आज प्रसिद्ध लेखक-संपादक श्रीपत राय की जयंती है। इस अवसर पर उनके ऊपर एक विस्तृत लेख पढ़िए। लिखा है कवि-कथाकार अर्पण कुमार ने- मॉडरेटर
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‘किसी ने क़ैद किया मुझे मेरे ही भीतर / जहाँ से छूटने में कामयाब रहा मैं / खोजती है मेरी अंतर्रात्मा ख़ुद को / पहाड़ी चोटियों और घाटियों में / यक़ीन है मुझे / मिलने से रही मेरी आत्मा मुझे कभी‘
फ़र्नांदो पेसोआ अपनी कविता ‘हूँ मैं अपने ही भीतर’ में ये पंक्तियाँ लिखते हैं। अनुवादक प्रमोद कौंसवाल हैं। फ़र्नांदो, पुर्तगाल के एक ऐसे लेखक-अनुवादक रहे, जिन्होंने 70 से अधिक दूसरे नामों (Heteronym) से रचनाएँ कीं। वे उन्हें छद्म नाम (Pseudonym) कहने से बचते थे।
श्रीपत राय (16 जुलाई 1916 – 09 जुलाई 1994) पर चर्चा करते हुए अकलंक मेहता की कुछ कहानियों पर बात करते चलते हैं। संभवतः यह बेहतर शुरुआत हो। मगर ये अकलंक मेहता कौन हैं! जाननेवाले जानते हैं और जो नहीं जानते हैं, वे यह जान लें कि श्रीपत राय ने कुछ कहानियाँ अकलंक मेहता के नाम से लिखीं। उनकी कहानियों में समाज अवलोकन के कई अनुभवपगे दृश्य सामने आते हैं। वे अपने पाठकों और कथा-पात्रों की पृष्ठभूमियों में उभरते विभेद का वह गूमड़ भी दिखलाते हैं, जो शिक्षा और विकास के समान अवसर न मिलने से बड़ा और बदसूरत होता चला गया। ऐसा करते हुए वे सुविधाभोगी और कुछ हद तक मतलबपरस्त उन बुद्धिजीवियों की ख़बर लेना नहीं भूलते, जो अन्यथा समाज की बेहतरी के कई संकल्पों से लबरेज़ दिखाई पड़ते हैं, अपने वक्तव्यों और आलेखों में बड़े-बड़े संकल्प करते मिलते हैं, मगर समाज में पसरी विद्रूपता की टेढ़ी-मेढ़ी, प्रकट-ओझल आकृतियों और उनके धब्बों से अक्सरहाँ अनजान रहते हैं। कहानियों की डोर पकड़े श्रीपत जी कई बार समाज के इन धड़ों के बीच आवाजाही करते हैं। उनके ज़्यादातर पाठक, मध्यवर्गीय-शिक्षित परिवारों से आते हैं और वे अपनी कहानियों में उन्हें जब-तब चिकोटी काटने का काम करते हैं। उनकी कहानियों में निम्न-मध्यवर्गीय और हाशिए के जीवन के उदासी, कशमकश से भरे कई प्रसंग पूरी प्रामाणिकता के साथ सामने आते हैं।
श्रीपत राय अपनी कथा-भाषा के लिए नए, अपारंपरिक कुछ शब्द भी गढ़ते चलते हैं। मसलन, ‘थामना’ शब्द का इस्तेमाल क्रिया के रूप में होता है, मगर इससे संज्ञा बनाकर वे ‘थाम’ (‘झगड़ा, सुलह और फिर झगड़ा’ कहानी में) का प्रयोग करते हैं। ऐसे कुछ और शब्दों को प्रचलन में लाने की कोशिश उनके यहाँ दिखती है। वे अपनी कहानियों में बेमेल, बहु-विवाह के अभ्यस्त ग़रीब मज़दूरों या अत्यल्पता में जीवन जी रहे नौकरीपेशों की समस्याएँ उठाते हैं। मगर उनके प्रति सहानुभूति की किसी आरोपित लहर की जगह वे उनके साथ सच्चे प्यार और समानता के व्यवहार के पैरोकार हैं। पात्रों को उनके आलस्य के लिए लताड़ने का हक़ भी उन्हें उनकी इसी स्नेह-तत्पर आत्मा से मिलता है। किसी के लिए ऐसा करना समाज से गहरे और अनपेक्षित जुड़ाव से ही संभव है। शब्दों से खिलंदड़े अंदाज़ में निपटते हुए श्रीपत जी हमें कई बार चौंकाते हैं। स्वयं को हीन समझते हुए प्रेम की तड़प के साथ जीते उनके पात्र, जीवन और उसके बाद भी हमसे जैसे संवादरत रहना चाहते हों। कड़वे या प्रदूषित यथार्थ के कई असहज दृश्य भी वे अपनी कहानियों में लाते हैं। कई जगहों पर चुभती/तल्ख़ या आक्रामक दिखती भाषा का प्रयोग है। जब मनुष्य पशुवत् रहने को विवश हो, तब उसकी परिस्थिति का चित्रण ऐसी ही खरी भाषा में संभव है, जहाँ निःसंकोच होकर वह गरिमाहीनता उकेरी जा सके, जो किसी संवेदनशील व्यक्ति को डिस्टर्ब कर सकती है। उनका उद्देश्य किसी का अनादर करना नहीं, बल्कि असुविधाजनक और पशुओं से बुरी हालत में गुजर-बसर करती मनुष्यता के उस वातावरण को निष्पक्ष, निरपेक्ष ढंग से शब्दों में ढालना है, जो है तो शहरी और सभ्य सभ्यताओं के पार्श्व में ही, मगर किसी रोशनी से महरूम वह अपनी ही अँधेरी, खुरदुरी गलियों में क़ैद रहने को अभिशप्त है। श्रीपत राय, बतौर कथाकार किसी सहानुभूति से काम नहीं लेते, तलछट को ढँपा नहीं छोड़ते, बल्कि उसे सभी के समक्ष ले आने का काम करते हैं।
श्रीपत राय की कहानियों में हिंदुस्तानियत का ठाट है। उनके यहाँ हिंदी और उर्दू, मैना और गोरैया की तरह एक-दूसरे के आसपास फुदकती नज़र आती हैं। ‘जांगरचोर’, ‘मूंडीकाटी’ जैसे शब्द उनके पात्र आपस में एक दूसरे के प्रति ग़ुस्सा और उसी वक़्त स्नेह दिखाते हुए बोलते हैं। ‘नीमजान’, ‘फ़ोहश’ जैसे शब्द उनकी कहानियों में अक्सरहाँ प्रयुक्त होते हैं। निरंकुश और बेपरवाह गृहस्थी में उपेक्षित रहती किशोरियों की उस स्थिति से निकलने की चाहत जैसे कोरी कल्पना साबित होती है। कम उम्र में वे किसी और के खूँटे से बाँध दी जाती हैं, जहाँ ससुराल में एक दूसरा मकड़जाल उनका स्वागत करने को उद्यत है। वे और उलझती चली जाती हैं। कुपोषण, बीमारी और तंगहाली के बीच बच्चे पैदा करती, उन्हें पालती-पोसती हुई अनथक संघर्षों से दो-चार होती हैं- स्त्री के ऐसे कई दुहरे-तिहरे संघर्ष श्रीपत राय की कहानियों में बख़ूबी आते है। ऐसे में कोई संक्षिप्त, मधुर-प्रेमिल याद किसी सूखते कुएँ के तल में मिलते पानी के चहबच्चे-सी होती है, जिसके सहारे जीवन का तपता रेगिस्तान पार कर लेने की कोई जुगत भी दिखाई पड़ती है। उनकी ऐसी कहानियाँ पाठकों पर गहरा प्रभाव छोड़ती हैं,जहाँ अन्यथा अलक्षित रह जानेवाली नामालूम-सी कोई तरलता, पाठकीय स्मृति का स्थायी नागरिक बन जाती है।
