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  • अस्सी: सांख्यिकी के शोर में सिसकती न्याय की पुकार

    हाल में ही अनुभव सिन्हा की फ़िल्म आई है ‘अस्सी’। इस फ़िल्म पर यह टिप्पणी लिखी है मनीष चौरसिया ने। मनीष इलाहाबाद विश्वविद्यालय के शोधार्थी हैं। आप उनकी लिखी यह टिप्पणी पढ़िए- मॉडरेटर 
    ==================
    “माई मेरी माई री माई
    तेरी याद आई
    माई री
    अंधेरे में घर कैसे जाऊं मेरी माई
    सन्नाटों की टोलियों ने सिसकी चुराई
    टेढ़ी मेढ़ी पगडंडी फैली रे सियाही
    किसी को ना दिखे मेरी फूटी रे रुलाई
    माई री माई री
    हे माई री माई री..
    तेरी याद आई”
    स्वानंद किरकिरे का यह गाना दो दिन से लूप पर सुन रहा हूं। बात दो दिन पहले की है जब अस्सी (Assi) मूवी देखकर थिएटर से निकला तो अंदर एक घना सन्नाटा सा था। कुछ भी बोलने का मन नहीं हो रहा था। काफ़ी देर तक शांत रहने के बाद टोटो (बैटरी रिक्शा) वाले भइया से बस इतना बोला था कि लक्ष्मी चौराहा जाना है कटरा। और वहां पहुंचने पर उतर कर वापस अपने छात्रावास (सर पी.सी.बी.छात्रावास, इलाहाबाद विश्वविद्यालय) चला आया। शाम के 8 बज रहे थे। बिना कुछ खाए पिए सो गया। अगले दिन जब सुबह उठा तबसे ‘माई तेरी याद’ यही गाना लूप पर सुने जा रहा हूं। सुबह टहलते हुए, ब्रश करते हुए, खाना खाते हुए, दोपहर को यूनिवर्सिटी चौराहे की दुकानों से किताब खरीदते हुए, शाम को पृथ्वी सर को कोटेश्वर महादेव मंदिर पर बन रहे डॉक्यूमेंट्री का जो स्क्रिप्ट लिखा था उसे देने जाते हुए, हर वक्त …इस समय भी जब ट्रेन (गोदान एक्सप्रेस) में बैठा हूँ, प्रयागराज से गोरखपुर जा रहा अपने घर, अपनी माई के पास तब भी यही सुन रहा हूं। इस वक्त ये सब लिखते हुए भी यही गाना सुन रहा
    “माई मेरी माई री माई
    तेरी याद आई
    माई री”
    ख़ैर..
    अब आते है फिल्म पर। उसे देखने के बाद अगर उसपर कुछ न बोलूं, कुछ न लिखूं तो शायद ये चुप्पी अंदर ही अंदर कचोटती रहेगी। अनुभव सिन्हा का वर्तमान सिनेमाई सफ़र भारतीय समाज की उन परतों को उधेड़ने का उपक्रम है, जिन्हें हम अक्सर अपनी सुविधानुसार अनदेखा कर देते हैं।
    एक समय में ‘दस’ (2005) और ‘रा.वन’ (2011) जैसी बड़े बजट की विशुद्ध व्यावसायिक फिल्में बनाने वाले अनुभव सिन्हा ने अपने सिनेमाई स्वर में एक आमूलचूल परिवर्तन किया है। उन्होंने ‘मुल्क’ (2018), ‘आर्टिकल 15’ (2019), ‘थप्पड़’ (2020), ‘अनेक’ (2022), और ‘भीड़’ (2023) जैसी फिल्मों के माध्यम से क्रमशः इस्लामोफोबिया, जातिगत उत्पीड़न, घरेलू हिंसा, उत्तर-पूर्व की राजनीतिक जटिलताओं और कोविड-19 महामारी के दौरान हुए पलायन जैसे जटिल और अक्सर ‘असुविधाजनक’ विषयों को मुख्यधारा के सिनेमा में स्थापित किया है।
