आज भारतीय चित्रकला की महान विभूति रामकुमार की जयंती है। उनको याद करते हुए यह टिप्पणी लिखी है संजीव कुमार ने। संजीव बहुत कम उम्र से कला और साहित्य आयोजनों से जुड़े रहे हैं और कला की गहरी समझ भी रखते हैं। आज उनकी लिखी यह टिप्पणी पढ़िए जिसमें कला-साहित्य की अंतरंग दुनिया की छवि है- मॉडरेटर
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हम सबको पता है कि जब रज़ा साहब 1950 में फ़्रांसीसी छात्रवृत्ति के अंतर्गत समुद्री मार्ग से अकबर पदमसी के साथ फ़्रांस पहुँचे थे, तब पेरिस के गार दु नॉर (Gare du Nord) स्टेशन पर राम कुमार जी उन दोनों का स्वागत करने के लिए पहले से मौजूद थे।
1985 में अकबर पदमसी की बेटी रईसा पदमसी ने इस पूरे प्रसंग को एक बार फिर जीवंत किया। फ़्रांसीसी सरकार के संस्कृति विभाग द्वारा भारत-फ़्रांस सांस्कृतिक संबंधों के अंतर्गत पेरिस में रहकर काम कर रहे तीन भारतीय कलाकारों पर एक फ़िल्म बनाई गई थी। ये तीन कलाकार थे- रज़ा साहब, अकबर पदमसी और कृष्णा रेड्डी। इस फ़िल्म के लिए राम कुमार जी विशेष रूप से पेरिस गए और स्टेशन पर रज़ा साहब तथा अकबर पदमसी के उतरने और राम कुमार जी द्वारा उनका स्वागत किए जाने के उस पुराने दृश्य को दोबारा फ़िल्माया गया।
फ़िल्म में राम कुमार जी, रज़ा साहब और अकबर पदमसी को उसी स्टेशन पर एक साथ देखना अपने आप में एक अलग ही अनुभव है। ऐसा लगता है, मानो इतिहास का कोई पुराना दृश्य फिर से जीवंत हो उठा हो और हम उस समय के साक्षी बन गए हों। इस फ़िल्म की एक प्रति रज़ा फ़ाउंडेशन के आर्काइव में सुरक्षित है।
राम कुमार जी से मेरी पहली मुलाक़ात कब हुई, यह मुझे बिल्कुल याद नहीं है। अशोक जी द्वारा आयोजित कार्यक्रमों में वे आया करते थे। उन्हीं आयोजनों में धीरे-धीरे उनसे परिचय हुआ। उनके साथ प्रायः विमला जी भी होती थीं। बाद में रज़ा साहब से जुड़े आयोजनों में भी उनसे मुलाक़ातें होने लगीं। धीरे-धीरे वे भी मुझे पहचानने लगे।
अरुण वढेरा जी की गैलरी में होने वाली बैठकों की अपनी एक अलग ही दुनिया थी। वहाँ अक्सर राम कुमार जी, विमला जी, अशोक जी, रज़ा साहब और मैं साथ हुआ करते थे। इन बैठकों में कला, कलाकारों और पुराने दिनों की बातें होती थीं। इन्हीं बैठकों के माध्यम से मुझे कलाकारों के आपसी संबंधों और उनकी मित्रताओं को करीब से देखने-समझने का अवसर मिला।
उन दिनों रज़ा साहब भारत में स्थायी रूप से नहीं आए थे। वे अपने वार्षिक प्रवास पर प्रायः 14 जनवरी के आसपास दिल्ली आते, ताकि अशोकजी के जन्मदिन पर उनके साथ रह सकें। दोनों की मित्रता का यह एक ऐसा पहलू था, जिसे मैंने हमेशा विशेष आत्मीयता के साथ देखा। रज़ा साहब का जन्मदिन दुनिया के किसी भी शहर में मनाया जा रहा हो, अशोक जी वहाँ उपस्थित रहने का प्रयास करते थे। दिल्ली में होने वाले जन्मदिन के आयोजनों की योजना भी प्रायः अशोक जी ही बनाया करते थे।
