नहीँ आया।” सतीश शाह ने कहा, “आपको मेरी बात माननी पड़ेगी क्योँकि मैँ हिन्दी का विद्वान हूँ।”
    डैनी डोरबेल ने मुस्कुरा कर कहा, “अब आपका ऐसा दावा बेकार का है। हम जल्दी ही ऐसे युग मेँ प्रवेश करने वाले हैँ जहाँ सही-गलत का निर्णय ‘एलएलएम’ करेगा, ‘चैटजीपीटी’ करेगा। आपकी इस तरह की आपत्तियोँ को ब्रिटेन मेँ रहने वाले हिन्दी के विद्वान क्या, भारत मेँ भी कोई नहीँ पूछने वाला। वैसे मैँ यह कह रहा हूँ कि केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय ने गलत परिपाटी का निर्देश दिया है।
    एक उदाहरण ‘नींद’ शब्द की वर्तनी का लेते हैँ। शिरोबिन्दु के उपयोग से यह ‘नीन्द’ पढ़ी जा सकती है जैसे कि उर्दू भाषा का शब्द ‘जिन्द’ पढ़ा जाता है या ‘कुन्द’ का उच्चारण होता है। इस पर भाषाविदोँ की आपत्ति होगी कि यह उदाहरण ठीक नहीँ है क्योँकि इसकी श्रेणी दूसरी है जिसमेँ स्वरमात्राएँ शिरोरेखा के ऊपर लगती होँ वहाँ स्थानलाघव के लिए चन्द्रबिन्दु के स्थान पर केवल शिरोबिन्दु का प्रयोग होता है, अत: नींद से आशय ‘नीँद’ का है ‘नीन्द’ का नहीँ। लेकिन उनसे सवाल यह है कि क्या हम ‘जिन्द’ शब्द को ‘जिंद’ वर्तनी मेँ लिख कर ‘जिँद’ उच्चारण करने को तैयार हैँ?
    इसका सम्भवतया उत्तर होगा, हम उर्दू शब्दोँ के लिए ऐसा नहीँ करेँगे। यहाँ पर विनम्र निवेदन है कि इस तरह की क्लिष्टता और नियमोँ की बृहद सूची बनाने की अपेक्षा हम ‘मैँ’, ‘मेँ’, ‘भैँस’, ‘चोँच’ आदि लिखना प्रारम्भ कर देँ। मेरा यह कहना है कि अनुनासिक वर्णोँ के लिए चन्द्रबिन्दु के स्थान पर शिरोबिन्दु का प्रयोग भ्रामक है।
    मेरे पक्ष मेँ एक सुन्दर उदाहरण ‘हिन्दी’ शब्द की वर्तनी का है। मैँ पूछना चाहूँगा कि क्या हड़बड़ी और अल्पज्ञता मेँ बनाए गए अशुद्ध नियमोँ के कारण ‘हिंदी’ को ‘हिन्दी’ की अपेक्षा ‘हिँदी’ उच्चारण को स्वीकार कर लेँ? हमेँ भूलना नहीँ चाहिए कि अनुस्वार मेँ प्रश्वास जहाँ नासिका से निकलता है, वहीँ अनुनासिक मेँ नासिक और मुँह दोनोँ से निकलता है। ये भिन्न उच्चारण हैँ, जिसे केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय के भाषाविद् स्वयं स्वीकारते हैँ।
    आशय यह है कि जिस तरह अनुनासिक और अनुस्वार के उच्चारण मेँ भेद है, उस भेद को लिपि मेँ यथावत रखने हेतु चन्द्रबिन्दु की व्यवस्था है। केवल स्थानलाघव का तर्क खोखला है। यह तर्क प्रिण्ट की सीमाओँ की समस्या से उत्पन्न हुआ था। कम्प्यूटर और यूनिकोड के आने के बाद, यह केवल ‘फॉण्ट टाइप’ की समस्या है कि ‘वर्णोँ’, ‘कहीँ’, ‘नहीँ’ जैसे शब्दोँ मेँ स्वरमात्राओँ या रेफ के आस-पास चन्द्रबिन्दु के लिए समुचित स्थान बनाए। इसके कारण सम्भव है कि शब्द की चौड़ाई कुछ विस्तार ले जैसे कि ‘मैँने’ की वर्तनी स्पष्टता से प्रकट होने हेतु ‘मैंने’ वर्तनी की तुलना मेँ अधिक विस्तार ले सकती है। देवनागरी लिपि के लिए लाटेक (LaTex) मेँ प्रयुक्त हॉलैण्ड के स्कॉलर फ्रांस वेलथुइस का बनाया ‘वेलथुइस लिप्यन्तरण’ (Velthuis system of transliteration) और ‘वेलथुइस फॉण्ट’ चन्द्रबिन्दु के प्राकट्य हेतु ध्यातव्य हैँ। गूगल ने बहुत से ऐसे फॉण्ट बनाए हैँ जिससे शिरोरेखा के साथ चन्द्रबिन्दु का निर्वाह आसानी से हो जाता है। एप्पल कम्पनी के ‘आइफोन’ मेँ शिरोरेखा के पास चन्द्रबिन्दु का प्रयोग करने से चन्द्रबिन्दु का आकार स्वतः छोटा हो जाता है।
    अत: स्थानलाघव का लचर तर्क कम्प्यूटर और तकनीक के युग मेँ चलने वाला नहीँ है। चन्द्रबिन्दु की उपयोगिता हेतु पहले ही स्पष्ट किया जा चुका है कि हिन्दी भाषा का लिखित मौलिक स्वरूप ‘ध्वन्यात्मक लिपि’ (फोनीम) का है और ‘लिखित लिपि’ (ग्लाइफ) का नहीँ। अङ्ग्रेजी मेँ प्रयुक्त रोमन जैसी आक्षरिक लिपि मेँ अक्षरोँ से ध्वनि का अभ्यास से अनुमान लगाना पड़ता है, यह स्थिति हिन्दी के भाषा-दर्शन की नहीँ है।
    आपको करोड़ रुपए जीतने हैँ ना? चलिए, आगे खेलते हैँ।

