• समीक्षा
  • मिट्टी की महक और बारूद की गंध का संगम

     

    हिंदी भाषा और नागरी लिपि के सतत उत्थान और प्रचार-प्रसार पर एकाग्र भारत की सबसे पुरानी संस्थाओं में से एक काशी नागरी प्रचारिणी सभा के प्रमुख इन दिनों व्योमेश शुक्ल हैं. उनके और उनकी मंडली के निरंतर प्रयासों से यह संस्था लंबे अंतराल के बाद एक बार फिर से रौशनी और चर्चा में है.

    इन सक्रियताओं से अलग, मुख्यधारा की गहमागहमी से कुछ दूर जाकर व्योमेश शुक्ल ने एक प्रकाशन गृह की शुरुआत भी की है, जिसका नाम है हमलोग प्रकाशन. हमलोग की पहली पुस्तक सूबेदार (लेखक : शिवकुमार सिंह) छपकर आ गई है. यह पुस्तक 86 बरस के एक अलेखक का आत्मवृत्तांत है, जो पेशे से फ़ौजी और किसान रहा है. इस पुस्तक में लेखक ने फ़ौज और किसानी, राष्ट्र और गाँव, पराक्रम और परिश्रम के अंतर को धुँधला कर दिया है और साफ़, सादा, सरल और प्रवहमान भाषा में अपने बीहड़ सैनिक अनुभवों की ऐसी कहानी कही है, जिसे पढ़कर आप चकित हुए बिना न रह सकेंगे. उसी पुस्तक की समीक्षा युवा अध्येता आशुतोष कुमार ठाकुर के शब्दों में- 

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    समीक्षा की शुरुआत में ही यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि इस किताब को पारंपरिक अर्थों में केवल एक सैनिक की डायरी मान लेना इसके साथ न्याय नहीं होगा. प्रतापगढ़ के कोल बझान गाँव से निकलकर चीन की जेलों की सलाखों तक और फिर वहाँ से भागकर हिमालय के दुर्गम रास्तों को नापने वाले एक ‘सूबेदार’ की कहानी महज एक फौजी का संस्मरण नहीं है. शिव कुमार सिंह की 110 पृष्ठों की यह कृति असल में एक भारतीय गाँव का वह सामाजिक इतिहास (Social History) है, जिसे मुख्यधारा के इतिहासकारों ने प्रायः अनदेखा किया है.

    गाँव की बायोग्राफी: समाजशास्त्रीय दृष्टि से परे

    लेखक ने इस किताब को किसी पारंपरिक ढांचे में नहीं बांधा है. यह न तो एम.एन. श्रीनिवास जैसा अकादमिक वर्णन है और न ही केवल शिवपूजन सहाय की ‘देहाती दुनिया’ जैसा आंचलिक उपन्यास. यह प्रेमचंद और फणीश्वरनाथ रेणु के गाँवों के उस यथार्थ के करीब है, जहाँ अभावों के बीच भी एक सामूहिकता जीवित थी. लेखक ने अपने गाँव के हर उस पात्र को दर्ज किया है जिसने वहाँ के सामाजिक ताने-बाने को बुना—चाहे वे प्रथम विश्व युद्ध में शहीद हुए रामप्यारे  सिंह हों या विज्ञान पढ़कर गाँव का नाम रोशन करने वाले पहले युवा बलभद्र सिंह और हरी प्रसाद.

    लेखक ने गाँव की आंतरिक संरचना को जिस बारीकी से पकड़ा है, वह हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि भारत के हर गाँव के पास अपना एक ‘सोशल हिस्टोरियन’ होना चाहिए, जो उस मिट्टी की उत्पत्ति, उसके संघर्ष और उसके वर्तमान को दर्ज कर सके.

    1962 का युद्ध और एक फौजी की जिजीविषा

    किताब का सबसे लोमहर्षक हिस्सा वह है जहाँ सूबेदार शिव कुमार सिंह 1962 के भारत-चीन युद्ध के अनुभवों को साझा करते हैं. नेहरू युग की विदेश नीति और चीन द्वारा दिया गया वह ‘धोखा’ इस पुस्तक में एक सैनिक के नजरिए से दर्ज है. शिव कुमार सिंह उस युद्ध में अग्रिम पंक्ति पर लड़ते हुए न केवल घायल हुए, बल्कि युद्धबंदी (POW) बनाकर चीन की जेल में डाल दिए गए.

    एक वर्ष से अधिक समय चीन की जेल में बिताने के बाद, अपने साथियों के साथ वहाँ से भागने की वह दास्तान रोंगटे खड़े कर देने वाली है. बिना किसी आधुनिक मानचित्र या संसाधनों के, केवल अपने साहस और पराक्रम के दम पर हिमालय के विशाल और बर्फीले हिस्से को पार करते हुए असम में प्रवेश करना, मानवीय इच्छाशक्ति की पराकाष्ठा है.

    लेखक ने अपनी इस ‘आपबीती’ को जिस सादगी से लिखा है, वह इसकी विश्वसनीयता को बढ़ा देता है. किताब का यह हिस्सा एक रोमांचक थ्रिलर की तरह चलता है, लेकिन इसमें युद्ध की विभीषिका और शांति की कीमत का गहरा बोध है.