    इसी वैचारिक और कलात्मक श्रृंखला की अगली, और संभवतः अब तक की सबसे तीखी कड़ी के रूप में 20 फरवरी 2026 को रिलीज़ हुई फिल्म ‘अस्सी’ (Assi) सामने आई है। यह फिल्म, भारतीय समाज में गहराई तक व्याप्त बलात्कार संस्कृति, संस्थागत उदासीनता और उस खोखली पितृसत्तात्मक मानसिकता पर एक सीधा और निर्मम प्रहार करती है जो यौन हिंसा को न केवल पनपने का अवसर देती है, बल्कि उसे एक खौफनाक हद तक नॉर्मलाइज भी कर देती है।
    फिल्म में बॉलीवुड की सशक्त अभिनेत्री तापसी पन्नू और अपने यथार्थवादी अभिनय के लिए जानी जाने वाली मलयालम सिनेमा की दिग्गज अभिनेत्री कनी कुसरुति (‘ऑल दैट वी इमेजिन एज़ लाइट’ फेम) मुख्य भूमिकाओं में हैं। ‘अस्सी’ मात्र एक पारंपरिक कोर्टरूम ड्रामा नहीं है, जहाँ अंत में न्याय की जीत पर तालियाँ बजती हैं; इसके विपरीत, यह उस सामूहिक मिलीभगत का एक मनोवैज्ञानिक और समाजशास्त्रीय अध्ययन है जो हर दिन अनगिनत महिलाओं को असुरक्षा के गर्त में धकेल देता है।
    फिल्म की कहानी दिल्ली जैसे महानगर की पृष्ठभूमि पर आधारित है, एक ऐसा शहर जिसे इसकी सत्ता और चकाचौंध के समानांतर महिलाओं के लिए एक “मध्ययुगीन, सैन्यीकृत और बर्बर साम्राज्य” के रूप में भी जाना जाता है। पटकथा लेखक गौरव सोलंकी और अनुभव सिन्हा द्वारा संयुक्त रूप से रचित यह कहानी परिमा (कनी कुसरुति) नामक एक केरल मूल की स्कूल शिक्षिका के इर्द-गिर्द घूमती है, जो अपने पति विनय (मोहम्मद जीशान अय्यूब) और छोटे बेटे ध्रुव (अद्विक जायसवाल) के साथ दिल्ली में एक शांतिपूर्ण मध्यमवर्गीय जीवन व्यतीत कर रही है। यह शांति तब एक खौफनाक दुःस्वप्न में बदल जाती है जब मध्य दिल्ली से काम के बाद लौटते समय परिमा का अपहरण कर लिया जाता है और एक चलती एसयूवी (SUV) में पांच लोगों द्वारा उसके साथ क्रूरतापूर्वक सामूहिक बलात्कार किया जाता है, जिसके पश्चात उसे एक रेलवे ट्रैक पर मरने के लिए फेंक दिया जाता है।
    फिल्म इस भयानक घटना को केवल एक ट्रिगर के रूप में इस्तेमाल नहीं करती, बल्कि घटना के तुरंत बाद शुरू होने वाले वास्तविक संघर्ष पर अपना पूरा ध्यान केंद्रित करती है, जहां ट्रॉमा केवल शारीरिक चोटों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि एक गहरा मनोवैज्ञानिक और सामाजिक रूप ले लेता है। ‘अस्सी’ की कथा संरचना को मुख्य रूप से दो समानांतर पटरियों पर दौड़ाया गया है। एक ओर, परिमा और उसके पति विनय का व्यक्तिगत और पारिवारिक संघर्ष है, जो इस अकल्पनीय त्रासदी के बाद अपने बिखरे हुए जीवन को समेटने का हताश प्रयास कर रहे हैं। दूसरी ओर, एक तीखी, जटिल और थका देने वाली कानूनी लड़ाई है जिसका नेतृत्व रावी (तापसी पन्नू) नामक एक निडर और कुशाग्र पब्लिक प्रॉसिक्यूटर कर रही है, जो भ्रष्ट पुलिस तंत्र, सबूतों से की गई छेड़छाड़, और समाज के निरंतर पड़ते पितृसत्तात्मक दबावों के बीच न्याय की एक संकरी राह तलाशने की कोशिश करती है।