    पाँचवाँ सवाल : डैनी डोरबेल ने पाँचवाँ सवाल किया। “इनमेँ से सही उच्चारण के लिए सबसे पुराना प्रामाणिक ग्रन्थ कौन है? विकल्प – १) शौनक का ‘ऋग्वेद प्रातिशाख्य’ २) किशोरीदास वाजपेयी का ‘हिन्दी शब्दानुशासन’ ३) कामताप्रसाद गुरु का ‘हिन्दी व्याकरण’ ४) मलिक मुहम्मद जायसी का ‘पद्मावत’।“
    सतीश शाह ने विकल्प ३ चुन कर अपनी विजय का डङ्का स्वयं पीटते हुए घोषित किया, “इस बार मैँ सही हूँ।” डैनी डोरबेल ने कहा, “फिर से गलत जवाब। सही उत्तर है– ‘ऋग्वेद प्रातिशाख्य’।
    उच्चारण के लिए वेदाङ्ग की ‘शिक्षा’ सम्बन्धित पूरे संसार मेँ सबसे प्राचीन ग्रन्थ माने जाते हैँ। वेदाङ्ग शिक्षा मेँ प्रमुख ग्रन्थ हैँ– याज्ञवल्क्य शिक्षा, नारदीय शिक्षा, भारद्वाज शिक्षा, पाणिनीय शिक्षा आदि। इसके अतिरिक्त प्रातिशाख्य ग्रन्थोँ मेँ उच्चारण की नियमावली निर्दिष्ट है। वेदोँ की अलग-अलग संहिताओँ के अलग-अलग प्रातिशाख्य मिलते हैँ। इन प्रातिशाख्योँ मेँ ध्वनितत्त्व और ध्वनि विकास सम्बन्धी विलक्षण संक्षिप्त कारिकाएँ कई अध्यायोँ मेँ दी गयीँ हैँ। उन कारिकाओँ को ठीक से समझने के लिए उन पर कई-कई भाष्य हैँ जो उनका अर्थ स्पष्ट करते हैँ। कुछ विद्वानोँ का मत है कि प्रातिशाख्य शास्त्र वैदिक शिक्षा के अन्तर्भूत हैँ। इसके विपरीत कतिपय अन्य विद्वानोँ का मत है कि प्रातिशाख्य शिक्षा-शास्त्र से पृथक् स्वतन्त्र शास्त्र है, जिसमेँ शिक्षा और व्याकरण, दोनोँ शास्त्रोँ के प्रतिपाद्य विषयोँ का समावेश है। अधिकतर प्रातिशाख्य ग्रन्थोँ का रचनाकाल पाणिनि से पूर्व का है। शौनकाचार्यकृत ऋग्वेद-प्रातिशाख्य का सम्बन्ध ऋक् संहिता से है। यह अठारह अध्याय मेँ है। इसे प्राचीनतम प्रातिशाख्य माना जाता है।