‘झगड़ा, सुलह और फिर झगड़ा’ शीर्षक अपनी कहानी में श्रीपत जी शहर के बीच बसी मेहतरों की बस्ती की कथा एक दंपती के माध्यम से कहते हैं। उस बस्ती को लेकर शहराती मध्यवर्ग की मनोवैज्ञानिक धारणाएँ बेपर्दा होती हैं। नजिया और कल्लू की गृहस्थी के उठते-गिरते प्रसंगों के बीच कथा आगे बढ़ती है, जहाँ सभ्य माने जाते लोगों का पोलापन सामने आता है। उनकी कहानी ‘घृणा’ के पात्र संवरी, भोला और मंगरू जैसे चरित्र हैं, जिनके लिए लेखक पहले आगाह कर देता है कि उनके प्रति अगर कोई घृणा पनपती है तो उसमें लेखक का कोई दोष नही होगा। कथा कहने का यह अपना अंदाज़ हुआ। घनघोर गरीबी, असुरक्षित और कुपोषण से भरी प्रसूति-स्थितियों, बहु-विवाह के बीच अग्रसर होते बचपन को लेखक बड़े तटस्थ भाव से रखता चलता है। श्रीपत राय के कथा-संसार में ऐसे कितने पुरुष हैं, जो अपनी बेटी की उम्र की लड़की के साथ विवाह करते हैं। अत्यल्प साधनों में जिजीविषा की संजीवनी का कमाल भी उनके यहाँ द्रष्टव्य है। उनकी कहानियों में व्यंग्य का टोन है। वहाँ व्यक्ति के आलस्य पर चुटकी ली गई है। वे मानते थे, ‘समसामयिक संवेदना में विराग, कुंठा, निस्संगता सब जीवित तत्व हैं। इन मानसिक स्थितियों को केवल वे नकार सकते हैं, जिनको जीवन संबंधी समस्याओं में कोई रस नहीं है।’
उनकी यह राय स्वयं उनके कहानीकार पर लागू है। उनके लिए जीवन-राग का कोई रंग अस्पृश्य नहीं था। अभाव की परिस्थितियों में दानवाकार दिखते जीवन की आपाधापी में मूलभूत आवश्यकताओं और चंद स्नेहिल फुहारों के लिए तरसते मानव-जीवन की बेचारगी और कोशिश- उनकी कहानियों का सिग्नेचर ट्यून बनती है। शहरी मध्यवर्ग की सीमाओं, लालसाओं को पहचानते श्रीपत राय अपनी कहानियों में समाज के निम्न तबकों से जुड़े लोगों की कथा सुनाते हैं। हाशिए के जीवन की कथा कहते हुए वे कई प्रयोग करते हैं और अपने पाठकों को उन समस्याओं से जोड़ने के लिए प्रयत्नशील दिखते हैं। ‘नरक’ कहानी की मुख्य किरदार पद्मिनी के माध्यम से वे जो कुछ कहलवाते हैं, वह किसी लंबी आह से कम नहीं, ‘…अगर यह दुनिया न सुधरी तो अगली तो सुधार लूँ। अब समझती हूँ कि सुधारना हो तो आदमी वही दुनिया सुधार ले, अगली को सुधारना महज़ खामख़ियाली है।’
अपनी इस कहानी का सार भी वे पद्मिनी के माध्यम से रखते चलते हैं,
‘उसके बाद मैं यहाँ लाई गई और अब यहीं रहूँगी। क़िस्से को बहुत मुख़्तसर में रख देती हूँ : ग़रीब और उससे भी ज़्यादा लावारिस बचपनः जवानी, एक मधुर चुंबन और विवाह, दो बच्चे, तपेदिक, मौत। मौत के वक्त उम्र 21 वर्ष।’
‘वासंती’ कहानी में वे जिस तरह वासंती का स्केच खींचते हैं, उनकी क़लम का कौशल वहाँ मुखर है। त्रिलोचन शास्त्री का यह मानना कितना समीचीन है,‘श्रीपत की कहानी की शैली आधुनिक थी। भावुकतापूर्ण अंश उनकी कहानियों में नहीं मिलते।’
बल्लभ डोभाल के लिखे संस्मरण के मुताबिक श्रीपत राय ने कुल पाँच कहानियाँ लिखीं। बल्लभ जी ने कभी श्रीपत जी से आगे कहानी न लिखने का कारण जानना चाहा था। उन्होंने बल्लभ जी को एक रात की घटना सुनाई थी- ‘उन दिनों मैं बनारस में था। इलाहाबाद, बनारस तब साहित्यकारों का गढ़ हुआ करता था। साहित्यकार सभी अपने परिचित थे। बनारस आते तो हफ़्ते-महीनों वहीं पड़े रहते। उन्हीं दिनों एक बार जैनेन्द्र जी वहाँ आ पहुंचे। दिनभर बातें हुई। रात को खाना खाकर मैं तो सो गया, लेकिन जैनेन्द्र रात भर बैठे रहे। सुबह जाकर मालूम हुआ कि वे कहानी लिखते रहे। बहुत अच्छी कहानी लिखी थी। मैंने सोचा, जब यह आदमी एक रात में इतनी अच्छी कहानी लिख लेता है तो इसी को लिखने दो। वैसा लिखना मेरे बस का था भी नहीं। जैनेन्द्र ने मेरा हौसला पस्त कर दिया और मैंने कहानी लिखना ही छोड़ दिया।‘
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‘कितनी दूर जाना होता है पिता से / पिता जैसा होने के लिए!’
- ‘चीनी चाय पीते हुए’ कविता में अज्ञेय
गोरखपुर में गाँधीजी के भाषण से प्रभावित होकर जब प्रेमचंद (31 जुलाई 1880 – 08 अक्तूबर 1936) अपनी जमी-जमाई नौकरी छोड़ते हैं, तब उसके बाद वे अपने प्रिय लेखन-कर्म के अतिरिक्त कुछ अन्य काम भी करते हैं। उनमें ‘हंस’ पत्रिका का संपादन और सरस्वती प्रेस का संचालन प्रमुख है। कुछ समय बंबई रहकर लौटते हैं। ज़्यादातर कामों में उनकी रचनात्मकता और संलिप्तता दिखती है, मगर आर्थिक स्तर पर वे उनके संघर्षभरे दिन रहे। बनारस में प्रेमचंद ने 56 वर्ष की उम्र में जब अंतिम साँस ली, श्रीपत राय तब 20 और अमृत राय (बन्नू-1921,कानपुर-1996,इलाहाबाद) 15 वर्ष के थे। साहित्यिक समझ की सघनता और भौतिक साधनों की अत्यल्पता दोनों उनके ज्येष्ठ पुत्र श्रीपत राय को विरासत में मिली। कथा-सम्राट जिस ‘हंस’ को छोड़ स्वयं अनंत की ओर प्रस्थान कर चुके, उसके प्रकाशन-संपादन का काम श्रीपत राय ने आगे बढ़ाया। प्रेमचंद की लिखी किताबों के जो अधिकार दूसरे प्रकाशकों के पास थे, अभी-अभी स्नातक हुए श्रीपत ने उनसे वे सभी अधिकार वापस ख़रीदे। ज़मीनी स्तर पर जाकर पुस्तकों की बिक्री शुरू की और प्रेस के कामों की ज़रूरी बारीकियाँ समझीं। पुस्तकें देश से बाहर भी पहुँचाई गईं। श्रीपत राय ने क्रमशः आर्थिक समृद्धि हासिल की।
श्रीपत जी ज़ोर से और देर तक हँसते थे। उस समय उनके चेहरे पर निर्दोषता का सूरजमुखी खिल उठता और उनकी आँखों में कोई चमकदार झील उतर आती। वह हँसी भी उन्हें अपने पिता से विरासत में मिली। यह बात उन्हें अपने छोटे भाई अमृत राय से क़रीब लाती थी। अपनी संस्मरण पुस्तक ‘Raw Umber’ में लेखक, अनुवादक सारा राय लिखती हैं, ‘मेरे चाचा अमृत राय दिल्ली आते तो हमारे घर रुकते। दोनों भाइयों की केवल एक चीज़ मिलती थी- उनकी हँसी। चाचा नीचे वाली मंज़िल पर ठहरते और मेरे पिता का ठिकाना ऊपर था। कभी संयोग से दोनों एक ही समय पर हँसते तो लगता कि पूरी इमारत उनके ठहाकों से हिल उठी है!’