    पटकथा की सबसे बड़ी और साहसिक विशेषता इसका नॉन सेंसेशनल दृष्टिकोण है। फिल्म ‘हूडनिट’ (Whodunit – अपराधी कौन है?) के स्थापित और सुरक्षित व्यावसायिक जाल में नहीं फंसती है। दर्शकों और पात्रों को शुरू से ही पता होता है कि अपराधी कौन हैं। रहस्य इस बात में नहीं है कि अपराध किसने किया, बल्कि इस बात में है कि क्या यह प्रणाली उन्हें सजा दे पाएगी? इसके बजाय, पूरा ध्यान इस बात पर केंद्रित किया गया है कि जस्टिस और सोशल सिस्टम किस प्रकार अपराधियों को बचाने और पीड़िता को बार-बार मानसिक रूप से प्रताड़ित करने का कार्य करती है।
    फिल्म का शीर्षक ‘अस्सी’ (80) इसके सबसे प्रभावशाली, विचलित करने वाले और केंद्रीय सांख्यिकीय तथ्य से लिया गया है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के 2018-19 के आंकड़ों का संदर्भ देते हुए, फिल्म यह नग्न सत्य स्थापित करती है कि भारत में प्रतिदिन औसतन 80 बलात्कार के मामले आधिकारिक तौर पर दर्ज किए जाते हैं। यह आंकड़ा अपने आप में भयावह है, लेकिन यह और भी अधिक डरावना हो जाता है जब हम यह महसूस करते हैं कि यह वास्तविक संख्या का केवल एक छोटा सा अंश (Tip of the iceberg) है, क्योंकि सामाजिक लांछन और पारिवारिक दबावों के कारण अधिकांश मामले कभी दर्ज ही नहीं हो पाते। इस गणितीय गणना का सीधा अर्थ यह है कि देश में हर 18 से 20 मिनट में एक महिला यौन हिंसा का शिकार होती है।
    निर्देशक अनुभव सिन्हा ने इस सांख्यिकी को दर्शकों के अवचेतन में गहराई तक उतारने के लिए एक बेहद आक्रामक और अपरंपरागत सिनेमाई तकनीक का प्रयोग किया है। फिल्म के 133 मिनट के रनटाइम के दौरान, हर 20 मिनट में सिनेमा के पर्दे की स्क्रीन अचानक लाल हो जाती है और उस पर सफेद अक्षरों में केवल ’20 मिनट’ लिखा हुआ आता है। यह एक रिमाइंडर है कि फिल्म देखने के दौरान ही देश के किसी न किसी हिस्से में एक और महिला के साथ यौन हिंसा हो चुकी है। यह तकनीक दर्शकों को कहानी की काल्पनिकता से बाहर खींचकर यथार्थ की क्रूरता में धकेल देती है।
    ‘अस्सी’ की सबसे बड़ी वैचारिक जीत यह है कि यह यौन हिंसा के लिए केवल कुछ गिने-चुने “राक्षसों” को दोष देकर पूरे समाज को बरी नहीं करती। इसके विपरीत, यह एक दर्पण दिखाती है कि कैसे पूरा समाज—परिवार, स्कूल, कार्यस्थल, पुलिस और न्यायपालिका—इस अपराध में मौन या सक्रिय रूप से भागीदार है। पटकथा लेखक गौरव सोलंकी के मारक संवाद इस सामाजिक सड़न की परत-दर-परत उघाड़ते हैं।
    दैनिक पितृसत्ता और संवेदनहीनता: फिल्म बेहद तीखेपन से दर्शाती है कि समाज के संभ्रांत वर्गों, अच्छे स्कूलों और सम्मानित परिवारों से आने वाले लड़के भी कंसेंट और महिलाओं की स्वायत्तता के अर्थ को नहीं समझते।
    एक अत्यंत प्रासंगिक दृश्य में, परिमा के स्कूल की प्रिंसिपल (सीमा पाहवा द्वारा अभिनीत) उसे त्रासदी के बाद वापस काम पर लौटने से रोकती है या हिचकिचाती है। यह समाज की उस गहरी मानसिकता को सटीकता से दर्शाता है जो पीड़िता को ही एक “अछूत” या “कलंकित” व्यक्ति मान बैठती है।