    सतीश शाह ने दाँत पीसते हुए कहा, “यह बेईमानी है। मैँने आपको प्रश्नोँ को हिन्दी तक समेटने के लिए कहा था। हिन्दी है ही कितनी पुरानी? डेढ़ सौ साल? बहुत पुरानी होगी तो आप उर्दू तक जाएँगे। आप संस्कृत ग्रन्थोँ का नाम कैसे ले सकते हैँ? हिन्दी संस्कृत से नहीँ, उर्दू से बनी है।”
    डैनी डोरबेल ने कहा, “आप बिलकुल ठीक कह रहे हैँ। आपको यह सब कहने के लिए हम शाबाशी देते हैँ पर अभी हम ‘कौन बनेगा करोड़पति’ खेल रहे हैँ और यहाँ बात विद्या की हो रही है। यहाँ आपके विश्वास और प्रस्थापनाओँ का कोई मोल नहीँ जब तक कि वे विद्वानोँ की बड़ी संस्था से स्वीकृत और प्रमाणित हो कर न आएँ। मुझे नहीँ लगता कि हिन्दी मेँ हम फारसी वर्णमाला का कभी भी प्रयोग करते हैँ। अगर हिन्दी वर्णमाला ऋग्वेद प्रातिशाख्य के ‘वर्ण समाम्नाय’ से भिन्न हो तो कहिए।”
    सतीश शाह ने पूरे जीवन मेँ कभी ‘प्रातिशाख्य’ का नाम नहीँ सुना था। वे डैनी डोरबेल को क्या उत्तर देते? उन्होँने एक छोटा-सा ब्रेक माँगा। इसी बीच उन्होँने ‘देवनागरी लिपि और हिन्दी वर्तनी का मानकीकरण’ पुस्तक अच्छे से पढ़ ली। वापस आकर सीट पर चुप बैठकर अगले सवाल की प्रतीक्षा करने लगे।

    छठा सवाल : “हिन्दी मेँ सन्ध्यक्षर ‘ऐ’ और ‘औ’ का उच्चारण कितने तरह से किया जाए।
    विकल्प- १) एक तरह से २) दो तरह से ३) तीन तरह से ४) चार तरह से”

    सतीश शाह ने मुस्कुराते हुए विकल्प २ चुन कर कहा, “मैँ जानता था कि आप सवाल उसी किताब से करेँगे। इस बार मेँ सही हूँ। रुकिए मैँ पढ़ कर सुनाता हूँ: —

