• व्यंग्य
  • दूसरों के लिए लड़ने वाला लेखक, अपने लिए क्यों नहीं लड़ पाता?

    आज पढ़िए युवा लेखक भगवंत अनमोल का यह व्यंग्य। विषय है लेखक-प्रकाशक संबंध, रॉयल्टी। भगवंत अनमोल को अपने उपन्यास ‘प्रमेय’ के लिए युवा साहित्य अकादेमी पुरस्कार मिल चुका है। अभी हाल में ही उनका उपन्यास ‘गेरबाज़’ प्रकाशित और चर्चित हुआ था। आप उनका यह व्यंग्य पढ़िए- मॉडरेटर

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    “भो……के”, एक पत्थर उठाकर सीधा कुत्ते के पेट पर फेंक मारा। वह कुत्ता, जो टांग उठाकर उस प्रतिमा पर पेशाब कर रहा था, पेशाब करना छोड़कर ‘क्याऊ क्याऊ’ करता भाग खड़ा हुआ। लेखक के मित्र श्याम सिंह ने पहली बार लेखक साहब जैसे सभ्य व्यक्ति के मुखमंडल से इतने मधुर शब्द सुने थे। वह यह सब देखकर अचरज में पड़ गए। वरना बिलकुल नपा-तुला, जैसे तराजू में रखकर सुनार सोना तौलता है, ठीक वैसे ही लेखक साहब शब्द सोच-समझकर निकालते थे। लेकिन आज उनकी मर्यादा और संतुलन टूट गया था।
    जब मित्र से नहीं रहा गया तो उसने पूछ लिया, “लेखक साहब! इस प्रतिमा में ऐसा क्या है, जो आप इतना गुस्से में आ गए?”
    “तुम्हें नहीं पता? पता होगा भी कैसे? सरकारी तंत्र ने प्रतिमा बनवाई और फोटो खिंचवाया, चलते बने।” उन्होंने उसकी दुर्दशा देखते हुए कहा, “कह क्या रहे थे, परेशान हो रहे थे! एक क्रांतिकारी ने देश के लिए अपनी कुर्बानी दे दी और उसकी यह हालत?” गुस्से में बड़बड़ा रहे थे, “हमें डूब मरना चाहिए।”
    उस प्रतिमा के सिर से लेकर चेहरे तक चिड़ियों के मल-मूत्र के इतने निशान थे कि अब चेहरा भी काला समझ आने लगा था।
    मित्र ने अपनी विवशता जाहिर की, “अब कैसे पता होगा, हम लोगों को जब पढ़ाया ही न गया।”
    “तुम बात ठीक कह रहे हो, पढ़ाया तो औरंगज़ेब को गया है। औरंगज़ेब की सातों पीढ़ियाँ पता होंगी तुम्हें। लेकिन एक क्रांतिकारी, जो देश के लिए, हमारे लिए कुर्बान हो गया, उसके बारे में कहाँ पता होगा?” लेखक साहब का गुस्सा उनके शब्दों के साथ चेहरे पर भी दिख रहा था।
    अब मित्र बोले तो क्या बोले। मित्र धीरे से वहाँ से निकल लिए। लेकिन लेखक साहब के मन में वे विचार कौंधते रहे। मन ही मन सोच रहे थे कि अगर इन क्रांतिकारियों को लेखक नहीं जीवित करेगा तो कौन करेगा। साहित्यकार ही है जो समाज को नयी दिशा देने का काम करता है। उन्होंने ठान लिया था कि अब इसी क्रांतिकारी ‘श्री मन्नी लाल शर्मा’ पर किताब लिखेंगे। कलम उठा ली थी।
    कलम क्या उठा ली थी— यह उनकी तलवार थी, जो मन्नी लाल शर्मा के अस्तित्व की लड़ाई वह खुद लड़ने जा रहे थे। उन्हें ऐसा महसूस हो रहा था कि इतना बड़ा काम इतिहास में दबा कैसे रह गया, इस क्रांतिकारी के बारे में देश जान क्यों नहीं पाया। तुरंत उन्होंने इतिहासकारों और सरकारों को भरपूर कोसा और कलम रूपी तलवार रात में चला दी।
