राजेश कमल की बारह कविताएँ

आज पढ़िए राजेश कमल की कविताएँ। राजेश कमल बहुत संकोची कवि हैं लेकिन उनकी कविता मुखर हैं। सघन संवेदनाओं के इस कवि की कुछ कविताएँ पढ़ते हैं- मॉडरेटर 

================== 

 

१
अनुपस्थिति
—————-
मैं लौटता रहा
पर लौटना
हर बार कुछ कम होता गया
मेरी अनुपस्थिति एक आदत की तरह
घर में बस गई

मैं पास था—
एक समय-रेखा की तरह
जो चलता रहता है
ठहरता नहीं

इस बिखरे ऋतु- चक्र का दोष
किसी और को नहीं दिया जा सकता
मैंने ही
अपने हिस्से का शबाब
रोक लिया है

जहाँ वह हँसती है
उजाला फैल जाता है
मैं उसी उजाले के पास
भटकता फिरता हूँ

अब छायाएँ भी
पहचानती नहीं मुझे

यदि आज मैं रिक्त हूँ
तो यह किसी के जाने से नहीं—
मैंने ही
अपने भीतर का दीप
बुझा दिया है।

२
हमिंग
———-
न जाने कितने दिनों बाद
फिर सुनता हूँ
रसोई के कोने में
चाय की उबाल के साथ
तुम्हारी हमिंग

इस गुनगुनाहट में शब्द नहीं
किस्से हैं
कहानियाँ हैं
सुर हैं
ताल हैं

न जाने क्यूँ
लगता है यूँ
कि सब के सब
नाम हैं दुखों के

तुम गुनगुनाती रही
मैं रहा पृथक
तुम्हारे सपनों से
तुम्हारी छोड़ी हुई इच्छाओं से
और उस धैर्य से
जिसे समझौता कहा जाना चाहिए

तुमने
एक अधूरे आदमी से
पूरा जीवन बाँट लिया

और ग़ज़ब ये
कि यह कहानी
हज़ार साल पुरानी नहीं है
इक्कीसवीं सदी का पच्चीसवाँ साल
अभी-अभी बीता है।

३
कालबोध
—————
अब पहले की तरह
नहीं खुलती गिरहें अपने आप

बातें—
भीड़ में फँसे मनुष्यों-सी हैं
एक दूसरे तक पहुँचना
आसान नहीं

शहर
हमारे बीच
अब एक तीसरा व्यक्ति है
जो हर समय
कुछ न कुछ कहता रहता

घर अब भी वही है
कमरे की गिनती अब भी वही है
बस एक आवाज़ कम है
जो कभी
सबसे ज़्यादा हुआ करती थी

उसकी आँखों में
अब कोई शिकायत नहीं
यही “नहीं”
मुसलसल निगल रही है मुझे

मन कहता है
बुरा वक़्त टल जाएगा
अनुभव कहता है
देर हो चुकी।

४
कुटिल
————
प्रेम में न जाने कब
होता गया कुटिल
और मेरे अपराधबोध
भाषा के ओज में छिप गए

सात जन्मों की यात्रा तय थी
पर एक अंधेरी रात
घने कुहासे के बीच
किसी अनजान स्टेशन पर
उतर गया मैं

यहीं से सौ कोस सिद्धार्थ
यहीं से सौ कोस बुद्ध
यहीं से सौ कोस मोक्ष

मेरी प्रिया
न मैं आया था
न मैं ठहरा
न मैं जा रहा हूँ —
न आगतो
न गतो
न ठितो।

५
तुम वही हो
—————-
तुम वही हो
बिल्कुल वही, हाँ वही —
जिसकी आँखों में
ठहरी है वही धूप अब भी

जिसकी हँसी में
बजता है वही संगीत
जिसकी लड़ाइयों में
अब भी बरसता है दिसंबर

जिसकी चुप्पियों में
पलते हैं किस्से अनकहे
जिसकी आँखों के कोरों में
छुपा है सावन

जिनके होठों पर
काँपता है मेरा नाम
जो भीग जाती है बिन बात
काँप जाती है बेमौसम

तुम वही हो—
नख-शिख वही
नाव बदली, घाट बदला
नदी वही, अनंतकाल से बहती

सुन बे वही—
फूल मुरझा के भी फूल ही रहते हैं
और अगर चाँद आधा हो
तो चाँद ही होता है

दुख आते रहेंगे ,जाते रहेंगे
पर जीने की ख़्वाहिशें कभी न होंगी कम

कामनाओं की नदियाँ
बहेंगीं— बहने दो
तू वही है
मैं भी वही
हाँ-हाँ वही रहने दो।

६
तुम्हारी चाय
—————-
फालतू बात नहीं करते
चाय पिलानी है
तो आ जाओ

बहुत दिन हो भी गए
धूप-सी लड़की को देखे हुए

तुम कहती हो—
तुमने सपने में चाय पिलाई
मैं कहता हूँ — आओ
ऐसे स्वप्न को
हक़ीक़त होने में
दुआओं की ज़रूरत नहीं होती

