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  • कथा-कहानी
  • गायत्री मनचंदा की कहानी ‘रजनीगंधा’

    आज हिन्दी दिवस है। आह हिन्दी वाह हिन्दी पर लेख के बजाय आज एक कहानी पढ़ते हैं। लेखिका हैं गायत्री मनचंदा। आज अगर हिन्दी विस्तृत हो रही है मज़बूत हो रही है तो इसमें बहुत बड़ा योगदान ऐसे लेखकों का है जो हिन्दी में अलग अलग क्षेत्रों से आये हैं। गायत्री का संबंध भी कॉर्पोरेट क्षेत्र से रहा है। आप यह मार्मिक कहानी पढ़िए- मॉडरेटर

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    ठक ठक ठक।

    दरवाज़े पर कोई है शायद। नहीं, डोर बेल तो नहीं बजी …..पर जाने क्यूँ ऐसा लगा जैसे दरवाज़े पर किसी ने भारी मुट्ठी से तीन बार थाप दी हो। कुछ पल का सन्नाटा, फिर बाहर गैलरी से नपे तुले क़दमों की आहट। दरवाज़े पर हुई दस्तक लिविंग रूम में अपने फ़ोन पर बेवजह स्क्रॉल करते मानव के कानों तक शायद पहुँच गयी थी।

    सुबह से लिविंग रूम की तरफ़ लगे दरवाज़े के बंद खुलते ताज़े रजनीगंधा के फूलों की खुशबू मेरे मुरझाये अस्तित्व को कई बार छू कर गयी थी। आज रविवार था और अमूमन रविवार हमारे यहाँ कोई नहीं आता था। फ़िर, आज ना ही मेरा जन्मदिन था और ना हमारी शादी की सालगिरह। बाकी दिन भी कोई मुश्किल से आता पर रविवार का लम्बा दिन एक गहन चुप्पी में लिप्त, सांय सांय करते बीतता। उस पर मैं सोच सोच कर परेशान हुए जाती थी कि आज ऐसा क्या ख़ास होने वाला है जिसके लिए रजनीगंधा के फूल मंगवाए गए हैं?

    सुबह नाश्ते के बाद जब चंदा मेरे कमरे में डस्टिंग करने आयी तो थोड़ा तुनक कर बोली, “बेबी, साहब ने डाइनिंग टेबल पर कश्मीरी कशीदाकारी वाला मेजपोश सेट बिछवाया है। बोले, चंदा, लिविंग रूम को अच्छे से सफा  करके लंच में ज़ाफ़रान राइस और सफ़ेद गोश्त बना देना … और हाँ, थोड़ा एक्स्ट्रा ही बनाना।” थोड़ा एक्स्ट्रा कहते उसकी भौहें चढ़ गयी।

    “कह रहे थे आज घर पर कोई ज़रूरी बिज़नेस मीटिंग है।” आँखें गोल गोल घुमाते उसने बात आगे बढ़ाई, “मैंने पूछा, साब, ऐसे कौन से वी आई पी साहब पधार रहे हैं तो होंठ भींच कर, आंखें तरेरने लगे।“

    उसकी बात नज़रअंदाज़ करते मैंने फिर मन ही मन सोचा।  ‘पर रजनीगंधा ही क्यूँ?’

