आज पढ़िए अनामिका अनु का लिखा यह ललित गद्य जिसमें बात घर में एक लड़की के कमरे से शुरू होती है और स्त्रियों की आज़ादी की बात तक पहुँच जाती है। बेहद पठनीय गद्य। आप भी पढ़ सकते हैं- मॉडरेटर
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एक बिना नाम की लड़की थी। उसके जीवन को आकार एक ऐसे कमरे ने दिया, जिसे सब ‘ऊपर वाला कमरा’ कहते थे। पहली मंज़िल का वही कमरा सबसे पहले बना था। उसमें एकांत अपने पूरे परिवार के साथ रहता था। एकांत की साथी शांति, उसके बच्चे आज़ादी और विचार भी उसी कमरे में बसते थे। उसी कमरे के हिस्से सबसे अधिक धूप, ठंड, बारिश और आँधी आई। फिर भी उस लड़की ने अपने रहने के लिए उसी कमरे को चुना—क्योंकि वहाँ एकांत था। वह वहीं बैठी, उठी, सोई और जागी।
एकांत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए बहुत-सी जगहें होती हैं। वहाँ आप हँसते हैं, रोते हैं, सोचते हैं, समझते हैं और जैसे हैं, वैसे ही बने रह सकते हैं—आज़ाद। एकांत आपको जज नहीं करता। वह आपके सौष्ठव और आपकी विद्रूपताओं के प्रति समान रूप से निरपेक्ष होता है।
ऊपर का कमरा वास्तव में किताबों का कमरा था। उसमें सैकड़ों किताबें थीं। उस लड़की के अलावा उस कमरे को कोई नहीं चुनता था क्योंकि किताबों की डस्टिंग और देखभाल आसान काम नहीं है। किताबों की ठीक से देखभाल न हो तो वहाँ रहना घुटन जैसा हो जाता था।वह सफ़ाई-पसंद और व्यवस्थित लड़की थी। समय-समय पर सारी किताबों को झाड़-पोंछकर करीने से रखती। यह काम श्रमसाध्य भी था और मज़ेदार भी—फिजिक्स से लेकर मेटाफिजिक्स तक की किताबों को उलटने-पलटने का सुख। ढेर सारी साहित्यिक किताबों के पन्ने पलटते हुए तरह-तरह के लेखकों और कवियों से मिलने का सुख। जब विज्ञान की किताबों से उसका मन ऊब जाता, तब वह दूसरी दुनिया की किताबों में चली जाती
इस तरह भारी कवर के अनुशासन को तोड़ते, लादे गए नामों को धकियाते, उलटते-पलटते पृष्ठों के बीच एक कोमल हृदय मनुष्यता की सही परिभाषा सीखने की कोशिश कर रहा था।
अज्ञेय कहते हैं—
“अकेले बैठना, चुप बैठना—इस प्रश्न की चिंता से मुक्त होकर बैठना कि ‘क्या सोच रहे हो?’—यह भी एक सुख है।”
अज्ञेय के कहे उसी सुख की जगह था पहली मंज़िल का वह किताबों वाला कमरा। वह कमरा भी लड़की की तरह ही था—बाहर से शांत, भीतर एक गतिशील दुनिया को समेटे हुए। लाखों बोलते शब्दों और हज़ारों कलरव करती पंक्तियों से भरा हुआ—एक ऐसा कमरा, जहाँ मौन भी बोलता था।
जब लड़की ने ऊपर के कमरे का एकांत चुना, तब नीचे की मंज़िल सामाजिकता के चरम कोलाहल में डूबी थी।
निचली मंजिल के नौरस,ऊपर के कमरे के नौ रसों से भिन्न थे।मसलन निचली मंज़िल का रुदन प्रतिक्रिया की आकांक्षा से ओतप्रोत था, जबकि ऊपर के कमरे का रुदन निजी क्रिया था।उस कमरे ने उस लड़की को सिर्फ़ अपने लिए रोने का व्यक्तिगत सुख नहीं दिया बल्कि अपने सभी ग़मों को धनात्मक दृष्टि से देख पाने की ताकत भी दी। वह फ़ैज़ की तरह मानती रही—
लंबी है ग़म की शाम, मगर शाम ही तो है।
एक छोटे-से कस्बाई शहर की युवा होती लड़की के जीवन में प्रेम वैसे नहीं आया, जैसे शायद निचली मंज़िल के लोगों के जीवन में आया होगा। एकांत में उसने अपने साथी की कल्पना की और उसके कई चित्र खींचे। उस मध्यमवर्गीय हिंदू लड़की के लिए धर्म और अर्थ कभी प्रेम की सीमाएँ नहीं बने—न उसकी बुद्धि ने उन्हें स्वीकार किया, न उसके हृदय ने। इसलिए उसकी कल्पना में कभी नमाज़ी टोपी लगाए कोई दुबला-पतला लड़का आता तो कभी सिर पर मुड़ेठा बाँधे कोई ट्रक ड्राइवर, तो कभी पसीने से लथपथ नमकीन गंध में डूबा कोई मजदूर।