देवेन्द्र सत्यार्थी की मानें तो श्रीपत राय की हँसी हिमालय को छूने वाली हँसी थी। मगर उन ठहाकों के अपने कुछ क्षेपक थे। डॉ. हरदयाल उन्हें याद करते हुए बताते हैं, ‘उनके ठहाकों के पीछे कहीं पीड़ा भी थी, उनके उत्साह के पीछे कहीं हताशा भी थी और उनकी मस्ती के पीछे कहीं मृत्यु भय भी था, इसे उनके अंतरंग में झांकने वाला कोई भी व्यक्ति पहचान सकता था।’
18 अक्तूबर 1948 को श्रीपत राय की शादी कथाकार और शास्त्रीय गायिका ज़हरा राय से हुई, जो शिया मुस्लिम पृष्ठभूमि से थीं। श्रीपत राय के चित्रकार को उन्होंने अपने तईं कुछ उकसाया होगा। अपने पिता का वह दौर सारा राय इन शब्दों में रूपायित करती हैं,‘1956 से उन्होंने चित्र बनाना शुरू कर दिया था। उन दिनों मेरी माँ मिट्टी के गुलदान रंगा करती थीं। उन पर चटकीले रंगों के फूल या महीन लताएँ, गुल बूटे बनातीं। मेरे पिता ने चित्रकला की तरफ़ अपने रुझान को शायद वहीं से पहचाना हो? कभी वे हम बच्चों को आर्ट में मिला स्कूल का होमवर्क ख़ुद करने बैठ जाते! अन्य कामों से फ़ुर्सत पाकर और इतवार को वह दीवार के सहारे कैनवस टिकाकर, अलसी, तारपीन और तेल रंगों के गुबार में खो जाते। एक के बाद एक चित्र बनाते जाने का जुनून उनपर हावी हो जाता। सैकड़ों तस्वीरें उन्होंने लगभग बीस साल के अन्तराल में बनायीं, जो कि चीड़ की लकड़ी से बने स्टैंड पर या दीवार के सहारे टिकी घर के कमरों में रखी रहतीं। उन्हीं दिनों से उनकी मुलाक़ात और दोस्ती रामकुमार, हुसैन, रज़ा, तैयब मेहता, रिचर्ड बार्थोलोम्यू इत्यादि से हुई। 1963 में टोक्यो के बिएनाले में उनकी तस्वीरें गईं। दिल्ली के अशोक होटल में प्रदर्शिनी हुई। हो सकता है कि चित्रकला जगत से जुड़ने के लिए ही उन्होंने पूरी तरह से दिल्ली शिफ़्ट हो जाने का फ़ैसला किया हो। 1964 से उनका दिल्ली आना जाना बढ़ गया था। 1970-72 में जब मेरी बहन का और मेरा कॉलेज में दाख़िला हुआ तो वह दिल्ली में बस चुके थे।’
कई लेखक-कला-समीक्षक, श्रीपत राय की चित्रकला के प्रति प्रतिबद्धता के बारे में लिखते रहे हैं और कुछ ने उनके इस पक्ष पर तंज भी कसा। चित्रों पर लिखे श्रीपत जी के आलेखों की चर्चा होती रही। जब वे चित्र बनाने में डूबे, कथा जगत और उसकी गहमागहमी से कुछ दूर भी हुए। वही कहानी, जो कभी उनकी धड़कन थी। दिल्ली आने पर मक़बूल फ़िदा हुसेन, रामकुमार जैसे चित्रकारों से उनकी मित्रता गहराई। उन्होंने यद्यपि काफ़ी देर से पेंटिग शुरू की मगर इस क्षेत्र में भी उन्होंने अपनी विशेष पहचान बनाई।
इस तरह मुख्यतः बनारस, इलाहाबाद और दिल्ली- उनके कर्मक्षेत्र रहे। दिल्ली में आर-7, हौजख़ास का मकान- जिसे उन्होंने ख़रीदा और बाद में बेचा, कई लेखकों-कलाकारों के संस्मरणों में केंद्रीय स्थान रखता है। वहाँ कई पीढ़ियों के लेखकों-कलाकारों का अड्डा जमा। बाद में वे कुछ समय नवजीवन विहार में रहे और फिर सफ़दरजंग एंक्लेव में। दिल्ली का वासी दिल्ली का किराएदार भी हुआ। बाद में वे इलाहाबाद चले गए, जहाँ उन्होंने अंतिम साँस ली।
दिल्ली में लगी श्रीपत राय की चित्र-प्रदर्शनी से जुड़े अपने भाव लेखक, अनुवादक रघुवीर सहाय अपनी डायरी में बड़े मनोयोग से दर्ज़ करते हैं। डायरी-पुस्तक ‘दिल्ली मेरा परदेस’ में संकलित दिनांक 16/10/1960 की अपनी टीप में वे बड़ी दिलचस्प, मानीख़ेज़ टिप्पणी करते हैं, ‘…लगता है, वह अपने प्रौढ़ मानस के एक आनंदमय पक्ष का थोड़ा परिचय अपने चित्रों में देना चाहते हैं और यहाँ तक वह पूर्ण रूप से सफल हैं। जहाँ तक उनकी निजी अनुभूति का प्रश्न है, ‘दो बहनें‘ और ‘म्यूराबाद का गिरिजाघर‘ जैसे चित्र दिखाते हैं कि उसमें कभी उनके ख़ुद के लिए और महत्त्व आना बाक़ी है। पर अन्यत्र श्रीपतराय एक ऐसे चित्रकार हैं, जिनकी कृतियों के साथ आप एक ही कमरे में रह सकते हैं- निरन्तर परिचय के बावजूद उन चित्रों से सौहार्द बढ़ाते हुए और यह काफ़ी होना चाहिए। उनके चित्रों की आत्मीयता का एक दूसरा पहलू यह है कि उनके अपने घर में लगे हुए वे और अधिक प्रभावशाली हो जाते हैं जैसे चित्रकार की उपस्थिति उनका आनुषंगिक हो। जिन्होंने इलाहाबाद में भी इन चित्रों को देखा है, इससे सहमत होंगे।’
बिंदु अग्रवाल भी श्रीपत जी पर लिखे अपने संस्मरण में उनकी पेंटिग्स की विस्तार से चर्चा करती हैं।
श्रीपत राय ने अपनी संतानों के बीच संघर्ष और पैसे की बचत को हमेशा एक बड़े मूल्य की तरह रखा। बच्चों की फ़ुज़ूल-ख़र्ची को यथासंभव नियंत्रित किया तो ज़रूरतमंद कई लेखकों-कलाकारों और अन्य लोगों की गाहे-ब-गाहे आगे बढ़कर मदद की।

श्रीपत राय, अपने पुत्र अनिल राय और पुत्री सारा राय के साथ
इसी कारण से किसी के यह पूछने पर कि तुम बड़ा होकर क्या बनना चाहती हो, उनकी छोटी बेटी सारा राय ग़रीब होना बतलाती थीं। ऐसा इसलिए कि वे अपने बचपन से ही प्रेमचंद और अपने पिता-चाचा के संघर्षपूर्ण दिनों को जानती-सुनती आई थीं और ‘ग़रीबी’ उन्हें कोई बड़ी शय नज़र आती। अंदाज़ लगाया जा सकता है कि श्रीपत राय अपने बच्चों में वह मूल्य ठीक-ठीक रोपित करने में सफल हो पाए, जहाँ रचनात्मकता के प्रति आग्रह किसी ठस्स आर्थिकी सुरक्षा से बीस ठहरता है।
बहुमुखी प्रतिभा के धनी श्रीपत राय ने एक साथ कई क्षेत्रों में अपने हाथ आजमाए और कुछेक क्षेत्रों में अच्छी ऊँचाई हासिल की। फिर कुछ ऐसा भी होता रहा कि वे वह अनुशासन एकदम छोड़ कुछ और करने लगते। एक समय ऐसा था कि वे जिस सरस्वती प्रेस को चलाते थे, उसके दफ़्तर बनारस, इलाहाबाद, लखनऊ, दिल्ली, पटना समेत कुछ और शहरों में खुलते चले गए। किसी काम को ऐसे मक़ाम पर लाकर छोड़ना जैसे श्रीपत राय का कोई विशेष स्वभाव हो। सारा राय उन्हें ‘ख़ानाबदोश सर्जनात्मक आवेग’ (nomadic creative impulses) वाले इंसान के रूप में देखती हैं। श्रीपत जी ही क्यों, दुनिया के कई लेखकों-कलाकारों पर यह बात लागू होती है। शायर ख़ुमार बाराबंकवी का यह शे’र याद आता है :
मेरे राहबर मुझको गुमराह कर दे
सुना है कि मंज़िल क़रीब आ गई है