    रजनीगंधा तो हमारे फूल थे ना … हैं। मानव और मेरे प्रेम के प्रतीक चिन्ह! शादी से पहले हर मुलाक़ात पर वो मेरे लिए रजनीगंधा का गुलदस्ता लाता। हमने जब ये नया घर सजाया तो ड्राइंग रूम में लाल पर्दे लगाए थे  … सुर्ख लाल रंग के वेल्वेटी पर्दे। ढलते सूरज की लालिमा का लाल। मेरे माथे के सिंदूर का लाल। मानव के प्रेम में सराबोर मेरी ख़ुशी का का लाल। शोख़ चटक रंगों के शौक़ीन हम दोनों ही थे, तो उस छोटे से घर के हर कोने में लाल, पीले, नीले, गुलाबी रंगो की छटा बिखरी पड़ी थी। पार्टी वगैरह के समय घर में अमूमन सफ़ेद गुलाब, ज़रबेरा या कारनेशन आया करते थे, हलके रंग के फूल लाल पर्दे के बैकग्राउंड के आगे खूब फबते। लिविंग रूम में टीवी के सामने रखे नीले वेलवेट के सोफे और गुलाबी पीले फूलों वाली लाउन्ज चेयर पर हर शुक्रवार रात हम रात भर बैठे वाइन पीते और अंतरंग पलों की अनुभूति समेटे सोफे पर ही एक दूसरे की बाहों में सो जाते।

    खिड़की पर ज़ोर ज़ोर से डस्टर मारती चंदा के हाथ रुक गए। मेरी तरफ़ मुड़ी और बिस्तर के नज़दीक,मेरे पास खड़ी हो गयी। अपने ख्यालों से बाहर निकल, मैंने चंदा की ओर देखा, “तुम्हारे दहेज़ के लिए ख़ास कश्मीरी कशीदकारों से वो गुलाबी मेजपोश सेट बनवाया था बड़ी बीबी जी ने, क्या पता था …” कहते कहते उसकी आंखों में आंसू थे।

    मैं मन ही मन सिसकियाँ लेने लगी। एक बार को दिल किया कि बिस्तर से एकदम उठ कर चंदा को गले लगा लूँ और कहूँ, माँ ने दहेज़ में जो सबसे कीमती सामान मुझे दिया था वो तो तू है पगली। इस घर में मेरी इकलौती हितैषी, जिसके दिल से मेरे लिए अपार ममत्व छलकता है।

    पर मैं अपाहिज, जिसने दो साल पहले एक कार एक्सीडेंट में न केवल अपने माँ बाप को खो दिया था, बल्कि गर्दन से नीचे पूर्ण शरीर के पक्षाघात की शिकार हो गयी थी। बिस्तर से खुद उठना तो दूर, अपनी एक ऊँगली भी अपनी मर्ज़ी से हिलाने में लाचार थी।

    उस दिन मेरा तीसवां जन्मदिन था। हम मुंबई से लोनावला जा रहे थे। किसे पता था, वो रात हमारे जीवन को यूँ उधेड़ कर चली जायेगी। एक्सीडेंट में मेरी ज़ुबान पर भी असर हुआ। हाँ, आँख, नाक और कान कुछ तेज़ हो गए और अब छोटी से छोटी आहट भी ऊंची सुनाई देती है। अभिशप्त हूँ, जो नहीं भी सुनना चाहती, वो तक कानों तक पहुँच जाता है।

    *

    “खैर”। अपनी बात कह कर चंदा साड़ी के पल्लू से आंसू पोंछती रसोई में बर्तन करने चली गयी। रसोई समेट कर वो रोज़ की तरह दिन भर साथ की सोसाइटी में बक्शी जी के घर बेबी सिटिंग करेगी और शाम को वापस आ, हमें खाना खिला कर यहीं मेरे कमरे में ज़मीन पर बिस्तर लगाकर सो जायेगी। मम्मी पापा के जाने के बाद रिश्तेदार के नाम पर मेरे बचपन की साथी, चंदा ही तो बची थी। उसका भी यहां मेरे सिवा कोई न था। पहले तो साल में एक महीने के लिए गाँव चली जाती थी पर अब मुझे छोड़ कर कहीं जाने को राज़ी नहीं होती।

    मानव की किस्मत अच्छी थी, उस एक्सीडेंट में उसके बायें पाँव पर हलकी चोट आयी थी पर दो बरस बाद भी वो अब तक बाएं पाँव से लंगड़ा के चलता। चंदा को लगता था कि मानव का लंगड़ाना सिर्फ लोगों को सहानुभूति इकठ्ठा करने का साधन है। पर जो आदमी अपना काम धंधा छोड़ कर घर पर ज़िंदा लाश सी पड़ी पत्नी की सेवा में दिन रात एक कर रहा हो तो वह झूठी सहानुभूति के लिए कोई ऐसा प्रपंच, ऐसा स्वांग भला क्यूं रचेगा?

