
आज पढ़िए कवि-लेखक अर्पण कुमार की कहानी ‘डाइनिंग टेबल’। इस कहानी को अप्रैल माह में अखिल भारतीय डॉ. कुमुद टिक्कू कहानी प्रतियोगिता’ में श्रेष्ठ श्रेणी का पुरस्कार मिला था। यह पुरस्कृत कहानी आपके पढ़ने के लिए- मॉडरेटर
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रात के साढ़े ग्यारह बज रहे हैं। बिखरी-बिखरी अणिमा डायनिंग टेबल का बिखराव समेट रही है। सोनू के मोबाइल पर किसी का फ़ोन आता है। रिंग-टोन पूरा बजता है मगर सोनू कॉल नहीं लेता। मोबाइल की घंटी दुबारा घनघनाती है। किसी का अर्जेंट कॉल हो और सोनू शायद नींद के आगोश में, अणिमा बेडरूम की ओर बढ़ती है। मोबाइल के स्क्रीन-आकाश पर प्रभा की संज्ञा-ज्योति चमक रही है। कोई इतनी गहरी नींद सो सकता है, खर्राटे भरते सोनू पर निगाह मारती अणिमा कॉल लेती है। प्रभा को उम्मीद नहीं रही होगी कि इस समय उसे अणिमा से बात करनी पड़ेगी। न घबराने का वह अभिनय करती है, “प्रणाम भाभी, कैसी हैं?”
“इतनी रात को फ़ोन कर रही हैं, सब ठीक है, प्रभा?”
“हाँ, भाभी।”
“इनसे कुछ काम था?”
“हाँ”, प्रभा की सकुचाहट बनी रहती है।
“उठा दूँ?”
“नहीं, सोने दीजिए। कल बात कर लूँगी। बी.ए. का ऑरिजिनल सर्टिफ़िकेट कॉलेज से निकलवाना था। सोनू भैया को और मुझे भी। उन्हें कहिएगा, अपने साथ मेरा भी सर्टिफ़िकेट निकाल लेंगे।”
प्रभा मज़ाक करती है, “आपको नींद आ जाती है, भाभी! भइया ऐसे भर-भर के खर्राटे लेते हैं।”
अणिमा इस मज़ाक का कोई जवाब नहीं देती।
अणिमा मोबाइल रखने को होती है कि उसके भीतर कुछ कौंधता है। वह व्हाट्स-अप चैट देखने लगती है। प्रभा से सोनू की हुई चैटिंग ऊपर ही है। लगभग पंद्रह मिनट तक वह उन संदेशों को पढ़ती है। साँस रोके। इस समय अगर साढ़े सात रिक्टर स्केल का भूकंप आ जाए, उसे कुछ पता न चले। वह संवादों की जिस गहमागहमी में डूबी है, ऐसे कई भूकंपों से अधिक का कंपन लाने की क्षमता उनके शब्दों में है।
प्रभा अपने बेटे की पढ़ाई और दूसरे खर्चों के लिए पैसे माँग रही है। साथ ही अपने लिए पॉकेट-मनी भी।
सुबह-सुबह ऑफ़िस जा रहे सोनू को अणिमा खाना परोसती है। उसे सोनू के अंतिम कौर लेने की प्रतीक्षा है। वॉश-बेसिन पर हाथ धोकर सोनू लौटता है। अणिमा ने प्रभा के साथ हुई सोनू की बातचीत स्क्रीन पर लाकर मोबाइल, डायनिंग टेबल पर रख दिया है। सोनू अवाक्। उसका चेहरा सफ़ेद हो उठता है। घबराहट, क्षीप्रता की पोशाक ओढ़ती है। सोनू ऑफ़िस के लिए भागता है। उस दिन उसकी जेब में रूमाल था और न उसके पाँवों में मोजे। ये सामान उसे अणिमा ही दिया करती है।
ऑफ़िस में उलझा-उलझा रहा सोनू। प्रभा को लेकर वह पुनः बेपर्दा हुआ है। ज़रूरी मीटिंग्स समाप्त करके वह ऑफ़िस से अणिमा को फ़ोन करता है, “मैं प्रभा को ढेला भी नहीं देता।”
अणिमा चुप है।
“उससे मिलता भी नहीं।”
अणिमा सिर्फ़ एक वाक्य कहकर फ़ोन काट देती है, “क्या मैं आपसे कोई सफ़ाई माँग रही हूँ!”