    3.11 ‘ऐ’, ‘औ’ का प्रयोग
    3.11.1 हिंदी में ऐ (है), औ (लौ) का प्रयोग दो प्रकार के उच्चारण को व्यक्त करने के लिए होता है। पहले प्रकार का उच्चारण ‘है’, ‘और’ आदि मेँ मूल स्वरोँ की तरह होता है जबकि दूसरे प्रकार का उच्चारण गैया, नैया, भैया, कौवा आदि जैसे शब्दों में संध्यक्षरों (diphthongs) के रूप में आज भी प्रचलित है। नियमानुसार ‘य’ के पहले ‘ऐ’ होने से उसका उच्चारण ‘अई’ के रूप में होगा और ‘व’ के पहले ‘औ’ के होने पर उसका उच्चारण ‘अउ’ के रूप में होगा। दोनों ही प्रकार के उच्चारणों को व्यक्त करने के लिए इन्हीं चिह्नों (ऐ, औ) का प्रयोग किया जाए। अन्य उदाहरण हैँ —भैया, सैयद, तैयार, हौवा आदि।
    डैनी डोरबेल ने कहा, “गलत जवाब। सही विकल्प है – एक तरह से। मैँ जानता हूँ केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय ने क्या कहा है। पर मेरा मत शीशे की तरह साफ और एकदम तार्किक है। पुस्तक के अनुच्छेद 3.11 मेँ निर्देशित ‘ऐ’ और ‘औ’ संध्यक्षरोँ के दो उच्चारण की समस्या दरअसल भाषाविदोँ की अहमन्यता का परिणाम है। यह नियम बताना कि “य’ के पहले ‘ऐ’ होने से उसका उच्चारण ‘अई’ के रूप में होगा और ‘व’ के पहले ‘औ’ के होने पर उसका उच्चारण ‘अउ’ के रूप में होगा” वस्तुतः अशुद्ध और दोषपूर्ण है।
    पहली बात यह है कि लिखना यह चाहिए था कि – व के पहले ‘औ’ आने पर उसका उच्चारण ‘अऊ’ होना चाहिए था, ‘अउ’ नहीँ। यह सही है कि सन्ध्यक्षरोँ कुछ समानाक्षरोँ की सन्धि से, जैसे अ+ई और अ+ऊ से, या कहेँ कि आ+ई और आ+ऊ की छोटी इकाइयोँ (अणुओँ) से बनते हैँ। डिफ्थॉङ् (सन्ध्यक्षर) की परिभाषा ही है जीभ का दो स्थानोँ पर विचलन। किन्तु स्वर बनने के बाद इस तरह की सन्धि को याद करके एक भूल कर रहे हैँ, जिससे भ्रम अधिक फैलता है। दूसरी बात यह है कि अगर हम इन शब्दोँ की मूल वर्तनी को स्वीकार कर लेँ तब यह समस्या उत्पन्न होती ही नहीँ है।
    तदनुसार गैया, भैया, कौवा, सैयाँ, सैयद, तैयार, हौवा की वर्तनी उसके मूल वर्तनी के अनुरूप गैया -> गैय्या, भैया -> भैय्या, कौवा -> कौव्वा, सैयाँ -> सैँय्याँ, सैयद -> सैय्यद, तैयार -> तैय्यार, हौवा -> हौव्वा लिखना जाना चाहिए। एक सौ साल पहले की हिन्दी मेँ यही स्वरूप था, जिसे हमने सरलीकरण की छटपटाहट मेँ गड़बड़ कर दिया।
    जो ‘य’ से पहले ‘ऐ से उसका उच्चारण ‘अई’ और ‘व’ के पहले ‘औ’ का उच्चारण ‘अऊ’ का प्रयोग बता रहे हैँ, वे दरअसल अन्तःस्थ वर्णोँ की मूल योजना को भूले जा रहे हैँ। मैँ याद दिलाना चाहूँगा कि ये वे वर्ण हैँ जिनके उच्चारण मेँ जीभ, तालु, दाँत और होँठ पूरी तरह से स्पर्श नहीँ करते हैँ, बल्कि ये एक दूसरे के करीब आते हैँ, जिससे एक विशेष प्रकार की ध्वनि उत्पन्न होती है। इन्हेँ सेमी वॉवेल कहना भी अशुद्ध है। चार अन्तःस्थ वर्ण वस्तुतः संस्कृत के ‘अ’ के इतर चार मूल स्वर वर्णोँ से निःसृत हैँ, जो व्यञ्जन वर्णोँ मेँ ही गिने जाते हैँ:–
    इ –> य (सघोष तालव्य अन्तःस्थ)
    ऋ –> र (सघोष मूर्धन्य अन्तःस्थ)
    लृ –> ल (सघोष दन्त्य अन्तःस्थ)
    उ –> व (सघोष ओष्ठ्य अन्तःस्थ)

