राकेश बिहारी की पहचान कथा-आलोचक संपादक के रूप में है। लेकिन वे मूलतः कथाकार हैं और अच्छे कथाकार हैं। उनकी यह कहानी पढ़िए। कहानी ‘प्रभात खबर’ के विशेषांक में प्रकाशित हो चुकी है लेकिन आप लोगों के लिए प्रस्तुत कर रहा हूँ- मॉडरेटर
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दस-बारह दिनों की धारासार बारिश के बाद आज जब धूप खिली, उसने सोचा वह दैनिक योगाभ्यास के लिए पार्क में जाएगा। लेकिन अगले ही पल इस बात का ख्याल आते ही कि पार्क की जमीन बहुत नम होगी, वह टैरस की तरफ चला गया। नीला, उसमें भी आसमानी उसका पसंदीदा रंग है। आसमान का नीलापन उसे बेतरह खींचता है। छत की फर्श पर योगा मैट बिछाते हुए उसने महसूस किया कि उसकी आसमानी रंगत खुले आसमान की आभा के सामने बहुत फीकी और उदास थी। उसने सोचा, हम लाख इनोवेटिव रंगों की रचना कर लें, इंसानी और कुदरती रंगों के बीच का यह फासला कभी कम नहीं होगा।
पिछले कई दिनों से सूर्य नमस्कार के दौरान हस्त उत्तानासन करते हुए उसकी नजर ड्राइंग रूम में लटकते झूमर पर जाती थी। आज उसके ऊपर नीला आसमान किसी साफ धुले चंदोवे-सा टंगा हुआ था। स्लेटी बादलों के कुछ झीने से गुच्छे सूदूर सूरज के आस-पास ठहरने की पुरजोर कोशिश रहे थे। पर सूरज की स्निग्ध किरणें उनकी उपस्थिति को भेदकर सीधे जमीन की तरफ बढ़ते हुए उनकी कोशिशों को लगातार नाकाम कर रही थीं। सूर्य नमस्कार की चौथी आवृत्ति करते हुए उसने गौर किया कि सूरज के आस पास इकट्ठा होने की कोशिश करते बादलों के वे गुच्छे कुछ और सघन हो आए थे। आसामान साफ होने के बावजूद सूरज की चमक पर एक स्लेटी-धूसर आवरण फैल गया था। तभी छत की रेलिंग के पास एक हलचल सी हुई। हरे और काले के बीच के गाढ़ेपन से युक्त रंगों वाला औसत से लंबा एक गिरगिट तेजी से निकलकर गमलों के पीछे कहीं गुम हो गया। अष्टांग नमस्कार की मुद्रा से भुजंगासन की तरफ बढ़ने के पहले ही उसकी लय टूट सी गई और उसने अपने बाजू जमीन पर टिका दिए। तभी योग गुरु सौरभ की आवाज किंचित लड़खड़ाई और आई पैड पर अनुराधा का मेसेज फ़्लैश किया- “सर अब दो ही दिन बचे हैं, बस आपकी ही कहानी का इंतजार है।”
अनुराधा एक दैनिक अखबार में फीचर संपादक है। पिछले साल भी उसने दीपावली पर प्रकाशित होनेवाली साहित्य वार्षिकी के लिए उससे एक कहानी मांगी थी। तय समय सीमा में उसने कहानी लिख भी ली थी, लेकिन शब्द सीमा से बाहर चले जाने के कारण नहीं दे सका था।
करीब एक महीना पहले उसका फोन आया था- “सर, इस बार वार्षिकी के लिए आपकी कहानी जरूर चाहिए।”
“विषय का कोई बंधन?”
“सर, आप जिस विषय पर लिखना चाहें। बस सरकार की….”
उसने बीच में अनुराधा को रोक दिया था- “इतना तो समझ ही सकता हूँ। वैसे मामला सिर्फ आपकी नौकरी का ही थोड़े है। मुझे भी तो…” अनुराधा की हँसी में घुली एक खास तरह की आश्वस्ति ने इस बार उसे अपना वाक्य पूरा नहीं करने दिया। उसने अनुराधा की तरफ एक नया वाक्य उछाल दिया था- “कोई शब्द सीमा?”