अणिमा जानती है- सोनू झूठ कह रहा है।
उस दिन सोनू हर घंटे अणिमा को फ़ोन करता रहा। वह हर घंटे फ़ोन काटती रही।
रात साढ़े नौ बजे सोनू घर लौटता है। अणिमा का लिखा नोट डायनिंग टेबल पर पड़ा हुआ है। नोट पर बड़े बेटे की ज्योमेट्री-बॉक्स रखी है। उसे हटाए बग़ैर ‘ख़त का मज़मूँ’ पढ़ा जा सकता है : –
मिलना बर्दाश्त करूँगी, बात करना भी। लेकिन अपने बच्चों का हक़ किसी और के घर नहीं जाने दूँगी।
सोनू ने बड़े शौक़ से महँगी और अल्ट्रा-मॉडर्न सीलिंग-लाइट लगवाई है, जिसकी रोशनी डायनिंग टेबल के ठीक बीचोबीच गिर रही है। आर्टिफ़िशियल रूफ़ से आता यह दूधिया प्रकाश उसे बेहद पसंद है। मगर आज उसे अपनी इस पसंद पर ग़ुस्सा आ रहा है। सफ़ेद रोशनी में सफ़ेद काग़ज़ पर लिखे ये ऊपर के दो काले वाक्य उसे चिढ़ा रहे हैं, जैसे किसी ने उसके मुँह पर कालिख पोत दी हो।
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डायनिंग टेबल पर छोटा-सा आईना किताबों के ऊपर रखा है। अणिमा उसमें अपना चेहरा देख रही है। उसके व्यक्तित्व के कोण-कोण से खिलखिलाहट के कई झरने बहते थे, समय के साथ वे सूखते चले गए। जैसे उसके ननिहाल में दालान के ठीक आगे चहल-पहल से कभी हरदम भरा-भरा रहनेवाला कुआँ आज पानी के बग़ैर राख, धूल और पॉलीथिन का आश्रय-घर हो चुका है। अणिमा हो या कुआँ, दयनीयता, उदासी उनके पोर-पोर पसर चुकी है। अणिमा के चेहरे पर सोनू की मुट्ठियों के कई प्रहार हैं। कटे के ऐसे गहरे निशान, जो समय के साथ आज कुछ अदृश्य हो चले हैं, मगर चेहरे पर उनकी उपस्थिति का भान कर अणिमा कल की तरह आज भी पसीने से सराबोर हो उठती है। घबराहट में उसके पाँव काँपने लगते हैं। घिग्घी बँध जाती है।
आज की स्थिति के ठीक विपरीत अणिमा का अतीत चटख और ख़ुशगवार रंगों में रँगा था। उन दिनों वह कितने सुहाने सपने देखती थी! हर सपने में बड़ा और भव्य महल होता, जिसकी पटरानी अणिमा होती। वह अपने पति अमितेश को भरपूर प्यार दे रही है। वह अपनी ससुराल में उसके साथ हँस-खेल रही है। अमितेश उसका क्लासमेट है, जिसे वह अशेष प्यार करती है। उसे अपने प्यार पर पूरा भरोसा है। वह अपने प्रेमिक को अपना पति मान चुकी है। नौवीं कक्षा से उसका नाम लेना छोड़ दिया है। अमितेश कितना भाग्यशाली है!
मगर…
अणिमा की शादी अमितेश से नहीं, सोनू से हुई। समाज के लिए यह घिसी-पिटी बात होगी, लेकिन अणिमा के लिए यह जीने-मरने की बात साबित हुई। कोई और होती, आगे बढ़ जाती, परिस्थितियों में रम जाती या उनसे समझौता कर लेती। अणिमा के साथ इनमें से कुछ नहीं हुआ। कष्ट और उलझन के कभी समाप्त न होनेवाले दलदल में उसके पाँव धँसते चले गए।
प्यार और विवाह पूरक नहीं।
प्यार और बच्चे पूरक नहीं।
सोनू से अणिमा को तीन बच्चे हुए।
बच्चे जनते, पालते हुए वह अमितेश को भूली हो, ऐसा नहीं। बच्चों को बीमारियों से बचाते, उनका इलाज कराते, उन्हें पढ़ाते-लिखाते वह अपना दुःख स्थगित ज़रूर करती रही।
………………………
अणिमा के यूट्रस में ट्यूमर बढ़ने लगा है। डॉक्टर यूट्रस हटाने के लिए बार-बार कह रहा है, मगर वह ध्यान नहीं दे रही। क्या उसकी जिजीविषा समाप्त हो चुकी है! उन दिनों उसके गुप्तांग से रक्तस्राव बढ़ चला था। उस रात भी अणिमा के शरीर से काफ़ी लहू निकल रहा था। रात पिशाचनी बन उसका रक्त पीना चाह रही हो, अणिमा हिम्मत कर बाथरूम की ओर बढ़ रही थी कि तब तक बिस्तर और कमरे का फ़र्श ख़ून से पट चुका था। बाथरूम का फ़र्श भी लोहित था।
देर रात स्थिति कुछ सँभलती है। अशक्त अणिमा अमितेश को याद कर रही है। बिस्तर पर लेटी हुई वह अपनी दोनों बहनों से कह रही है, “मैं बचूँ कि न बचूँ! किसी विधि अमितेश को कहलवा देना कि उसके लिए मेरा प्यार कभी कम न हो पाया। मेरा मन उसमें ऐसा डूबा कि कहीं और लगा ही नहीं!”