    सुबह हुई ही थी कि पड़ोसी आ गए। उनकी नाली का कुछ काम था। लेखक साहब को प्रणाम किया,
    “पाण्डेय जी, नाली बिलकुल जाम हो गई है। आप देश के प्रतिष्ठित साहित्यकार हो। आप हम लोगों की तरफ से सभासद साहब से बात कह दोगे तो बात बन जाएगी। सभासद साहब आपकी बात काटेंगे नहीं।”
    उन लोगों ने ‘देश के प्रतिष्ठित’ शब्द पर अधिक जोर दिया था। ‘देश के प्रतिष्ठित’ शब्द सुनकर साहित्यकार साहब मन ही मन गदगद हो गए। उन्हें ऐसा लगा जैसे उनका किताब लिखना सफल हो गया। उनका जीवन धन्य हो गया। उन्होंने अपने गमछे की तरफ इशारा किया,
    “आप लोग बैठिए, मैं कपड़े बदलकर आता हूँ।”
    उन्होंने अंदर पड़े लकड़ी के हल्के टूटे सोफे की तरफ इशारा किया, जिस पर पड़े हुए गद्दे फट चुके थे और गंदे हो गए थे, जिनमें हल्की सी चिपचिपाहट थी। अब लोगों को बैठना पड़ा, आखिर प्रतिष्ठित लेखक से काम करवाना था।
    जितनी देर में वह कपड़े बदलने गए, उतनी देर में वह सोचने लगे कि आखिर उनकी प्रतिष्ठा और उनकी कलम समाज के काम तो आ रही है। वह मन ही मन गदगद हुए जा रहे थे और सोच रहे थे कि लेखक अगर समाज की आवाज़ नहीं उठाएगा तो कौन उठाएगा?
    वह कपड़े पहनते हुए अपनी पत्नी से चुपके से कह उठे, “चार कप चाय बना दो, शर्मा जी आए हुए हैं और साथ में दो लोग हैं।”
    पत्नी ने जानबूझकर तेज़ आवाज़ में अपनी बात रखी, “तीन महीने से कुछ लाए हो? न चीनी है और न चाय? कहाँ से चाय बना दूँ?”
    बाहर बैठे लोगों तक पूरी बात पहुँच गई थी। उन्होंने बाहर की तरफ देखा। शर्मा जी की नज़रें मिलीं, लेकिन शर्मा जी ने ऐसे दर्शाया जैसे कुछ सुनाई न दिया हो। आश्वस्त होकर लेखक साहब ने पत्नी से कहा, “थोड़ा धीरे बोला करो। अभी किताब लिखना शुरू किया है। आज शाम को जाकर प्रकाशक से कुछ एडवांस ले आता हूँ। दो-चार महीने का इकट्ठे सामान लाकर रख दूँगा।”
    “ठीक है, तुम और तुम्हारा प्रकाशक! वो कंबल ओढ़कर घी पा रहा है…” कहते हुए वह नाक-भौं सिकोड़कर चली गई।
    साहित्यकार साहब कपड़े बदलकर बाहर आए। कुर्ता पुराना था, हल्की सी सिलाई भी खुली थी, शायद उसे उनकी पत्नी ने सिल दिया होगा, जो दुबारा खुलने लगी थी। इन सब से क्या? लेखक कोई पैसे के लिए थोड़े ही बनता है। लेखक तो समाज के मूल्यों को बचाने, वंचितों की आवाज़ उठाने के लिए बनता है। हर किसी का अपना उद्देश्य है। लेखक अपने उद्देश्य के लिए सभासद साहब के पास चल दिए थे।
    शाम हुई थी, वह प्रकाशक के पास चल दिए थे। प्रकाशक का नाम शब्दसंगम प्रकाशन था— लगभग हज़ार गज की जगह में फैला, पैंतीस साल पुराना यह प्रकाशन था, जहाँ करीब 35 कर्मचारी काम करते थे। जैसे ही वे अंदर प्रवेश करने को हुए, उनकी किताब का पोस्टर रिसेप्शन में लगा हुआ था। वह अपनी किताब का कवर देखकर इतने प्रफुल्लित हुए जैसे प्रकाशक ने उन्हें जीवन के सत्य से मिलवा दिया हो। थोड़ी देर तक निहारते रहे, मन ही मन सोचते रहे कि अगर ऐसा प्रकाशक उन्हें न मिलता तो उनकी इतनी ख्याति न होती। उन्हें महसूस हुआ कि कई लेखक इन्हें पैसा देकर छपने को तैयार हैं, फिर भी ये सबकी किताबें प्रकाशित नहीं करते। लोग इनके यहाँ से प्रकाशित होने को तरसते हैं और मेरी किताब का पोस्टर इन्होंने ऑफिस में सबसे बड़ा लगाया हुआ है। मन में खुशियों का अंबार लेकर वह अग्रवाल साहब के ऑफिस की तरफ बढ़ गए थे।