इन आयोजनों में रज़ा साहब के दो मित्रों- राम कुमार जी और कृष्ण खन्ना जी- की उपस्थिति लगभग अनिवार्य हुआ करती थी। इन तीनों की अपनी एक अलग ही जुगलबंदी थी। जब भी वे मिलते, उनके बीच की आत्मीयता और सहजता देखते ही बनती थी। जब से मैंने इन बैठकों को जानना शुरू किया, अशोक जी को हमेशा इस मित्रमंडली के सूत्रधार की भूमिका में पाया। उन्हें इन सबके बीच देखकर कभी ऐसा नहीं लगता था कि उन्होंने इन मित्रों के साथ उनके शुरुआती दिनों का समय नहीं बिताया होगा। उनकी सहज उपस्थिति और सबके साथ आत्मीय संबंधों को देखकर लगता था कि वे इस मित्रता के बहुत पुराने और अभिन्न हिस्से हैं।

हुसेन साहब और राम कुमार जी के बीच भी बहुत अच्छी निभती थी। बैठकों में राम कुमार जी से अक्सर हुसेन साहब का ज़िक्र सुनने को मिलता था। वे बताते कि हुसेन आए थे, तो यह कह रहे थे, वह कह रहे थे। उनकी बातों से लगता था कि वे हुसेन साहब की गतिविधियों और उनके आसपास घट रही घटनाओं से लगातार परिचित रहते थे। इन छोटी-छोटी बातों से कलाकारों के उस आत्मीय संसार की झलक मिलती थी, जो उनकी कला से परे उनकी व्यक्तिगत मित्रताओं से बनता था।
हुसेन साहब की आत्मकथा एम. एफ़. हुसेन की कहानी अपनी ज़ुबानी जब तैयार हो रही थी, तब अशोक जी उसकी पूरी प्रक्रिया के प्रमुख सूत्रधारों में थे। पुस्तक के साथ एक ऑडियो कैसेट भी तैयार की गई थी, जिसमें हुसेन साहब की अपनी आवाज़ में उनकी बातें रिकॉर्ड की गई थीं। पुस्तक के लोकार्पण समारोह की पर्दे के पीछे की ज़िम्मेदारी भी काफी हद तक अशोक जी के निर्देशन में मेरे पास थी। उस शाम पुस्तक का लोकार्पण निर्मल जी ने किया था। राम कुमार जी और विमला जी भी वहाँ उपस्थित थे।
यह उन अवसरों में से एक था, जब मुझे कला और साहित्य की दुनिया के इतने महत्त्वपूर्ण लोगों को एक साथ देखने और उनके आपसी संबंधों को समझने का अवसर मिला। अशोक जी की भूमिका केवल आयोजन करने वाले व्यक्ति की नहीं है। वे अपने मित्रों, कलाकारों और साहित्यकारों को एक साथ लाने वाले ऐसे सूत्रधार हैं, जिनकी उपस्थिति से ये मुलाक़ातें और भी अर्थपूर्ण हो जाती हैं।
इसी क्रम में रज़ा साहब पर अशोकजी द्वारा लिखी गई पुस्तक ए लाइफ़ इन आर्ट का लोकार्पण भी मेरे लिए एक यादगार अवसर रहा। रज़ा साहब के 85वें जन्मदिन पर प्रकाशित इस पुस्तक का लोकार्पण राम कुमार जी ने किया था। तब तक उनसे मेरा परिचय कुछ आगे बढ़ चुका था और उनके साथ एक सहज जुड़ाव बनने लगा था।
2008 में अशोकजी के ललित कला अकादेमी का अध्यक्ष बनने के बाद राम कुमार जी से मेरी मुलाक़ातें कुछ और बढ़ गईं। अब वे अकादेमी के आयोजनों में भी आने लगे थे। अशोक जी के अनुरोध पर राम कुमार जी और कृष्ण खन्ना जी ने अकादेमी की गतिविधियों में अपनी उपस्थिति से उसे एक नई गरिमा प्रदान की।