उस रात अणिमा ने अपनी अधूरी, अभागी प्रेम-कहानी के कुछ अनछुए क़िस्से अपनी बहनों के साथ बाँटे।
दो शयनकक्षों का साझा दरवाज़ा ख़ुला था, जिससे होती आवाज़ बग़ल के कमरे में लेटे सोनू के कानों तक पहुँच रही थी।
अमितेश- यह नाम सोनू पहले सुन चुका है, मगर बीमारी की इस दशा में जिस विह्वलता के साथ अणिमा पराए मर्द को याद कर रही है, सोनू की ‘मेल-ईगो’ चोटिल होती है। उसकी पूरी रात कसमसाती बीतती है। दो-तीन बार अणिमा के कमरे में वह आया, गया। दोनों बहनें अणिमा को घेरे बैठी हैं। अणिमा थकी आँखों से देखती है – सोनू की आँखें ग़ुस्से में लाल हैं। मगर उसे यह अंदाज़ नहीं कि सोनू ने उसकी बातें सुन ली हैं। किसी शातिर शिकारी-सा सोनू अपने आक्रमण के लिए मौक़ा ढूँढ़ रहा है। शिकार उसे कभी तो अकेला मिले!
सोनू का पेट सालियों के परोसे खाने से नहीं भरता। अगली सुबह स्वयं को किसी तरह सँभालती अणिमा सोनू को खाना परोस रही थी। थाली रखने के लिए वह निहुरी (झुकी) थी कि शिकारी आक्रामक हो उठा। उसकी आँखों में लाल डोरे अब भी तिर रहे हैं। जिसे भोजन परोसा जा रहा है, वह पति नहीं आक्रांता है। अणिमा में उसे अन्नपूर्णा नहीं बेबस, अकेला शिकार दिख रहा है। सोनू ने उसके बाएँ गाल पर इतना तेज़ मुक्का मारा कि उसकी उँगलियों में पहनी पत्थर की अँगुठियों ने अपने समवेत निशान वहाँ छोड़ दिए। उसका गाल बुरी तरह फट गया। अणिमा चीखी और बेहोश हो गई। किचन से दौड़ती बेबी और स्वाति बाहर आईं। बड़ी बहन के गाल से बहते रक्त को दोनों बहनें रोकने की कोशिश करने लगीं। अणिमा की माँ सविता देवी छाती पीट रही हैं। आक्रोश और अफ़रा-तफ़री में बेबी और स्वाति ने जितने हुए, उतने मुक्के सोनू के शरीर पर इधर-उधर चलाए। राक्षस बलवान है। कोमलांगियों के हल्के-फुल्के प्रहार उसे फूल के स्पर्श जैसे लग रहे हैं।
सोनू बके जा रहा है, “हम तो समझते थे कि यह हिजड़नी है। मगर इसका मन तो अमितेसवा में रमा है। पहले भी अनुमान था, मगर कल तो राजदुलारी की पूरी रामकहानी इसके मुख से सुन ली। इसको जीने का अब अधिकार नहीं।”
स्वाति अपना ग़ुस्सा नियंत्रित नहीं कर पाती है। रिश्ते का लिहाज़ करना उसके लिए संभव नहीं रहा, “किसी कमज़ोर को तुम जान से मार दोगे! जितना अत्याचार कर रहे हो न, तुमको पक्का कोढ़ फ़ूटेगा।”
बग़ल में पड़ोसन डॉली रहती है। चीख-पुकार सुन वह चली आई। महिलाओं के बढ़ते जत्थे से सोनू असहज हुआ और घबराया। ड्यूटी न जाकर अपने गाँव भागा। उसे यह अंदेशा हुआ कि अणिमा की कहीं जान न चली जाए! फ़िलहाल यह शहर छोड़ना उसे मुफ़ीद लगा।
पास ही रह रहे अपने छोटे मामा राजेश को फ़ोन कर बेबी ने तुरंत आने को कहा। आनन-फानन में अणिमा को हॉस्पिटल में भर्ती किया गया। आई.वी. ड्रिप (Intravenous Drip) से दवाइयाँ चढ़ाई गईं। चेहरे पर बैंडेज लगाया गया।
उस रात अणिमा के यहाँ किसी ने खाना नहीं खाया। बच्चों को डॉली खाना खिला गई। अगले दिन काफ़ी देर से अणिमा होश में आई।
राजकुमार बाबू अपनी बड़ी नतिनी अणिमा की इस स्थिति पर बहुत अफ़सोस कर रहे हैं। शादी के अगुआ को पूरे वेग से गरियाते जा रहे हैं। सोनू फ़ोन उठा नहीं रहा। उन्होंने उसके मँझले भाई रजनीश को फ़ोन कर अपना विरोध जताया। रजनीश के पास कहने के लिए कुछ नहीं है। सोनू का बचाव किए बग़ैर वह कहने लगा, “जी, क्या कहा जाए, वह बचपन से ही ज़िद्दी और बदमाश है। हमलोगों की भी कहाँ सुनता है!”
