गौहर रज़ा की किताब ‘मिथकों से विज्ञान तक’ का अंग्रेज़ी अनुवाद आया है ‘From Myths to Science‘. हिन्दी किताब पेंगुइन स्वदेश से आई थी जबकि अंग्रेज़ी किताब पेंगुइन से। हाल में ही इस किताब का लोकार्पण हुआ। कार्यक्रम की रपट लिखी है मुशर्रफ परवेज़ ने। आप भी पढ़ सकते हैं- मॉडरेटर
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गौहर रज़ा जी की हिन्दी पुस्तक का अंग्रेज़ी अनुवाद आया है- ‘From Myths to Science’ का लोकार्पण था। पुस्तक पेंगुइन से आई है। कुछ दिन पूर्व मेरे एक साथी ने पोस्टर भी भेजा और कहा कि चलना है। क्योंकि जावेद साहब आ रहे थे। मेरे मित्र को पता है कि मैं सुनने से ज़्यादा पढ़ने मे यक़ीन रखता हूँ। लेकिन मैं उसे मना नहीं कर पाया क्योंकि इन दिनों हिंदी गीतों का अध्ययन कर रहा हूँ। इसीलिए जावेद साहब से मिलना था ताकि कुछ एक सवालों का जवाब मिल सके। ठीक बात है कि जावेद साहब ने हिंदी सिनेमा को अपने कलम से समृद्ध किया है। पटकथा और गीतों के द्वारा हिंदी सिनेमा को ऊँचाइयों पर ले जाने का अद्भुत काम किया है। हां, मैं भी जावेद साहब का बड़ा वाला फैन हूँ। यही कारण है कि उनसे किताब साइन करवाया।
अब हम दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ते हैं तो इसका मतलब ये नहीं है कि हम उनसे असहमति नहीं रख सकते हैं। आज उन्हें सुनकर मेरे अंदर कई सवाल आए जिसका ज़िक्र करना लाज़िम बन पड़ता है। जावेद साहब के गानों ने हमसे पहली वाली पीढ़ी को प्रेम करना अवश्य सिखाया है जो उनकी पहचान भी है। हम जैसे लड़के किसी भी सेमिनार या पुस्तक परिचर्चा में इसीलिए जाते हैं ताकि कुछ सीखकर आएं। जैसे मुशायरे में माताएं अपने बच्चों को भेजती हैं क्योंकि वहां उन्हें अदब और इंसानियत की बात सिखाई जाती है।
गौहर साहब ने अपने वक्तव्य में देश के हालात और तमाम बातों को रखा। किताब पर बातें कम की। जबकि मुझ जैसे सैकड़ों छात्र उनके किताब की खासियत को सुनने गए थे। न कि उनके विचार को सुनने। अव्वल तो उन्हें उन मिथकों को बताना चाहिए जिस धरातल पर उन्होंने अपनी किताब लिखी। वक्ताओं को सुनकर मुझे ऐसा महसूस हुआ कि उन्होंने रचनाधर्मिता से कहीं ज़्यादा विचारधारा पर बातें रखीं जिसकी मुझ जैसे पढ़ने वाले लड़के को उम्मीद नहीं थी।
प्रोफेसर पुरूषोतम अग्रवाल जी ने अपना दायित्व बड़े सलीके से निभाया। उन्होंने बहुत सी ऐसी बातें बताई जो किताब के इर्द-गिर्द रहीं। अग्रवाल जी का एक वाक्य था- “It is very bad for becoming fool religious.” बात एकदम ठीक है सर। इसमें कोई आपत्ति नहीं है लेकिन इस बात को समझना पड़ेगा कि “हर एक धार्मिक व्यक्ति बेवकूफ़ नहीं होता।”
जावेद साहब के कई बातों से मैं गुरेज रखता हूँ। कई लोग इस बात पर कमेंट करेंगे कि आपको उतनी समझ नहीं है। आप देश के इतने बड़े कलाकार पर टिप्पणी कर रहे हैं। शायद आप लाइमलाइट में आना चाहते हैं। वगैरह-वगैरह। लेकिन मेरा ऐसा उद्योग नहीं है। मेरे बहुत से सवाल हैं। मैंने भी प्रश्नकाल में प्रश्न करने की कोशिश की पर कामयाब नहीं हुआ क्योंकि हर मर्तबा कोई न कोई बोल पड़ता था। और अपन सहज महसूस नहीं कर पा रहे थे। चूहादौड़ में शामिल होना मुनासिब नहीं लगा।
जावेद साहब ने कहा- “Gauahar Saab this is not a good book but an exceptional work.” उनका पहला वाक्य मुझे ख़ूब पसंद आया। लेकिन जैसे-जैसे उनका वक्तव्य आगे बढ़ रहा था। किताब से वे काफ़ी दूर जाते दिखने लगे। मुझे छटपटाहट होने लगी क्योंकि अपन तो किताब की खासियत सुनने गए थे।
वैसे जावेद साहब हमेशा से ‘धर्म’ को लेकर बड़े उदासीन रहे हैं। उनके तमाम इंटरव्यू को उठाकर देख लीजिए टॉपिक कोई भी हो वे धर्म को लेकर अवश्य बोलते हैं।
आज भी उन्होंने ऐसा ही किया। जबकि हॉल में युवा पीढ़ी थी जो उनके विचार किताब पर सुनना चाहती थी। जहां तक मेरी समझ है, वर्तमान में दो धारा है एक जो धर्म को ऊंचा दिखाने की कोशिश कर रही है और दूसरी धारा साइंस को महत्वपूर्ण बताकर धर्म को सिरे से नकारती है। लेकिन दोनों धाराओं को अपना-अपना विशेष महत्व है। दोनों धारा के लोग आख़िर कब सामंजस्य स्थापित करेंगे मुझे समझ नहीं आता। यदि कोई युवा जावेद साहब को सुन ले तो साइंस पर यक़ीन कर बैठेगा और किसी अन्य व्यक्ति को तो धर्म को अच्छा मानेगा।
सवाल ये है कि अब युवा किसे माने?
