भारतीय संगीत परंपरा पर यतीन्द्र मिश्र की किताब आई है ‘नैनन में आन-बान’, जिसके ऊपर मेरी यह टिप्पणी पढ़िए- प्रभात रंजन
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पेंगुइन स्वदेश से यतीन्द्र मिश्र की नई किताब आई है ‘नैनन में आन-बान’। इस किताब के बारे में पहला वाक्य लिखें तो यह किताब हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के बारे में है। इस वाक्य को विस्तार दें तो यह ऐसी किताब है जिसको पढ़कर उसकी रुचि भी शास्त्रीय संगीत में जाग्रत हो जाएगी जिसको शास्त्रीय संगीत और उसकी परंपरा के बारे में ज्यादा पता नहीं हो। लेखक ने भूमिका में उचित ही लिखा है यह किताब ‘शास्त्रीय संगीत की समझ, उसके आत्मीय परिवेश और आनंद की फलश्रुति कराने वाले माध्यम को लेकर मेरे अपने विचार हैं, जो नैनन के आन-बान(राग मुल्तानी की बंदिश की पहली पंक्ति से उठाया गया शीर्षक) के माध्यम से व्यक्त हुए हैं।‘
किताब में दो खंड हैं। पहला खंड शास्त्रीय गायकों के सांगीतिक वैभव को लेकर है, जिसमें लेखक ने केसरबाई केरकर, उस्ताद अमीर खाँ, रसूलन बाई, उस्ताद बड़े ग़ुलाम अली खाँ, पंडित कुमार गंधर्व, गंगूबाई हंगल, बेगम अख़्तर, पंडित भीमसेन जोशी, गिरिजा देवी, पंडित जसराज, किशोरी अमोनकर जैसे मूर्धन्य गायकों की गायन कला के महत्व को रेखांकित किया है। उनसे जुड़े एक से एक क़िस्से भी लिखे हैं जिनसे उनकी व्याप्ति का पता चलता है। जैसे केसरबाई केरकर के बारे में यह जानकारी बहुत दिलचस्प है कि वे अपने गाये बंदिशों की रिकार्डिंग नहीं होने देती थीं। बाद में जब उनके कुछ रिकॉर्ड जारी भी हुए तो इस कारण क्योंकि कुछ लोगों ने उनकी रेकार्डिंग चोरी-छिपे कर ली थी। 1930 के आसपास उनकी एक संगीत रचना राग भैरवी की ठुमरी ‘जात कहाँ हो’ को अंतरिक्ष में विश्व की कुछ चुनिंदा संगीत धरोहरों के साथ अंतरिक्ष में भेजा गया था।
जैसे महान ख़याल गायकों में एक उस्ताद अमीर खाँ साहब के बारे में इस किताब से यह जानकारी मिली कि उन्होंने कभी ऐसी कोई बंदिश नहीं गाई जिसमें स्त्री को ऑब्जेक्टीफ़ाई किया गया हो। किराना घराना की गायिका गंगूबाई हंगल अपनी भारी दमदार आवाज़ के लिए जानी जाती थीं। कहा जाता है बचपन में उनके गले के टॉन्सिल को ठीक करने के लिए उसको लोहे की गरम सलाख़ों से दागा गया। जब गंगूबाई हंगल ख्यात गायिका बन गईं तो बाद में कर्नाटक के युवा गायक गायिकाएँ बीबी अपने टॉन्सिल को दबाने के लिए डॉक्टर के पास जाने लगे ताकि उनकी आवाज़ भी गंगूबाई हंगल जैसी हो जाये। लेकिन कोई दूसरी गंगूबाई हंगल नहीं हुईं।
किताब में किशोरी अमोनकर की गायकी पर भी लेखक ने बहुत अच्छा लिखा है। आप लोगों को ध्यान हो कि मृणाल पाण्डे की एक किताब का नाम है ‘सहेला रे’, इस बंदिश को प्रसिद्धि किशोरी अमोनकर की गायकी से ही मिली। यतीन्द्र मिश्र ने लिखा है कि ‘किशोरी अमोनकर की गायकी में हमें कुछ साहित्यिक पदों की बिलकुल गैर-पारंपरिक व्याख्या होती नज़र आती है। प्रतीक्षा, विरह, आकांक्षा और शांति ऐसे पद हैं जिनकी सबसे सफल व मार्मिक अभिव्यक्ति हमें किशोरी जी ही सुलभ करवाती हैं।‘ यह बात भी ध्यान रखने वाली है कि मीरांबाई के पदों को भी किशोरी अमोनकर ने अपने गायन से एक अलग तरह की आध्यात्मिक ऊँचाई दी।
शास्त्रीय गायक-गायिकाओं के अलावा लेखक ने उप-शास्त्रीय गायन की श्रेष्ठ गायिकाओं में रसूलन बाई को भी याद किया है, जिनकी गाई यह ठुमरी बहुत प्रसिद्ध है- ‘फुलगेंदवा न मारो लागत करेजवा में चोट’। तवायफ़ परंपरा ने गायन परंपरा को कितना समृद्ध किया उसको इस किताब को पढ़ते हुए समझा जा सकता है। इसी तरह लेखक ने बड़े मनोयोग से ग़ज़ल गायकी को शिखर पर पहुँचाने वाली गायिका बेगम अख़्तर पर लिखा है। उनकी गाई कजरी, चैती, ठुमरी, दादरा आदि ने पूरब की गायकी को एक अलग ही रंगत दी।
सबसे बड़ी बात जो इस किताब में मुझे लगी कि लेखक ने जिन गायक-गायिकाओं के बारे में लिखा है उनके गायन की विशिष्टताओं, उनकी परंपरा, उनके घराने सबके बारे में विस्तार से लिखा है। जो इस किताब को बेहद उपयोगी बनाती है। इसको पढ़ते हुए शास्त्रीय संगीत परंपरा की ओर एक ऐसी खिड़की खुलती दिखाई देती है जिनके माध्यम से हम राग रागिनियों का आनंद ले सकते हैं।
किताब के दूसरे खंड में संगीत को लेकर लेखक के कुछ स्फुट विचार हैं, कुछ प्रसंगों की चर्चा है और कुछ रोचक किस्से दिये गये हैं। जिनसे संगीत के बारे में हमारी समझ का विस्तार होता है। जैसे ध्रुपद गायन क्या है, शास्त्रीय और उप शास्त्रीय गायन किसको कहते हैं। इस तरह की तमाम बातें।
आज के समय के लिए यह एक ज़रूरी किताब है जिसको पढ़ते हुए आप शास्त्रीय संगीत की उस विराट परंपरा की दिशा में मुड़ सकते हैं, रसिक बन सकते हैं। निस्संदेह यह किताब एक बहुत बड़े रिक्त स्थान की पूर्ति करने वाली किताब है जो बेहद पठनीय शैली में लिखी गई है।
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