राजेश अपनी बड़ी बहन सविता देवी का हाथ पकड़ रो रहा है, “दीदी, हमर भगनी के मुँह न देखल जात हे!”
सविता देवी कुछ भूली नहीं हैं। ग़ुस्से में काँपती हैं, “तोहनिए सब के करल हऊ। सब मिलके हमर बेटी के नरक में झोंक देलीं।”
अणिमा दो दिनों बाद अस्पताल से घर आती है।
शिकारी दूर बैठा घटनाएँ भाँपता रहता है। दो सप्ताह बाद शिकारी भी घर लौटता है।
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लगभग ढाई दशकों तक अमितेश और अणिमा के बीच कोई संपर्क नहीं रहा। इंटर के बाद आगे की पढ़ाई के लिए अमितेश दिल्ली गया। इधर अणिमा की शादी हुई। सब-कुछ बेहद ज़ल्दी में। अमितेश को यह ख़बर परदेस में मिली। इतनी कम उम्र में अणिमा का विवाह – वह कुछ समझ नहीं पाया। वह जब कभी अणिमा के बारे में सोचता, यही समझता कि वह अपनी गृहस्थी में ख़ुश होगी।
विवाहित अणिमा के जीवन में बहुत सारी घटनाएँ घट रही थीं, जिनसे अमितेश अनभिज्ञ था।
पच्चीस वर्षों बाद अमितेश पच्चीस वर्ष तक की कई-कई बातें अब अणिमा के माध्यम से जान रहा है। उसके साथ होते अत्याचारों के डिटेल्स उसे दुःखी करते हैं। वह टूटता है। उसे अपना वज़ूद किसी शक्तिहीन का-सा महसूस होता है।
अमितेश अणिमा से हर बात पूछता चलता है। दुःखी होकर भी। अणिमा हर बात उसे बताती चलती है। इससे उसका दर्द कुछ कम होता है क्या! वह एक साँस में दर्द का मूल रख देती है-
आपके अलावा किसी के साए को भी अपने पास आता देख मैं बुरी तरह काँप उठती हूँ। किसी नागिन की तरह फुफकारती हूँ, मगर उस्ताद और हठीला सँपेरा जब मुझे अपने कब्ज़े में कर लेता है, मैं मृतप्राय हो जाती हूँ। सोनू ऐसा ही सँपेरा है। इस हालत में मुझे दाँत लग जाते हैं। मगर, वह निवृत्त होकर ही मानता है।
प्रेम में किसी मंज़िल तक न पहुँची अणिमा की नसों में रक्त बहता है, मगर रक्त के प्रवाह से चेहरे पर जो चमक आनी चाहिए, वह सिरे से ग़ायब है। जीवन में गुलाबों की जितनी रंगत है, उससे कई गुना अधिक उनके काँटों की चुभन। अणिमा अपने जीवन पर खिझती है।
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अपमान के गहराते अंधकार में उतरती, अत्याचार सहती, अकेलेपन की ओर बढ़ती जाती अणिमा के चारों ओर जाले ही जाले हैं, जिनकी गिरफ़्त में वह ठीक से साँस नहीं ले पाती है। ऐसे में फ़ोन पर अमितेश की संगति से अणिमा की उखड़ती साँस कुछ सँभलती है। अमितेश उसके साथ मिलकर स्कूल-दिनों के पन्ने पलटता रहता है। वह उसकी मदद करती है। बीता हुआ हर क़िस्सा विस्तार से सुनाती है। दोनों उन पलों में असीमित सुख भोगते हैं। पीछे की छोटी-बड़ी हर बात अमितेश से साझा करना, अणिमा के लिए कोई पवित्र धर्म-ग्रंथ पढ़ना हो। वह उसे काफ़ी पीछे ले जा रही है…