दो विश्वयुद्धों (प्रथम, 1914-18 और द्वितीय, 1939-45) का कइयों की तरह श्रीपत राय जी के जीवन से संबंध ठहरता है। प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान वर्ष 1916 में वे गोरखपुर में पैदा हुए। प्रेमचंद के गुज़रने के बाद ‘कहानी’ पत्रिका की शुरुआत वे वर्ष 1937 में करते हैं और द्वितीय विश्वयुद्ध के पहले ही वर्ष यानी 1939 में कागज़ का दाम काफ़ी बढ़ जाने से उन्हें ‘मन मारकर’ उसे बंद करना पड़ता है। मगर असमय बुझी वह लौ उनके भीतर बराबर जलती रही। परिणाम यह हुआ कि वर्ष 1953 में वे पुनः ‘कहानी’ पत्रिका आरंभ करते हैं, जिसे 1979 तक चलाते हैं।
‘कहानी की बात’ पुस्तक की भूमिका (‘आत्मनिवेदन’) में वे लिखते हैं, ‘1979 में ‘कहानी‘ के संपादन का बड़ा बोझ मेरी सीमित शक्ति से परे हो गया और मैंने यही उचित समझा कि उसे बंद कर दूँ क्योंकि उसका स्तर और महत्त्व मैं कम नहीं कर सकता था। वह निर्णय मुझे आज भी उचित प्रतीत होता है।’
‘कहानी’ में लिखे जानेवाले उनके संपादकीय के मुरीद बहुतेरे थे। देवेंद्र सत्यार्थी बतलाते हैं, ‘कहानी पत्रिका में उनका संपादकीय (‘कहानी की बात’) मुझे अच्छा लगता था। सचमुच उनकी ‘कहानी की बात’ ऐसी होती थी जैसे बड़े गुलाम अली खाँ की ठुमरी हो। वे स्वयं भी उससे भिन्न नहीं थे। उनके व्यक्त्वि में लयात्मकता थी।’
‘The Bloomsbury Handbook of POSTCOLONIAL PRINT CULTURES’ ( संपादक : तोरल जतिन गजारवाला, नीलम श्रीवास्तव, राजेश्वरी सुंदर राजन और जैक वेब) के खंड 1 के अध्याय 4 में संकलित आलेख ‘A magazine for everyone : The ecology of postcolonial Indian magazines’ में साहित्य इतिहासकार फ्रंचेस्का ओरसीनी, समाज में पत्रिकाओं की उपस्थिति के बारे में लिखती हैं। इसमें ‘कहानी’ पत्रिका (1953 से पुनः आरंभ) के प्रारंभिक कुछ वर्षों में जिस तरह ग़ैर-मामूली ढंग से अनुवाद-कार्य प्रकाशित हुए, वे उन्हें रेखांकित करती हैं। फ्रंचेस्का की नज़र में ‘कहानी’ पत्रिका के पृष्ठ उस समय के सभी महत्त्वपूर्ण कहानीकारों के कैटलॉग़ जैसे हैं। अपने आलेख में उन्होंने वर्ष 1954-1957 के दौरान ‘कहानी’ पत्रिका में प्रकाशित उन भारतीय कथाकारों की सारणी प्रस्तुत करती हैं, जिनकी कहानियों के हिंदी अनुवाद ‘कहानी’ पत्रिका में छपे। इसके मुताबिक इन चार वर्षों में उर्दू से 33, पंजाबी से 26, बाँग्ला से 25, मराठी से 18, गुजराती से 11, कश्मीरी से 05, मलयालम से 05, तमिल से 03, तेलुगु से 03, कन्नड से 02 और अँग्रेज़ी से 02 और सिंधी से 01 कहानी हिंदी में अनूदित हो ‘कहानी’ में प्रकाशित हुईं।
‘हंस’ का प्रकाशन सन् 1930 में बनारस से आरंभ हुआ। तब से लेकर 1936 तक प्रेमचंद उसके संपादक रहे। उनके निधन के बाद ‘हंस’ के संपादकों में जैनेंद्र, शिवरानी देवी, शिवदान सिंह चौहान, श्रीपत राय, अमृत राय आदि रहे। प्रेमचंद के समय से ही ‘हंस’ ने अपनी आधुनिक चेतना की धार बनाई। अपने आलेख ‘MODERNISMS IN THE MAGAZINE : A Case for Recovery in Hindi’ में आकृति मांधवानी ‘हंस’ पत्रिका की वह आधुनिकता-एप्रोच उठाती हैं, जिसके पीछे अपने समय से आगे की सोच काम कर रही थी और ऐसी रचनाएँ जगह पा रही थीं। वे अपने आलेख में विडंबनाओं को उसकी पूरी कटुता के साथ उकेरनेवाले कथाकार और आधुनिक हिंदी एकांकीकार भुवनेश्वर की रचनाओं की विशेष रूप से चर्चा करती हैं। ‘हंस’ के दिसंबर 1933 अंक में प्रेमचंद, भुवनेश्वर की पहली एकांकी ‘श्यामा : एक वैवाहिक विडंबना’ छाप चुके थे। श्रीपत राय के समय ‘हंस’ के अप्रैल 1937 अंक में भुवनेश्वर की चर्चित कहानी ‘भेड़िए’ छपी। भुवनेश्वर की इन रचनाओं से संदर्भ लेती हुई आकृति मांधवानी ‘हंस’ के साहस और सच के साथ खड़े होने की बात उठाती हैं।
प्रेमचंद की मृत्यु के बाद सरस्वती प्रेस, बनारस की ओर से श्रीपत राय ‘हंस’ पत्रिका निकालते रहे। श्रीपत जी के समय उस पत्रिका की टैग-लाइन होती थी-‘अंतर्प्रांतीय साहित्यिक प्रगति का अग्रदूत’। इंटरनेट पर ‘हंस’ के जनवरी 1942 अंक का पीडीएफ़ उपलब्ध है।
श्रीपत राय ने विभिन्न भारतीय भाषाओं के लेखकों को इसके सलाहकार संपादक मंडल में शामिल किया। उर्दू से मौलाना अब्दुलहक, मराठी से वि.स. खांडेकर, गुजराती से रा.वि. पाठक, उड़िया से कालिंदीचरण पाणिग्राही, बाँग्ला से श्रीनन्दगोपाल सेनगुप्त, पंजाबी से प्रो. मोहनसिंह, राजस्थानी से नरोत्तमदास स्वामी, कन्नड़ से बी. अश्वत्थनारायणराव, निट्टूर श्रीनिवासराव उस संपादक मंडल के सदस्यों में रहे। श्रीपत राय पर लिखे अपने संस्मरण में विष्णु प्रभाकर ‘हंस’ की स्तरीयता, एकांकी और संस्मरण जैसी विधाओं के लिए उसके योगदान की बात उठाते हुए कहते हैं, ‘ ‘हंस’ और ‘कहानी’– इन दो पत्रिकाओं ने हिंदी को जाने-माने लेखक ही नहीं दिए बल्कि अनेक विधाओं को भी पुनर्जीवित किया। ‘हंस’ के अनेक विशेषांक प्रेमचंद जी के समय में निकले थे और कालातंर में मील का पत्थर बन गए। उनके बाद श्रीपत के कार्य-काल में कम-से-कम दो विशेषांक तो ऐसे निकले, जिन्होंने हिंदी-साहित्य को नई दिशा दी। जब हिंदी में एकांकी नाटक लिखने की प्रथा नहीं पनप पा रही थी, केवल सर्वश्री राम कुमार वर्मा, भुवनेश्वर, उपेन्द्रनाथ अश्क आदि कुछ ही ऐसे लेखक थे जो इस विधा में लिख रहे थे, लेकिन उसे गंभीरता से लेने वाले बहुत कम लोग थे। ऐसे में ‘हंस’ ने हिंदी एकांकी को लेकर एक विशेषांक निकाला। उसमें इस विधा को लेकर जहाँ कई नए नाटक प्रकाशित हुए वहीं उसकी उपयोगिता को लेकर एक लंबी बहस भी शुरू हो गई। उसके बाद हिंदी संसार में देखते-देखते एकांकी नाटकों का लेखन और प्रकाशन शुरु हो गया। इसी प्रकार हिंदी साहित्य में रेखाचित्र लेखन के लिए कोई विशेष स्थान नहीं था। संस्मरण लेखन को भी लेखक गंभीरता से नहीं लेते थे। इसके विपरीत, गुजराती आदि दूसरी भाषाओं में उत्कृष्ट रेखाचित्र लिखे जा रहे थे। तब अपनी परपंरा के अनुरूप ‘हंस’ ने सन् 1940 में रेखाचित्र विशेषांक प्रकाशित किया और इस विधा ने भी शीघ्र ही अपनी स्वतंत्र सत्ता स्थापित कर ली। उन दिनों गद्य-गीत लिखने की भी प्रथा थी। ‘हंस’ में अनेक सुंदर गद्य-गीत प्रकाशित हुए।’
