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  • अमिताव घोष को 2025 का पार्क क्योंग-नी पुरस्कार

    भारतीय मूल के प्रसिद्ध लेखक अमिताव घोष को दक्षिण कोरिया का प्रसिद्ध साहित्यिक पुरस्कार पार्क क्योंग-नी पुरस्कार देने की घोषणा हुई है। इसी को आधार बनाकर कुमारी रोहिणी ने यह लेख लिखा है। रोहिणी जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से कोरियन भाषा में पीएचडी हैं और कोरियन पढ़ाती हैं। आप यह टिप्पणी पढ़ सकते हैं- मॉडरेटर

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     कभी-कभी साहित्य अपने आप में एक भूगोल बन जाता है। नदियों, हवाओं, सीमाओं और स्मृतियों से भरा एक मानवीय भूगोल। जब दक्षिण कोरिया की तोजी कल्चरल फाउंडेशन ने 2025 का पार्क क्योंग-नी (Park Kyong-ni) पुरस्कार भारतीय लेखक अमिताव घोष को देने की घोषणा की है। इस खबर को सुनते ही मैंने महसूस किया कि यह सिर्फ एक लेखक का सम्मान नहीं, बल्कि दो अलग-अलग भूगोलों – दक्षिण कोरिया और भारत – के बीच उस साझा अनुभव का उत्सव है, जिसे साहित्य बार-बार शब्दों में पुनर्जीवित करता है। कोरियाई भाषा और साहित्य से जुड़े होने के कारण मेरे लिए तो एक बार फिर से यह दोहरी ख़ुशी का अवसर था ही। हालाँकि इस पुरस्कार की घोषणा सितंबर महीने में हुई और 23 अक्तूबर को दक्षिण कोरिया के वोनजू शहर में यह सम्मान दिया गया।

    इसके पहले इस पुरस्कार को पाने वाले लेखकों में अमेरिकी लेखक मैरिलिन रॉबिन्सन, इज़राइल के सामाजिक और राजनीतिक संघर्षों को मानवीय गहराई से अपने लेखन में दर्शाने वाले लेखक अमोस ओज़, केन्याई उपन्यासकार न्गुगी वा थिओंगो, बाल्कन क्षेत्र के सबसे बड़े साहित्यकारों में शुमार इस्माइल कदारे और ब्रिटिश लेखिका एंटोनिया सुसान बायट का नाम है।
    पार्क क्योंग-नी (1926–2008) दक्षिण कोरिया की सबसे महत्वपूर्ण उपन्यासकारों में मानी जाती हैं। सोलह खंडों में प्रकाशित उनके उपन्यास Toji” (The Land) को इसके पाठक एक राष्ट्र की सामूहिक आत्मा के लेखा-जोखा के रूप में देखते हैं। यह कोरियाई प्रायद्वीप की सदियों की उथल-पुथल, औपनिवेशिक छाया, और स्वतंत्रता के बाद की जटिलताओं से भरी हुई कृति है।
    ‘तोजी’ का शाब्दिक अर्थ है भूमि यानी धरती या मिट्टी। पर उसके भीतर बसते हैं लोग, जिनके सुख-दुख, विस्थापन, और संघर्ष एक सजीव सभ्यता का मानचित्र बनाते हैं। पार्क के लिए ज़मीन एक निर्जीव चीज नहीं, हम भारतीयों के लिए भी तो धरती का दर्जा माँ का ही है ना। पार्क के लिए उसकी धरती जीवित स्मृति है – वह बोलती है, उसे दुख होता है और वह बार-बार जन्म लेती है। मातृभूमि के प्रति उनके लेखन में उपस्थित इसी आत्मीयता के सम्मान में साल 2011 में दक्षिण कोरिया के तोजी सांस्कृतिक फाउंडेशन ने इस अंतरराष्ट्रीय साहित्यिक पुरस्कार की स्थापना की थी।