अणिमा इंटर कर चुकी है। अमितेश के लिए अपने ननिहालवालों के आगे रो-धोकर भी जब उसे कुछ नहीं मिला, अनाज को कीड़ों से बचानेवाली गोली सल्फास खाकर वह अपना जीवन ख़त्म करना चाहती है। परिवार की तत्परता और स्थानीय डॉक्टर के अनुभव उसे बचा ले जाते हैं। अणिमा की जाती साँस लौट आती है। वह अपने कमरे में महीनों गुमसुम पड़ी रहती है। बिना किसी बात के इतना बड़ा कदम कोई उठा सकता है, घरवालों को विश्वास नहीं हुआ। विश्वास अणिमा को भी नहीं हुआ कि वह बच गई। वह अबतक अमितेश को छू तक नहीं पाई है, मगर उसके भीतर उसका प्यार यूँ बस चला है कि कोई और उसे अब जीवन भर छू नहीं सकता।
औरों के लिए प्यार का यह मामला एकदम साधारण और मौसमी है, मगर अमितेश के प्रति अपने इस अथाह प्यार में अणिमा पूर्वजन्म के किसी रिश्ते की अतृप्त छटपटाहट देखती है।
बड़े से घर में अणिमा के नज़रिए पर तवज्जोह नहीं दी जाती है। समझा-बुझाकर, डेढ़ साल के भीतर उसकी शादी सोनू से कर दी जाती है।
सोनू से अणिमा की जब शादी होने लगी, उसकी मामियों, उम्र में बड़ी उसकी कुँवारी मौसियों ने अपने-अपने ढंग से उसे समझाया। निचोड़ यह कि शादी होने के बाद हर लड़की अपना पिछला प्यार भूल जाती है। अणिमा उनकी बातों में आई, मगर उसके भीतर कोई केमिकल लोचा गहराता जा रहा था, जिसे वह काफ़ी बाद में समझी। शादी के बाद ससुराल या मायके में अणिमा जहाँ रही, सोनू जब उसके निकट आने की कोशिश करता, वह घबरा और मूर्छित हो जाती। अणिमा के ससुरालवाले बमुश्किल यह समझ पाए कि नई बहू को मिरगी का दौरा नहीं पड़ता है। अणिमा तीन रात ससुराल में रही। उसके बाद ददिहाल आ गई, जहाँ वह डेढ़ महीने तक रही। इतने दिनों तक सोनू ने अणिमा के साथ कोई ज़बरदस्ती नहीं की। दोनों अबतक एक नहीं हुए थे।
रक्षा बंधन का त्यौहार आया। अपनी माँ की भेजी राखियों के साथ अणिमा ननिहाल गई। कई वर्षों से वह माँ की ओर से मामाओं की कलाइयों पर राखियाँ बाँधती आ रही है।
शादी के बाद ननिहाल में यह उसकी पहली सावन-पूर्णिमा है। पुराना और चिर-परिचित यह परिवेश उसे अच्छा लगता है। यहीं रहकर उसने अपना स्कूली-जीवन पूरा किया है। यहाँ के कोने-कोने में उसके भीतर गहराते प्रेम के अनंत पल सुवासित हैं। मगर अब वह कोई और अणिमा है। बदली-बदली। वेश-भूषा में; आचार, व्यवहार में। अपनी माँग में भखरा सिंदूर लगाए, बड़े से घर में वह इधर-उधर मँडराती फिरती है। मगर यह नव-विवाहिता रोमांच और उत्साह से कोसों दूर है। सुख-दुःख पचाती स्त्रियों और सुख-दुःख से काफ़ी हद तक अभी बेमतलब, बलखाती लड़कियों की भीड़ में वह अपनी वेदना किससे कहे! उसने हरेक की आँखों में आँखें डालकर पूछना चाहा-
मैं तो कुछ भूल नहीं पाई बड़ी नानी!
मुझे अमितेश के अलावा कोई और छूता है, मैं बेहोश क्यों हो जाती हूँ कंझली नानी!
तुम तो मुझसे पाँच साल बड़ी और अब तक कुँवारी हो, नाना जी को मेरी ही शादी करने की ऐसी क्या हड़बड़ी थी, कंचन मौसी!
क्या मैं अतृप्त ही मर जाऊँगी माँ!
उस बड़े इज़्ज़तदार घर में उसके सवालों के जवाब किसी के पास नहीं हैं। कानाफूसी महतो परिवार में बढ़ चली है।
कैसे भी ख़बर लगी हो, सोनू अणिमा के ननिहाल आ चुका है। नए पाहुन ने मज़ाक-मज़ाक में अपने पक्ष में घर की स्त्रियों की सहानुभूति बटोरी ली है।
पागल है, नादान है अणिमा, आप कुछ ज़ोर-आज़माइश करें मेहमान!