    पलायन और प्रवासी जीवन का द्वंद्व

    किताब का एक और महत्वपूर्ण पहलू ‘प्रवास’ (Migration) है. लेखक का जीवन संघर्ष केवल सीमा तक सीमित नहीं रहा. ग्यारहवीं की पढ़ाई छोड़कर बिना टिकट बॉम्बे (मुंबई) जाने और कपड़ा मिलों में काम करने का जो चित्रण उन्होंने किया है, वह उत्तर भारत के एक बड़े हिस्से की नियति रही है. प्रतापगढ़ के लोगों के लिए बम्बई पहली पसंद थी, उसके बाद कराची और फिर कलकत्ता. यह क्रम उस समय की आर्थिक विवशताओं को दर्शाता है.

    प्रवासियों का सांस्कृतिक अकेलापन और अपनी जड़ों से कटे होने की पीड़ा को लेखक ने बड़ी गहराई से उकेरा है. प्रवास के दौरान अपनी पहचान को बचाए रखने का संघर्ष इस पुस्तक में झलकता है, जो हमें उन लाखों मजदूरों की याद दिलाते हैं जो आज भी शहरों की धड़कन बने हुए हैं पर खुद बेनाम हैं.

    यह हिस्सा आज भी उतना ही प्रासंगिक है, क्योंकि प्रवास की प्रकृति बदली है, पर संघर्ष नहीं.

    बदलता हुआ गाँव और समावेशी सोच

    लेखक एक फौजी हैं, लेकिन उनकी दृष्टि बेहद संवेदनशील और प्रगतिशील है. उन्होंने गाँव की बदलती सामाजिक संरचना का वर्णन करते हुए जातियों के आपसी संबंधों और महिलाओं की स्थिति पर लिखा है. वे बताते हैं कि कैसे उनके गाँव में पहले केवल उच्च जातियों की लड़कियाँ स्कूल जाती थीं, पर धीरे-धीरे पिछड़ी जातियों में भी शिक्षा के प्रति चेतना आई.

    हिंदू-मुस्लिम भाईचारे के प्रसंग और गाँव की सदानीरा ‘सेइ’ नदी के प्रति उनका अनुराग यह बताता है कि एक व्यक्ति का व्यक्तित्व उसकी भौगोलिक और सांस्कृतिक विरासत से कैसे निर्मित होता है. अपनी वंशावली का जो खाका उन्होंने खींचा है, वह आने वाली पीढ़ियों के लिए अपनी जड़ों को पहचानने का एक जरिया है. उनके साथ पढ़ने वाले 20 छात्रों का सरकारी सेवा में आना और एक मित्र का पीएचडी तक पहुँचना, उस दौर के ग्रामीण भारत की शैक्षणिक महत्वाकांक्षाओं का प्रतिबिंब है.

    सूबेदार साहब की दृष्टि केवल अतीत के मोह (Nostalgia) में नहीं फंसी है. अपनी वंशावली के खाके के साथ-साथ गाँव की सदानीरा ‘सेइ’ नदी को पुस्तक समर्पित करना उनकी प्रकृति और संस्कृति के प्रति गहरी चेतना को दर्शाता है.

    स्मृतियों का दस्तावेज

    ‘सूबेदार: प्रतापगढ़ से चीन की जेल तक’ एक ऐसी कृति है जो हमें हमारे समय के गुमनाम नायकों से मिलवाती है. शिव कुमार सिंह ने 23 साल की देशसेवा के बाद स्वास्थ्य कारणों से सेवामुक्त होकर जब यह किताब लिखी, तो उन्होंने केवल अपनी कहानी नहीं कही, बल्कि उन तमाम पुरखों को सम्मान दिया जिन्होंने इस देश की नींव में अपनी ईंटें लगाई हैं.

    यह पुस्तक हमें सिखाती है कि इतिहास केवल राजाओं और युद्धों का नहीं होता, इतिहास उस आम आदमी का भी होता है जो हल चलाता है, जो मिलों में पसीना बहाता है और जो सीमा पर बर्फ के बीच जागता है.

    पढ़ते हुए आप केवल शिव कुमार सिंह को नहीं पढ़ते, बल्कि अपने खुद के गाँव को याद करने लगते हैं. यह किताब इस बात की तस्दीक करती है कि भारत के हर गाँव के पास अपना एक ‘कथावाचक’ होना चाहिए जो उसके अस्तित्व के संघर्षों को कागजों पर उतार सके. यदि आप भारतीय गाँवों की नब्ज और एक सैनिक के फौलादी इरादों को समझना चाहते हैं, तो यह किताब एक अनिवार्य पाठ है. यह किताब पढ़ने के बाद आप अपने गाँव को याद न करें, ऐसा असंभव है.

    किताब : सूबेदार प्रतापगढ़ से चीन की जेल तक

    लेखक : शिव कुमार सिंह

    प्रकाशक : हमलोग

    मूल्य : रु 240 /

    (आशुतोष कुमार ठाकुर साहित्य, संस्कृति और कला विषयों पर नियमित लिखते हैं.)

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