
आज पढ़िए नेपाली भाषा के कवि देवेन्द्र खेरेस की कविताएँ। उन्होंने अपना पहला कविता–संग्रह ‘रूङ्रीको बयान र नदी किनारा’ सन् २००८ में हांगकांग में प्रकाशित किया था। सन् २०१७ में उनका दूसरा नेपाली कविता–संग्रह ‘कोलम्बस यात्रा’ इंग्लैंड में प्रकाशित हुआ है। इस संग्रह में उन्होंने काव्यात्मक अभिव्यक्तियों के माध्यम से विविध विषयों को प्रस्तुत किया है, जो उनकी बहुमुखी प्रतिभा और कल्पनाशील सृजन–क्षमता को उजागर करता है। नेपाल के खोटाङ जिल्ला में जन्मे खेरेस वर्तमान में इंग्लैंड में रह रहे हैं।
अनुवादक – चन्द्र गुरुङ नेपाली कवि तथा अनुवादक है। चन्द्र गुरुङ का पहला नेपाली कविता संग्रह “उसको मुटुभित्र देशको नक्सा नै थिएन” सन् २००७ में प्रकाशित हुआ था। उनके द्वारा रचित नेपाली कविताओं का अंग्रेजी अनुवाद दूसरी कवितासंग्रह My Father’s Face के रुप में सन् २०२० में दिल्ली से प्रकाशित हुआ है। चन्द्र गुरुङ का दूसरा नेपाली कवितासंग्रह “जब एउटा मान्छे हराउँछ” सन् २०२२ में प्रकाशित हुआ है। चन्द्र गुरुङ कविता के अलावा अनुवाद में भी सक्रिय हैं। उन्होंने विदेशी विदेशी कवियों की कविताओं का नेपाली भाषा में अनुवाद किया है । नेपाली कविता के क्षेत्र में योगदान के लिये उन्हें “अस्वीकृत विचार साहित्य सम्मान” सन् २०१६ में और स–सिद्धी राष्ट्रीय कलाश्री युवा पुरस्कार (सन् 2025) से सम्मानित किया गया था। अनूदित कविताएँ पढ़िए- मॉडरेटर
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पोपी का फूल
पिछले साल युद्ध में–
एक सार्जेंट शहीद हो गया
मुझे यह खबर सुनकर गहरा सदमा लगा
और मुट्ठी भर फूलों से
मैंने उसे श्रद्धांजलि अर्पित की।
इस बार–
एक राइफलमैन
भी युद्ध से नहीं लौटा
मेरा दुखी हृदय
बस इतना ही कर सका
कि उसकी आत्मा को फूल अर्पित करूँ।
अगले साल–
पता नहीं कौन सा लेफ्टिनेंट, कप्तान
या सेना अधिकारी
युद्ध में शहीद होगा?
या गुम हो जाएगा?
या घायल हो जाएगा?
अब–
मुझे और ज्यादा फूलों की जरूरत महसूस हो रही है
मुट्ठी भर फूल
मुट्ठी भर जीवन।
यह कभी न खत्म होने वाला युद्ध
यह अजेय युद्ध
बहुत पहले
लड़ा जाता था
अन्याय और अत्याचार के विरुद्ध
अधिकार और स्वतंत्रता के लिए
अपने अस्तित्व और जिम्मेदारी के लिए।
वीर योद्धाओं की स्मृति में
जिन्होंने युद्ध में अपने प्राणों की आहुति दी
हर वर्ष–
फ्लैंडर्स के मैदानों में
पोपी के फूल खिला करते थे
और उन फूलों के गुलदस्ते से
वीर शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित की जाती थी
और शांति का आह्वान किया जाता था।
लेकिन अब फ्लैंडर्स के मैदानों में
काफी समय से
पोपी के फूल खिलना बंद हो गए हैं
लेकिन युद्ध अभी समाप्त नहीं हुआ है
लोगों ने मरना और मारना बंद नहीं किया है
कागज के फूलों से
हम अब भी मना रहे हैं
११ नवंबर
और भेज रहे हैं
हजारों वीर पुत्रों को
युद्ध में
या हम उन्हें मृत्युशय्या पर धकेल रहे हैं
क्या युद्ध केवल गोलियों से जीता जा सकता है?
या केवल झूठ बोलकर समाप्त किया जा सकता?
2 शब्द–शब्द में धड़कन
शुरू में उन्होंने मेरे हाथों से कलम छीन ली
मैंने अपनी ही उँगलियों को कलम बनाकर लिखा
फिर उन्होंने मेरी कॉपी चुरा ली
मैंने दीवारों और भित्तियों पर लिखा
अंत में उन्होंने मेरी स्याही और उँगलियाँ ही गायब कर दीं
मैंने जीवन के पन्ने खुरच–खुरचकर रक्त में डुबोते हुए लिखा
जब उन्हें विश्वास हो गया कि मेरे पास अब कुछ नहीं बचा
तब मैंने अपने अस्तित्व के शब्दों को चमका–चमकाकर लिखा।
3. प्रश्न
किसे नहीं होता अपने देश से प्रेम?
किसे नहीं होता अपनी भाषा और संस्कृति से प्रेम?
किसे नहीं होता जीवन और संसार से प्रेम?
मत पूछो
मुझसे मत पूछो
कुछ मत पूछो
कुछ भी मत पूछो
घर को खोजता फिरने वाले से देश मत पूछो
आँगन को याद करता फिरने वाले से भाषा और संस्कृति मत पूछो
वर्तमान को ढोता फिरने वाले से जीवन और संसार मत पूछो
जिसका घर नहीं होता
-उसके लिए देश होने और न होने में क्या फर्क है?
जिसका आँगन नहीं होता
-उसके लिए भाषा और संस्कृति होने और न होने में क्या फर्क है?
जिसका वर्तमान नहीं होता
-उसके लिए जीवन और संसार होने और न होने में क्या फर्क है?
मत पूछो
बार–बार मत पूछो
कभी भी मत पूछो
मैं नए युग का
पुराना आदमी नहीं हूँ
और महलों में रहकर
झोपडि़यों में सपने बाँटने वाला
बेईमान भी नहीं हूँ
किसने किया दूर अपने ही देश से?
किसने बनाया गूँगा अपनी ही भाषा और संस्कृति से?
किसने उजाड़ा अपने ही जीवन और संसार से?
हाँ,
उसी से पूछो
कटघरे में खड़ा करके पूछो
जिसने देश की पीठ पर चढ़कर
भाषा और संस्कृति को कुचला
और, जीवन तथा संसार की यह दशा कर दी।