उस रात दुलारे दामाद ने अणिमा के ननिहाल में उसके पाँवों को उसकी ही साड़ी से बाँधकर वह सब कुछ किया, जो बलात्कार से अलग कुछ नहीं होता।
अणिमा सोनू का अत्याचार भूल नहीं पाती है।
सोनू बदसूरत नहीं, मगर दुनिया का सुंदरतम व्यक्तित्व भी होता, अणिमा को इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। अमितेश के अलावा उसपर अब किसी और का रंग नहीं चढ़नेवाला।
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सोनू की करतूतें एक-एक करके अणिमा के सामने आने लगीं। क़स्बे से लगा सोनू का गाँव है। वहीं की एक लड़की से उसका अफ़ेयर था। वह उसकी दूर की चचेरी बहन प्रभा थी। आनन-फानन में उसकी शादी कहीं और कराई गई। वह ससुराल गई। कुछ माह के गर्भ के साथ। वह बच्चा उसके पति का नहीं सोनू का था। सोनू के कहने पर ही प्रभा ने उसका नाम आकाश रखा।
यह बात सोनू की अणिमा से हुई शादी से पहले की है।
आकाश जैसे-जैसे बड़ा होता गया, उसका चेहरा सोनू के क़रीब आता चला गया। जेठों, देवरों और ननदों से भरा-पूरा ससुराल है अणिमा का। सुनीता उसकी हमउम्र जैधी (गोतनी की बेटी) है। एक दिन उस बच्चे को लेकर वह अणिमा के पास आई, “चाची, देखिए न, यह आकाश है। चाचू से हू-ब-हू मिलता है न!”
उस बच्चे को देखती हुई अणिमा प्रभा को भी देखती जा रही है। वह आँगन में कई स्त्रियों से घिरी चहक रही है। वह इन दिनों मायके आई है।
तब भी काफ़ी समय तक अणिमा की सोनू से बातचीत बंद रही। चुप रहना अणिमा का सत्याग्रह है। सत्याग्रह एकाध वर्ष चला। सोनू की पहल से चीज़ें कुछ ठीक हुईं। अणिमा अपनी गृहस्थी की दिनचर्या में लौट आई। वह सोनू से बात करती, मगर अत्यंत संक्षिप्त। बेहद आवश्यक काम भर।
मगर उस दिन व्हाट्स-अप चैट में प्रभा, सोनू से अच्छे-ख़ासे पैसे माँग रही थी। उसपर पहले भी सोनू कई तरह के ख़र्च करता रहा है। दुबली-पतली प्रभा के बाहर की ओर निकले बड़े-बड़े दाँत उसे याद आए। अगर वह मन से सोनू के क़रीब होती, प्रभा के दाँत खींच निकालती। मगर, सोनू उसके लिए दुनिया के दूसरे मर्दों की ही तरह है।
इतनी उम्र तक आते-आते अणिमा ने रक्त-संबंधियों में कई दैहिक संबंध पनपते देखे हैं। सोनू और प्रभा का यह संबंध उसे चौंका नहीं पाता।
प्रभा और सोनू का संपर्क आज भी बना हुआ है।
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सोनू और प्रभा के सामने आए इस व्हाट्स-अप प्रसंग को बीते पाँच-छह महीने हुए होंगे। इधर लगातार कई रात सोनू जब देर से घर आने लगा, अणिमा को खटका हुआ। वह बुधवार की रात थी। बच्चे सोए थे। ड्राइंग रूम की दीवार-घड़ी रात के पौने ग्यारह बजा रही थी। अणिमा को चिंता हुई। वह अपने फ़्लैट से बाहर निकली। देखी कि नीचे सीढ़ी के पास सोनू फ़ोन पर किसी से बात कर रहा है। वह काफ़ी देर तक बातचीत सुनती रही। पूरा मामला वह समझ चुकी थी।
‘सहजे-सहजे’ (धीरे-धीरे, चुपचाप) वह ऊपर आ गई। कुछ देर में सोनू ने जब फ़्लैट के अंदर प्रवेश किया, अणिमा ने डिनर की थाली चुपचाप उसकी ओर बढ़ा दी। सोनू कुछ-कुछ कहता रहा। अणिमा बिना हाँ-ना कहे कुछ दूरी से उसकी बातें सुनती रही। तटस्थ होकर। खाना समाप्त कर सोनू सोने चला गया। अंदर बेडरूम से अणिमा को पुकारता रहा। वह किचन समेट रही थी। कुछ देर में सोनू की टेर बंद हुई और उसके खर्राटे की आवाज़ हॉल तक आने लगी। अणिमा इस पल की प्रतीक्षा कर रही थी। स्कूटर की चाबी सोनू की जेब से निकाल वह नीचे गई। डिक्की में सोनू का बेसिक मोबाइल रखा था। अणिमा ने उसे ऑन किया। अंतिम बार उसकी जिससे बात हुई, वह जूली थी। अणिमा उससे मिल चुकी है। वह सोनू के ऑफ़िस में काम करती है। वह एक बार पहले भी सोनू और जूली को संग-संग देख चुकी है। दोनों किस तरह प्रफुल्लित जोड़ी की भाँति मज़े-मज़े में खा-पी रही थे, अणिमा वह दृश्य कभी नहीं भूलती। सोनू का दिलफेंक स्वभाव इस जवान विधवा को अपनी गिरफ़्त में ले चुका है- अणिमा तब यह समझ गई थी। उस शाम ‘चौधरी एग कॉर्नर’ पर जूली छमकती जा रही थी। सोनू उबला हुआ अंडा उसे अपने हाथों से खिलाना चाह रहा था।
उस रात भी सोनू जब घर आया, अणिमा ने आँखों देख पूरा हाल उसे सुनाया। इसी डायनिंग टेबल की एक छोर पर खड़े होकर। कुछ देर तक ना-नुकूर करते हुए सोनू ने सारा सच वोमेट कर दिया। तैश में आकर वह अणिमा को भला-बुरा कहने लगा, “क्या करूँ, तुमको पकड़कर बैठा रहूँ! तुम्हारी आरती उतारूँ! तुमसे कभी कुछ मिलता है!”