‘हंस’ के विभिन्न स्तंभों की चर्चा गाहे-ब-गाहे होती रही है। रामकृष्ण अपनी पुस्तक ‘सिने संसार और पत्रकारिता’ में स्पष्टतः मानते हैं, ‘पुस्तक-समीक्षाओं से सम्बन्धित ‘नीरक्षीर’ नामक उसका स्तम्भ मुझे विशेष रूप से आकृष्ट करता था और उसे पढ़कर मैंने कितनी पुस्तकें ख़रीद डाली होंगी, इसका अनुमान करना आज भी मेरे लिए सहज-संभव नहीं। श्रीपतराय के साथ मेरा आत्मीय नैकट्य तो बहुत बाद में हुआ, लेकिन उनकी सम्पादन-कला का मुरीद मैं बचपन से था।’
सरस्वती प्रेस से ही श्रीपत राय ने कुछ समय तक ‘उपन्यास’, ‘साहित्यालोचन’ जैसी पत्रिकाओं का प्रकाशन भी किया। विष्णुचंद्र शर्मा और प्रयाग शुक्ल अपने संस्मरणों में ‘उपन्यास’ के अंकों की चर्चा करते हैं। ‘उपन्यास’ के हरेक अंक में सिर्फ़ एक पूरा, तुलनात्मक रूप से छोटा उपन्यास प्रकाशित करने की उनकी योजना थी। पहले अंक में बलवन्त सिंह का उपन्यास आया, दूसरे में कृष्ण बलदेव वैद का उपन्यास ‘उसका बचपन‘ प्रकाशित हुआ। उस पत्रिका में कुछ विदेशी उपन्यासों के हिंदी अनुवाद भी छपे। पुस्तक रूप में ‘उसका बचपन’ 1957 में प्रकाशित हुआ, सरस्वती प्रेस से। रामकुमार के बनाये आवरण चित्र और श्रीपत जी के लेटरिंग में उपन्यास के नाम के साथ। कवि, कथाकार उदयन वाजपेयी से बात करते हुए वैद वह दौर याद करते हैं,‘ ‘उसका बचपन‘ का पहला प्रारूप 1955-56 में लिखा गया; उसे लेकर मैं 1956 में गर्मियों की छुट्टियों में एक महीने के लिए अकेला रानीखेत चला गया। वहाँ मैं एक होटल, मॉउण्ट व्यू में होटल से अलग एक कॉटेज में रहा।….दूसरा प्रारूप रानीखेत के एक महीने में ही पूरा हो गया। ‘कहानी‘ पत्रिका के संपादक श्रीपत राय भी तब रानीखेत में थे। उनका बँगला मेरे होटल से ज़्यादा दूर नहीं था। ‘कहानी‘ में तब तक मेरी कुछ कहानियाँ प्रकाशित हो चुकी थीं। श्रीपत जी से पहली मुलाक़ात रानीखेत में ही हुई लेकिन ख़तोकिताबत हो चुकी थी। मैंने दिल्ली लौटने से पहले उनको पांडुलिपि पढ़ने को दी। उन्होंने उसे रातोंरात ही पढ़ लिया-उन्हें मालूम था कि मैं दिल्ली लौटने वाला हूँ-और मुझे बताया कि वे उसे सरस्वती प्रेस से प्रकाशित करेंगे अगर उसका अंतिम प्रारूप भी दूसरे प्रारूप जैसा ही हुआ तो। और इसके बाद उनकी हँसी शुरू हो गयी। ज़ाहिर है मैं बहुत ख़ुश हुआ।’
डॉ. हरदयाल अपने संस्मरण में ‘साहित्यालोचन’ से अपने जुड़ाव की बात करते हुए बताते हैं, ‘प्रियदर्शी प्रकाश उसमें सहायक संपादक थे। उनके आग्रह पर उसमें मैंने शिकागो समीक्षकों पर एक लेख लिखा और निर्मल वर्मा के कहानी संग्रह ‘बीच बहस में’ तथा उनके द्वारा अनूदित ‘एमेके : एक गाथा’ की समीक्षा लिखी।’
बाद में राजेंद्र यादव के संपादन में अगस्त 1986 से ‘हंस’ का पुनर्प्रकाशन हुआ। वर्तमान में संजय सहाय इसके संपादक हैं।
श्रीपत राय ने अपने समय में एक प्रकाशन योजना ‘गल्प संसार माला’ की शुरूआत की थी। इसमें पहले विभिन्न भारतीय भाषाओं से और बाद में विदेशी भाषाओं से चयनित कहानियों के अनुवाद छापे जाने थे। यह योजना उनकी सोच के मुताबिक बेशक आगे नहीं बढ़ पाई, मगर इसके अंतर्गत कुछ महत्त्वपूर्ण पुस्तकों का प्रकाशन हुआ। इसमें बाँग्ला और तमिल के साथ-साथ कुछ अन्य भाषाओं से हिंदी में अनूदित कहानियाँ छपीं। इसके तमिल भाग का पीडीएफ़ संस्करण इंटरनेट पर उपलब्ध है। श्रीपत राय पर लिखे अपने संस्मरण में त्रिलोचन शास्त्री इस योजना की चर्चा करते हुए बताते हैं, ‘चीनी और जापानी साहित्य का अँग्रेज़ी से अनुवाद का काम शमशेर को सौंपा गया था। शमशेर जी ने चुनी हुई कहानियों के अनुवाद पूरे भी कर लिए थे, लेकिन उनकी पांडुलिपि कहीं गुम हो गई।…’
‘कहानी’ पत्रिका के संपादक के रूप में श्रीपत राय का कार्य ऐतिहासिक महत्त्व का है। उसमें अज्ञेय, फणीश्वरनाथ रेणु, राम कुमार, भीष्म साहनी, मोहन राकेश, कृष्णा सोबती, निर्मल वर्मा, रमेशचंद्र शाह, ज्योत्स्ना मिलन आदि की कई शुरुआती रचनाएँ छपीं। ‘कहानी’ पत्रिका के संपादन से कई नामचीन लेखक जुड़े रहे, जिनमें भैरव प्रसाद गुप्त आदि शामिल हैं। सरस्वती प्रेस की किताबों ने एक विशेष क़िस्म की सेंसबिलिटी तैयार की। महत्त्वपूर्ण द्विमासिक पत्रिका ‘प्रतीक’ के संपादन मंडल में सियारामशरण गुप्त, नगेंद्र, अज्ञेय के साथ श्रीपत राय भी रहे। यह पत्रिका 14, हैस्टिंग्स रोड (न्याय मार्ग), इलाहाबाद से निकलती थी। वह जगह उन दिनों लेखकों का जमावड़ा होती थी, जिसका किराया श्रीपत राय देते थे। विष्णुचंद्र शर्मा अपने संस्मरण में इसकी चर्चा करते हैं। ‘Raw Umber’ में सारा राय बताती हैं कि कैसे वह जगह राईटर्स कम्यून की तरह काम करती थी। वहाँ एक समय अज्ञेय, डॉ. आशा मुकुल दास, नेमीचंद्र जैन आदि रहा करते थे। कई लेखकों का वहाँ आना-जाना होता था। श्रीपत राय, अज्ञेय के मित्र और प्रकाशक रहे। उनके ‘शेखर : एक जीवनी’ उपन्यास के दोनों खंड सबसे पहले सरस्वती प्रेस से ही आए। कथाकार, कवयित्री और संस्मरणकार ममता कालिया श्रीपत राय के इन दोनों उपक्रमों को अपनी पुस्तक ‘जीते जी इलाहाबाद’ में इस तरह शब्दबद्ध करती हैं,
‘प्रतीक‘ द्वैमासिक पत्र का सम्पादन एक सम्मिलित प्रयास था जिसमें नेमिचन्द्र जैन, भारत भूषण अग्रवाल और अज्ञेय जी की साधना लगी थी। साधन जुटाए प्रेमचन्द के बड़े पुत्र श्रीपत राय ने जिन्होंने अरसे बाद ‘कहानी‘ पत्रिका का सम्पादन व प्रकाशन कर हिंदी कहानी को शीर्ष पर पहुँचा दिया। यही पत्रिका ‘नई कहानी‘ आन्दोलन की रीढ़ बनी। श्रीपत जी ने शुरू तो यह सन् 1937 में की लेकिन दूसरे महायुद्ध के छिड़ने पर कागज़ की क़ीमतों में इतना उछाल आ गया कि इसे बन्द करना पड़ा।’
कइयों की तरह भारत भारद्वाज भी यह स्पष्ट मानते हैं कि ‘वस्तुतः ‘कहानी’ से ही ‘नई कहानी’ की शुरुआत हुई।’ वे याद करते हैं कि ‘डॉ. नामवर सिंह द्वारा हिंदी कहानी की समीक्षा की शुरुआत ‘आज की हिंदी कहानी’ शीर्षक जिस लेख से हुई थी, वह लेख ‘कहानी’ के नववर्षांक 1957 अंक में ही छपा था। इसमें उन्होंने सवाल उठाया था ‘नई कविता की तरह ‘नई कहानी’ नाम की भी कोई चीज़ है क्या?’