    पांच साल की शादी में हमें बच्चे नहीं हुए पर परस्पर प्रेम में अभिभूत हम दोनों को हमारे घर आँगन में किलकारियों की कमी कभी नहीं खली।

    मुंबई के पवई इलाके में स्थित इस सलीकेदार दो बेडरूम का फ्लैट मम्मी पापा ने अपनी इकलौती बेटी की शादी में देने के लिए अपनी बरसों की संजोई कमाई लगा दी थी। मेरा दफ्तर भी पवई में ही था और मानव भी अपना रियल एस्टेट का बिज़नेस उसी इलाके में जमाने की कोशिश कर रहा था। हमारी शादी उन दिनों कई मायने में सुखद थी।

    *

    पर उस एक्सीडेंट के बाद काफी कुछ बदलने लगा। हॉस्पिटल से घर वापस आने के शुरुआती दिनों में एक नर्स दिन रात मेरे पास रहती। मानव को यकीन था कि अच्छे इलाज और भरपूर ध्यान से मैं धीरे धीरे ठीक हो जाऊंगी। डॉक्टर भी उम्मीद के एक महीन तार पकड़े बैठे थे पर टूटी रीढ़ की हड्डी रिश्तों में चटके विश्वास की तरह है, एक बार टूट जाए तो जुड़ती नहीं। शुरू शुरू में मेरे बचपन और कॉलेज के दोस्त कभी कभी आ कर मुझे हंसाने की कोशिश करते पर धीरे धीरे वो भी वक़्त की धुंध में गुम हो गए। समय के साथ मानव और मैंने भी अपनी अपनी नियति को स्वीकार कर लिया।

    पहले पहल तो मानव घंटों तक मेरे सिरहाने बैठा रहता। किताबें पढ़ के सुनाता, मेरी पसंद के गाने ज़ोर ज़ोर से लिविंग रूम में चला देता और  अभिजीत की आवाज़ जब “मैं कोई ऐसा गीत गाऊं कि आरज़ू जगाऊँ“ तो मेरे कमरे में आ कर “अगर तुम कहो“ कहता मेरा हाथ पकड़ लेता। उस अभागी रात गाड़ी मानव ही चला रहा था। उसने एक पल के लिए मोबाइल पर नज़र डाली और हमारी गाडी सामने से आते ट्रक के लपेटे में आ गयी। शुरू शुरू में उस रात के भयावह मंज़र को याद करते कभी कभी पश्चाताप के आंसू रुके न रुकते थे  फ़िर धीरे धीरे सब बदलने लगा।

    मेरी सुबह-शाम चंदा की बातों में, दिन टी वी देखते और खिड़की के बाहर दिन पलटते देखते बीत जाता पर रात काटनी मुश्किल थी। एक व्हील चेयर थी जो लोगों की आँखों में उतरी बेचारगी देखने के बाद मेरे कमरे के एक कोने में धूल खा रही थी।  मानव अब अलग कमरे में सोता, हालांकि दूसरा बैडरूम हमारे बैडरूम से काफी छोटा था पर उसके होने से मुझे तकलीफ़ न हो, ये कह कर उन्होंने मुझसे अपने को अलग कर लिया।

    ये जो नींद है ना, ये दो किस्म के लोगों को नहीं आती। एक, जिनके जीवन से उम्मीद रेशा रेशा उधेड़ रही हो। दूसरे, जिन्हें किसी चीज़ की कोई परवाह नहीं हो। मैं शायद एक तीसरे वर्ग में आती थी जिस पर ये दोनों बातें लागू थी।  डॉक्टरों की मानें तो मेरे अंदर की मशीनरी तो ठीक चल रही थी पर बाहर के पुर्जों पर जंग लग गया था। कहने को कल मर जाऊं और जीने को दशकों जी जाऊं।