सोनू ने उस रात भी अपना ब्रहास्त्र चलाया, “तुम जब अपने मन में किसी और को बसाए रखोगी, तो यही सब होगा। तुम मेरे पास आया करो। फिर मैं बिल्कुल नहीं भटकूँगा। किसी की ओर दबी निगाह से भी नहीं देखूँगा। तुम बस तैयार रहो, फिर देखो, मैं यह सब कैसे छोड़ता हूँ!”
संवाद के इस सिरे पर आकर अणिमा निरुत्तर हो जाती है। यह ऐसा मोड़ है, जिसके आगे दूर-दूर तक निराशा और अनिश्चय है। जिसके आगे वह सोनू के भटकाव को माफ़ कर देना चाहती है।
वह इस जीवन में अमितेश को शायद ही भूल पाए। ईश्वर से सवाल करती है- आपने मेरा मन ऐसा क्यों बनाया! उनके अलावा अगर कोई भी मुझे हाथ लगाता है, मेरा ख़ून खौल उठता है। सपना ही क्यों न हो!
सोनू इतने सालों में अणिमा की यह मज़बूरी जान चुका है। वह कभी भी उसपर यह टोंट (ताने) कस देता है। अब बच्चे बड़े हो आए हैं। उनके आगे भी।
दूसरे कमरे में सोने जाने से पहले अणिमा डायनिंग टेबल पर वह बेसिक मोबाइल रख देती है।
बच्चे स्कूल जा चुके थे। सोनू ने उठते ही डायनिंग टेबल पर अपना वह बेसिक मोबाइल रखा देखा। अणिमा की जासूसी के आगे वह बेपर्दा है। अणिमा उसे जो संदेश देना चाहती है, वह उस तक पहुँच चुका है। उसकी चोरी हर बार क्यों पकड़ी जाती है! उससे कुछ कहा नहीं जा रहा। अणिमा की मँझली बहन बेबी अपने जीजा के अफ़ेयर्स जानती है। अपनी बहन की ओर से ग़ुस्से में कहने लगी, “दो मोबाइल काहे रखते हैं, जीजाजी।”
सोनू ने कोई भूमिका नहीं कसी। सीधे अपनी बात रखी, “इसका मन क्यों नहीं करता है! जब मेरा जी करे, इसे कहिए कि यह सहयोग करे। आप गवाह बनिए। फिर मैं किसी के पास जाऊँ, मुझे जो सज़ा दीजिए, मंज़ूर है।”
बेबी चुप रही।
“एक और बात बोलूँ! मैं तो चाहता हूँ कि मुझे यह रोके-टोके। इसके शक के लिए मैंने कभी इसके साथ मार-पीट की हो तो पूछिए। बस इसे कहिए कि अमितेश को भूले और मुझे अपनाए।”
बेबी अपनी बहन का हाल-ए-दिल समझती है। धीरे से कहती है, “ऐसी शर्त ग़लत है।”
सोनू साली को छेड़ने लगता है, “आप ही आ जाया कीजिए। बड़ी नहीं तो छोटी बहन सही। आपसे भी विवाह कर लेंगे।”
बेबी आक्रामक हो उठती है, उसका ख़ून खौल जाता है, “तोरे जइसन से बियाह करवई। तू हमरा साथ ऐसे मार-पीट करतड हल, तो तोरा के मार चप्पल हम मुँह पोंछ देतियो हल। हम एकरा नियन बर्दाश्त करे वाला न हिओ! हम गलतो रहतीओ हल और तू हमरा ऐसे मारतड हल, त तोर सिर के एक-एक बलवा नोच लेतिओ हल।” (“आपके जैसे से ही ब्याह करूँगी! अगर आप इस तरह मेरे साथ मारपीट करते, मैं मार चप्पल आपका मुँह पोंछ डालती! मैं इसकी तरह बर्दाश्त करने वाली नहीं हूँ। मैं ग़लत भी रहती और आप मेरे साथ मारपीट करते, मैं आपके सिर का एक-एक बाल नोच लेती!”)