    अतः सुझाया गया वर्तनी परिवर्तन हिन्दी भाषा व्यवहार के लिए अधिक सुगम है।
    अब संध्यक्षर पर आते हैँ। संध्यक्षर दो स्वर वर्णोँ के मेल से बनने वाले नये स्वर को कहते हैँ जैसे ‘ए’, ‘ऐ’, ‘ओ’ और ‘औ’। हिन्दी मेँ ‘ए’ तथा ‘ओ’ को अलग स्वर माना गया है। अतः हिन्दी मेँ केवल ‘ऐ’ और ‘औ’ को संध्यक्षर माना गया है। पर ऐसा करना शुद्ध नहीँ प्रतीत होता, अस्तु।
    ऋक् प्रातिशाख्य और तैत्तिरीय प्रातिशाख्योँ मेँ ‘ए ऐ ओ औ’ को सन्ध्यक्षर कहा गया है। वहीँ कात्यायन कृत वाजसनेय प्रातिशाख्य के टीकाकारोँ ने ‘ए ए३ ऐ ऐ३ ओ ओ३ औ औ३’ को सन्ध्यक्षर माना है तथा स्वर वर्णोँ मेँ स्थान दिया है। अगर वाजसनेय प्रातिशाख्य की परिपाटी हिन्दी मेँ मान भी ली जाए, तो भी तीन मात्रा वाले ए३ (अै), तीन मात्रा वाले ऐ३ (एै), ओ३, औ३ (अै, एै, ओ३, औ३) का प्रयोग हिन्दी के मानकीकरण मेँ नहीँ होता। हिन्दी मेँ संस्कृत से भेद स्थापित किया जाता है, अतः इस पर अधिक बहस करने के बजाय हमेँ हिन्दी के प्रारम्भिक अवस्था की सही लेखन पद्धति और वर्तनी को स्वीकार करना चाहिए।
    अतः भैय्या, कौव्वा, तैय्यार जैसा लिखना ही शुद्ध होगा।
    वैसे भी केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय ने बड़ी-बड़ी गलतियाँ की हैँ। जैसे कि तत्सम शब्दोँ का सत्यानाश करना।

    तत्सम शब्दोँ का अशुद्ध तथा यादृच्छिक ग्रहण

    जैसे कि पुस्तिका के अनुच्छेद 3.7 (विसर्ग), 3.8 (हल् चिह्न) और 3.10 (स्वन परिवर्तन) के निर्देश परस्पर विरोधी और अतार्किक हैँ।
    3.10.1 तत्सम शब्दों की वर्तनी को ज्योँ-का-त्योँ ग्रहण किया जाए।
    3.8.3 शब्दों के अंत में आने वाला ‘हल्’ चिह्‌न हिन्दी की प्रकृति के अनुरूप नहीं है। अतः महान, राजन, तेजस, ओजस, जैसे शब्‍दों में ‘हल्’ चिह्‌न का प्रयोग नहीं होगा।
    3.8.3.1 संस्कृत से लिए गए अव्ययों में हल् चिह्‌न मूल भाषा के अनुसार अपरिवर्तित रहेगा।
    स्वनिक परिवर्तन के व्याज से हम हल् को यादृच्छिक प्रवृत्ति से ग्रहण करने का निर्देश दे रहे हैँ। पुस्तिका के उदाहरण (3.8.3) मेँ जगदीश के सन्धि विग्रह के लिए (जगत्+ ईश) हल् आवश्यक बताया गया है। किन्तु जगत्, महान् और विद्वान् के लिए हल् का प्रयोग वर्जित किया गया है। उपर्युक्त बिन्दुएँ तत्समोँ की देवनागरी लिपि मेँ ग्रहण के लिए यादृच्छिक प्रवृत्ति का द्योतक हैँ और साथ ही घोर भ्रामक हैँ।
    प्रयत्न लाघव के नाम पर हमने हिन्दी मेँ द्वित्व का लोप करने का अपराध भी किया है। हमने महत्त्व -> महत्व, तत्त्व -> तत्व, पाश्चात्त्य -> पाश्चात्य और प्रायश्चित्त -> प्रायश्चित की अशुद्ध वर्तनियाँ कुछ पीढ़ियोँ को सिखा दी है जो तत्सम शब्दोँ के देशज रूपान्तरण के नाम पर खिलवाड़ है। मैँ समझता हूँ कि इसके लिए केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय के पुराने निर्देश ही उत्तरदायी हैँ।
    सतीश शाह ने क्षुब्ध होकर कहा, “अभी तक आप मुझे अपने ऊलजलूल तर्कोँ के नाम पर मुझे, केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय को, हिन्दी के समस्त विद्वानोँ को अपमानित कर रहे थे। किन्तु अब और नहीँ। मैँ करोड़ रुपए पाने के लिए कोई और तरीका ढूँढूगा। किसी राजनैतिक पार्टी का एजेण्ट बन जाऊँगा या कहीँ और जुआ खेलूँगा। लेकिन अभी सातवाँ सवाल मैँ आपसे पूछता हूँ। यदि आप इसका सही जवाब दे पाए, तो आपको चाय मैँ पिलाऊँगा।”