    मानव कभी कभी दबी आवाज़ में मुझे जता देता कि अकेले घर चलाना उसके लिए एक बोझ सा बनता जा रहा है। पिछले बरस नर्स आनी बंद हो गयी। मानव ने अपने किराए के दफ्तर की लीज़ बंद करवा दी और जो थोड़ा बहुत काम हाथ में था, वह घर से करने लगा। चंदा की तनख्वाह मुश्किल से निकल रही थी, इसीलिए साल उसने साथ वाली सोसाइटी में दिन भर का काम पकड़ लिया था। अब चंदा और मानव मिल कर मेरी देखभाल करते। नहलाना धुलाना, डायपर पहनाना, मेरी पीठ और जांघ पर उभर आते बेड सोर पर मरहम लगाना। मैंने आंख की शर्म और हिचक खुलेआम त्याग दी गयी थी।

    बस, चंदा के घर से निकलना शुरू होने के कुछ दिन बाद ही ‘ठक ठक ठक’ का सिलसिला शुरू हो गया।

    *

    मानव ने आहिस्ता से उसके कमरे दरवाज़ा खोला और मुझे सोता हुआ समझ कर दरवाज़ा धीरे से बंद कर दिया।

    बाहर गैलरी में इसीमियाके के फ्लोरल नोट्स रजनीगंधा की भीनी भीनी खुशबू को टक्कर दे रहे थे। मेरी फेवरिट परफ्यूम। ड्रेसिंग टेबल की तरफ यकायक नज़र डाली तो मेरी परफ्यूम की शीशी गायब थी। चूड़ियों की ख़नक, हलकी हंसी, लरजते क़दमों की आहट और बदन की ख़ुश्बू, सब में नयेपन की खनखनाहट थी। मैंने दीवार पर टंगे कैलेंडर की तरफ देखा, फिर उसके साथ लगी ग्रैंड फादर क्लॉक पर नज़र डाली। आज मार्च की पहली तारीख़ थी, साल मुझे याद नहीं। घड़ी में 2 बज के 20  मिनट हुए थे। आने वाली शायद  तय समय से 20 मिनट लेट आयी थी। मानव रूटीन पसंद आदमी था।

    “कुछ गाने चलाएं क्या, डार्लिंग, थोड़ा बोरिंग हो रहा है।“ औपचारिक बातों के दस मिनट बाद ही लड़की ने शोखी से कहा पर मानव ने दबी आवाज़ में उसे समझाया कि मैं अंदर वाले कमरे में सो रही हूँ और गानों की आवाज़ से मेरी नींद में खलल पड़ सकता है।

    मानव जानता था संगीत से मुझे इतना प्रेम है कि उसे नींद में भी सुन सकती हूँ पर खैर…

    “ओह, यू आर सो काइंड, मानव।“ सो काइंड पर एक्स्ट्रा तवज्जो देती लड़की की आवाज़ अब मिश्री की डली हो रही थी। मुझे समझ में आ रहा था कि उसके घर तक आने से पहले मानव कहीं बाहर इसके साथ सहानुभूति का दांव पहले ही खेल चुके हैं। बातों से पता चला कि वे दोनों किसी ऑनलाइन डेटिंग प्लेटफार्म पर मिले थे। मैंने एक गहरी सांस ली। मैं और मानव भी तो ऐसे ही… और फिर चंद ही मुलाक़ातों के बाद चट मांगनी पट ब्याह। …पापा की कहाँ सुनी थी मैंने… तब मैं प्यार में थी….