सोनू हक्का-बक्का अपनी साली का यह दुर्गा रूप देख रहा है। बिना कुछ कहे ऑफ़िस के लिए निकल पड़ता है।
बेबी बड़ी बहन की भूमिका में आ जाती है, “दीदी, इस तरह मार खाती हो, अच्छा लगता है! इससे ठीक तो यही है न कि पाँच मिनट के लिए सब कुछ भूलकर उन्हें पास आने दो।”
“मेरा मन नहीं करता है, बेबी। कितनी बार कह चुकी!”
“मन नहीं भी रहता है, देह बिछा दो। उनकी इच्छा पूरी हो जाएगी।”
“जान भी मार देंगे न, तब भी मेरा मन नहीं करेगा। सुन ली!”
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विरोध दर्ज़ करने का हरेक का अपना तरीक़ा है। जितने लोग, उतने ढंग। कष्ट सहनेवाले कमज़ोर लोग भी अपने ढंग से अपना प्रतिरोध व्यक्त करते हैं। ताक़तवर और हिंसक उनकी ऐसी किसी पहल और साहस से कई बार सकपका भी जाते हैं। उस सकपकाहट में वे और ज़्यादा हिंसक हो उठते हैं।
“अमितेश में ऐसा क्या है, जो मुझमें नहीं!” महीने के आख़िरी शुक्रवार की शाम होते-होते सोनू अपने ग़ुस्से पर नियंत्रण नहीं रख सका। आज उसका वीक-ऑफ़ है।
अणिमा कुछ नहीं बोली। वह जानती है कि अगर उसने कुछ जवाब दिया तो सोनू को और अश्लील हो जाने का मौक़ा मिलेगा। अणिमा चुप रही मगर सोनू नहीं रुका। उसकी भाषा अश्लीलता की सारी हदें पार करती गई, “देखी थी क्या? उसका सामान कैसा है! हमसे अच्छा है?”
अणिमा क्या करे! वह कुछ क्षणों के लिए अपना सिर नीचा कर लेती है। फिर किसी हिरणी की तरह इधर-उधर देखती है। कोई सुन ले तो क्या सोचे! सोनू उसे घाव देना बंद नहीं करता, घाव पर नमक भी छिड़कता है, “तुम हमसे काहे बियाह कर ली! मड़वा पर से ही भाग जाती!”
अणिमा शादी के उन बदली-भरे, उदास-उदास दिनों में चली जाती है। आषाढ़ माह में पंद्रह दिनों तक उसकी चचेरी मौसी चंद्रप्रभा उसके ददिहाल में रही। घर की दोनों तरफ़ कुएँ थे। कहीं किसी कुएँ में वह कूद न जाए, इसका वह ध्यान रखती थी। वह अणिमा को छत पर कभी अकेले भी नहीं जाने देती।
उसी चंद्रप्रभा ने सोनू का गर्म लोढ़ी से परिछन (गाल-सेंकाई की रस्म) किया।
“दुःख मिले, लेकर जी लेना, मगर नैहर की लाज रख लेना बेटी। बाप-दादा की पगड़ी न गिरने देन।”
रोती, सुबकती विधवा दादी ने अँकवार भरते अणिमा से कहा।
अणिमा का रोना बंद नहीं हो रहा। मायके से विदा होकर जिस ससुराल में वह जा रही है, वह उसके मन की नहीं, उसके सपने की नहीं।
पीतल की थाली में जीरा, मेवा, हल्दी, दूब, फूल और पैसे से चंद्रप्रभा अणिमा का खोइंचा (गोद) भरती है।
अणिमा की आँखों के आगे उसके नाना का चेहरा दृश्यमान हो उठता है। शादी की रीतियों के लिए जब वह तैयार नहीं हो रही थी, उसके नाना अंदर आए। उन्होंने अपनी पगड़ी अणिमा के पैरों में रखा, “बेटी, परिवार की लाज रख लो। बारात दरवाज़े पर है।”
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सोनू का इधर-उधर मुँह मारना बंद नहीं होता। डायनिंग टेबल पर सोनू की किसी न किसी प्रिय वस्तु को रखकर अणिमा अपना विरोध सालों से दर्ज़ करती आ रही है। यह उसकी कोई घरेलू कूटनीति है या वह अपने सर्वाइवल के लिए प्रयास कर रही है! वही जाने।
अधूरे प्यार की कसक किसी की गृहस्थी तबाह कर सकती है। उसकी ख़ुशी जीवन भर के लिए समाप्त कर सकती है।
घर का डायनिंग टेबल अणिमा के सारे क़िस्से जानता है। वह अपने हित के लिए कभी नहीं सोचती, मगर जब उसके बच्चों के हितों पर सोनू के किसी अफ़ेयर के कारण आँच आने लगती है, वह पूरी शक्ति से सोनू का सामना करती है। उसके सारे फ़रेब उसके सामने लाकर खोल देती है।
डायनिंग टेबल जानता है- अणिमा समर्पित पत्नी बेशक न हो, समर्पित माँ अवश्य है। बच्चों के लिए कहीं, किसी से भिड़ जाती माँ।
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