
हाल में ही प्रसिद्ध गायक-परफ़ॉर्मर माइकल जैक्सन की बायोपिक आई है- माइकल। इस बायोपिक पर यह विस्तृत टिप्पणी पढ़िए। माइकल जैक्सन सिर्फ़ एक गायक नहीं थे, वे एक फ़िनोमिना थे, जिन्होंने पॉप संगीत को घर-घर पहुँचा दिया। इसी फ़िल्म पर कुमारी रोहिणी की यह टिप्पणी पढ़िए- मॉडरेटर
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माइकल जैक्सन हमारे बचपन में केवल एक सिंगर-परफ़ॉर्मर का नाम नहीं था, वह अपने आप में एक अनुभव था। एक ऐसा दौर जब टीवी पर कहीं भी कोई आदमी टोपी झुकाकर, पैरों को पीछे सरकाकर moonwalk करता दिख जाए, तो नाम पूछने की ज़रूरत नहीं पड़ती थी, हम तुरंत पहचान जाते थे कि ये माइकल जैक्सन है। कई लोगों के लिए डांस का मतलब ही माइकल जैक्सन था। संगीत, मंच, भीड़ का पागलपन, चमकदार जैकेट, सफ़ेद मोज़े और वर्क्स वाले दस्ताने, हवा में घूमता-लहराता शरीर, यह सब माइकल की निशानियाँ थीं। उस समय हम जैसे लोगों को तो शायद इस बात की समझ भी नहीं थी कि हम सिर्फ़ एक सिंगर या परफ़ॉर्मर को नहीं देख रहे हैं, बल्कि हमारे सामने जो शख़्स है वह modern pop culture के सबसे बड़े pioneers में से एक है।
माइकल जैक्सन ने दुनिया को सिर्फ़ गाने और अद्भुत संगीत नहीं दिया। उन्होंने दुनिया को परफ़ॉर्मेंस का असली मतलब समझाया और दिखाया। उन्होंने अपने डांस और गानों से बताया कि म्यूज़िक वीडियो केवल प्रमोशनल क्लिप नहीं बल्कि cinematic events भी हो सकते हैं। मंच पर खड़ा एक आदमी पूरी भीड़ की collective energy को बदल सकता है और एक अश्वेत कलाकार वैश्विक कल्पना का सबसे बड़ा चेहरा बन सकता है।
बहुत लंबे समय तक अश्वेत कलाकारों को लगभग हाशिए पर रखने वाले MTV को भी आख़िरकार माइकल जैक्सन के Thriller के वीडियो लगातार चलाने पड़े क्योंकि दर्शकों की मांग को अनदेखा करना उनके लिए अब संभव नहीं रह गया था। यह सिर्फ़ एक म्यूज़िक एल्बम की सफलता नहीं थी, बल्कि पॉप-कल्चर की racial hierarchy में दरार पड़ने जैसा था, उस दुनिया में श्वेतों की हेजीमोनी टूटने जैसा था।
शायद यही कारण है कि माइकल जैक्सन पर बनी बायोपिक “माइकल” को देखते हुए लगातार यह महसूस हो रहा था कि यह फिल्म सिर्फ़ एक इंसान की कहानी नहीं कह रही, बल्कि उस collective nostalgia को भी छू रही है जो दुनिया भर के लोगों के भीतर अब भी ज़िंदा है। थिएटर में बैठे चौदह-पंद्रह साल के बच्चे हों या वे वयस्क जो अपने बच्चों के साथ आए थे, उन सबकी स्मृतियों में माइकल जैक्सन पहले से मौजूद थे। और शायद माइकल जैक्सन होने का सबसे बड़ा अर्थ भी यही है कि समय बीत रहा है, पीढ़ियाँ बदल रही हैं, उनकी सोच और पसंद भी बदल रही है, लेकिन pop culture की हमारी collective memory में कहीं-न-कहीं एक आदमी अब भी moonwalk कर रहा है।
अभिनय नहीं, जैसे माइकल ख़ुद स्क्रीन पर लौट आए हों