‘कहानी’ पत्रिका के कई विशेषांक आए, जो ख़ूब सराहे गए। ‘नई कहानी’ आंदोलन के प्रमुख आधार-स्तंभों में एक कमलेश्वर स्वीकारते हैं, ‘श्रीपत राय ने नए लेखकों, कथाकारों के लिए कहानी का मंच तैयार किया था और नए को आत्मसात् कर नई कहानी आंदोलन को जन्म दिया था। वे स्वयं आंदोलनकारी नहीं थे परंतु निरंतर आंदोलित रहना ही उनकी आदत थी।…श्रीपत जी कहानी के केंद्र पुरुष नहीं थे, पर वे लगभग दशकों तक कहानी के केंद्र में थे। कहानी पत्रिका के माध्यम से उन्होंने कहानी के ऐसे नए प्रतिमान स्थापित कर दिए थे, जिसके आधार पर नई कहानी और उसकी आलोचना पद्धति का आविष्कार हुआ था।’
मोहन राकेश मानते हैं, ‘श्रीपत राय जी का संपादकीय कौशल इतना कमाल का था कि हर बड़े से बड़ा लेखक उसमें छपना चाहता था। खासकर ‘कहानी‘ का संपादकीय मुझे पसंद था।’
बतौर संपादक श्रीपत राय के लिए नए लेखकों को बेहतर ढंग से प्रकाशित और प्रमोट करने की बात कई लोग स्वीकारते हैं। साथ ही, उन्होंने बड़ी संख्या में लेखकों को पत्र लिखे। अलग-अलग लेखकों के संकलनों में वे पत्र पढ़े जा सकते हैं। आज ज़रूरत है कि उनके लिखे और उन्हें मिले पत्रों (जितना प्राप्त हो सके) का एक संकलन तैयार किया जाए। गुज़रने से पहले वे स्वयं अलग-अलग मौक़ों पर प्राप्त पत्रों को फाड़ते चले गए, मगर उनके घर में संभवतः अभी भी कुछ पत्र बचे हों। यह श्रमसाध्य कार्य होगा, मगर इससे उस युग की साहित्यिक गतिविधियों का मंज़र कुछ अधिक स्पष्टता से सामने आ सकेगा। ‘एक पते पर’, ‘आवाहयामि’ जैसी पुस्तकों में रमेशचंद्र शाह को लिखे श्रीपत राय के कुछ पत्र संकलित हैं। उन पत्रों में श्रीपत जी के व्यक्तित्व की गरमाहट महसूस की जा सकती है। भाषा भी उसी के अनुरूप वहाँ अपना आकार लेती है। बदलती परिस्थितियों के साथ स्वयं के ढीले पड़ते चले जाने का वे एक-दो वाक्यों में हवाला देते चलते हैं। अपने मनोभावों पर वे चुटकी भी लेते हैं। वे ‘अनिश्चित जीवन का स्वाद’[1] भी लेते हैं। प्रकटतः कम बोलनेवाले श्रीपत जी अपने पत्रों में दूसरों को चिंताओं से मुक्त रहने की राय देते हैं तो असमंजस से घिरा अपना हृदय भी खोलते हैं। प्रकाशक-संपादक होने के नाते उनके लिए हर समय मीठा बने रहना संभव नहीं था। कई बार उम्र के साथ उनमें चीज़ों को ठीक से अंज़ाम न देने की स्थिति आ रही थी (विशेषकर सत्तर के दशक के परिवर्ती समय में), ऐसे में वे बिल्कुल स्पष्ट ढंग से अपनी बात रखते हैं। इससे अपनी भाषा में आती कठोरता को भी वे स्वीकारते हैं। ‘आवाहयामि’ में रमेशचंद्र शाह बताते हैं, ‘वे बहुत अच्छे पत्राचारी भी थे। उनका नितांत अपना ठाठ, नितांत अपनी स्वतःस्फूर्त फक्कड़ाना मस्ती वाली शैली थी, पत्र लिखने की। बीसियों पत्र उनके मुझे मिले होंगे…।’
रमेशचंद्र शाह, श्रीपत जी की लिखावट के भी मुरीद दिखते हैं। उनके पत्राचार पर बात करते हुए वे अपने मन की बात भी लिखते हैं, ‘उनकी लिखावट इतनी सुंदर है कि लगता है कि यथावत् उसे न छापा जाए तो व्यर्थ है छपाना। मानो वह लिखावट भी उनके कथ्य का अनिवार्य हिस्सा हो।’
‘कहानी’ पत्रिका के कला-पक्ष और उसमें जब-तब कला पर होती टिप्पणियों और आलेखों की ओर भी लोगों की नज़र गई। ‘आधुनिक कला कोश’ की भूमिका में विनोद भारद्वाज लिखते हैं, ‘श्रीपत राय की ‘कहानी‘ ने भी आधुनिक कला के प्रति नई जागरूकता पैदा की। उसके आवरण पर आधुनिक कला (पश्चिमी भी) को जगह मिली। छोटी-छोटी संपादकीय टिप्पणियाँ भी कला के प्रति पाठक की दिलचस्पी बनाने-बढ़ाने में सहायक हुई। श्रीपत राय स्वयं एक महत्त्वपूर्ण कलाकार भी थे और अगर वे कला-लेखन को अधिक समय दे पाते, तो निश्चय ही हिंदी कला-लेखन और भी समृद्ध होता।’
श्रीपत राय ने ‘कहानी’ के अपने संपादकीय में ललित कलाओं पर भी विचार किया। ‘नन्दलाल बोस की कला साधना’ शीर्षक से लिखा उनका आलेख काफ़ी चर्चित रहा। ललित कला अकादमी, नई दिल्ली की पत्रिका ‘समकालीन कला’ के नवम्बर, 1983 अंक (अतिथि सम्पादन : प्रयाग शुक्ल) में वह पुनर्प्रकाशित हुआ।
‘कहानी की बात’ पुस्तक का प्रकाशन (1990) श्रीपत जी के जीते जी हुआ, जिसमें उन्होंने ‘कहानी’ पत्रिका के अपने संपादकीय संकलित किए। ‘कहानी’ पत्रिका की साख बनी रहे, इसके लिए श्रीपत जी ने सालों अनथक मेहनत की। किसी के लिए वहाँ छपना हसरत की बात होती। रमेशचंद्र शाह ‘आवाहयामि’ में लिखते हैं,‘किस कदर प्रलोभन होता था ‘कहानी‘ में छपने का उन दिनों! यही लगता था कि ‘कहानी‘ में छप जाना ही कहानीकार बन जाने का पक्का प्रमाणपत्र हासिल कर लेना है।’
उषाकिरण खान अपनी आत्मकथा ‘दिनांक के बिना’ में अकुंठ भाव स्वीकारती हैं, ‘मैंने सबसे पहले जो कहानी लिखी ‘आँखें स्निग्ध, तरल और बहुरंगी मन‘, वह ‘कहानी’ पत्रिका में श्रीपत राय जी के यहाँ भेज दी। उनका पत्र शीघ्र ही आ गया। मेरी कामना थी– सभी तत्कालीन लेखकों की भाँति कि पहली कहानी ‘कहानी‘ पत्रिका में छपे, सो पूरी हो गई।’
इसी तरह डॉ. सुमन सिंह को दिए एक साक्षात्कार में सुषम बेदी ‘कहानी’ में छपी अपनी कहानी के बाबत ऐसे ही कुछ भाव अभिव्यक्त करती हैं। ब्रसल्स, बेल्ज़ियम से भेजी अपनी कहानी ‘जमी बर्फ़ का कवच’ पर श्रीपत राय के मिले सकारात्मक पत्र से प्राप्त ऊर्जा की वे बात करती हैं, जिसे कभी वे भूल नहीं पाईं। इन कुछेक क़िस्सों से हम समझ सकते हैं कि श्रीपत जी ने ‘कहानी’ की कैसी स्तरीयता बना रखी थी!