    *

    “वाइन?”  मानव के पूछने पर लड़की ने शायद हाँ में सर हिलाया होगा क्यूंकि मानव ने क्राकरी की अलमारी खोल कर हमारे इकलौते दो लम्बी गर्दन वाले वाइन गॉब्लेट निकाले और एक एक कर के दोनों ग्लासों में आधा आधा गिलास भर रेड वाइन उंडेल दी।

    लड़की बातूनी लग रही थी, आवाज़ में कश्मीरियत का लहज़ा था पर उसकी इस्तेमाल की गयी शब्दावली बम्बई की आबो हवा का पता दे रही थी।

    “ब्यूटीफुल वर्क। जम्मू में मेरी माँ के पास भी ऐसा ही टेबल क्लॉथ है, उनकी शादी के समय का।” उसके लम्बे लाल नाखूनों वाले छहररे गोरे हाथों को मेरी माँ के दिए हुए टेबल क्लॉथ पर फेरने के ख़याल भर से मेरे बदन पर हज़ारों कीड़े रेंगने लगे थे।  गजब ये है कि अपने शरीर पर मुझे एक हलकी सी भी कंपन महसूस नहीं होती थी पर ये खाली दिमाग दिन के 24 घंटे भीड़ से भरी, भागती लोकल ट्रैन सा दौड़ता रहता।

    बाहर से अब छुरी काँटों की आवाज़ आ रही थी। बिना माँ बाप की चंदा दस बरस की थी जब यूपी के एक गांव से हमारे घर काम करने आयी थी और माँ ने उसे दो साल में ही घर के कामकाज में निपुण कर दिया था। सालन और गोश्त बनाना भी उसने माँ से ही सीखा था। मैं ज़्यादातर सेमि सॉलिड डाइट पर रहती और स्वादिष्ट खाने की खुश्बू महसूस कर मन मार कर रह जाती।

    अपने ख्यालों से बाहर निकली तो महसूस किया कि बाहर से छुरी कांटे की आवाज़ आनी बंद हो गयी थी। हॉल के साथ लगे बाथरूम का दरवाज़ा खुला। वहां मानव गया होगा क्यूंकि बाथरूम का दरवाज़ा बंद होते ही मेरे कमरे का दरवाज़ा हलके से खुला और एक छोटे क़द की लड़की का सर झांकता दिखाई दिया। मैंने सोने का ढोंग जारी रखा। बिस्तर पर पड़ी मेरी एक झलक से जैसे वह लड़की मानव की कही हर बात से आश्वस्त हो गयी।

    मैं दबी सांस से अगली आहट के इंतज़ार में थी। अब बाहर ऐसी शांति थी जैसे मातम वाले घर में होती है । फिर चूड़ियों की हलकी खनक सुनाई देने लगी। कसमसाहट की साउंड वेव्स हवा में भारीपन भरती, एक रूमानी मिस्ट जो मेरे बंजर पड़े मन ने बरसों से महसूस नहीं की थी, मार्च की हवा के साथ घुलती महसूस होने लगी। मैंने अपने दूसरी मंज़िल के अपार्टमेंट की खिड़की के बाहर से झांकते उस ऊंचे कदम्ब के पेड़ पर शोखी से चढ़ती अमर बेल की तरफ़ देखा। धीरे धीरे हवा के झोंको के साथ मदमाती बेल की सांसें तेज़ हो रही थी। पेड़ भी अपनी रवानी पर था। मानव अक्सर कहते कि वाइन से नशा नहीं होता, बस ख़ुमार चढ़ता है। बाहर ड्राइंग रूम में वही खुमार परवान चढ़ रहा था।

    आज की दोपहर हफ्ते की बाकी दोपहरों से कुछ अलग महसूस हो रही थी।

    *

    मिस मंडे पास के ही किसी दफ्तर में सेक्रेटरी थी जो लंच टाइम में एक घंटे के भीतर खाना और आदमी दोनों डकार कर अपने बॉस से साथ ढाई बजे की मीटिंग के लिए वापस दफ्तर पहुंच जाती।