जावेद साहब ने कहा- “यदि 16 से 17 वर्ष के युवाओं को सभी धर्म के ग्रंथ पढ़ने को दिए जाएं तो एक युवा सारे ग्रंथों को नकार देगा।” यह परिकल्पना तो उनकी है क्योंकि उन्होंने इसे गढ़ा है। क्या उन्होंने कोई सर्वे कराया है? फ़िर उन्होंने कहा- “धर्म की सारी बातें (Illogical) यानी अतार्किक है और विज्ञान की तार्किक।”
मेरा मन हुआ कि उनसे पूछूं कि कैसे धर्म की सारी बातें अतार्किक हैं? ये ठीक बात है कि आज लोग धर्म को लेकर कट्टर होते जा रहे हैं। हालांकि ये लोगों का नज़रिया है। जबकि हर धर्म तो मानवता की बातें सिखाता है।
मसलन, इस्लाम धर्म में नमाज़ से पूर्व ‘वज़ू’ करने की रवायत है। इसके पीछे तर्क है जावेद साहब। यदि किसी लड़के या लकड़ी के माता या पिता असमय गुज़र जाएँ उस समय उसके रिश्तेदार या अपने पराए कहते हैं न यही नियति थी। अगर उसे ये नहीं कहा जाएगा तो उसको हिम्मत कहां से मिलेगी? साइंसदां की मानें तो तो उसे कहें इसका जवाब तुम लेबोरेटरी में जाकर पता करो।
इसी संदर्भ में एक और बात यदि कोई लड़का असफल हो रहा है कई सालों से और अंत में वो उस चीज़ को छोड़ देना चाहे तो उस वक़्त लोग कहते हैं न कि मेहनत करने वालों को सफलता अवश्य मिलती है। यहां ‘मेहनत’ वाली संकल्पना क्या साइंस बताती है? कहना ये है कि साइंस को ऊंचा दिखाकर धर्म की बातों को नकारा नहीं जा सकता।
*किसी ने एक प्रश्न किसी- ‘क्या प्रेम में भी रैशनल रहना चाहिए?’*
*जावेद साहब ने कहा- ‘प्रेम में ईरेशनल बनना पड़ता है।”*
ठीक उसी प्रकार जब कोई अपने अल्लाह, ईश्वर और भगवान् से प्रेम करता है तो वो भी ईरेशनल ही होता है। क्योंकि भगवान को मानने वाले व्यक्तियों की आस्था होती है जो उसे सुकून देती है।
*ये क्या बात हुई एक जगह आप Rationality की बात कर रहे हैं और दूसरी जगह Irrationality की।*
आख़िर ये दोहरा रवैया क्यों?
ख़ैर, अंत में कहना ये है कि मैं कोई ज्ञानी या आलोचक नहीं हूँ लेकिन फिर भी थोड़ी बहुत समझ है तो लगा कि ये बातें रखनी चाहिए।
*मैं इसीलिए नहीं जाता हूँ किताबों के लोकार्पण में क्योंकि कहीं रचनाधर्मिता से ज़्यादा रचनाकार की तारीफें होती हैं और कहीं विचारधारा की।*
कायदे से होना तो ये चाहिए कि जो धर्म की अच्छी बातें हैं उसको भी आत्मसात करनी चाहिए और साइंस की बातों को भी। हम 21वीं सदी में जी रहे हैं इसीलिए दोनों की अपनी-अपनी प्रासंगिकता है। बाक़ी गौहर साहब की टीम को गुलाब- जामुन, समोसा और चाय के लिए मुबारकबाद।