माइकल जैक्सन पर बनी इस बायोपिक की सबसे बड़ी ताक़त उसका अभिनय है। जाफ़र जेरेमिया जैक्सन को स्क्रीन पर देखते हुए कई बार सचमुच यह याद ही नहीं रह जाता है कि पर्दे पर दिखने वाला शख़्स ख़ुद माइकल नहीं हैं। उनके चलने का ढंग, हाथों की movement, stage पर आते ही बॉडी एनर्जी का बदल जाना, बोलते समय आंखों में दिखने वाली झिझक, मुस्कान के पीछे छिपी अजीब सी घबराहट, सब कुछ इतना परफ़ेक्ट है कि कई सिन देखकर ऐसा लगता है जैसे किसी डॉक्युमेट्री का फ़ुटेज हो।
लेकिन जाफ़र के अभिनय की सबसे बड़ी उपलब्धि माइकल की तरह दिखना और उनकी तरह डांस करना भर नहीं है। उन्होंने इस क्रम में माइकल के जीवन की बेचैनी, अकेलेपन की घबराहट और लगातार अप्रूवल और वेलिडेशन तलाशते उस व्यक्ति को जिस कदर अपने भीतर उतार लिया है वह क़ाबिल-ए-तारीफ़ है। फिल्म कई बार सिर्फ़ उनके चेहरे के भावों से यह महसूस करा देती है कि मंच पर खड़ा वह आदमी, जो लाखों लोगों को hysterical excitement में बदल देता था, stage से उतरते ही कितना अकेला और असुरक्षित महसूस करने लग जाता था।
एक ऐसा बच्चा जिसे कभी “सिर्फ़ बच्चा” होने का समय नहीं मिला
फिल्म देखने के बाद लगा कि अकेलापन शायद माइकल जैक्सन के जीवन का सबसे स्थायी भाव था। बार-बार यह बात महसूस होती है और एक बार तो ख़ुद माइकल के मुँह से कहवाई भी जाती है कि वे दूसरे बच्चों जैसे नहीं हैं। और सबसे भयावह यह था कि माइकल इस तथ्य को जानते थे। वे जानते थे कि दूसरे बच्चे उनसे दोस्ती नहीं करते, उनके साथ खेलते नहीं, उन्हें एक आम बच्चे की तरह नहीं देखते। एक तरफ़ पिता का अनुशासन, दूसरी तरफ़ दुनिया की असहज कर देनी वाली निगाहें और बर्ताव, इन दोनों के बीच माइकल का बचपन कहीं दबता चला जाता है।
यही वज़ह है कि जिराफ़, चिम्पांज़ी, साँप और ऐसे ही दूसरे exotic जवानरों को वे अपना pet बनाते हैं। उनसे प्रेम करते हैं और उन जानवरों के साथ उनका लगाव किसी सनक जैसा नहीं लगता है। फ़िल्म देखने पर लगता है जैसे उन्हें किसी साथी (companionship) की बहुत ज़्यादा चाह है। वे डेस्परेटली इसे तलाशते नज़र आते हैं, कभी इन जानवरों में तो कभी सॉफ्ट टॉयज और बच्चों के खिलौनों में। ये सब देखकर ऐसा लगता है जैसे माइकल एक ऐसी दुनिया रच रहे थे जहां कोई उन्हें उनके लुक और सोच के लिए जज करने वाला न हो। इंसानों की दुनिया में जहां उन्हें हमेशा “The Michael Jackson” बनकर रहना पड़ता था, वहीं जानवरों और सॉफ्ट टॉयज़ की उस दुनिया में वे केवल माइकल बनकर रह पाते थे।
फिल्म बहुत तीखे ढंग से यह एहसास कराती है कि चमक-दमक के पीछे का जीवन कितना disciplined, कठोर और emotionally isolating होता है। माइकल जैक्सन सिर्फ एक पॉप स्टार नहीं थे, वे दुनिया के शायद पहले ऐसे ग्लोबल परफ़ॉर्मर थे जिनके लिए “परफ़ेक्ट” दिखना और “परफ़ेक्ट” होना ही उनकी पहचान बन गया था। बचपन से कैमरे, स्टेज और लोगों की उम्मीदों के बीच बड़े हुए माइकल के लिए शायद एक समय के बाद इंसान और परफ़ॉर्मर के बीच की सीमा ही धुंधली पड़ गई थी। दुनिया उन्हें “King of Pop” कह रही थी, लेकिन उसी दुनिया की नज़रों में हमेशा बेदाग़ बने रहने का दबाव उन्हें भीतर से लगातार तोड़ भी रहा था।