2008 से 2011 तक का समय ललित कला अकादेमी के इतिहास का एक महत्त्वपूर्ण अध्याय रहा। जो वरिष्ठ कलाकार किसी कारणवश अकादेमी से दूर हो गए थे, वे फिर से वहाँ नियमित रूप से दिखाई देने लगे। इस दौरान अनेक विशिष्ट कलाकारों की प्रदर्शनियाँ आयोजित हुईं। इसी समय भारत ने पहली बार आधिकारिक तौर पर वेनिस आर्ट बिएनाले में भी भाग लिया।
अशोक जी के प्रयासों और उनके द्वारा प्रस्तावित नामों पर विचार करते हुए पद्म पुरस्कार समिति ने कई मूर्धन्य लेखकों और कलाकारों को सम्मानित किया। इसी दौरान राम कुमार जी और कृष्ण खन्ना जी को भी पद्म भूषण से सम्मानित किया गया। रज़ा साहब की भारत वापसी के बाद, उनके नामांकन के प्रस्ताव पर राम कुमार जी को ललित कला अकादेमी का फेलो भी घोषित किया गया।
इन वर्षों में ललित कला अकादेमी केवल प्रदर्शनियों और आयोजनों का केंद्र नहीं रही, बल्कि वरिष्ठ कलाकारों की सक्रिय भागीदारी और उनके सम्मान के माध्यम से भारतीय कला-जगत की एक महत्त्वपूर्ण संस्था के रूप में फिर से प्रतिष्ठित हुई।
इसके बाद रज़ा साहब का भारत में रहना और उनके मित्रों के बीच मेरा अधिक समय बिताना, इन संबंधों को और गहरा करता गया। राम कुमार जी से मुलाक़ातें अब किसी आयोजन में होने वाली औपचारिक मुलाक़ातें भर नहीं रह गई थीं। उनके साथ बैठने, उनकी बातें सुनने और पुराने दिनों के प्रसंग जानने का सिलसिला बढ़ने लगा था। इन सबके बीच अशोक जी की भूमिका हमेशा एक ऐसे सूत्रधार की रही, जिन्होंने मुझे इस संसार से परिचित कराया और धीरे-धीरे उसका हिस्सा बनने का अवसर दिया।
रज़ा साहब के भारत लौटने के बाद की एक ईद मुझे विशेष रूप से याद है। ईद आने में दो-तीन दिन बाकी थे, जब मैंने उनसे इसका ज़िक्र किया। मेरी बात सुनकर उन्होंने बड़े सहज भाव से कहा, “देखो, हम मंदिर और चर्च तो जाते ही हैं, तुम मुझे ईद पर मस्जिद भी ले चलना।”
उनकी यह बात सुनकर मन में एक आत्मीयता-सी महसूस हुई। रज़ा साहब के लिए धर्म और आस्था के अपने मायने थे, लेकिन दूसरे धर्मों और उनकी परंपराओं के प्रति उनका सहज सम्मान भी हमेशा दिखाई देता था।
मैंने अशोक जी से पूछा कि क्यों न ईद पर दोपहर के भोजन का आयोजन किया जाए? रज़ा साहब के कुछ मित्र भी आ जाएँगे, तो उन्हें अच्छा लगेगा। अशोक जी ने तुरंत हामी भर दी। इस तरह ईद के दिन रज़ा साहब के घर मित्रों के साथ मिलने-बैठने का एक सुंदर अवसर बन गया।
उस दिन अरुण वढेरा, सोनिया बलानी, मनीष पुष्कले, प्रेरणा श्रीमाली, दिलीप और लतिका पडगाँवकर, प्राण तलवार, कृष्ण खन्ना, राम कुमार और विमला जी सहित कई मित्र आए। घर में खूब रौनक रही। विमला जी तो अपने घर से एक डोल भरकर सेवइयाँ बनाकर लाई थीं। सबने बड़े चाव से सेवइयाँ खाईं। वह भोजन केवल ईद की दावत नहीं था, बल्कि मित्रता, अपनत्व और साथ बिताए गए कुछ सुखद पलों का उत्सव भी था।
