मणिपुरी भाषा की फ़िल्म बूँग को ब्रिटिश अकेडेमी ऑफ फ़िल्म एंड टेलीविजन आर्ट्स(BAFTA) का प्रतिष्ठित पुरस्कार मिला है। लक्ष्मीप्रिया देवी द्वारा निर्देशित इस फ़िल्म को यह सम्मान मिलना बहुत बड़ी उपलब्धि है। इस फ़िल्म पर यह टिप्पणी लिखी है प्रसिद्ध संस्कृतिकर्मी वाणी त्रिपाठी ने। आप भी पढ़ सकते हैं- मॉडरेटर
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उस समय में जब सिनेमा अक्सर सुने जाने के लिए शोर मचाता है, बूंग मणिपुर की पहाड़ियों से आती एक धीमी फुसफुसाहट की तरह सामने आती है- कोमल, संयत, और फिर भी अनदेखी न की जा सकने वाली। यह स्वयं को किसी घोषणापत्र की तरह प्रस्तुत नहीं करती, न ही प्रतिनिधित्व के झंडे लहराती है। फिर भी, एक बच्चे की दुनिया को चुपचाप देखते हुए, यह हमारे समय की सबसे राजनीतिक फिल्मों में से एक बन जाती है।
अब इस फुसफुसाहट को विश्व ने भी सुना है। बूंग को British Academy of Film and Television Arts द्वारा प्रदान किया गया BAFTA Award केवल एक ट्रॉफी नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक स्वीकृति है। यह उस भारत की पहचान है जो महानगरों की चकाचौंध से दूर, सीमांत प्रदेशों की मिट्टी में सांस लेता है। यह जीत हमें याद दिलाती है कि गहरे स्थानीय अनुभव ही सबसे सार्वभौमिक हो सकते हैं।
बूंग सीमांत प्रदेश में स्थित है- उन मानचित्रों के हाशियों पर, जिन्हें महानगरीय भारत अक्सर केवल संकट के क्षणों में याद करता है। पर यहाँ सीमा कोई सुर्ख़ी नहीं, एक जीवित यथार्थ है। वह बचपन को आकार देती है, पहचान को गढ़ती है, और आकांक्षाओं को सीमाबद्ध भी करती है। एक छोटे लड़के की आँखों से- जो दोस्ती, परिवार और नाज़ुक सपनों के बीच अपना रास्ता खोज रहा है- फिल्म भूगोल को भाव में बदल देती है।
फिल्म की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह उत्तर-पूर्व को ‘अलग’ या ‘अद्भुत’ बनाकर पेश नहीं करती। दशकों तक भारतीय सिनेमा ने इस क्षेत्र को या तो अदृश्य रखा या पोस्टकार्ड जैसी छवियों में सीमित कर दिया- धुंध, पहाड़, विद्रोह। बूंग न तो तमाशा रचती है, न रूढ़ छवियों का सहारा लेती है। वह अंतरंगता पर भरोसा करती है। कैमरा केवल परिदृश्य पर नहीं, चेहरों पर ठहरता है—ठहरावों, चुप्पियों और अनकही आशंकाओं पर।
मूलतः यह एक ‘कमिंग ऑफ एज’ कथा है। पर महानगरीय आकांक्षाओं से भरी कहानियों के विपरीत, यहाँ बड़ा होना ‘सफल’ होने की यात्रा नहीं, ‘अपना होने’ की खोज है। जब आपकी पहचान बार–बार गलत उच्चारित हो, गलत समझी जाए, तो नागरिकता का अनुभव कैसा होता है? जब आपका भूगोल राष्ट्र की स्मृति में हाशिये पर दर्ज हो, तो आपका बचपन किन प्रश्नों के साथ बड़ा होता है?