फ़िल्म माइकल देखते हुए मुझे कई बार K-pop इंडस्ट्री के कलाकारों की भी याद आई। उनकी बेचैनी कहीं-न-कहीं माइकल जैक्सन की बेचैनी की परछाईं जैसी लगी। फर्क सिर्फ़ इतना है कि माइकल अकेले उस दबाव को झेल रहे थे, जबकि K-pop में पूरा सिस्टम ही उसी दबाव पर टिका हुआ दिखाई देता है।
दुनिया की नज़रें लगातार माइकल के चेहरे, उनकी त्वचा, उनके शरीर और उनके पब्लिक एपियरेंस पर बनी रहती थीं। मंच पर लाखों लोगों को सम्मोहित कर देने वाला वही इंसान मंच के बाहर अपनी ही छवि से जूझता दिखाई देता है। K-pop कलाकारों में भी यही दबाव दिखता है, जहां उन्हें सिर्फ़ गाना या डांस नहीं, बल्कि हमेशा “परफ़ेक्ट”, “स्कैंडल-फ्री” और फैंस की कल्पनाओं के अनुरूप बने रहना पड़ता है।
फ़िल्म बार-बार यह एहसास कराती है कि चमक-दमक के पीछे का जीवन कितना कठोर और emotionally isolating होता है। जिस उम्र में दूसरे बच्चे खेल रहे थे, माइकल रिहर्सल कर रहे थे। जिस उम्र में लोग दोस्त बना रहे थे, वे परफ़ेक्शन के पीछे भाग रहे थे। शायद यही वजह थी कि उनके भीतर का वह बच्चा कभी पूरी तरह बड़ा हो ही नहीं पाया।
पिता का डर, महत्वाकांक्षा और प्यार का कठोर और जटिल रूप
माइकल जैक्सन के पिता जोसफ़ जैक्सन का एक सपना था, एक परफ़ेक्ट सक्सेसफुल फ़ैमिली का सपना। वे अपने चारों बेटों को एक साथ संगीत का रिहर्सल करवाते थे, माइकल उनमें सबसे छोटा लेकिन सबसे अधिक प्रतिभाशाली था। और जोसफ़ को यह बात बहुत अच्छी तरह से पता थी। इसलिए मुझे लगा कि उनके व्यक्तित्व को पर्दे पर लाने का काम इस फ़िल्म का सबसे जटिल हिस्सा रहा होगा। एक नज़र में लग सकता है कि वे एक abusive पिता थे, लेकिन यहीं फ़िल्म अपना रुख़ थोड़ा बदल लेती है। वह उन्हें केवल एक abusive पिता के रूप में दिखाकर आसान रास्ता नहीं चुनती, बल्कि उनके भीतर के डर और असुरक्षा को भी दिखाती है। श्वेत प्रभुत्व वाले समाज में अश्वेतों के परिवार का टिके रहना, सफल होना और अपने अस्तित्व को बचाए-बनाए रखने का डर। मुझे देखने से लगा संभव है उनका यही डर आगे चलाकर महत्वाकांक्षा में बदल गया हो। वे अपने बच्चों को सिर्फ़ सफल नहीं, अजेय बनाना चाहने लगे हों। उनके लिए discipline सिर्फ़ parenting नहीं, survival strategy थी। लेकिन दोनों के बीच के उस महीन फर्क़ को न समझ पाने के कारण इसी survival ने धीरे-धीरे भावनात्मक हिंसा का रूप ले लिया। नाक को लेकर माइकल को लगातार ताने देना, उनसे लगातार परफेक्शन की मांग करना, हर छोटी से छोटी चीज़ को नियंत्रित करना उनके व्यक्तित्व का स्थायी हिस्सा था। यह सब देखकर लगा कि माइकल के जीवन की बहुत-सारी असुरक्षाएँ उनके घर के भीतर ही जन्म ले चुकी थीं।