    अग्रवाल साहब किसी मित्र के साथ बैठे हुए थे। जैसे ही अग्रवाल साहब ने साहित्यकार साहब को देखा, मन में मुस्कान अपने आप बिखर गई। जो दो लोग गंभीर मुद्रा में बात कर रहे थे, वहाँ एकदम से ख़ुशी की लहर दौड़ गई। प्रकाशक साहब अपनी कुर्सी से उठ खड़े हुए, जैसे प्रधामंत्री जी को देख लिया हो और अपनी कुर्सी की तरफ इशारा करते हुए बोले, “इधर बैठिए पाण्डेय जी, आपकी जगह यहाँ है। आपकी वजह से ही हम प्रकाशक जिंदा हैं। आप हैं तो हम हैं।” साहित्यकार साहब इतना सम्मान देखकर प्रफुल्लित थे। जैसे ही बैठे, प्रकाशक साहब ने बेल बजाई, “पाण्डेय जी को पानी लाओ”, फिर पाण्डेय जी की तरफ देखते हुए पूछने लगे, “चाय या कॉफी?”
    पाण्डेय जी ने सकुचाते हुए जवाब दिया, “अग्रवाल साहब, जो आपकी इच्छा हो!”
    “तीन कप चाय ले आओ,” अग्रवाल साहब ने अपने चपरासी से कहा, “पाण्डेय जी की चाय में शक्कर कम रहेगी।”
    चपरासी के जाने के बाद उन्होंने बगल में बैठे व्यक्ति से पाण्डेय जी का परिचय करवाया, “इन्हें जानते हैं आप?”
    “देखे-देखे तो लग रहे हैं,” मेहमान साहब जिनका नाम विपिन निगम था, ने उत्तर दिया।
    “आप इन्हें नहीं जानते? ये देश के जाने-माने लेखक हैं। पूरा देश इन्हें जानता है। हाल ही में इन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त हुआ, माननीय राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू जी के हाथों मिला था। इनकी किताब ‘कहीं ख्वाब, कहीं सच’ देश भर में खूब बिकी है और यह अमेज़न बेस्टसेलर भी बनी है। हमारा सौभाग्य है कि हमने इनकी पच्चीस किताबें प्रकाशित की हैं। हमारा सौभाग्य है कि इन जैसे महान लेखक से हमारा वास्ता है,” प्रकाशक महोदय ने एक सांस में इतना सब कह दिया। कहीं नहीं रुके, बस बोलते गए। जैसे-जैसे वे बोलते गए, साहित्यकार साहब को अपने होने का एहसास, अपने सम्मान का एहसास और अपनी कलम की ताकत का अनुभव बढ़ता हुआ महसूस हुआ। उन्हें महसूस हुआ कि उनका कुर्ता भले फटा हो, लेकिन उनका सम्मान सबसे बड़ा है। इतना बड़ा करोड़पति प्रकाशक जब इतना सम्मान दे रहा है तो यह बहुत बड़ी बात है। भले ही वे हाथ जोड़े, मुस्कान छिपाने की भरसक कोशिश करते हुए गंभीर मुद्रा बनाए हुए थे, पर मन बहुत खुश हो रहा था। उन्हें ऐसा लग रहा था कि वे दुनिया के केंद्र हैं; अगर दुनिया न सही तो साहित्य के तो वे केंद्र बिंदु ही हैं। उन्हें अपने फटे कुर्ते में भी चमक दिखने लगी थी।