लड़की ने अपने पहले प्रेमी का स्केच भी उसी कमरे में बनाया था। हर साल अख़बार में असम की बाढ़ की खबरें आतीं और लड़की उन खबरों के बीच उस लड़के की कल्पना करती। वह बाढ़ग्रस्त किसी दूर गाँव से पढ़ने उसके शहर आएगा और एक दिन उसे नीलमोहर के नीचे बैठकर तिल पीठा खाता हुआ दिखाई देगा। लड़की उसके बारे में धीरे-धीरे ऐसी ही कई कहानियाँ बुनती चली गई और इस तरह उसने उस लड़के की पूरी छवि अपने मन में गढ़ ली।
उस तस्वीर में वह लड़का भी उसकी ही तरह दुबला-पतला था। उसके सिर पर नमाज़ी टोपी थी और बदन पर सुग्गापंखी रंग की बिना कॉलर वाली टी-शर्ट। उसने नीली चेक वाली लुंगी पहन रखी थी।
फिर एक दिन इस्लामपुर चौक पर उसे वैसा ही एक लड़का दिखाई दिया। बस, नीली चेक वाली लुंगी की जगह उसने गहरे नीले रंग की फुलपैंट पहन रखी थी। चेहरा बिल्कुल वैसा ही—जो किसी उदास जगह को रोशनी से भर दे। वही नमाज़ी टोपी, वही सुग्गापंखी रंग की टी-शर्ट। लड़का चठेल खरीदता रहा और लड़की का रिक्शा आगे बढ़ गया।
‘ट्रेन टू पाकिस्तान’ पढ़कर उसने जग्गा सिंह जैसा एक प्रेमी अपने मन में गढ़ लिया था। उसके नैन-नक्श उसने काग़ज़ पर उतार लिए थे और मन में उसकी पूरी तस्वीर भी बना ली थी। लेकिन उसने यह कहाँ सोचा था कि एक दिन किताब का वह जग्गा सिंह सड़क पर सचमुच उसके सामने आ खड़ा होगा!
वह मधेपुरा से सहरसा बस से जा रही थी। रास्ते में जाम लगा तो बस रुक गई। तभी बगल में आकर एक ट्रक भी अटक गया। लड़की ने यूँ ही खिड़की से बाहर देखा और अचानक उसकी नज़र ट्रक के ड्राइवर पर ठिठक गई।चेहरा वही।बिल्कुल वही, जैसा उसने अपने मन में जग्गा सिंह का बनाया था। लड़की कुछ पल उसे देखती रही। फिर उसके भीतर जैसे किसी ने धीरे से कहा—‘यह तो मेरा जग्गा सिंह है!’
अब जाम उसके लिए परेशानी नहीं, एक अप्रत्याशित वरदान था। बस और ट्रक आमने-सामने खड़े थे और लड़की के पास अपने जग्गा सिंह को जी भरकर देखने का समय था। वह उसे आँखें भर-भरकर देखती रही ।लेकिन सड़क का जाम और प्रेम-कथाएँ सदा के लिए नहीं होती हैं।थोड़ी देर बाद रास्ता खुला। ट्रक आगे बढ़ गया, बस भी चल पड़ी। बचा रह गया एक चेहरा और यह सुखद भ्रम कि उसका जग्गा सिंह सचमुच इस दुनिया में कहीं मौजूद है।
इस तरह उस लड़की ने घर के एक उपेक्षित कमरे में ऐसी दुनिया खड़ी कर ली थी, जहाँ बेशुमार रंग और कई तरह के जीवन थे।
कमरे की दीवारें पहले आखड़ थीं। ईंट और गारा अपने रंगों के साथ उपस्थित थे। छत भी पक्की नहीं थी; एस्बेस्टस की चादरें लगी थीं। बाद में दीवारों पर प्लास्टर चढ़ा, सफेदी पुती और एस्बेस्टस की जगह पक्की छत ने ले ली। एक समय ऐसा आया जब उस किताबों वाले कमरे के आसपास घर के दूसरे कमरे बन गए और निचली मंज़िल का कोलाहल और जीवन ऊपर तक पसर गया।
किताब वाला कमरा दूसरी मंजिल पर शिफ्ट हो गया।
तब लड़की ने दूसरी मंज़िल के किताब वाले कमरे की शरण ली।जिस लड़की को बार-बार किताबों वाला कमरा मिलता रहा, एक दिन वही लड़की किताबें लिखने लगी।
