लियो टॉल्स्टॉय के परपोते डेनिल टॉल्स्टॉय पढ़ाते हैं और जैविक खेती भी करते हैं। एक समय उन्होंने अपने परदादा की लोककथाओं और बच्चों की कहानियों को फिर से लोगों तक पहुँचाने का काम किया था। हाल में उन्होंने महात्मा गांधी के पोते गोपालकृष्ण गांधी के साथ मिलकर गांधी और टॉल्स्टॉय के बीच हुए करीब सौ साल पुराने पत्राचार को फिर से देखा। इन पत्रों को ‘Truth and Love: The Gandhi-Tolstoy Letters’ नाम से प्रकाशित किया गया है। भारत में यह किताब 30 सितंबर से उपलब्ध होगी। आज टाइम्स ऑफ इंडिया में स्नेहा भूरा से उनकी बातचीत प्रकाशित हुई है, जिसमें डेनिल ने दोनों विचारकों के रिश्ते और उनके विचारों के बारे में बात की। प्रस्तुत है उस बातचीत का हिन्दी अनुवाद- मॉडरेटर
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प्रश्न- आपके नाम में टॉल्स्टॉय है। पहली बार कब लगा कि इस नाम का कुछ बोझ भी है?
डेनिल- मुझे याद है, जब रूस से कोई मेहमान हमारे घर आता था तो मैं अपने दादा से रूस के बारे में पूछता था। मुझे लगता था कि वहाँ हर किसी का कोई न कोई ऐसा ही मशहूर परदादा होगा। लेकिन स्कूल के शुरुआती सालों में मुझे समझ आया कि बात ऐसी नहीं है। मैं उस समय थोड़ा असहज हो गया था। स्कूल के शिक्षक बार-बार मेरे परदादा के बारे में पूछते थे। मैं सोचता था, क्या मेरे साथ पढ़ने वाले बच्चों को भी अपने परदादा के बारे में बताना पड़ता होगा? शायद यह मेरे लिए गर्व से ज्यादा शर्मिंदगी की बात थी। मैं भी दूसरे बच्चों जैसा ही था और नहीं चाहता था कि सिर्फ अपने परिवार की वजह से लोग मुझे अलग नजर से देखें।
प्रश्न- गांधी ने दक्षिण अफ्रीका में टॉल्स्टॉय को पढ़ा और उनके अहिंसा, सविनय अवज्ञा और राजसत्ता का विरोध करने वाले विचारों से बहुत प्रभावित हुए। 1909-10 में दोनों के बीच सात पैट्रन का आदान-प्रदान हुआ। टॉल्स्टॉय की मृत्यु से कुछ ही समय पहले यह पत्राचार हुआ। आपको और गोपालकृष्ण गांधी को क्यों लगा कि इन पत्रों को आज फिर सामने लाना जरूरी है?
डेनिल- इन पत्रों के बारे में पढ़ने वाले और शोध करने वाले लोग जानते हैं, लेकिन आम लोगों को गांधी और टॉल्स्टॉय के इतने करीबी रिश्ते के बारे में बहुत कम पता है। यह बात मुझे हमेशा खटकती रही। गांधी ने खुद कई बार कहा था कि टॉल्स्टॉय का उनके ऊपर प्रभाव उनकी किताबों के असर से कहीं ज्यादा था। मेरे लिए इन पत्रों की खासियत यही है कि ये सिर्फ इतिहास का हिस्सा नहीं हैं। इनमें दोनों के अपने विचार हैं, उनकी बेचैनियाँ हैं और उन सवालों पर उनकी बातें हैं जो आज भी हमारे सामने हैं।
टॉल्स्टॉय को दुनिया एक महान उपन्यासकार के रूप में जानती है। वार एंड पीस और अन्ना करेन्निना जैसे उपन्यासों ने उन्हें अमर कर दिया। लेकिन टॉल्स्टॉय को सिर्फ इन किताबों तक सीमित करके देखना ठीक नहीं होगा। बाद के जीवन में उन्होंने समाज और धर्म को लेकर भी बहुत सवाल उठाए। उन्हें रूसी ऑर्थोडॉक्स चर्च से निकाल दिया गया था। वे राज्य की सत्ता, संगठित धर्म और निजी संपत्ति पर भी सवाल करते थे। गांधी के विचारों में भी ऐसी ही बेचैनी दिखाई देती है। The Kingdom of God Is Within You और A Letter to a Hindu जैसी टॉल्स्टॉय की किताबों में जो बातें हैं, उनमें गांधी की अपनी सोच से काफी समानता दिखाई देती है।
आज हमारी दुनिया बहुत बदल गई है। तकनीक, बाजार और राजनीति ने जीवन को पहले से कहीं ज्यादा उलझा दिया है। लेकिन टॉल्स्टॉय और गांधी को पढ़ते हुए बार-बार लगता है कि इंसान की असली ताकत दूसरों पर दबाव डालने में नहीं, बल्कि सच और अहिंसा का रास्ता चुनने में है।
प्रश्न- महात्मा गांधी को कई बार ‘हिंदू टॉल्स्टॉय’ कहा गया है। आप इस तुलना को कैसे देखते हैं?