    इसी बीच चाय आ गई। चाय पीते हुए लेखक साहब ने बताया, “मैं अपने शहर के उस गुमनाम क्रांतिकारी पर किताब लिख रहा हूँ, जिसे इतिहास ने भुला दिया।”
    प्रकाशक महोदय बहुत खुश हुए, “अरे वाह, यह तो बहुत बड़ा काम है। ऐसा काम तो सिर्फ आप ही कर सकते हैं।” प्रकाशक महोदय अपने लेखक को खुश करने के लिए कोई कोर कसर नहीं छोड़ना चाहते थे। वह धन के अलावा लेखक को सब कुछ उसकी हैसियत से अधिक देना जानते थे। इसीलिए पैतीस वर्षों से लगातार उनकी संपत्ति बढती जा रही थी।
    बगल में बैठे निगम साहब ने भी दाद दी, “साहित्यकार का काम ही होता है समाज के वंचित लोगों को उठाना। वह क्रांतिकारी जिसे लोग नहीं जानते, वह भी तो वंचित ही रहा! बहुत चलेगी यह किताब, आजकल इतिहास को जानने की इच्छा रखने वाले बहुत लोग हैं।”
    लेखक को ऐसा लग रहा था जैसे, सिर्फ वही है जो नए विषयों पर लिखना जानते हैं, बाकी सभी तो अवही घिसे-पिटे दो तीन विमर्शों पर बात करते रहते हैं। उन्हें लग रहा था कि अगर वह न लिखें तो हिंदी साहित्य से नयापन चला जाएगा। फिर भी उन्होंने खुद पर काबू पाते हुए पॉइंट पर आ गए, “हम चाहते हैं कि यह किताब आप ही प्रकाशित करें,”
    “बिलकुल, हम तो आपकी हर किताब प्रकाशित करना चाहते हैं, ” अग्रवाल साहब चहक उठे।
    “मुझे लगता है अभी धन की मुझे ज़रूरत है। आप चाहें तो अनुबंध कर लिया जाए और एडवांस और पिछली किताबों की रॉयल्टी का स्टेटमेंट दे दें तो अच्छा रहेगा, ”पाण्डेय साहब ने बहुत संकोच के साथ रॉयल्टी के मुद्दे पर बात की। शायद यह पहली बार उन्होंने रॉयल्टी पर बात की थी। इसके पीछे का कारण हाल के दिनों में मिली तीस लाख की रॉयल्टी थी।
    प्रकाशन ने पहली बार लेखक के मुंह से रॉयल्टी का नाम सुना था, इससे पहले वह जो देते थे, लेखक ख़ुशी ख़ुशी ले लेते थे। इसके बदले वह गुलाम जामुन खिलाकर मुंह मीठा कराते थे और लेखक के लेखन पर कुछ कसीदे गढ़ देते थे। इस बार लेखक के मुंह से रॉयल्टी नाम सुनकर उनकी नाक भौं सिकुड़ी थी, लेकिन खुद को संभालते हुए अपनी बात रखी, “ठीक है, आपको जो पिछली किताब में एडवांस दिया था, वही एडवांस हम आपको दे देंगे और रॉयल्टी स्टेटमेंट भी अभी ईमेल के माध्यम से भेज देंगे और अगर आपको ठीक लगे तो अभी अनुबंध हो जाये, चेक ले लीजिये और सोशल मीडिया में सबके साथ खुशखबरी साझा कर दी जाए, ” अग्रवाल साहब ने बड़े आत्मविश्वास से लेखक साहब का दिमाग भटकाना चाहा, “आखिर यह सोशल मीडिया युग है, जो दिखता है वही बिकता है।“ सभी ने एकसाथ उनकी बात पर सहमति जताई थी।
    लेकिन पाण्डेय जी अपने पॉइंट पर रहना चाहते थे, थोड़े संकोच के साथ लेखक साहब ने फिर कहा, “पिछली किताब तो राष्ट्रीय पुरस्कार पाने के बाद खूब बिकी होगी, तो इस बार कुछ अधिक एडवांस की ज़रूरत है।”
    “कितना चाहिए? खुलकर बोलिए,” अग्रवाल साहब ने लेखक के मन की बात जननी चाही, वह बहुत अच्छे व्यापारी थे, उन्हें भली-भांति पता था कि वह देंगे उतना ही जितना उन्हें देना होगा, लेखक के मांगने से क्या हो जाता है।