“दो हजार शब्दों में हो जाए तो हमें सुविधा होगी!” अनुराधा को पिछले साल की याद हो आई, पर उसने अपनी आवाज में इसे प्रकट नहीं होने दिया।
“आप तो खुद कहानीकार हैं, समझ सकती हैं। कहानी जब तक पूरी न हो जाय, कुछ कहा नहीं जा सकता। आपके लिए कहानी लिख कर मुझे खुशी होगी, पर आप ही कहिए दो हजार शब्दों में कैसी कहानी बनेगी? कम से कम तीन हजार शब्द तो दीजिए।”
“मैं आपकी दुविधा समझ सकती हूँ सर। लेकिन हमारे संपादक इसे समझना ही नहीं चाहते। उनकी नजर तो बस विज्ञापन और इलस्ट्रेशन पर होती है। आपसे इस तरह कहते हुए मुझे बुरा लग रहा है…ढाई तीन सौ शब्द और ले लीजिएगा…पर इससे ज्यादा में दिक्कत होगी।”
“कोशिश करूंगा।” उसकी आवाज में उतर आई थकान को अनुराधा ने अपनी आवाज में अतिरिक्त मिठास घोलकर दूर करने की कोशिश की थी…
“सर, मैं आपके भरोसे ही हूँ। आपकी कहानी जरूर मिलनी चाहिए। अधिकतम सितंबर के पहले सप्ताह तक। मैं व्हाट्सऐप पर याद दिला दिया करूंगी। प्लीज इसका बुरा मत मानिएगा।”
इस बीच बादलों के बहुत सारे नए गुच्छों के एकत्र हो जाने से सूरज का तेज लगभग समाप्त हो चुका था। देखते ही देखते आकाश के विशाल आसमानी कैनवस पर हल्के भूरे-सफेद बादलों की चितकबरी सी प्रिंट उभर आई थी। टैरस की फेन्स से टिके आई पैड की स्क्रीन पर आईआईटियन सौरभ अब भी अलग-अलग योग मुद्राओं और आसनों का अभ्यास कराने में तल्लीन था।
उसका जूनियर कुलीग अखिलेश जहाँ उन आसनों के नियमित वर्जन प्रस्तुत कर रहा था वहीं वह खुद उनके फायदे बताता हुआ प्रायः कुर्सी पर ही बैठकर उन्हीं आसनों के आसान वर्जन बता रहा था- “यह आसन पीठ के निचले हिस्से की मांसपेशियों को मजबूत करता है और स्पाइन की इलास्टिसिटी को बढ़ाता है। इससे पेट और पाचन तंत्र की अंदरूनी मालिश हो जाती है। इस तरह यह पेट के भारीपन को कम करने, रक्त संचार को बढ़ाने, नर्वस सिस्टम को स्टिमुलेट करने और पेट से गैस को बाहर निकालने में मदद करता है।”
सौरभ उधर पवनमुक्तासन के फायदे गिनाने में व्यस्त था और इधर दो हजार शब्दों में कहानी का कमिटमेंट लेखक महोदय के पेट में किसी गैस के गोले सा उमड़-घुमड़ रहा था। एक पल को उसे सौरभ पर ही गुस्सा आया- ‘इसी को कहते हैं पढ़े फारसी बेचे तेल। यदि यही करना था तो आई आई टी से इंजीनियरिंग करने की क्या जरूरत थी, बन जाते रामदेव का चेला।’
“जरूरी नहीं कि आप पूरे पैंतालीस मिनट का क्लास अटेण्ड करें। आपके पास समय नहीं है तो कोई बात नहीं, पाँच मिनट के लिए ही सही, यूट्यूब का लिंक खोलिए जरूर। समथिंग इज बेटर दैन नथिंग। पाँच मिनट का नियमित योगाभ्यास भी आपको कुछ न कुछ फायदा ही पहुंचाएगा।” लेखक महोदय ने खुद को यह समझाने की कोशिश की कि ‘पाँच मिनट’ और ‘फायदा’ जैसे शब्दों का संबंध लोगों की सेहत से हो न हो, यूट्यूब चैनल के मोनेटाइजेशन टार्गेट से जरूर है। लेकिन चाहकर भी इस सोच पर टिक नहीं सके । उसकी देह ही नहीं, वाणी में भी लोच थी। योग गुरु की मोहिनी मुस्कान की गिरफ्त में कैद लेखक महोदय कब सुखासन में बैठ गए उन्हें पता ही नहीं चला।