    फिल्म का एक सबसे भयानक और परेशान करने वाला हिस्सा वह है जहाँ परिमा के ही स्कूल के किशोर छात्र (जिनको वह गणित पढ़ाती है) व्हाट्सएप ग्रुप्स में अपनी शिक्षिका के बलात्कार का भद्दा मज़ाक उड़ाते हैं। वे यहाँ तक कहते हैं कि काश वे भी इस कृत्य में शामिल हो पाते। यह दृश्य डिजिटल युग में युवाओं के बीच पनप रही संवेदनहीनता और पोर्नोग्राफी-प्रेरित मानसिकता के चरम को दर्शाता है।
    परिमा के पति विनय पर उसके ही परिवार (विशेषकर उसके पिता) द्वारा झूठे “सम्मान” को बचाने के लिए केस वापस लेने का भारी दबाव डाला जाता है। यह दर्शाता है कि कैसे पितृसत्तात्मक समाज न्याय से अधिक अपनी झूठी प्रतिष्ठा को महत्व देता है।
    एक दृश्य में एक पुरुष पुलिस अधिकारी अभियुक्तों में से एक से पूछताछ करते हुए परोक्ष रूप से पूछता है, “आप भी मर्द हो। आप बताओ, औरत की मर्जी के बिना यह काम हो सकता है?”। यह प्रश्न “विक्टिम ब्लेमिंग” की उस गहरी पुलिसिया और सामाजिक प्रवृत्ति को उजागर करता है जो मानती है कि बलात्कार में पीड़िता की भी किसी न किसी रूप में सहमति या उकसावा रहा होगा।
    अपराधियों का मानवीकरण भी ‘अस्सी’ का एक डरावना लेकिन यथार्थवादी पहलू है। सिन्हा राक्षसों का निर्माण नहीं करते; वे हमारे बीच मौजूद सामान्य दिखने वाले लोगों को दिखाते हैं। ये अपराधी अपने कृत्य को बीयर की शर्त वाले एक खेल की तरह मानते हैं। वे अदालत की सुनवाई के दौरान अपने कपड़े मैच करने के लिए स्कार्फ बदलते हैं, और उनमें से एक तो घटना के बाद डिस्को में पार्टी करने चला जाता है। यह दर्शाता है कि उन्हें न तो कानून का कोई भय है और न ही अपनी अंतरात्मा में कोई ग्लानि; वे महिलाओं के शरीर को केवल एक वस्तु मानते हैं।
    फिल्म में एक अत्यंत जटिल समानांतर उप-कथानक ‘छतरी मैन’ का है, जो एक प्रकार का विजिलेंट (Vigilante) है। जब व्यवस्था पूरी तरह से विफल हो जाती है, तो यह अज्ञात व्यक्ति बलात्कार के आरोपियों को निशाना बनाना और उन्हें मारना शुरू कर देता है। यह किरदार कार्तिक (कुमुद मिश्रा) द्वारा निभाया गया है, जो विनय के सुपरमार्केट का बॉस है और एक अंडरकवर एजेंट रह चुका है, जिसके जीवन में अपने खुद के गहरे मनोवैज्ञानिक घाव और व्यक्तिगत नुकसान का इतिहास है।
    यह उप-कथानक मॉब जस्टिस, एनकाउंटर संस्कृति और मीडिया ट्रायल के खतरों का तार्किक और दार्शनिक विश्लेषण करता है। आम जनता अक्सर ऐसे विजिलेंट नायकों को पूजने लगती है, लेकिन फिल्म पूछती है कि क्या इससे मूल समस्या हल होती है? वकील रावी (तापसी पन्नू) जब अदालत के बाहर इस एक्ट्राजूडिशियल हिंसा के खिलाफ बयान देती है और कहती है कि व्यवस्था को कानून के दायरे में काम करना चाहिए, तो एक क्रुद्ध और भावनात्मक समर्थक द्वारा उसके चेहरे पर काली स्याही फेंक दी जाती है। यह दृश्य स्पष्ट करता है कि समाज न्याय की लंबी, उबाऊ और अक्सर निराश करने वाली प्रक्रिया की तुलना में त्वरित, हिंसक प्रतिशोध को अधिक पसंद करता है। हालांकि, फिल्म इस बात पर ज़ोर देती है कि बदला लेना न्याय नहीं है, और सिस्टम की खामियों को सिस्टम के भीतर रहकर ही ठीक किया जाना चाहिए।