    इसका उद्देश्य ऐसे लेखक की पहचान करना है जिसकी लेखनी अपने समय और भूगोल की सीमाओं से परे जाकर मानवीय और पर्यावरणीय सरोकारों को आवाज़ देती हो। इसे दक्षिण कोरिया का सबसे बड़े साहित्यिक सम्मान का दर्जा भी हासिल है और सम्मानित लेखक को लगभग 100 मिलियन वोन यानी लगभग 1 लाख अमेरिकी डॉलर की राशि मिलती है। फाउंडेशन इसे केवल एक पुरस्कार भर नहीं मानता है बल्कि उसके लिए यह पुरस्कार साहित्यिक विवेक की पहचान का एक ज़रिया है – यह उस लेखक को दिया जाता है जिसने “साहित्य के नैतिक और सृजनात्मक मूल्य को अपने समय की सबसे बड़ी चुनौतियों के बीच जीवित रखा हो।”

    इस पुरस्कार के साल 2025 की चयन समिति ने अमिताव घोष को सम्मानित करते हुए कहा कि,  “अमिताव घोष ने अपने लेखन से औपनिवेशिक दौर के बाद के समाज और पर्यावरण से जुड़ी कहानियों को नए तरीके से समझने का रास्ता दिखाया है। उन्होंने यह साबित किया है कि साहित्य सिर्फ इंसानों के अनुभवों तक सीमित नहीं है। इसमें धरती, नदियाँ, पेड़, हवा और समुद्र भी अपनी भूमिका निभाते हैं। उनके उपन्यासों में प्रकृति कोई पृष्ठभूमि नहीं, बल्कि एक जीवित पात्र की तरह सामने आती है, जो बोलती है, दुखी होती है, जिसे गुस्सा आता है और  जो समय-समय पर चेतावनी भी देती है।”

    चयन समिति की इस टिप्पणी से यह स्पष्ट होता है कि घोष का लेखन अब ‘मानव-केंद्रित कथा’ से आगे निकलकर ‘सजीव जगत-केंद्रित साहित्य’ की दिशा में बढ़ रहा है।

    पार्क क्योंग-नी की तोजी (The Land)  और अमिताव घोष की Ibis Trilogy (आइबिस त्रयी एक ऐतिहासिक उपन्यास हैजो 1830 के दशक में प्रथम अफीम युद्ध से पहले हिंद महासागर क्षेत्र में घटित घटनाओं पर आधारित है। यह विशेष रूप से भारत और चीन के बीच अफीम के व्यापार और मॉरीशस में गिरमिटिया की तस्करी पर केंद्रित है।), दोनों ही भूमि, इतिहास और विस्थापन की कहानियाँ हैं।
    कोरिया में ‘धरती’ जापानी उपनिवेश और विभाजन की स्मृति से जुड़ी है, वहीं भारत की धरती अफीम के खेतों और औपनिवेशिक व्यापार की छाया से भरी है।
    पार्क और घोष दोनों ने ही अपने लिखे से यही दिखाने का प्रयास किया है कि इतिहास केवल राजाओं या युद्ध जीतने वालों का नहीं होता है। उसका रिश्ता मिट्टी, आम लोगों द्वारा बहाए जाने वाले पसीने और उनके आँसुओं का भी होता है। घोष के उपन्यासों में जिस तरह कोलकाता से लेकर मॉरिशस और चीन तक फैले ओपियम युद्धों की कहानी मिलती है, उसी तरह पार्क की ज़मीन पर कोरिया के खेतिहर मज़दूर, स्त्रियाँ, और मजदूर अपनी सांस्कृतिक अस्मिता की कहानी बुनते नज़र आते हैं।
    अमिताव अपने लिखे में आधुनिक साहित्य के उस मौन को तोड़ते हैं, जो जलवायु और पर्यावरण जैसे संकटों के प्रति उदासीन था। उनके लिखे में वे बताने की कोशिश करते हैं कि पर्यावरण केवल ‘नीति’ या ‘विज्ञान’ का विषय नहीं, बल्कि यह स्मृति और नैतिकता का भी प्रश्न है। अपनी किताब The Great Derangement में वे लिखते हैं: “हमने अपनी कहानियों में तूफानों और बाढ़ को बाहर निकाल दिया, जैसे वे हमारे नहीं, किसी और ही दुनिया से आते हों।”