“अब हम भ्रामरी प्राणायाम का अभ्यास करेंगे। इस प्राणायाम का नाम भ्रमर यानी भौंरा या फिर भ्रामरी नामक मधुमक्खी के नाम पर रखा गया है। इस प्राणायाम में स्वास छोड़ने की आवाज मधुमक्खियों या भौंरों की गुंजन की तरह सुनाई पड़ती है। आपके मन और चित्त को शांत करने में यह काफी मददगार साबित होगा। भ्रामरी का नियमित अभ्यास आपको क्रोध, चिंता और निराशा से राहत दिलाएगा।”
सौरभ के निर्देशों का पालन करते हुए लेखक महोदय ने आखें बंद की, पूरे शरीर को शिथिल छोड़ा, तर्जनी से कान बंद किए, ध्यान को भौंहों के बीच केंद्रित किया, गहरी सांस ली और सांस छोड़ते हुए भौंरे की ध्वनि निकालने की कोशिश करने लगे…
पहले राउंड में उनकी सांस बहुत जल्दी ही टूट गई। लेकिन दो चार राउंड के अभ्यास में ही भौंरों की आवाज निकालने का यह प्राणायाम किसी खेल की तरह मजेदार हो गया। कुछ देर तक अभ्यास करने का निर्देश देकर इंजीनियर सौरभ ऑफ स्क्रीन हो चुका था…आसमान में तैरते बादलों के गुच्छों की गति थोड़ी और तेज हो गई थी…और लेखक महोदय भौंरा बने इस डाल से उस डाल घूम रहे थे…
भ्रामरी प्राणायाम का अभ्यास करते हुए उसे याद हो आया कि उस दिन आधुनिक साहित्य संस्थान के सालाना जलसे में शहर का पूरा लेखक समाज किस तरह मधुमक्खियों सा भनभना रहा था।तुलसी-सूर और मीर-गालिब से लेकर निराला-मुक्तिबोध तथा गुलेरी-प्रेमचंद और जैनेन्द्र-अज्ञेय से लेकर निर्मल-रेणु तक की आदमकद छवियों से सुसज्जित नगर भवन का सभागार लगभग एक दर्जन कवि, कहानीकार और आलोचक के सम्मान का साक्षी बनने को प्रतीक्षातुर था। बहुत ही कम समय में इस संस्थान ने प्रकाशन की दुनिया में अपनी अच्छी पहचान बना ली थी। कम से कम सोशल मीडिया, खासकर फेसबुक पर तैरते किताबों के नित नूतन आवरण और सम्मानित लेखकों की आकर्षक छवि वाले पोस्टरों को देख कर तो ऐसा ही लगता था। जिस सभा में मंच पर जगह न मिले, वहाँ जाना उसने हमेशा अपनी शान के खिलाफ ही माना है। पर सम्मानितों की सूची में उसके कुछ खास दोस्त भी शामिल थे, जो दूसरे शहरों से आए हुए थे। वह चाहकर भी खुद को वहाँ जाने से मना नहीं कर सका और पत्नी सहित समय से पहले ही सभागार में जा जमा।
कोई दो घंटे की सामान्य देरी के बाद पहले सत्र का मंच सज चुका था। अध्यक्ष और मुख्य अतिथि सहित सम्मानित होने वाले लेखक मंच पर विराज चुके थे। आलोचना विधा का सम्मान प्रदान किया जा चुका था। लेखक महोदय अपने मित्र की फ़ोटो खींच कर वहीं से फ़ेसबुक पर पोस्ट लगाने में व्यस्त थे कि उसी बीच मुख्य आयोजक, जो उस संस्थान का स्वामी भी था, दबे पैरों से उसके पार्श्व में नमूदार हुआ…
“सर, एक जरूरी बात है…थोड़ा बाहर आएंगे?”