    “यार, मैं उसे कभी किस नहीं कर सकता, उसके मुंह से सड़ी मछली की बदबू आती है।“ मानव को फ़ोन पर अपने किसी दोस्त से यह कहते सुना था।

    “फिर मिलते ही क्यूँ हो?” दोस्त ने पूछा। फ़ोन स्पीकर पर था। मानव हंस भर दिया, “आने दे भाई, वर्ना जो मिल रहा इतना भी न मिलेगा।“

    सच कहूँ, जब पहली पराई स्त्री की परछाई इतने प्रेम से सजाएं सँवारे अपने गृहस्थ जीवन में महसूस की थी तो उस रात रो रो कर सिरहाना भिगो दिया था। सूजी आँखें देख कर अगले दिन चंदा ने कितना पूछा था कि क्या हुआ पर मैं आँखों से भी बता पायी।

    *

    फिर आई, मिस वेडनेसडे। सुबह जिस वक़्त चंदा मेरे साथ होती, उस वक़्त मानव एक घंटा बिल्डिंग की जिम में और एक घंटा स्विमिंग पूल में बिताते। मिस वेडनेसडे हमारे टावर में ही रहती थी और उनके इकलौते बेटे की वेडनेसडे दोपहर को स्कूल के बाद टेनिस कोचिंग के लिए जाता था ।मिस वेडनेसडे लंच नहीं करती पर अपने पति की बेरुखी का सारा गुबार ज़ोर ज़ोर से शिकायत करके मानव पर निकाल देती। मानव धैर्य से उसकी सारी बात सुनते और फिर बदले में उसके जिस्म के साथ एक ज़िद्दी बच्चे की हाथ में आये खिलौने की तरह पूरी मनमानी करता, उसके बाल खींचता, कभी कभी हमारे कमरों के बीच की दीवार पर उसका जिस्म टिका कर दांतो से उसे इतनमा काटता कि उसकी आहें छोटी छोटी चीखों में बदल जाती। देर तक दोनों विषय लोलुप्ता की गहराइयों में गोते लगाने के बाद निढाल हो कभी मानव के कमरे में बिछे सिंगल बेड पर और कभी काउच पर एक सिगरेट सुलगाने के बाद सो जाते। उनकी सांसों और हलके खर्राटों की सिम्फनी आ आ कर मेरे कानों में गरम लावे की तरह पिघलती रहती। वह स्त्री, उसी नीले काउच पर मेरे पति की बाँहों में सो रही होती जिसके वेलवेटी नीले काउच पर मेरा अंतर्मन अब भी शुक्रवार रात के इंतज़ार में एक हाथ में ख़ाली वाइन का गिलास और दूसरे हाथ में बिना जली सिगरेट थामे एक अनंत प्रतीक्षा में बैठा हुआ है। मेरी आत्मा को हनन करता उनका उद्वेगित आवेश, उनकी सर्द आहें, साँसों से धमनियों तक तेज़ प्रवाह से दौड़ता उत्तेजित रक्त मेरे अंतस में उग आये पाताल की तरफ धकेलता रहता।

    ऐसे ही एक दिन जब उनका उन्माद चरम सीमा पर था और बिना किसी परवाह मानव के मुंह से हिंदी मराठी की गालियां झर रही थी, मैंने क्षुब्ध होकर आवेश में अपने ही दांतों से अपने होंठ काट लिए। शाम को खून से लथपथ मेरे चेहरे को देख चंदा कितना रोई थी। तब भी मैंने अपनी आँखों को कुछ जताने का हक़ नहीं दिया।

    मैं सोचती और रो पड़ती।  ‘आदमियों की भी अपनी ज़रूरतें होती हैं। मानव भी तो आखिर एक आम आदमी ही था! अ मैन नीड्स टू फुलफिल हिस डिसायर्स।’ कहकर अपने मन को समझाती।