इसके ठीक उलट, माइकल की माँ का किरदार बेहद कोमल लेकिन लगभग अदृश्य और कमजोर दिखाई देता है। वे माइकल का इमोशनल सपोर्ट तो हैं, लेकिन उसे किसी भी तरह से बचा नहीं पातीं, न असुरक्षा से, न पिता की सख़्ती से और न ही परफ़ेक्ट होने और दिखने के पागलपन की हद तक वाले जुनून से। उनका प्यार पिता के वर्चस्व के सामने बेहद असहाय दिखाई देता है। और शायद फिल्म इसी सबसे दुखद पारिवारिक सच को दिखाना चाहती है कि कई बार प्रेम होने के बावजूद कोई किसी को बचा नहीं पाता।
चेहरा, असुरक्षा और “perfect” दिखने का दबाव
मेरी नज़र में इस फिल्म का एक महत्वपूर्ण हिस्सा माइकल जैक्सन के जीवन की असुरक्षाएँ हैं। पिता द्वारा उनकी नाक को लेकर किए गए ताने, लगातार picture perfect दिखने का दबाव, vitiligo का दर्द, यह सब मिलकर प्लास्टिक सर्जरी को केवल सौंदर्य तक सीमित नहीं रहने देता। बल्कि माइकल के मामले में वह अपने ही चेहरे और पहचान से लगातार असहज होते जाने की प्रक्रिया जैसा महसूस होने लगता है।
फिल्म का एक मार्मिक पहलू यह भी है कि इसमें प्लास्टिक सर्जरी को ग्लैमर की तरह नहीं, बल्कि दर्द की तरह दिखाया गया है। पहली बार नाक की सर्जरी के लिए जाने पर डॉक्टर ने माइकल से उनके बिलकुल परफ़ेक्ट होने की बात भी कही है। लेकिन माइकल का पिक्चर परफ़ेक्ट शायद कुछ और ही था। सर्जरी के बाद दर्द, पछतावा और अपने ही चेहरे से लगातार असहज रहना, और “परफ़ेक्ट” बनने की यही कोशिश धीरे-धीरे self-destruction में बदलती दिखाई देती है।
हालांकि फ़िल्म में माइकल के शरीर और चेहरे में होने वाले बदलावों को अलग से न दिखाकर उनके हर बार के स्टेज एपीयरेंस के माध्यम से दिखाया गया है। माइकल को देखकर यही लगता रहा कि एक ऐसा व्यक्ति जिसकी छवि पूरी दुनिया के लिए परफेक्शन का पर्याय थी, भीतर से लगातार अपने ही शरीर और चेहरे से लड़ रहा था और असंतुष्ट था।
बच्चों के प्रति लगाव और फिल्म की सबसे बड़ी चुप्पी
फिल्म बच्चों के साथ माइकल के संबंधों को बेहद कोमलता और मासूमियत से दिखाती है। विक्ट्री टूर के परफ़ॉर्मेंस के दौरान उनके शरीर में लगने वाली आग जिसमें उनका सिर का एक बड़ा हिस्सा जल गया था, वाली घटना के बाद वे लंबे समय तक अस्पताल में रहे। इंश्योरेंस में मिलने वाले लाखों डॉलर को उन्होंने बर्न हॉस्पिटल को दान देने का फ़ैसला कर लिया। फ़िल्म में दिखाया गया है कि अपने रिकवरी के दौरान वे लगातार अपना समय बर्न वार्ड के बच्चों के साथ बिताते थे। वे उनके लिए कुछ करना चाहते थे, और उन्होंने जलकर बच निकलने की इस घटना को ईश्वर का दिया एक नया अवसर माना। शायद फ़िल्म के उन दृश्यों के माध्यम से यह दिखाने कि कोशिश की गई है कि माइकल के भीतर वह बच्चा हमेशा जीवित रहा जिसे कभी सामान्य बचपन मिला ही नहीं। इसलिए बच्चों के साथ उनकी सहजता को फिल्म lost childhood की तरफ़ लौटने की कोशिश की तरह पेश करती है।