“आप प्लीज सुप्रिया जी की कहानियों पर बोल दीजिए। जिन्हें उनपर बोलना था नहीं आ सके हैं।”
लेखक महोदय ठीक से यह समझ पाते कि बोलने का यह प्रस्ताव चुनौती है या परीक्षा, आग्रह है या अपमान उसके पहले ही उनकी जुबान जवाब देने को फिसल गई- “कार्यक्रम चल रहा है, लेखिका मंच पर है…और आप बिना किसी पूर्व सूचना के…मुझे अचानक ही बोलने को कह रहे हैं! यह कैसे हो सकता है?”
“सर, आप कहानीकार और आलोचक दोनों हैं। आपको तैयारी की क्या जरूरत?” याचना और मक्खन की मिलावट की एक असफल-सी कोशिश…
“मैंने तो आजतक…इनकी कोई कहानी नहीं पढ़ी। बिना पढ़े ऐसे कैसे….” कहानीकार-आलोचक अपनी बात पूरी करते उसके पहले ही उनके कंधे ने किसी पुराने मित्र के हाथों का स्पर्श महसूस किया-
“कुछ मत सोचिए, अभी कार्यक्रम की प्रतिष्ठा का प्रश्न है। भले सुप्रिया पर नहीं, समकालीन कहानी पर बोल दीजिए, पर आपको बोलना ही पड़ेगा।” मित्र संपादक ने आयोजक के प्रस्ताव को साधिकार अपने आदेश में बदल दिया था।
“आपकी बात कैसे टालूँ, पर कुछ तो देखना होगा न! सम्मान के मौके पर इनकी जिस किताब का लोकार्पण होना है, उसकी प्रति ही दे दीजिए…”
लेखक महोदय ने लिफाफा देखकर खत का मजमून भाँप लेने की तकनीक का सहारा लेने के लिये किताब के पन्ने पलटे। पर हाय री किस्मत! पुस्तक का यह पेपरबैक संस्करण ब्लर्बविहीन निकला।
डूबते को तिनके का सहारा की तरह आयोजकों से एक आखिरी दरख्वास्त…
“सम्मान के वक्त पढ़े जाने वाला प्रशस्ति पत्र ही दीजिए, वहीं से कुछ…”
लेकिन जब विधाता ही वाम हो तो कोई क्या कर लेगा? खूबसूरत फ्रेम में मढ़े उस तथाकथित प्रशस्ति पत्र में सुप्रिया जी की फ़ोटो और उनके परिचय के अलावा कुछ भी नहीं था।
लेखक महोदय को पुरस्कार-तिरस्कार और सम्मान-अपमान के बीच की रेखाएं धुंधली सी होती दिखीं। कई महीनों से फ़ेसबुक पर चमक रहे पोस्टरों की हकीकत और औचित्य पर वे तनिक ठहर कर विचार करना चाहते थे, पर वक्त और अवसर की नजाकत इसका इजाजत देने को तैयार नहीं थी..
सभागार की अगली पंक्ति में बैठे लेखक महोदय सुप्रिया जी की किताब को उलट-पलट कर देखते रहे…सोचा, जब तक उनका नाम पुकारा जाय दो-चार पन्नों की कोई छोटी कहानी ही पढ़ डालें…कुछ तो कहने को मिल जाएगा…पर चित्त स्थिर न हो सका। उन्होंने मन ही मन खुद को ‘ना’ नहीं कह पाने के लिए जीभर के कोसा।
बगल में बैठी लेखक पत्नी को तबतक उनके धर्मसंकट का अहसास हो चुका था। अपनी उलटी सीधी आलोचनात्मक टिप्पणियों से वे हमेशा ही उनका अहित करते रहे हैं। पत्नी की आँखों में खास तरह की हिदायत की रेखाएं उभरीं और वह धीरे से फुसफुसाईं – “कुछ उल्टा-सीधा मत बोल देना। सम्मान का समय है।” लेखक महोदय ने एक कातर सी चुप्पी ओढ़ रखी थी। अभी उन्हें सुप्रिया जी और आयोजकों के सम्मान से ज्यादा अपने सम्मान की चिंता सता रही थी।