    सातवाँ सवाल : सतीश शाह ने कहा, “आपने तीन मात्रा वाले स्वरोँ की बात की जैसे कि अै, एै, ओ३, औ३। क्या ये अंतरराष्ट्रीय स्वनविज्ञान मेँ कहीँ स्थान पाते हैँ या यह आपकी कपोल कल्पना है? यह आप कैसे कहते हैँ कि ‘अई’ और ‘अउ’ का लिखना दोषपूर्ण है? मैँ आपको कोई विकल्प नहीँ दे रहा है। आप यदि जानते हैँ तो बताइए कि स्वर वर्णोँ के उच्चारण की मानक योजना क्या है?

    यह सुनकर डैनी डोरबेल ने स्मित भाव से कहा, “दुनिया बहुत आगे निकल चुकी है। हिन्दी वालोँ को ना ठीक से हिन्दी आती है, ना ही वे अपनी किसी विरासत को अपना जानने या मानने को तैय्यार हैँ। आपने मुझे चुनौती दी है तो सुनिए। यह सामान्य सी बात जो कि हिन्दी के हर गम्भीर विद्यार्थी को अवश्य ही मालूम होनी चाहिए।
    स्वर वर्णोँ के ध्वन्यात्मक मानकीकरण निर्धारित करने के लिए ब्रिटिश भाषातत्त्वशास्त्री ‘डैनियल जोन्स’ ने सन् १९१७ मेँ मानव मुख के कई एक्सरे लेकर कुछ नतीजोँ पर पहुँचे। इस मानकीकरण मेँ उन्होँने ‘ऋ’ और ‘लृ’ को छोड़ दिया, जिसे वाजसनेय प्रातिशाख्य और ऋक प्रातिशाख्य स्वरोँ मेँ गिनते हैँ, पर तैत्तिरीय प्रातिशाख्य स्वरोँ मेँ नहीँ गिनता। शेष संसार भर के स्वरोँ का उच्चारण जिह्वा के सर्वोच्च बिन्दु के विभिन्न स्थानोँ पर स्थितियोँ के जाने से और होठोँ के सिकोड़ने से मापा जा सकता है। ऐसी परिस्थितियोँ को ‘वॉवेल बैकनेस’, ‘वॉवेल राउण्डनेस’ और ‘वॉवेल हाइट’ कहते हैँ; जिसके आधार पर संसार भर की फुस्फुसीय उत्क्रमण (पल्मोनिक एग्रेसिव) वाली भाषा के स्वरोँ की सारणी बनती है। वॉवेल बैकनेस से अग्रस्वर (=फ्रण्ट वॉवेल), केन्द्रीय स्वर (=सेण्ट्रल वॉवेल) और पश्च स्वर (=बैक वॉवेल) बनते हैँ। वॉवेल राउण्डनेस से होठोँ की स्थिति ‘प्रसृत’ (सामान्य खुला हुआ =अनराउण्डेड), ‘वर्तुल’ (=राउण्डेड) और ‘अर्द्धवर्तुल’ होती है। वॉवेल हाइट मेँ जीभ के मूर्धा की दूरी बताने के लिए ‘खुले’ (=ओपन) और ‘बन्द’ (=क्लोज्ड) की अवधारणा है। स्वर वर्णोँ की आनुभविक मेयता का यह विशुद्ध पाश्चात्त्य तरीका है। इस प्रकार की विवेचना प्रातिशाख्योँ या वैदिक शिक्षा ग्रन्थोँ मेँ नहीँ मिलती।