लेकिन यहीं फिल्म की सबसे बड़ी सीमा भी यही है। यह फिल्म माइकल जैक्सन के जीवन के सबसे असहज कर देने वाले हिस्सों से पूरी तरह से बचकर निकल जाती है। बच्चों से जुड़े आरोप, मीडिया ट्रायल और उन जटिल सवालों की गहराई से फिल्म पूरी तरह बच निकलती है, जिन्होंने माइकल जैक्सन की पब्लिक इमेज को हमेशा के लिए बदल दिया था।
इसलिए कई जगह फ़िल्म एक खुली और ईमानदार कहानी कम, और माइकल की छवि को संभालकर पेश की गई स्मृति ज़्यादा लगती है। फ़िल्म माइकल को समझना तो चाहती है, लेकिन उसे पूरी तरह से सवालों के कटघरे में खड़ा करने से बचती है। और शायद यही वजह है कि कई बार यह भावनात्मक स्तर पर आपको परेशान और उद्वेलित कर देने के बावजूद सतही होने का एहसास करा देती है।
अपनी अलग पहचान की तलाश का अर्थ परिवार से नफ़रत नहीं
इस फिल्म की सबसे अच्छी बात मुझे यह लगी कि यह एक सफल व्यक्ति के उसके परिवार के साथ के संबंधों की बारीक़ियों और जटिलताओं, दोनों को बड़े ही सहज ढंग से सामने लाती है। एक तरफ़ जहां माइकल अपने परिवार से बेहद प्यार करते थे, वहीं वे “जैक्सन परिवार का एक कलाकार” की अपनी पहचान से आज़ादी चाहते हैं। उन्हें अपनी स्वतंत्र पहचान बनानी थी, वे जानते थे कि उनकी प्रतिभा और सफलता के सामने उनके परिवार और उनके भाइयों का क़द बौना पड़ चुका है। दुनिया के सामने अपनी अलग पहचान बनाना माइकल के लिए केवल बग़ावत नहीं था, बल्कि शायद अपने भीतर बचे हुए “ख़ुद” को बचाए रखने की कोशिश भी थी।
जॉन ब्रैंका और बॉडी-गार्ड बिल के ज़रिए फिल्म यह दिखाने की कोशिश करती है कि माइकल धीरे-धीरे अपने परिवार, ख़ासकर अपने पिता के कंट्रोल सिस्टम से बाहर निकलना चाहते थे। और इसके लिए उन्होंने सबसे पहले जॉन ब्रैंका के माध्यम से अपने पिता को मैनेजर के पद से हटा दिया। इस फ़ैसले को केवल एक पेशेवर फ़ैसला मान लेना ग़लत होगा। दरअसल यह फ़ैसला दशकों पुराने वर्चस्व, हिंसा और शोषण से बाहर आने की कोशिश थी। और शायद फिल्म का सबसे मज़बूत भावनात्मक मोड़ भी यही है जब एक बेटा अपने पिता से नफ़रत तो नहीं करता, लेकिन उनके नियंत्रण से आज़ाद होकर अपने आगे का जीवन जीना चाहता है।
वेम्बली स्टेडियम के परफ़ॉर्मेंस पर समाप्त होती कहानी और उसके मतलब
हालांकि एक दर्शक के रूप में मुझे लगा कि यह फ़िल्म उसी क्षण ख़त्म हो जाती है जब माइकल विक्ट्री टूर के स्टेज से इस टूर के ख़त्म होने का एलान करते हैं। यह ऐलान इसलिए भी चौंकाने वाला है क्योंकि उनके पिता और जैक्सन 5 के दूसरे सदस्यों को इसकी थोड़ी भी भनक नहीं थी। दरअसल, जीवन भर अपने पिता की आँखों में आँखें डालकर न देख पाने वाले माइकल अपने इस ऐलान के ज़रिए पूरी दुनिया के सामने अपने पिता के फ़ैसले को नकारते हैं।