    मानव को हमेशा से स्त्री स्पर्श की इतनी तलब थी कि मैं रसोई में होती या बिस्तर में लेट कर किताब पड़ रही होती तो उनका हाथ जाने कैसे मेरी नंगी पीठ पर या जांघ पर देर तक टिका रहता और मेरी देह को सहलाता रहता। सहवास के पश्चात भी उतारे कपड़ों से मेरे बदन पर दुबारा खुद को ओढ़ लेते। पति का मेरी तरफ यूँ रुझान और मंत्रमुग्ध होना मुझे अपने एक ब्याहता औरत होने के एहसास से भर देता।

    *

    हर बेवक़ूफ़ औरत यही मान चुकी थी कि मानव की ज़िन्दगी में मेरे अलावा वो अकेली दूसरी औरत है जो उसकी उदासीन ज़िन्दगी में रंग भरने आयी है। ये सोच कर मेरे लबों पर एक कुटिल मुस्कान तैर जाती। कैसी बेवक़ूफ़ होती हैं न वो औरतें जिन्हे मदर टेरेसा सिंड्रोम होता है। वो आदमी जिसका मन मेरे पांव के टखनों में अटका रहता था, आज मुझे स्पंज से साफ़ भी ऐसे करता है जैसे बबूल के पेड़ से छाल उतार रहा हो। रात को सोते वक़्त माथे पर दिए गया सूखा चुम्बन रेगमार्ग की रगड़ सा मुझे चुभता। वो होंठ जाने कितनी औरतों के शारीरिक भूगोल पर अपना वर्चस्व स्थापित करने के बाद हर रात मेरे माथे पर दो मिनट श्वास बटोरने के लिए रुकते थे। और वही आदमी इन औरतों की देह मोह में महंगी वाइन, सिगरेट और समय बर्बाद कर रहा था।

    लौट कर ख़्याल वापस रविवार पर आ गए। अब बाहर वो लड़की और मानव अपने अपने कपड़े पहन रहे थे, चूड़ियाँ वापस कलाई पर थी और हाथ खनका कर उसके जाने का संकेत दे रही थी। खिड़की के बाहर सूरज धीरे धीरे आसमान के लालिमा बिखेरता समुद्र के क़रीब जा रहा था।

    “चाय“ मानव ने उस लड़की से पूछा। ये उसे विदा करने का संकेत था। शायद उसने सर ना में हिलाया था।

    दोबारा मिलने की बात हो रही थी। “सुनो, फ्राइडे से मेरा लॉन्ग वीकेंड शुरू हो जाता है, अगर तुम अपनी रिसर्च से टाइम निकाल कर आ सको तो किरुतसामी की कोई नयी पिक्चर यहाँ साथ में देखेंगे।” मानव ने कैजुअली कहा।

    अहा! मेरा दिमाग ठनका। पिछले दो हफ्ते से मिस वेडनेसडे नहीं आयी थी। तीन हफ्ते पहले कुछ ऊंची आवाज़ों में उनके बीच एक नया नाम उछला था। तो ये नयी लड़की रिप्लेसमेंट है। पिछली कई और रिप्लेसमेंट की तरह। अब तक मैं उनकी आवाज़ों, चार्म की सीमाओं, प्रेम के निवेदन और प्रताडनाओं को पहचान चुकी थी। वो अपने साथ मेरे लिए बाहर का एक नया संसार और उसकी बातें लाती थी, वो संसार जिसे मेरी मौजूदगी और अस्तित्व से कोई सरोकार नहीं। और मैं, मैं मानव का तुरुप का पत्ता।  एक आदर्शवादी पति जो शरीर की ज़रुरत पूरी करने के लिए परस्त्री का संग तो कर सकता है पर उसे अपना नहीं सकता।  तू नहीं तो और सही, और नहीं तो और सही!