    पाण्डेय साहब ने निगम साहब की तरफ देखा, फिर थोड़ा संकुचाते हुए धीमे से कहा, “पच्चीस…” हल्का सा होठ हिला भर दिया था। उन्हें ऐसा लगा कि कहीं निगम साहब यह न जान जाएँ कि इतना बड़ा लेखक और मात्र पच्चीस हज़ार का एडवांस मांग रहा है। लेखक को यह भली-भांति पता था कि अगर यह खबर समाज में पहुँच गयी तो उनकी बे-इज्जती हो जायेगी और लोग सोचेंगे कि उनकी किताब इतनी भी नहीं बिकती? यह बात प्रकाशक और लेखक के बीच में दबी रहती है। लेखक भी खुश रहता है और प्रकाशक भी मस्त।
    अग्रवाल साहब को बात काटते देर नहीं लगी, “हम आपका सम्मान करते हैं, आपकी बात काटते नहीं हैं, लेकिन जितनी पिछली किताब में एडवांस हमने दिया था, उतना ही नए में दे पाएंगे। आपकी पिछली किताब की बिकी हुई रॉयल्टी स्टेटमेंट आपको भेज देंगे। आपकी किताब भेजने पर संपादन होगा, पेज-सेटिंग होगी, प्रूफ-रीडिंग होगी, फिर छपाई और बाइंडिंग होगी और मार्केट में 40% के डिस्काउंट पर जाएगी— कई किताबें वापस भी आती हैं। पीआर टीम को आपकी किताब के प्रचार के लिए पैसे देने पड़ेंगे; जो अमर उजाला में आपका इंटरव्यू पिछली किताब के समय छपा था, वह भी हमारी पीआर टीम ने ही कराया था।”
    लेखक साहब सुनते रहे और प्रकाशक साहब बातें करते रहे, “पुस्तक मेला में आपकी किताब के बड़े-बड़े पोस्टर लगाए गए थे और हम आपको हमेशा आगे रखते हैं। इन सब में पैसा लगता है, पाण्डेय जी। आजकल रील के जमाने में जान रहे हो न कि किताबें कहाँ बिक रही हैं?”
    इतना सब सुनने के बाद अब लेखक साहब प्रकाशक से और कुछ नहीं बोल पाए। वे नहीं चाहते थे कि संबंध बिगड़ें, क्योंकि उन्हें ऐसा डर था कि यदि संबंध बिगड़ गया तो रिसेप्शन में सबसे आगे लगा बड़ा पोस्टर हट जाएगा, किताब का पीआर कम हो जाएगा, पुस्तक मेले में बड़ी तस्वीरें नहीं लगेंगी और समाचारपत्रों में इंटरव्यू भी नहीं छपेंगे। फिर जो सम्मान है लोगों के बीच है, वह भी धीरे-धीरे चला जाएगा। उन्होंने हाथ जोड़कर उठना चाहा कि तभी प्रकाशक महोदय ने उन्हें रोकते हुए कहा, “अरे, मीठा खाए बिना कहाँ जा रहे हो? नया अनुबंध कर लेते हैं।”
    नया अनुबंध तुरंत कर लिया गया; एक लिफाफे में चेक पकड़ा दिया गया और प्रकाशक ने गुलाब जामुन खिलाकर मुंह मीठा कराया और सोशल मीडिया पर तस्वीर डाल दी- “राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता श्री अमन पाण्डेय जी की अगली किताब पर अनुबंध हो चुका है। हम ऐसे महान लेखक से अनुबंध करके गौरवान्वित हैं।” पाण्डेय जी ने गुलाब जामुन खाया और उस ऑफिस से निकल आए।
    उधर निगम साहब और अग्रवाल साहब फिर अपनी-अपनी कुर्सियों पर बैठ गए। अग्रवाल साहब ने तुरंत निगम साहब से कहा, “लेखक सोचता है कि उसकी किताब बहुत बिकेगी, पर असलियत यह है कि आजकल कौन किताबें पढ़ता है?”