    अंग्रेजी मेँ पेन (=कलम) और पेन (=दर्द) के लिए क्रमशः ‘ए’ तथा ‘ऐ’ (ए३) स्वर का प्रयोग होता है। वहीँ ‘पैन’ (=तवा) के लिए हम ऐ, और रैन (=रात) मेँ एै (ऐ३) या स्वनविज्ञान की तकनीकी भाषा मेँ ‘ऐː’ का प्रयोग करते हैँ। यदि उसे ध्वन्यात्मक तरीके से लिखना हो तो हम ‘रैːन’ लिखेँगे। उसी तरह कोना मेँ ‘ओ’, भोपाल मेँ ‘ओ३’ (ओː) का प्रयोग होता है; यदि हम उच्चारण के अनुरूप ‘भोːपाल’ लिखने लगे तो मिलते-जुलते विसर्ग से भ्रमित हो सकते हैँ। ठीक इसी तरह ‘कौन’ मेँ ‘औ’ तथा चौबीस मेँ ‘औ३’ (औः), औरत मेँ ‘औ३’ (औː) का प्रयोग किया जाता है।
    यहाँ वर्ण के बाद त्रिभुजात्मक कॉलन (ː) का प्रयोग दीर्घ मात्रा दर्शाने के लिए किया जाता है। सूक्ष्म दृष्टि से ‘इ’ और ‘ई’ मेँ बहुत थोड़ा भेद हो जाता है। सूक्ष्म दृष्टि से देखा जाए तो दीर्घ ई, केवल ह्रस्व इ का दीर्घ रूप (इː) मात्र नहीँ है। वहीँ ‘आ’ केवल दीर्घ ‘अ’ न हो कर दूसरा स्वर है। यह बात बहुत से संस्कृत के पोङ्गा-पण्डितोँ को नहीँ पता होगी।
    यह बाते मैँ अपने ज्ञान से नहीँ कह रहा है। यह वही बाते हैँ जो भारत के प्रातिशाख्योँ मेँ कही गयी है, जिसे हिन्दी मेँ कोई नहीँ पढ़ता क्योँकि वह विरासत हिन्दी की है ही नहीँ। पता नहीँ ‘अब्जद’ लिपि (Abjad Writing System) से ‘अबुगिदा’ लिपि (Abugida Writing System) वाली भाषा कैसे सीखेँगे और क्या उच्चारण करेँगे? यह आश्चर्य का विषय है कि इस तरह के बेसिरपैर की बात कोई कैसे कह सकता है?
    यदि केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय ने दो प्रकार के ‘ऐ’ और ‘औ’ का उच्चारण कहा है तो वह पूरी तौर पर गलत नहीँ है, पर प्रयोग का दिया गया सुझाव ठीक नहीँ है। यह उच्चारण की वह विशिष्टता वर्तनी की शुद्धि से ठीक की जा सकती है, यदि हिन्दी भाषी ‘कौव्वा’ और ‘तैय्यार’ जैसी वर्तनी का प्रयोग करने लगेँ।
    स्थिति यह है कि मैँ कोई भी विकल्प चुन कर आपको शान्त करा सकता हूँ क्योँकि पैसा और शक्ति दोनोँ मेरे पास है। उससे बड़ा सत्य यह है कि हिन्दी वालोँ का स्वाभिमान ही नहीँ है और वे रीढ़हीन हैँ जिन्हेँ चरण-चुम्बन से कोई सङ्कोच नहीँ। मेरा प्रतिवाद करने के लिए आपके पास न समुचित तर्क है न सम्यक ज्ञान है। और हो भी कैसे सकता है? सदियोँ से राजनैतिक विमर्श करते हुए आपने कभी भाषा और साहित्य ठीक से समझा भी है?