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देवताओं का ख़ुदा से होगा काम
आदमी को आदमी दरकार है
- फ़िराक़ गोरखपुरी
अगर मैं अपनी बात करूँ तो सारा राय मेरे लिए वह खिड़की हैं, जिससे श्रीपत राय के जीवन-संसार के बड़े-से लैंडस्केप को देखा जा सकता है। उन्होंने जब-तब पूरी ऊष्मा और तटस्थता के साथ अपने पिता को याद किया है। संस्मरण की उनकी किताब ‘Raw Umber’ में श्रीपत जी के व्यक्तित्व की तहें खुलती चली जाती हैं। मसलन, वे प्रकृति-प्रेमी थे। वे धुन के पक्के थे। जब उन्हें किसी चीज़ की कोई धुन सवार होती थी, तब वे उसे पूरा करके ही मानते। इसी कारण से उनकी माँ शिवरानी देवी उन्हें ‘धुन्नू’ कहा करती थीं। अपने पिता को लेकर सारा राय ऐसी बातें ‘Raw Umber’ में दर्ज़ करती चलती हैं। श्रीपत जी के लिए ‘धुन्नू’ संबोधन ‘प्रेमचंद घर में’ में एकाधिक जगहों पर आता है।
कृष्ण बलदेव वैद अपने एक इंटरव्यू में श्रीपत राय को शिद्दत से याद करते हैं। श्रीपत राय के निधन के बाद दिल्ली में शोक-सभा का आयोजन हुआ, जिसमें राम कुमार, नामवर सिंह, कृष्णा सोबती, कृष्ण बलदेव वैद, कमलेश्वर आदि थे। वैद ने यह बात स्वीकारी की कि श्रीपत जी की असाधारण प्रतिभा को पूरी तरह पनपना नसीब नहीं हुआ। श्रीपत जी ने अपनी दो पेंटिंग्स, वैद को दी, जो लंबे समय तक वसंत कुंज स्थित उनके फ़्लैट में टँगी रहीं।
विष्णु प्रभाकर का कथाकार श्रीपत राय को एक ‘अद्भुत चरित्र’ के रूप में मानता रहा, ‘जो सौम्य है, शांत भी; व्यापारी है और कूटनीतिज्ञ भी।’ कमलेश्वर उन्हें ‘साहित्य का धर्मकांटा’ मानते थे। वे स्पष्ट कहते हैं, ‘हिंदी रचना संसार का इतिहास इलाहाबाद के बिना अधूरा है और इलाहाबाद का इतिहास श्रीपत राय के बिना।’
कवि, संपादक विष्णुचंद्र शर्मा ने उनके साथ काम किया है। उनका मानना है, ‘श्रीपत व्यावसायिक रूप से अल्पव्ययी किंतु नए लेखकों को स्थापित करने में बहुत उदार और फ़ुज़ूलख़र्च थे।’
अपने संस्मरण में विष्णुचंद्र शर्मा, सरस्वती प्रेस द्वारा की गई कुछ अनूठी पहलें याद करते हैं, ‘नए से नए लेखक को श्रीपत और जगत शंखधर पूरे मन से छापते थे। इसका महत्त्वपूर्ण उद्धरण है नामवर की पीएचडी की थीसिस ‘पृथ्वीराज रासो की भाषा’, हिंदी साहित्य के इतिहास की शायद पहली किताब है जो अपने वायवा से पहले छप गई थी और वह छपी प्रति ही वायवा के हेड को दी गई थी। कपिला वात्स्यायन की थीसिस थी ‘भरत नाट्यम में संगीत’ वह श्रीपत के यहीं से ही आई।’
कमलेश्वर अपनी यादनामा ‘आधारशिलाएँ : जो मैंने जिया’ के अध्याय ‘उस वक़्त नामवर सिंह का जन्म नहीं हुआ था’ में फ़रमाते हैं,‘श्रीपत जी रचना और फ़ैशनपरस्त रचना का भेद समझाते थे। विश्व की आधुनिक रचनाशीलता की लगातार जानकारी देते थे, वे सार्थकता के उतने समर्थक नहीं थे जितने कि रचनाशीलता के।’
नासिरा शर्मा अपने आलेख में लिखती हैं, ‘श्रीपत जी न किसी तरह के साहित्यिक दांव-पेंच में रुचि रखते थे न अपना परचम लहराने की कोशिश में रहते थे। उनके हाथों में साहित्य की आत्मा की बागडोर रहती जो कभी किसी के प्रति पक्षपात या निंदा की ओर न जाकर केवल उसकी साहित्यिक कसौटी पर नज़र रखती थी। उन्हें बहुत कुछ पता होता मगर उसका पिटारा वह किसी के सामने नहीं खोलते थे।’
नासिरा शर्मा ने इलाहाबाद की पृष्ठभूमि पर लिखा अपना उपन्यास ‘अक्षयवट‘ श्रीपत राय को समर्पित किया। उनका पहला कहानी-संग्रह ‘शामी काग़ज़ और अन्य कहानियाँ‘ सरस्वती प्रेस से छपा।
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ज़िंदगी क्या है अनासिर में ज़ुहूर-ए-तरतीब
मौत क्या है इन्हीं अज्ज़ा का परेशाँ होना
- चकबस्त ब्रिज नारायण
श्रीपत राय को बड़े से हॉल में बैठना पसंद था। जगह की हो या विचारों की, संकीर्णता को वे नापसंद करते थे। वे साफ़-सफ़ाई वाले व्यक्ति थे। व्यवस्था-पसंद। कागज़ों के अनावश्यक ढेर वे स्वयं नष्ट कर दिया करते। इस कारण कई महत्त्वपूर्ण दस्तावेज़ उन्हीं के सामने नष्ट हुए, जबकि उनके होने पर उस समय को और श्रीपत राय को जानने-समझने के लिए कई सामग्री अपने भौतिक रूप में सही सलामत रह सकती थी। इससे शोधार्थियों और अध्येताओं को सुविधा होती है। भविष्य के किसी मोड़ टिककर अतीत की किसी व्याख्या से कई नए संदर्भ निकलते हैं। जो भी हो, अपने स्वभाव से वे अपना तो शायद नहीं, मगर हिंदी साहित्य का कुछ नुकसान ज़रूर कर गए। परवर्ती पीढ़ी, अहमद फ़राज़ के शब्दों में उनके लिए यह कह सकती है :
सिलसिले तोड़ गया वो सभी जाते जाते
वर्ना इतने तो मरासिम थे कि आते जाते
आना-जाना महज मनुष्यों के बीच ही नहीं, काल-खंडों के बीच भी होता है। आने-जाने के बहाने तो होने ही चाहिए। मित्रों, संबंधियों, लेखकों और कलाकारों को लिखे पत्रों में और घर पर छोड़ी गईं, मित्रों को भेंट दी गईं पेंटिंग्स में श्रीपत उपस्थित हैं। उन सामग्रियों तक पहुँचकर दरअसल हम श्रीपत राय तक पहुँचते हैं। कोई लेखक-संपादक किस तरह अपने परिवार को विस्तृत कर लेता है, इसका एहसास तब हमें शिद्द्त से आता है।
नासिरा शर्मा को शायद तभी यह लगता है कि ज़हरा राय, श्रीपत राय के बारे में कुछ ख़ाका खींच जातीं, तो बेहतर होता! मगर वह न हो सका।