फिल्म का बच्चा इन प्रश्नों को राजनीतिक भाषा में व्यक्त नहीं करता। वह उन्हें बस जीता है। उसकी मासूमियत ही फिल्म की सबसे तीखी आलोचना बन जाती है। स्कूल के छोटे प्रसंगों, पारिवारिक तनावों और मामूली–सी अवज्ञाओं में हम एक सजग चेतना का जन्म देखते हैं—नर्म, पर सतर्क।
बूंग की चुप्पियाँ विशेष रूप से मार्मिक हैं। कई दृश्यों में संवाद पीछे छूट जाते हैं और जीवन की ध्वनियाँ उभर आती हैं—बाँसों में से गुजरती हवा, दूर से आती आवाज़ें, एक अनिश्चित–सी गूंज। यहाँ मौन शून्य नहीं, स्मृति है। उसमें इतिहास का भार है—संघर्ष का, उपेक्षा का, और अदम्य जीवट का।
फिर भी यह निराशा की फिल्म नहीं है। इसमें ऊष्मा है। दोस्ती शरण बनती है। खेल प्रतिरोध का रूप लेता है। कल्पना पलायन भी है और मुक्ति भी। इस अर्थ में बूंग उस वैश्विक परंपरा से जुड़ती है जहाँ बाल–दृष्टि वयस्क जटिलताओं को उजागर करती है—चाहे वह सत्यजित रे का मानवीय स्पर्श हो या Abbas Kiarostami की काव्यात्मक संवेदना।
किन्तु BAFTA की यह मान्यता केवल कलात्मक उत्कृष्टता की पुष्टि नहीं; यह सांस्कृतिक राजनीति का संकेत भी है। जब विश्व के सबसे प्रतिष्ठित मंचों में से एक किसी सीमांत कथा को सम्मानित करता है, तो वह ‘केंद्र’ और ‘हाशिये’ के समीकरण को पुनर्लेखित करता है। यह जीत बताती है कि भारत की कहानियाँ अब किसी अनुवाद की मोहताज नहीं। वे अपनी जड़ों के साथ, अपनी भाषा और लय में, वैश्विक संवाद का हिस्सा बन सकती हैं।
समकालीन भारत में बूंग का महत्व इस बात में है कि वह ‘मुख्यभूमि’ की दृष्टि को चुपचाप विखंडित करती है। यह सहानुभूति को दया की तरह नहीं माँगती; यह बराबरी के रूप में पहचान चाहती है। यह स्वयं को महानगरीय सुविधा के लिए अनुवादित नहीं करती। बल्कि दर्शक को आमंत्रित करती है कि वह अपरिचित लयों के साथ बैठे, जीवन की दूसरी गति को महसूस करे।
इस प्रकार बूंग भारतीय सिनेमा के एक बड़े परिवर्तन का हिस्सा बनती है- एकरूप कथाओं से बहुवचन अनुभवों की ओर। हाशिये अब केंद्र को परिभाषित कर रहे हैं। उत्तर-पूर्व कोई परिधि नहीं, एक सशक्त कथात्मक उपस्थिति है। और BAFTA की यह ट्रॉफी उस परिवर्तन की वैश्विक मुहर है।
फिल्म की सौंदर्यात्मक सादगी ही उसका नैतिक कथन है। यह संघर्ष को सनसनी में नहीं बदलती, पहचान को द्वंद्वों में सरल नहीं करती। यह दर्शक पर भरोसा करती है- कि हम अस्पष्टताओं के साथ बैठ सकते हैं, बिना निर्देशित हुए भी महसूस कर सकते हैं।
जब एंड क्रेडिट्स आते हैं, हम अभिभूत नहीं, परिवर्तित महसूस करते हैं- धीरे, लगभग अनजाने में। सीमा कोई दूर की रेखा नहीं रह जाती। वह एक बच्चे का आँगन बन जाती है, एक माँ की चिंता, एक दोस्त की हँसी।
बूंग केवल एक फिल्म नहीं, एक सांस्कृतिक क्षण है। इसकी लघुता में विस्तार है, इसकी चुप्पी में साहस। और अब, इसकी यात्रा में एक BAFTA भी जुड़ चुका है- यह प्रमाण कि जब कोई कथा सच्चाई से कही जाती है, तो वह सीमाओं को पार कर जाती है।