    हिन्दी के किसी विद्वान का ध्यान भाषा, वर्ण, उच्चारण, वर्तनी पर नहीँ जाता। मैँ पूछता हूँ कि कोई ऐसा गणितज्ञ है, जिसे गिनती नहीँ आती? कौन ऐसा सङ्गीतकार है, जिसे सरगम नहीँ आती? फिर हिन्दी भाषा के विद्वान ही सामान्य और मूलभूत बातोँ पर इतने अज्ञ हैँ कि उन्हेँ वर्णमाला का अता-पता नहीँ। स्वर वर्णोँ के बारे मेँ कोई सामान्य ज्ञान नहीँ। अन्तःस्थ वर्णोँ को सेमी-वॉवेल कह देँगे क्योँकि यह किसी ने उन्हेँ गलत-सलत सिखा-पढ़ा दिया।
    हिन्दी भाषा मेँ आखिरी विद्वान, जिन्होँने उच्चारण के विषय मेँ अचम्भित कर देने वाला ग्रन्थ लिखा, वे थे ‘हरिशङ्कर जोशी’। आज यह बड़ी आसानी से दावा किया जा सकता है कि देश भर मेँ किसी विश्वविद्यालय के किसी हिन्दी विभाग मेँ, किसी ने उनका ग्रन्थ पढ़ना तो दूर, नाम तक ना सुना होगा।
    हिन्दी का कल्याण तब होगा जब हम ठीक से हिन्दी के स्वरूप को समझेँ, जाने और गर्व करेँ। आपकी जानकारी के लिए हिन्दी के स्वर वर्णोँ का अन्तरराष्ट्रीय मानकीकरण का स्थूल संयोजन कुछ इस तरह होगा, जिसे अधिक विवेचना की आवश्यकता है :—

    हिन्दी स्वर वर्ण
    हिन्दी स्वर वर्ण

    केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय द्वारा निर्गत ‘देवनागरी लिपि और हिन्दी वर्तनी का मानकीकरण’ पुस्तिका से विदित होता है कि तकनीकी पक्ष को समाहित करने के लिए देवनागरी लिपि मेँ हिन्दीतर भाषाओँ को सम्मिलित करने हेतु कई सराहनीय प्रयास किए गए हैँ, जिसकी समय-समय पर विवेचना होती रहती है। पुस्तिका मेँ कई सामान्य और आवश्यक दुविधाओँ का समाधान किया गया है जिसके कारण यह एक आवश्यक दस्तावेज है।
    मैँ इस दिशा-निर्देश से बहुत प्रभावित हूँ कि हिन्दी लिखते समय नुक्ते का प्रयोग छोड़ देना ही श्रेयस्कर है। हिन्दी मेँ आकर रूढ़ हो जाने वाली अरबी-फारसी शब्दावली को हिन्दी के स्वरूप मेँ ढ़ल जाना चाहिए। पुस्तिका मेँ स्पष्ट कहा गया है कि— उर्दू से आए अरबी-फारसी मूलक वे शब्द जो हिन्दी का अङ्ग बन चुके हैँ और जिनकी ध्वनियोँ का हिन्दी ध्वनियोँ मेँ रूपान्तर हो चुका है, हिन्दी रूप मेँ ही स्वीकार किए जा सकते हैँ। जैसे — कलम, किला, दाग। नुक्ता हिंदी मेँ प्रचलित नहीँ है। अतः, देवनागरी की मूल हिन्दी वर्णमाला में नुक्ते को नहीं रखा जाना चाहिए।
    उर्दू के जो शब्द हिन्दी ने आत्मसात् कर लिए हैँ, वहाँ नुक्ते के प्रयोग का कोई औचित्य नहीं है। उर्दू के मूल पाठ/साहित्य का लिप्यन्तरण करने में नुक्ता का प्रयोग चलता रहेगा। (अंग्रेजी और अन्य) सभी विदेशी भाषाओं से आगत शब्द का देवनागरी लिप्यन्तरण यथासम्भव विदेशी भाषाओं के मानक उच्चारण के अधिक से अधिक निकट होना चाहिए।
    अब चलिए, आप मुझे चाय पिला दीजिए। आप ‘कौन बनेगा करोड़पति’ खेल मेँ पूरी तरह हार चुके हैँ।

    सतीश शाह ने डैनी डोरबेल से नज़रेँ चुराते हुए चुपके से उठकर कसीनो से बाहर की राह पकड़ ली।

    इति श्री

    (आश्विन कृष्ण तृतीया, संवत् २०८२)

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