उस कमरे में एक बड़ी-सी खिड़की थी जिसपर लड़की ने रंग-बिरंगे कपड़ों को सिलकर पर्दे टाँगे।खिड़की के बाहर मालती के फूलों से लदी मोटी-मोटी लताएँ और जामुन की सघन छाया थी। पूरे बगीचे की हरियाली और चिड़ियों का कोलाहल खिड़की की परिधि को एक रंगीन संसार में बदल देते थे।उस कमरे की खिड़की से लगे चबूतरे पर बैठकर उस युवा होती लड़की ने इलिना सेन और ऐलिस वॉकर को पढ़ा। वहीं लियो टॉल्स्टॉय और रवींद्रनाथ टैगोर को पढ़ा। अफ़ग़ानिस्तान के युद्ध की ख़बरें पढ़ीं और ‘काबुलीवाले की बीबी’ भी। वहीं बैठकर उसने ‘एकला चलो रे’ गाया और रसूल हमज़ातोव को पढ़ा।खिड़की का चबूतरा लड़की के बैठने की जगह था, किताबें पढ़ने की जगह था, तुलसी के गमले की जगह था और गुलाब की पंखुड़ियाँ, नीम और नारंगी के छिलके सुखाने की जगह भी।न जाने उस चबूतरे पर बैठकर लड़की ने अपने मन के कितने दुःख और हृदय की कितनी दबी जिज्ञासाएँ खोलीं और उन पर लंबा विचार किया।उसकी आज़ादी के सारे फ़लसफ़े वहीं आकार लेते रहे। कई रातें वहीं बैठकर चाँद को निहारते हुए गुज़रीं और कई सुबहें पनडुक्की के घोंसलों और पक्षियों के संवाद सुनते हुए।
जब तक वह वहाँ रही, वह चबूतरा उसकी आज़ादी का चबूतरा बना रहा। वही खिड़की उसकी आज़ादी की खिड़की बनी रही। किताबों की पंक्तियाँ उसके लिए वे रॉकेट थीं, जिन पर बैठकर वह किंग्सब्रिज, कैसल रॉक, मैकॉन्डो, यॉकनपाटॉफ़ा काउंटी और ऑर्डिस घूमती रही।
आँगन में आम, अमरूद, आँवला, डाब नींबू, जामुन,नीम,कटहल,पपीता,अशोक के घने लंबे वृक्ष थे।इतनी सघन हरियाली के बीच भी उस खिड़की ने अपना आकाश नहीं खोया था। उसके दाएँ कोने से पूरा आकाश कमरे में उतर आता था। सूरज लड़की का सगा भाई था और सूरज का सातवाँ घोड़ा न जाने क्यों उस लड़की से हमेशा रूठा रहा।
इसी कमरे में रहते हुए लड़की को बार-बार प्रेम हुआ।पहले पेले से,बाद में रोमारियो से, फिर रोनाल्डिन्हो से।एक बार उसे लोथार माटॉयस से भी प्रेम हुआ।
उस घर से विदा होकर लड़की जिस घर में आई, वहाँ उसे उसका वह कमरा कभी नहीं मिला। उस लड़की के पास बस कलम और शब्द रहें। लिखकर उसने कभी इतना नहीं कमाया कि अपने लिए किताबों से भरा कोई ऐसा कमरा बना पाती, जो सिर्फ़ उसका होता। फ़कीरी कलम की कोशिशों से खत्म ही नहीं हुई।
वह कमरा लड़की के जीवन से हमेशा के लिए गायब हो गया।वह लड़की अब वहाँ नहीं रहती और उस लड़की को एक ट्रंक में समेटकर कोने में लगा दिया गया है।उस ट्रंक में पड़े हैं उस लड़की के चंद टुकड़े और उसकी छीन ली गई जगहों का ढेर सारा दुख।तीन मंज़िला उस घर को उसकी याद नहीं आती है, मगर किताबों का कमरा अब भी सुबक-सुबककर रोता है।वह कमरा आज भी बेचैन होकर उस लड़की को ढूँढ़ता है और उसके हर ज़िक्र पर ज़ोर-ज़ोर से धड़कता है।
उस लड़की का सारा दुख उस कमरे के ज़र्रे-ज़र्रे में दर्ज है, मगर लड़की की तमाम कहानी कविताओं से क्यों गायब है?
शायद इसलिए कि सब खाली हाथ आते हैं और खाली हाथ जाते हैं। वह लड़की दोनों मुट्ठियाँ भरकर जाएगी। अपने तमाम दुख अपने साथ ले जाएगी।
इस पृथ्वी पर उसके दुख को रखने की कोई महफ़ूज़ जगह जो नहीं है।
वह काग़ज़, कलम और शब्द को अपने दुख कभी नहीं देगी। वे मिलकर उसके अनमोल, दुर्लभ दुखों को खा जाएँगे।
दुखों को राहत शिविरों की नहीं, स्थायी घर की ज़रूरत होती है।
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