मृत्यु, जीवन का दूसरा पहलू है। हममें से हर कोई इसे अपने ढंग से देखता है। श्रीपत जी ने लगभर अठहत्तर वर्ष की उम्र पाई, मगर उनके अवचेतन में कहीं यह बात पैठी रही कि वे अपने पिता की तरह छप्पन के आस-पास यह दुनिया छोड़ेंगे। सारा राय ने ‘Raw Umber’ के ‘Lightfastness’ अध्याय में उनका यह मनोवैज्ञानिक पक्ष ठीक-ठीक उकेरा है। अपने अंत की ओर बढ़ते श्रीपत के मनोभावों का आकलन करती हुई सारा लिखती हैं, ‘प्रत्येक वस्तु कोई थोपी हुई चीज़ थी, जिसका एक दमनकारी इतिहास था, जो उनपर हावी हो रहा था। वह वस्तु जगह घेर रही थी और उन्हें जीवन से तब बाँध रही थी, जब उनकी ऊर्जा स्वयं के लुप्त होने पर केंद्रित हो रही थी, न कि न होने पर। वे वस्तुएँ उनके इस आग्रह का निषेध थीं क्योंकि वे अस्तित्व में थीं और उनकी स्पर्शशीलता उनके होने का प्रमाण थी।’
घर के एक-एक सामान को स्वयं से दूर करते जाने के श्रीपत के इस स्वभाव को यहाँ सारा ठीक-ठीक समझने की कोशिश करती हैं। कृष्ण बलदेव वैद, बल्लभ डोभाल, नासिरा शर्मा आदि के संस्मरणों में भी ऐसी कुछ घटनाओं की चर्चा है, जहाँ वे मुक्त भाव से लोगों को पैसे, पेंटिंग आदि दे दिया करते। उनके अठहत्तर वर्ष होने में एक सप्ताह बचा था, जब उनकी मृत्यु हुई। अपनी चुप्पी से हठात् बाहर निकल ठहाका लगाता और फिर किसी कछुए की मानिंद अपनी चुप्पी के खोल में वापस पहुँच जाता वह शख़्स अंततः दुनियावी लोगों की पहुँच से परे हुआ। उनकी पत्नी ज़हरा उनसे कुछ माह पूर्व (31 दिसंबर, 1993 की रात) उन्हें छोड़कर जा चुकी थीं।
हिंदी, उर्दू, बाँग्ला, भोजपुरी आदि भाषाओं/बोलियों के जानकार श्रीपत राय को एकाकी जीवन जीना पसंद था। ‘कहानी’ पत्रिका का अगस्त-अक्तूबर, 1994 अंक श्रीपत राय के निधन के बाद उनपर एकाग्र हुआ था। ‘लमही’ पत्रिका ने अप्रैल–सितंबर 2018 का संयुक्तांक श्रीपत जी पर केंद्रित किया। लखनऊ में आयोजित इसके विमोचन-कार्यक्रम में शेखर जोशी ने स्वीकारा कि किस तरह उनके लेखक के निर्माण में भैरव प्रसाद गुप्त और श्रीपत राय की विशेष भूमिका रही!
‘द हिंदू’ के 29 अगस्त 2019 के संस्करण में प्रकाशित अपने आलेख ‘The enduring ‘Kahani’ of Sripat Rai’ में कुलदीप कुमार यह तथ्य रेखांकित करते हैं, “अगर सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ की प्रतिभा को पहचानने और हिंदी साप्ताहिक ‘जागरण’ में प्रकाशन के लिए उनकी कहानियों की सिफारिश करनेवाले जैनेंद्र कुमार थे तो वे श्रीपत राय ही थे जिन्होंने ‘अज्ञेय’ की शुरुआती रचनाओं को, जिसमें उनके मशहूर उपन्यास ‘शेखर: एक जीवनी’ के दोनों भाग शामिल थे, सरस्वती प्रेस से प्रकाशित किया।’
वे इस आलेख में श्रीपत राय जी के भविष्य में समुचित मूल्यांकन की उम्मीद करते हैं।
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संदर्भ :
- ‘प्रेमचंद घर में’ : शिवरानी देवी (प्रथम संस्करण : दिसंबर 1944), सरस्वती प्रेस, बनारस
- ‘कहानी की बात’/ श्रीपत राय, सरस्वती प्रेस
- ‘कहानी’ पत्रिका का श्रीपत राय स्मृति अंक, अगस्त-अक्तूबर 1994
- ‘Raw Umber’ / Sara Rai, Context, an imprint of Westland Books, Chennai
- ‘प्रवास और प्रवास’ / कृष्ण बलदेव वैद से संवाद, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली
- ‘जीते जी इलाहाबाद’/ ममता कालिया, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली
- ‘मेरे साक्षात्कार’ / कमलेश्वर, किताब घर प्रकाशन, नई दिल्ली
- ‘लमही’ पत्रिका, अप्रैल–सितंबर 2018 का संयुक्तांक
- ‘आधारशिलाएँ : जो मैंने जिया’ / कमलेश्वर, राजपाल एंड संज़, नई दिल्ली
- ‘मेरे साक्षात्कार’ / मोहन राकेश, किताब घर प्रकाशन, नई दिल्ली
- ‘बृहद् आधुनिक कला कोश’/ विनोद भारद्वाज, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली
- ‘डुबोया मुझको होने ने’/ कृष्ण बलदेव वैद, भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली
- ‘लमही’ पत्रिका, जुलाई–सितंबर 2021 का अंक
- ‘INDIAN MODERNITIES : LITERARY CULTURES FROM THE 18TH TO THE 20TH CENTURY’, edited by Nishat Zaidi, ROUTLEDGE, New Delhi
- ‘दिनांक के बिना’/ उषाकिरण खान, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली
- ‘दिल्ली मेरा परदेस’ / रघुवीर सहाय, राजकमल प्रकाशन प्रा.लि., नई दिल्ली
- ‘भारतेतर हिंदी साहित्यकार (आत्मीय संवाद)’ / डॉ. सुमन सिंह, सर्व भाषा ट्रस्ट, नई दिल्ली
- ‘समकालीन सृजन संदर्भ’, खण्ड 2 / भारत भारद्वाज, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली
- ‘सिने संसार और पत्रकारिता’ / रामकृष्ण, भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली
- ‘आवाहयामि’/ रमेशचंद्र शाह, किताबघर प्रकाशन, नई दिल्ली
- ‘एक पते पर’ / रमेशचंद्र शाह, पहले पहल प्रकाशन, भोपाल
- ‘The Bloomsbury Handbook of POSTCOLONIAL PRINT CULTURES’ ( संपादक : तोरल जतिन गजारवाला, नीलम श्रीवास्तव, राजेश्वरी सुंदर राजन और जैक वेब)
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लेखक-परिचय :
अर्पण कुमार कवि, कथाकार, संस्मरणकार, आलोचक और अनुवादक हैं। ‘नदी के पार नदी‘, ‘मैं सड़क हूँ‘, ‘पोले झुनझुने‘, ‘सह-अस्तित्व‘, ‘नदी अविराम‘ – पाँच कविता संग्रह, ‘पच्चीस वर्ग गज़‘ शीर्षक से उपन्यास, ‘गौरीशंकर परदेसी’ नाम से कहानी-संग्रह और आलोचना की उनकी दो पुस्तकें प्रकाशित हैं। उनके लिखे संस्मरण और अनुवाद कुछ पत्रिकाओं में प्रकाशित हैं।
मो. 9413396755
ई-मेल : kumararpan1977@gmail.com
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[1] . रमेशचंद्र शाह को लिखे पत्र में श्रीपत राय दिनांक – 01/09/1975