    फिल्म में कलाकारों के अभिनय की बात करें तो तापसी पन्नू, जो पहले भी ‘पिंक’ और ‘मुल्क’ जैसी फिल्मों में कोर्टरूम ड्रामा का एक अनिवार्य हिस्सा रह चुकी हैं, ने रावी के रूप में अपने करियर का एक अत्यंत परिपक्व और संयमित प्रदर्शन दिया है। रावी का चरित्र शुरुआत में बहुत ठंडा और पेशेवर है। एक पब्लिक प्रॉसिक्यूटर के रूप में, जो दिल्ली की निचली अदालतों में रोज़ाना ऐसे दर्जनों वीभत्स मामले देखती है, उसके लिए हर मामले में शुरुआत से ही भावुक होना यथार्थवादी नहीं होगा। लेकिन जैसे-जैसे मामला आगे बढ़ता है, सिस्टम का भ्रष्टाचार और परिमा का दर्द इसे रावी के लिए एक व्यक्तिगत लड़ाई बना देता है।
    अदालत में रावी की जिरह भावुकता से अधिक ठोस तथ्यों, तीखे व्यंग्य और तीक्ष्ण तर्कों पर आधारित है। तापसी पन्नू ने कुंठा, सहानुभूति, और उस ड्राई ह्यूमर को बेहतरीन तरीके से पर्दे पर उतारा है जो एक पेशेवर वकील को सिस्टम में जीवित रहने के लिए विकसित करना पड़ता है।
    एक दृश्य में रावी पुलिस अधिकारी संजय से सबूतों से छेड़छाड़ और पुलिस की मिलीभगत पर चुप रहने पर उसे अदालत के सामने सच बोलने के लिए प्रेरित करते हुए जब उदय प्रकाश की कविता पढ़ती है:
    “आदमी
    मरने के बाद
    कुछ नहीं सोचता।
    आदमी
    मरने के बाद
    कुछ नहीं बोलता।
    कुछ नहीं सोचने
    और कुछ नहीं बोलने पर
    आदमी
    मर जाता है।”
    यह दृश्य बड़ा ही प्रभावशाली है।
    भारतीय सिनेमा में प्रायः पुरुष वकीलों (जैसे ‘पिंक’ में अमिताभ बच्चन या ‘दामिनी’ में सनी देओल) को तारणहार के रूप में दिखाया जाता है, लेकिन ‘अस्सी’ इस “मेल सेवियर सिंड्रोम” को तोड़ती है और एक महिला को ही दूसरी महिला के न्याय की लड़ाई का नेतृत्व सौंपती है। अदालत में रावी का वह संवाद जहाँ वह कहती है, “अपराध वाले दिन देश में अस्सी (80) रेप कंप्लेंट्स हुए थे, जिसमें से 76 का तो ट्रायल भी स्टार्ट नहीं हुआ है,” भारतीय न्याय व्यवस्था के धीमेपन पर एक करारा तमाचा है।
    मलयालम सिनेमा की बेहतरीन अभिनेत्री कनी कुसरुति ने परिमा के रूप में एक मौन, लेकिन हृदय विदारक प्रदर्शन किया है। उनका चरित्र सिनेमाई रूढ़ियों वाले ‘आदर्श पीड़ित’ के सांचे में नहीं ढलता, जो केवल रोती है और दया की पात्र बनती है। परिमा सहानुभूति की भीख नहीं मांगती; वह आहत है, वह टूटी हुई है, लेकिन वह वैचारिक रूप से कमज़ोर नहीं है। कुसरुति ने अपनी बॉडी लैंग्वेज और आंखों के भावों से उस मानसिक आघात को व्यक्त किया है जिसे शब्दों में पिरोना असंभव है।