आ भी जाओ
ताकि दुनिया जान ले— कि
धूप का कोई अपना तेज़ नहीं होता
वह
किसी के आकर बैठ जाने से
हो जाती है ख़ूबसूरत

चाय ठंडी हो जाए
तो भी पी ली जाएगी
पर तुम्हारे न होने का
क्या करे कोई

इसलिए आओ
इससे पहले
कि ये धूप भी ढल जाए
और हो जाए शाम।

७
चाँद
———-
कितना उदास है वह
जैसे हँसी-ठिठोली के मेले से
लौट आया हो कोई थका हारा

कितने दिन बीते
घड़ी-घड़ी घटते चाँद को निहारते
और फिर
उसे लौटते बढ़ते
रूप और आभा में सँवरते देखना

क्या सचमुच इतना ज़रूरी है
ज़रूरतों का गणित
जबकि हर निवाले के साथ
छिन रहा है स्वाद

हम धीरे-धीरे
आसमान से नहीं
अपने भीतर से
छूट रहे हैं

हम छूटते जा रहे हैं लगातार
और जीवन की सबसे मीठी रातें
किताब के कोरे पन्नों-सी
ख़ाली रह जा रही हैं

अब कौन हुनरमंद लिखेगा
चौदहवीं का चाँद हो या आफ़ताब हो

८
बुदबुदाना
———————
अगर ईश्वर जैसा कोई सहकार है
तो उसे ही मालूम होगा
क्या कहा तुमने

अगर नहीं है
तो कहावतों में भी नहीं कहा जा सकता
कि ईश्वर ही जानता होगा

बेवजह घंटों से सोच रहा हूँ
क्या बुदबुदाया तुमने

९
जो बच गया है
——————
तुम बोलते थे—
कविता होती थी

तुम हँसते थे—
कविता होती थी

तुम लड़ते थे—
कविता होती थी

तुम्हारा होना ही—
कविता होना था

अब ये घर
चुप है, खामोश है, उदास है

जो बच गया है
वही कविता है।

१०
तुम नहीं हो
—————
कुछ बातें अधूरी थी
वैसी ही पड़ी है कोने में
यह जानते हुए भी
जा रहे हो तुम

तुम जा रहे हो— तो जाओ
रोकूँगा नहीं
रिश्तों को अगर जोर से थमा जाए
तो फिसल जाते हैं रेत बनकर

और मैं
उम्मीद के आख़िरी हर्फ़ तक
उम्मीद बनाए रखना चाहता हूँ

तुम्हारी अनुपस्थिति हिंसा है
अब
स्मृतियों की धीमी ताप में
गलूँगा—
बूँद-बूँद
बूँद-बूँद

पर जियूँगा
बचा रहूँगा
जैसे—
बारिश में कभी-कभी दिया
बुझने से कर देता है इनकार।

११
यह भी है—प्रेम-कविता
————————
जब तमाम तरह की गपड़चौथ कर ली जीवन में
तब तुम मिले
मिलते ही तुम्हारे जीवन का शग़ल
रोटियाँ बेलना हो गया

जिसे मैं खाता
मेरे बच्चे खाते
मेरे रिश्तेदार खाते
और कभी-कभी मेरे दोस्त भी

तुम्हारा काम इतना ही नहीं था
तुम्हें मुस्कुराना भी था
मुस्कुराहट तुम्हारी—
जिस पर मैं सदियों-सदियों से वारा हूँ

१२
आत्मस्वीकृति
——————-
जिसकी आँखों में अधूरी नींद के बादल हैं
जिसके मन में असंख्य धमाके हैं
जिसके जीवन में नहीं आता है इतवार
और जिसके दुख की लिपि
नहीं पढ़ी जा सकी अब तलक
उसी की ऊष्मा के घेरे में बैठकर
दे रहा हूँ अपरिमित ज्ञान
लिख रहा हूँ कविताएँ
कर रहा हूँ विमर्श

More From Author

दु:स्वप्नों के दिलचस्प और मानीखेज़ किस्से : उदय प्रकाश

यतीन्द्र मिश्र की किताब ‘नैनन में आन-बान’ पर

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

जानकी पुल को सहयोग करें

Jankipul : A Bridge of World's Literature एक नयी शुरुआत! मेरा कॉलम #Jankipul के लिए " जनहित में जारी सब पर भारी" आपकी टिप्पणी की अपेक्षा रहेगी