लेकिन फ़िल्म के निर्माताओं को शायद यह दृश्य अंतिम दृश्य के रूप में सही नहीं लगा। इसलिए उन्होंने इसके लिए साल 1988 में वेम्बली स्टेडियम में दिये गए माइकल जैक्सन के परफ़ॉर्मेंस वाले दृश्य को चुना। और उनके इसी फ़ैसले से हमें फिल्म के पूरे दृष्टिकोण को समझने का सूत्र मिल जाता है।
दरअसल, वेम्बली स्टेडियम में अपनी परफ़ॉर्मेंस दे रहा माइकल केवल एक ग्लोबल स्तर का सफल सिंगर नहीं है। यही वह मोड़ है जहां सारे मिथक बदल चुके हैं। अब वह केवल जैक्सन परिवार का हिस्सा नहीं है बल्कि पूरी दुनिया की सांस्कृतिक स्मृति में स्थायी रूप से दर्ज हो चुका नाम है।
लेकिन फ़िल्म के इस अंत का एक दूसरा मतलब भी है जो शायद अधिक महत्त्वपूर्ण है। फिल्म को यहां ख़त्म कर दिया जाता है क्योंकि इसके बाद की कहानी कहीं ज़्यादा स्याह, जटिल और असहज कर देने वाली है। माइकल जैक्सन के जीवन का बढ़ता अकेलापन, अनगिनत सर्जरी से शरीर का बदल रहा रूप-स्वरूप, मीडिया की क्रूर निगाहें, आरोप, कोर्ट-केस, दवाइयों पर निर्भरता और अपने ही बोझ तले उन गढ़े गए मिथकों का ढहना, ये सब उस परफ़ॉर्मेंस के बाद के जीवन का दूसरा पहलू है।
इसलिए इस फ़िल्म के लिए वेम्बली स्टेडियम वाले परफ़ॉर्मेंस को चुनना केवल एक दृश्यात्मक फ़ैसला नहीं लगता है और न ही हो सकता है। बल्कि यह माइकल जैक्सन की विरासत और उनकी चमकदार छवि को बचाए रखने की कोशिश जैसा लगता है। यह फ़िल्म माइकल को उसी समय में स्थिर कर देना चाहती है जहाँ वे अब भी “King of Pop” हैं, एक त्रासदी नहीं।
और अपनी तमाम ख़ूबियों के बावजूद इसी बिंदु पर आकर यह फ़िल्म हम जैसों के लिए एक कमज़ोर और आम बायोपिक फ़िल्म की कैटेगरी में आ जाती है। एंटोनी फुक्वा (Antoine Fuqua) के निर्देशन में बनी यह फ़िल्म दृश्यात्मक और भावनात्मक स्तरों पर कई जगह प्रभावशाली लगती है। लेकिन संभवतः माइकल जैक्सन एस्टेट की भागीदारी के कारण इसकी सीमाएं भी साफ़ दिखाई देती हैं और यह एक carefully preserved legacy बनकर रह जाती है।
एक मिथक, एक बच्चा और एक अधूरी कहानी
इस फ़िल्म को देखते हुए बार-बार यही महसूस हुआ कि माइकल जैक्सन जैसे larger-than-life व्यक्तित्व को दो-ढाई घंटे की फिल्म में उनके जीवन और व्यक्तित्व की पूरी जटिलता के साथ दिखा पाना शायद संभव ही नहीं। कुछ लोगों का जीवन इतना बड़ा, विविध, जटिल और अनोखा होता है कि कला के किसी भी माध्यम में उन्हें fragments में ही पकड़ा और पेश किया जा सकता है। माइकल जैक्सन भी वैसा ही नाम है।
यह फ़िल्म हमें माइकल के भीतर के अकेले और प्यार की तलाश करते बच्चे की झलक तो देती है, लेकिन उस अंधेरे कमरे का दरवाज़ा पूरी तरह नहीं खोलती जहां वह बच्चा आगे जाकर खो गया था। शायद यही वजह है कि फ़िल्म ख़त्म होने के बाद भी माइकल जैक्सन हमारे भीतर एक निष्कर्ष नहीं, बल्कि एक सवाल की तरह बने रहते हैं।