उस पहली ईद के बाद यह सिलसिला चल निकला। हर साल ईद पर रज़ा साहब के घर दोपहर के भोजन का आयोजन होने लगा। मित्र जुटते, बातचीत होती, हँसी-मज़ाक चलता और सेवइयों की मिठास के साथ रिश्तों की गर्माहट भी बनी रहती। राम कुमार जी और विमला जी भी नियमित रूप से इस आयोजन में शामिल होते रहे।
विमला जी का साथ तब तक बना रहा, जब तक वे हमारे बीच थीं। उनका निधन रज़ा साहब और राम कुमार जी से पहले हो गया था। आज उन दिनों को याद करता हूँ, तो ईद के उस पहले आयोजन की तस्वीर आँखों के सामने आ जाती है—विमला जी का घर से सेवइयाँ बनाकर लाना, मित्रों का मिल-बैठ कर खाना और रज़ा साहब के घर का वह आत्मीय वातावरण।
धीरे-धीरे एक दिन का आयोजन परंपरा बन गया। उस परंपरा के पीछे केवल एक त्योहार मनाने का उत्साह नहीं था, बल्कि मित्रों के बीच बने उन रिश्तों की गर्माहट थी, जो समय के साथ और गहरी होती गई। आज वे लोग और वे मिलन-समारोह स्मृतियों का हिस्सा हैं, लेकिन उन दिनों की मिठास अब भी मन में बनी हुई है।
22 फ़रवरी 2012 को रज़ा साहब का जन्मदिन मनाने के बाद एक दिन रज़ा साहब और अशोक जी के बीच बातचीत में यह निष्कर्ष निकला कि कृष्ण खन्ना जी और राम कुमार जी का जन्मदिन भी मनाया जाना चाहिए। मैंने दोनों से बात की और उनके जन्मदिन की तारीख़ें पता कीं। तभी मुझे मालूम हुआ कि राम कुमार जी का जन्मदिन 24 अक्टूबर को है।
आज राम कुमार जी का जन्मदिन है। आपमें से बहुत-से लोग कहेंगे कि उनका जन्मदिन तो 23 सितंबर को होता है। बात दरअसल यह है कि विकिपीडिया पर दी गई जानकारी सही हो या ग़लत, हमारे हिसाब से राम कुमार जी का जन्मदिन 24 अक्टूबर को ही है।
कृष्ण खन्ना जी ने अपना जन्मदिन मनाने की सहमति दे दी। इसके बाद हम सबने लॉरा ब्रिगेत द्वारा पण्डोल के लिए बनाई गई फ़िल्म का प्रदर्शन शाम को इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में किया और बड़े उत्साह के साथ उनका जन्मदिन मनाया।
लेकिन राम कुमार जी ने इसकी अनुमति नहीं दी। वे शुरू से ही कम बोलते थे और स्वभाव से काफ़ी संकोची थे। इसके विपरीत, विमला जी ख़ूब बातें करती थीं और अपनी बात स्पष्टता से कहती थीं।
हमने राम कुमार जी के जन्मदिन के लिए भी बड़ी योजना बनाई थी। लेकिन उनके मना कर देने के बाद रज़ा साहब ने एक अलग ही रास्ता निकाला। उनके जन्मदिन की सुबह-सुबह राम कुमार जी के घर एक गुलदस्ता और वाइन की एक बोतल भिजवा दी। रज़ा साहब के जीवित रहने तक यह सिलसिला इसी तरह चलता रहा। हर साल 24 अक्टूबर की सुबह राम कुमार जी के घर गुलदस्ता और वाइन की बोतल पहुँच जाती थी।
राम कुमार जी ने सार्वजनिक रूप से जन्मदिन मनाने से भले ही इनकार कर दिया हो, लेकिन रज़ा साहब ने अपने मित्र के प्रति स्नेह व्यक्त करने का रास्ता नहीं छोड़ा। मित्रता का यह कितना सहज और सुंदर ढंग था- एक मित्र की इच्छा का सम्मान करते हुए भी उसके प्रति अपना स्नेह जताते रहना।