    निगम साहब ने हाँ में हाँ मिलाई, “बात तो सही है।”
    “ऐसे हम सबको पच्चीस हज़ार दे दें तो हम कहाँ के रहेंगे?” अग्रवाल साहब बोले। तभी चपरासी को बुलाकर आदेश दिया गया, “ऑडी निकालो, अब घर के लिए निकलना है।” लेखक साहब टेम्पो से गए थे और प्रकाशक महोदय ऑडी निकलवा रहे थे।
    “भाई, पैसा मेरा, रिस्क मेरा, सब कुछ मेरा। आपने तो लिखकर अपनी खुजली मिटा ली, पैसा जो लगाएगा उतना ही देगा जिसमें उसे फायदा हो। आपको नाम चाहिए, हम नाम दे रहे हैं, हम तो यहाँ व्यापार के लिए बैठे हैं।” वे कहते जा रहे थे।
    निगम साहब ने टोंक दिया, “आजकल लेखकों को कौन जानता है? अंग्रेज़ी के लेखक हों तो कुछ लोग जानते भी हैं।”
    अग्रवाल साहब तक बात पहुँच गई, वे मुस्कराए पर बोले नहीं। वह कहना चाहते थे लेकिन रुक गए- लेखक खुद एक-दूसरे को बड़ा लेखक मानते हैं, पर असल में प्रकाशक के लिए कोई लेखक बड़ा नहीं होता। वे बस प्रकाशक को व्यापार देने का काम करते हैं, इससे ज्यादा कुछ नहीं।
    अब जैसे-तैसे खुश होकर पाण्डेय जी अपने घर आए। उन्हें इस बात की खुशी थी कि जिस प्रकाशक के यहाँ लोग प्रकाशित होने को तरसते हैं, वहाँ से उन्हें एडवांस मिला है। वह लिफाफा खोलकर देखना चाहते थे। घर पहुँचे ही देखा कि मित्र श्याम सिंह वहां बैठा हुआ है, “पाण्डेय जी, बधाई हो! शब्दसंगम प्रकाशन के पेज पर देखा कि आपने नया अनुबंध किया है। शायद चेक का लिफाफा भी मिला है। आज तो पार्टी बनती है।”
    पाण्डेय जी खुश थे। उन्होंने लैपटॉप खोला; उसमें प्रकाशक की ओर से एक ईमेल उनके घर पहुँचने के पहले आ चुका था। प्रकाशक ने रॉयल्टी स्टेटमेंट भेजा था। पिछली किताब पर ₹5,000/- एडवांस दिया गया था; पूरे साल भर की बिक्री के बाद भी ₹2,560 लेखक पर बकाया था। राष्ट्रीय पुरस्कार मिलने के बाद भी किताब इतनी नहीं बिकी क्या— यह मन में कौतूहल था। इस दुःख से निकल पाते कि तभी मित्र ने आग्रह किया, “आज तो गोल्ड लेबल चलेगी, इसके नीचे कुछ नहीं।”
    पाण्डेय जी मुस्कुराए, “जरूर चलेगी।”
    उन्होंने धीरे से लिफाफा खोला, मात्र ₹5,000/- का चेक था। उनसे न अब हँसा जा रहा था न रोया जा रहा था।
    मित्र ने तुरंत पूछा, “कितने का चेक है? अभी विनोद कुमार शुक्ल को तीस लाख रुपये की रॉयल्टी मिली है, आपको कितना एडवांस मिला?”
    तुरंत पाण्डेय जी ने बात मोड़ दी, “मुझे रॉयल्टी नहीं मिली, सिर्फ़ एडवांस मिला है। फिर भी सम्मानजनक राशि मिल जाती है, जिससे घर का खर्च चलता है।” फिर जोड़ते हुए पूछा, “गोल्ड लेबल कितने की आती है?”
    मित्र ने बताया, “₹4,500/- की, साथ में खाने-पीने और सिगरेट के लिए कुल ₹6,000 दे दीजिए।”
    अब लेखक साहब बोले, “अभी तुम ले आओ, हम दे देते हैं।” जैसे ही मित्र गया, पत्नी आई, “कितने का चेक दिया? मुझे भी शॉपिंग करनी है।”
    इतने में गुस्से से साहित्यकार साहब ने कहा, “चलो हटो, चाय बनाओ।”
    पत्नी ने भी नाक फुला लिया, “जब चाय और चीनी लाओगे तभी तो चाय बनेगी। तुम तो आज पार्टी कर लोगे, घर के लिए भी सोचो?”
    साहित्यकार साहब आगबबूला हो गए और झिड़ककर अंदर कमरे की ओर चले गए। पत्नी सब समझ गई, पत्नी ही तो है जो सब समझती है, वह बैठकर मन ही मन सोचती रही— “दूसरों के लिए लड़ने वाला लेखक, अपने लिए क्यों नहीं लड़ पाता?”

    2 thoughts on “दूसरों के लिए लड़ने वाला लेखक, अपने लिए क्यों नहीं लड़ पाता?

    1. बहुत सही लिखे आप। कितने लेखक तो झूठ भी बोलते हैं कि मेरी पुस्तक छपने के लिए मैंने पैसे नहीं दिए।

    2. “भाई, पैसा मेरा, रिस्क मेरा, सब कुछ मेरा। आपने तो लिखकर अपनी खुजली मिटा ली, पैसा जो लगाएगा उतना ही देगा जिसमें उसे फायदा हो।
      … सबसे मारक अंश

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