    यह वही भाव है जो पार्क क्योंग-नी के लेखन में भी मिलता है। उनके लिए प्रकृति केवल पृष्ठभूमि नहीं, बल्कि पात्र है; और मनुष्य केवल उसका संरक्षक नहीं, बल्कि उसका उत्तरदायी साथी है।

    अमिताव घोष का चयन केवल एक भारतीय लेखक की जीत नहीं, बल्कि दक्षिण एशियाई संवेदनशीलता की वैश्विक मान्यता भी है। यह उस साहित्य का सम्मान है जो सीमाओं से परे जाकर साझा पीड़ा और साझा जिम्मेदारी की बात करता है। जब एक कोरियाई संस्था किसी भारतीय लेखक को “धरती” और “प्रकृति” के नैतिक विमर्श के लिए पुरस्कृत और सम्मानित करती है, तो यह इस बात का प्रमाण होता है कि आज का साहित्य राष्ट्र की अवधारणा और राजनैतिक सीमाओं से ज़्यादा धरती की बात कर रहा है।

    इस पुरस्कार को मिलने के बाद घोष ख़ुद कहते हैं कि, “यह पुरस्कार मेरे लिए ख़ास है। मैं खुश हूँ कि मेरे काम में बसे भूले-बिसरे इतिहास और गैर-मानवीय आवाज़ों को वहाँ के लोगों ने सुना और समझा। यह ऐसे समय में मिला है जब दक्षिण कोरिया ने के-पॉप से ​​लेकर फिल्म और साहित्य तक, सांस्कृतिक क्षेत्र में खुद को एक वैश्विक महाशक्ति के रूप में स्थापित कर लिया है। ऐसा करने वाला वह पहला गैर-पश्चिमी देश है जिसने बहुत लंबे समय में ऐसा किया है। मणिपुर और पूर्वोत्तर से होते हुए भारत के अन्य हिस्सों में हाल्यू लहर के आने की कहानी विशेष रूप से दिलचस्प है। यह कोरियाई लहर हमें इसकी याद दिलाती है कि हम सब ऐसे युग में जी रहे हैं जब दुनिया कई अलग-अलग तरीकों से, कभी-कभी बिना हमारी जानकारी के, पुनर्निर्माण की ओर अग्रसर है। इस संदर्भ में, मैं और भी अधिक प्रभावित हूँ कि मेरे काम, जो अक्सर इतिहास के भूले-बिसरे धागों और अनसुनी रह जाने वाली आवाज़ों, जिनमें गैर-मानवीय आवाज़ें भी शामिल हैं, से जुड़ा होता है, को यहाँ महत्त्व और सम्मान मिला है।”

    अंत में, किसी लेखक के लिए पुरस्कार केवल एक सम्मान नहीं होता, बल्कि यह उस संवाद की स्वीकृति है जो वह समय से करता है।” अमिताव घोष की लेखनी ने इतिहास, पर्यावरण और स्मृति को एक-दूसरे में पिरोकर एक ऐसे साहित्यिक भूगोल को रचा है जिसमें प्रकृति की अपनी आवाज़ तो है ही, साथ ही मनुष्य भी उसकी प्रतिध्वनि में अपनी पहचान खोजता है। पार्क क्योंग-नी और अमिताव घोष, दोनों ने अपनी ज़मीन से शुरू करके दुनिया का रास्ता मापा है या उसका प्रयास किया है। अपने लिखे से दोनों ही यह दिखाने का प्रयास करते नज़र आते हैं कि मिट्टी सिर्फ खेत नहीं होती, वह स्मृति की पहली परत है।
    और शायद यही कारण है कि जब दक्षिण कोरिया ने “धरती” के नाम पर स्थापित पुरस्कार भारत के उस लेखक को दिया जिसने “समुद्रों और धरती” की स्मृतियों को शब्द दिए, तो यह दो संस्कृतियों के बीच साहित्यिक संवाद का सबसे सुंदर क्षण बन गया।

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