डेनिल- मुझे लगता है कि इस सवाल का जवाब गोपाल मुझसे बेहतर दे सकते हैं। फिर भी मुझे नहीं लगता कि यह तुलना पूरी तरह गलत है। टॉल्स्टॉय खुद भी अपने जीवन के आखिरी वर्षों में लगातार अपने आपको बदलने की कोशिश कर रहे थे। 82 साल की उम्र में उन्होंने अपने पुराने, आरामदेह जीवन से दूर जाकर बहुत सादा जीवन अपनाया। वे अपने जीवन को बिल्कुल नए तरीके से जीना चाहते थे। आखिर में वे घर छोड़कर चले गए। कुछ ही समय बाद एक रेलवे स्टेशन पर उनकी मृत्यु हो गई।
प्रश्न- आपकी माँ बौद्ध धर्म मानती हैं और आपके पिता रूसी ऑर्थोडॉक्स चर्च से जुड़े थे। इन दोनों में से किसका आप पर ज्यादा असर रहा?
डेनिल- टॉल्स्टॉय मानते थे कि सभी धर्मों के भीतर एक ही मूल बात है। वे इसे agape कहते थे। यह एक पुराना यूनानी शब्द है, जिसका मतलब है बिना किसी शर्त के प्रेम। लेकिन मैं हर धर्म की थोड़ी-थोड़ी बातें लेकर अपना अलग धर्म बनाने के पक्ष में नहीं हूँ। मुझे लगता है कि आज हम बहुत ज्यादा अपने बारे में सोचने लगे हैं। हम अलग-अलग धर्मों से अपनी पसंद की बातें ले लेते हैं और फिर उन्हें अपने निजी विचारों के साथ जोड़ लेते हैं। इससे कई बार बातें उलझ जाती हैं और उनमें विरोधाभास भी पैदा हो जाता है। मैंने अलग-अलग धार्मिक परंपराओं को करीब से देखा है और उन सभी का मेरे ऊपर असर है। लेकिन अगर मुझे किसी एक को चुनना हो तो मेरे लिए पिता का धर्म, रूसी ऑर्थोडॉक्स चर्च, ज्यादा स्वाभाविक लगता है। मुझे लगता है कि रूस से बाहर आकर बसे बहुत से रूसियों के लिए भी यह उनके घर, उनकी परंपरा और परिवार से जुड़े रहने का एक जरिया रहा है।
प्रश्न- 1917 के बाद आपका परिवार रूस छोड़कर चला गया। युद्ध के कारण अब उस जगह से भी आपका रिश्ता नहीं रहा जहाँ आपका परिवार खेती करता था। आज रूस में जो कुछ हो रहा है, उसे देखते हुए आप अपनी रूसी विरासत के गौरव और वहाँ की मौजूदा स्थिति के बीच कैसे तालमेल बैठाते हैं?
डेनिल- किसी देश की सभ्यता और वहाँ की जमीन को वहाँ की सरकार से अलग करके देखना चाहिए। रूस की अपनी बहुत पुरानी और अलग पहचान है। उसे सिर्फ वहाँ की राजनीति या युद्ध की खबरों से नहीं समझा जा सकता।
वहाँ की जमीन और वहाँ के लोग राजनीतिक उथल-पुथल खत्म होने के बाद भी रहेंगे। आज की सबसे बड़ी परेशानी यह है कि हमारी आपस में जुड़ी हुई दुनिया में भी अलग-अलग सभ्यताओं के बीच की दूरियाँ बढ़ती जा रही हैं। हम एक-दूसरे को समझने के बजाय एक-दूसरे के बारे में अपनी धारणाएँ बना लेते हैं। मेरा मानना है कि युद्ध से हमेशा शांति बेहतर होती है। हमें एक-दूसरे को दोष देने और निंदा करने के बजाय बातचीत का रास्ता खोजना चाहिए। कूटनीति और थोड़ा संयम शायद आज पहले से ज्यादा जरूरी है। मुझे अपनी रूसी विरासत पर गर्व है। वह मेरे लिए सिर्फ एक देश या परिवार की कहानी नहीं है। वह हमारी संस्कृति, हमारे साहित्य और उस मानवीय सोच का हिस्सा है जिसकी बात लियो टॉल्स्टॉय करते थे।
प्रश्न- टॉल्स्टॉय की सोच में ऐसी कोई बात है जिससे आप सहमत नहीं हैं?
डेनिल- हाँ, उनकी बाद की कुछ रचनाओं में उनकी सोच बहुत कठोर हो गई थी। The Kreutzer Sonata और What Is Art? जैसी किताबों में वे नैतिकता को लेकर बहुत सख्त नजर आते हैं। वे मानते थे कि सुंदरता और नैतिकता को अलग-अलग नहीं देखा जा सकता। उन्होंने बीथोवेन, शेक्सपियर और यहाँ तक कि अपनी कुछ महान रचनाओं को भी पतन की निशानी माना। विवाह और परिवार को लेकर भी उनके विचार बहुत कठोर थे। उन्हें लगता था कि पारिवारिक रिश्ते भी इंसान को उसकी आध्यात्मिक पूर्णता से दूर ले जा सकते हैं। मुझे लगता है कि उनकी यह कठोरता उनके अपने जीवन में भी बहुत दुख लेकर आई। इसका सबसे ज्यादा असर उनकी पत्नी सोफिया पर पड़ा।
(अंग्रेज़ी से अनुवाद किया है कुमारी रोहिणी ने)