    ‘आफ्टर ऑल, मानव इस अ मैन एंड ही हेड हिस नीड्स।’

    मैं हंस दी। लड़की शायद अब तक जा चुकी थी। हवा में इसी मियाके के फ्लोरल नोट्स अब तक थी। कैसी त्रासदी है मेरे अंदर की पर्फ्यूमोलॉजिस्ट जो इत्र और देह गंध के रिश्ते पर रिसर्च करती थी, आज उसी महक को भुलाने की कोशिश कर रही थी। दीवार घड़ी में चार बज रहे थे।

    *

    दरवाज़े पर फिर कोई था। पर इस बार घंटी बजी थी।  पहले मुझे लगा लड़की शायद अपना कुछ भूल गयी है और लेने वापस आयी है पर अंदर आते कदमों की आहट और सिगार की महक मेरे बरसों की जानी पहचानी थी।

    “मैंने सोचा आज रविवार है और पहली तारिख भी, तो घर ही आकर तुमसे बात कर लेता हूँ।“ जोशी अंकल की आवाज़ थी।

    “उसका खर्चा बढ़ रहा है अंकल …. दवाइयों और डायपर पर ही इतना लग जाता है, देखिये, आप किसी तरह अलाउंस में कुछ अमाउंट बढ़ा सकें तो।” मानव लगभग गिड़गिड़ा रहा था।

    “तुम अपने एक्स्ट्रा खर्चे कम करो, मानव।“  जोशी अंकल ने शायद डाइनिंग टेबल पर पड़े वाइन के खाली गिलास, कश्मीरी कसीदाकारी वाले गुलाबी नैपकिन पर लाल लिपस्टिक के दाग और मालबोरो की सिगरेट का पैकेट देख कर बोला था। “ उसका ध्यान रखो, समझे । … जब तक वो है, तुम्हारे पास ये घर और अलाउंस है…जानते हो ना उसके जाते ही ये सब…  ट्रस्ट के पास… । “

    सर झुकाए मानव कुछ नहीं बोला।

    *

    जोशी अंकल मेरे कमरे में आकर मेरी साइड में बैठ गए ।

    “कैसी है बेटा, पल्लवी?” मेरे माथे पर हाथ फेरते उन्होंने प्यार से पूछा।

    मेरी आंखों में उमड़ते आंसू पलकों पर ठहर गए। मुंह उचका कर मैंने सीलिंग पर बंधी घंटी की रस्सी खींची तो मानव आ गया।

    फिर बोले, “बेटा, मानव तेरा ध्यान तो रखता है, ना?” मैंने डबडबाई आँखों से हाँ में सर हिला दिया।

    उन्हें क्या ही कहती? ‘मानव इस अ मेन एंड ही हेड हिज नीड्स।’

    जोशी अंकल ने चेक मानव की ओर बढ़ा दिया और सर झुकाये मानव ने चेक को मोड़ कर अपनी शर्ट की जेब में रख लिया।

    जोशी अंकल मानव से चेक रिसीविंग पर सिग्नेचर ले कर चले गए और मैं खिड़की के बाहर कदम्ब के पेड़ पर अटके ढलते सूरज के लाल गोले को निहारने लगी।

    *

    4 thoughts on “गायत्री मनचंदा की कहानी ‘रजनीगंधा’

    1. प्रेम , जीवन से हार , जीने की मजबूरी और मनुष्य के बदलते रूप को बखूबी दर्शाती कहानी
      रोचक है । ऐसा जीवन कितना अभिशप्त हो सकता है ये सीच कर भी तकलीफ़ हो रही है !
      शुभकामनाएँ ।
      जानकीपुल पे हर कलेवर की कहानियाँ पढ़ने मिलती है । साधुवाद प्रभात जी को 😊🙏🏻

    2. बहुत ही मार्मिक कहानी है।
      Gayatri, you’ve captured a sad reality really well. Engaging storytelling with two smartly placed twists.

    3. कहानी की बुनावट में जो कसावट है शुरू से अंत तक पढ़ने को बाँधे रखी। विषय चित्रण बहुत मार्मिक है।

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