सबकुछ इतनी तेज गति से अनायास घटित हुआ था कि उसे कुछ भी सोचने-समझने का तनिक भी वक्त नहीं मिला। जीवन इतना अप्रत्याशित और सपाट भी हो सकता है, उसने कभी सपने में भी नहीं सोचा था। गालिब को वक्त-बेवक्त उद्धृत करने वाले लेखक महोदय जिस वक्त खुद ही ईमान और कुफ्र की कठिन जंग का मैदान हुए जा रहे थे, संचालक ने उनके नाम की दावत दी और वे अभ्यास से अर्जित सधे कदमों से मंच की तरफ बढ़ चले…
समकालीन स्त्री कहानी पर बार-बार दुहराए गए अपने ही पुराने जुमलों को जिस आत्मविश्वास के साथ वे सुप्रिया जी की कहानियों पर चस्पाँ कर रहे थे, उसने पूरे सदन का दिल जीत लिया था। मंच से उतरने के बाद जिस उदारता से लोगों ने उनके वक्तव्य की तारीफ की उससे इस बात पर उनका विश्वास और दृढ़ हो गया कि आलोचना की किताब और समीक्षा-लेखों को लेखक और समीक्षक के अलावा शायद ही कोई पढ़ता है।
सत्र समाप्ति के बाद मंच से नीचे उतरकर सुप्रिया जी ने जो कहा, वह भी कम चकित करनेवाला नहीं था-
“जब संचालक ने मुझ पर बोलने के लिये आपका नाम बुलाया, तब से आपके वक्तव्य के अंत तक मैंने लगातार अपने फिंगर क्रॉस कर रखे थे। लेकिन आपने जितने कम समय में मेरी कहानियों के मर्म को पकड़ा वह विस्मयकारी था।”
सुप्रिया जी की एक और समकालीन जो सभागार में शुरू से अंत तक मौजूद थीं, को तो अब भी भरोसा नहीं हो रहा था कि कहानीकार-आलोचक ने बोलने की कोई तैयारी नहीं कर रखी थी।
जन्नत की हकीकत जानने के बावजूद लेखक महोदय लोगों की तारीफ पर फूले नहीं समा रहे थे।
भ्रामरी प्राणायाम का अभ्यास अपनी असर दिखा चुका था। आंखे खोलकर अपने कान से तर्जनी अलग करते हुए लेखक की चिंताएं जैसे बादलों के गुच्छों के साथ आसमान में उड़ चली थीं। अनुराधा से किए गए वादे का तनाव हवा से भी हलका होकर अदृश्य हो चुका था। उसने जैसे खुद से ही कहा-
‘यदि बिना किताब पढ़े लेखक पर बोलकर सराहना अर्जित की जा सकती है, तो दो हजार शब्दों में कहानी भी लिखी जा सकती है।’
आई पैड को कवर में डालते हुए उसे योग गुरु सौरभ के शब्द याद हो आए-
“आप कोई और आसन कीजिए न कीजिए, पाँच मिनट प्रति दिन हास्यासन जरूर कीजिए। ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में हुए एक रिसर्च से यह पता चला है कि मुस्कुराने के बजाय जोर से ठहाका लगाकर हँसना सिरदर्द के लिये दवा का काम करता है। इससे दिमाग में एन्डोरफीन का स्राव होता है, जिससे दर्ददायक रसायन नियंत्रित होते हैं। इसलिए जोर से हँसिये, ठहाके लगाकर हँसिये, असली हँसी नहीं आती, तो हँसने का अभिनय कीजिए, पर हँसना मत भूलिए।”
बादलआच्छादित सूरज की तरफ चेहरा करके वह योगा मैट पर खड़ा हो गया और दोनों हाथ ऊपर उठा-उठाकर जोरदार ठहाके लगाने लगा। ठहाके की गूंज ने धरती आसमान को एक कर दिया था। उसे समझ नहीं आया कि यह उसी के ठहाके की प्रतिध्वनियाँ हैं, या फिर सारी कायनात ही उस पर जोरदार ठहाके लगा रही है।
कुछ देर तक यूं ही जोर-जोर से हँसते रहने के बाद उसकी आँखें भर आईं…
आकाश पूरी तरह गाढ़ा स्लेटी हो चुका था…बादलों के गुच्छे भारी होकर टपकने लगें, इसके पहले उसने जल्दी से योगा मैट समेटा…
उसके कदम खुद-ब-खुद बरसाती की तरफ बढ़ चले थे…
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