    एक अत्यंत शक्तिशाली संवाद में, परिमा एक अपराधी (या संभावित अपराधी) की मौत की खबर सुनकर अच्छा महसूस करने की बात स्वीकार करती है और भरे हुए गले से कहती है, “मैं कभी ऐसा महसूस नहीं करना चाहती थी”। यह संवाद पीड़ित के मनोविज्ञान के उस स्याह पहलू को छूता है जहाँ हिंसा एक शांत इंसान के भीतर भी प्रतिशोध की भावना को जन्म दे देती है, और पीड़ित इस भावना के लिए भी स्वयं को ही दोषी मानता है। कनी ने स्पष्ट किया है कि उन्होंने इस आघात को निभाने के लिए खुद को पूरी तरह से अंधकार में नहीं धकेला, ताकि उनका मानसिक स्वास्थ्य प्रभावित न हो, फिर भी उनका प्रदर्शन पर्दे पर अविश्वसनीय रूप से प्रामाणिक लगता है।
    अभिनेता मोहम्मद जीशान अय्यूब ने परिमा के पति विनय का किरदार निभाया है। विनय एक अत्यंत सहायक साथी है जो पारंपरिक मेल इगो से पूरी तरह मुक्त है। उनका प्रदर्शन शांत और संयमित है, जो एक ऐसे व्यक्ति की बेबसी को दर्शाता है जिसे यह विश्वास था कि दिल्ली जैसे महानगर सुरक्षित हैं। ‘अस्सी’ मुख्य रूप से महिलाओं के संघर्ष की कहानी है, लेकिन यह विनय के माध्यम से “पुरुष अपराध-बोध” (Male Guilt) के लिए भी एक स्थान बनाती है। विनय और उनके छोटे बेटे ध्रुव के बीच के दृश्य यह दर्शाते हैं कि कैसे इस प्रकार की त्रासदी की छाया घर के सबसे मासूम सदस्यों तक पहुंच जाती है।
    रहस्यमयी अतीत वाले कार्तिक के रूप में कुमुद मिश्रा का अभिनय बेहतरीन है। यद्यपि उनका चरित्र थोड़ा अधूरा सा लगता है, फिर भी वे अपनी उपस्थिति से फिल्म में एक तनाव पैदा करते हैं।
    सबसे कम उम्र के आरोपी के पिता के रूप में, मनोज पाहवा का चरित्र डरावना है क्योंकि वह एवरीडे नॉर्मलसी का प्रतिनिधित्व करता है। वह अपने बेटे के अपराध की चर्चा करते हुए छोले भटूरे और मोमोज जैसे भोजन के रूपकों का उपयोग करता है। यह उस पितृसत्तात्मक मध्यवर्गीय कुंठा और पाखंड का सटीक चित्रण है जो अपने बेटों के जघन्य अपराधों को केवल “स्वाद बदलने” या “गलती” के रूप में देखता है। और अंत में अपने बेटे का बदला लेने के लिए दिनदहाड़े कोर्ट में ही कार्तिक (छतरी मैन, जो खुद पुलिस को सरेंडर कर चुका है) को गोली मार देता है।
    एक किरदार और है जिसपर यदि बात न करें तो शायद बात ही अधूरी रह जाए। जतिन गोस्वामी (संजय नरवाल)-एक नैतिक रूप से अस्पष्ट पुलिस अधिकारी, जो साहित्य (रामधारी सिंह दिनकर और विनोद कुमार शुक्ल) पढ़ता है लेकिन सिस्टम के दबाव में भ्रष्ट हो जाता है, गोस्वामी का काम उल्लेखनीय है। यह चरित्र इस बात को रेखांकित करता है कि साहित्य या कला का ज्ञान किसी व्यक्ति को अपराध या भ्रष्टाचार से मुक्त नहीं कर सकता। हम में से काफी लोग इस किरदार से रिलेट करेंगे।
    ‘अस्सी’ केवल एक सिनेमाई रचना तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक राजनीतिक और सामाजिक स्टेटमेंट बन गई है। फिल्म की प्रासंगिकता हाल की वास्तविक घटनाओं के साथ इसके जुड़ाव से और अधिक पुख्ता होती है।
    अगस्त 2024 में कोलकाता के आरजी कर मेडिकल कॉलेज में एक महिला डॉक्टर के साथ हुए वीभत्स बलात्कार और हत्या के मामले ने पूरे देश को झकझोर दिया था। फिल्म ‘अस्सी’ के कोलकाता में हुए प्रीमियर के दौरान, जब क्रेडिट रोल चल रहे थे, तब तापसी पन्नू ने अचानक थिएटर में प्रवेश किया। मीडिया और दर्शकों ने स्वाभाविक रूप से उनसे आरजी कर मामले पर प्रतिक्रिया मांगी थी।
    तापसी का उत्तर न केवल तीखा था, बल्कि वह फिल्म की मूल सांख्यिकीय भावना (’80 बलात्कार प्रतिदिन’) को प्रतिध्वनित करता था। उन्होंने कहा, “हम जिस भी शहर में जा रहे हैं, वे बलात्कार का एक उदाहरण दे रहे हैं और मुझसे उस पर प्रतिक्रिया मांग रहे हैं। पटना में, उन्होंने NEET छात्रा की बात की… आज सुबह मैंने अपने पिता के दोस्त द्वारा एक डेढ़ साल की बच्ची से बलात्कार की खबर पढ़ी। तो, मुझे किस मामले पर टिप्पणी करनी चाहिए? क्या हम एक मामले के बारे में बात करें या उन 79 अन्य मामलों के बारे में जो उसी दिन हुए?”। यह बयान इस बात को रेखांकित करता है कि कैसे मीडिया और जनता का आक्रोश केवल उन कुछ मामलों तक सीमित रहता है जो ‘ट्रेंड’ बन जाते हैं, जबकि शेष 79 मामले प्रतिदिन गुमनामी में खो जाते हैं।
    यह फिल्म केवल एक बलात्कार पीड़िता की कानूनी लड़ाई की कहानी नहीं है; यह न्याय की उस मृतप्राय व्यवस्था का शोकगीत है जहाँ प्रतिदिन दर्ज होने वाले 80 मामलों में से 76 का ट्रायल भी कभी शुरू नहीं हो पाता है। यह उस समाज के मुँह पर एक तमाचा है जो बलात्कारियों को पैदा करता है और फिर उन्हें ‘लड़के तो लड़के होते हैं’ जैसी मानसिकता के पीछे छिपा लेता है।
    खैर।
    शाम गहरा चुकी है। ट्रेन दो घंटे की देरी से चल रही है; जिसे रात 8 बजे गोरखपुर पहुंचना था, वह अब 10 बजे अपने गंतव्य तक पहुंचेगी। ट्रेन की खिड़की से बाहर मीलों तक केवल घना अंधेरा ही पसरा है। कहीं दूर किसी गांव से बल्बों की टिमटिमाती रोशनी, ओस की बूंदों सी प्रतीत होती है, जो पलक झपकते ही पीछे छूट जाती है। सर्द हवा तेजी से अंदर आ रही है, खिड़की का शीशा नीचे गिरा हुआ है। कानों में बड्स लगे हैं अस्सी फिल्म का ही एक और गाना – ‘मन्न हवा’, जिसे मोहित चौहान ने गाया है, सुन रहा हूँ..
    “तन्न वी रोशन रूह वी रोशन
    चार चिरागे सारे मौसम
    आज मिलया वजूद मेरा
    जो कल तक सी खोया
    मन्न मेरा ए पतंगा होया
    बेफिक्रा ए मलंगा होया
    चुमदा अंबर बदलां चों हुंदा होया
    मन्नहवा हवा मन्न हवा हवा
    मन्न हवा हवा….”
    ============
    • मनीष चौरसिया
    शोधार्थी इलाहाबाद विश्वविद्यालय प्रयागराज
    सम्पर्क-9792787475
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    Facebook id: @Mnish Chaursiya

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