रज़ा साहब की भारत वापसी के बाद के साढ़े पाँच वर्षों में एक बार वे मेरे साथ राम कुमार जी के घर गए। वहाँ अरुण वढेरा और सोनिया जी भी मौजूद थे। विमला जी ने रज़ा साहब के लिए अपनी ओर से भरसक कोशिश करके ऐसी चीज़ें मँगवाकर रखी थीं, जिन्हें वे आसानी से खा सकें। हमारे पहुँचने के कुछ देर बाद अरुण वढेरा और सोनिया जी वहाँ से चले गए, लेकिन हम लगभग दो घंटे वहीं बैठे रहे। रज़ा साहब को इस बात की बड़ी उत्सुकता थी कि राम कुमार जी आजकल कैसा काम कर रहे हैं और उनकी कला में क्या नया घटित हो रहा है।
राम कुमार जी का स्टूडियो बेसमेंट में था। रज़ा साहब की सुविधा को ध्यान में रखते हुए उन्होंने अपने कुछ काम ऊपर ड्रॉइंग रूम में भी मँगवा लिए, ताकि रज़ा साहब उन्हें देख सकें। दोनों पुराने मित्रों के बीच कला को लेकर यह साझा उत्सुकता और एक-दूसरे के काम को देखने की चाह उनके रिश्ते की गहराई को व्यक्त करती थी।
2014 के उत्तरार्ध से रज़ा साहब का स्वास्थ्य बिगड़ने लगा था। धीरे-धीरे अस्पताल में उनके छोटे-छोटे प्रवास भी जल्दी-जल्दी होने लगे थे। राम कुमार जी या कृष्ण खन्ना जी को यदि लंबे समय तक रज़ा साहब से मिलने का अवसर नहीं मिलता, तो दोनों मुझे फ़ोन कर लेते थे। अक्सर फ़ोन पर ही उन सबकी बात हो जाया करती थी और फिर जल्द मिलने की बात के साथ बातचीत समाप्त हो जाती थी।
राम कुमार जी, जो कम बोलने के लिए मशहूर थे, मुझसे नियमित रूप से फ़ोन करके रज़ा साहब के बारे में बात करते थे। यह रज़ा साहब के प्रति उनके गहरे लगाव का प्रमाण था। राम कुमार जी के स्वभाव से परिचित लोगों के लिए यह बात शायद हैरान करने वाली हो, लेकिन उनके इस व्यवहार से रज़ा साहब के प्रति उनकी आत्मीयता का सहज ही पता चलता था।
2015 के उत्तरार्ध से तो महीने की एक शाम लगभग तय हो गई थी, जो राम कुमार जी रज़ा साहब के स्टूडियो में बिताने लगे थे। वे मुझे फ़ोन करते, रज़ा साहब की तबीयत के बारे में पूछते और कहते कि शाम को आऊँगा।
शाम को वे आते, तो रज़ा साहब और अशोक जी स्टूडियो में गिलास लिए बैठे होते। कुछ देर तीनों के बीच बातचीत होती, फिर कुछ देर गपशप और उसके बाद एकदम ख़ामोशी। उस ख़ामोशी में भी एक अपनापन था, जिसे शब्दों की ज़रूरत नहीं थी।
बीमारी के उन दिनों की एक शाम आज भी मेरी आँखों के सामने है। रज़ा साहब अपने कमरे में लेटे हुए हैं, आँखें खुली हुई हैं और उनके पास वाली कुर्सी पर राम कुमार जी बैठे हैं। दोनों के बीच कोई बातचीत नहीं हो रही। कुछ देर बाद राम कुमार जी स्टूडियो में चले जाते और वहाँ अशोक जी के पास कुछ देर बैठते या फिर अपने घर लौट जाते।
कभी-कभी रज़ा साहब को ध्यान आता कि राम कुमार जी आए थे, अब कहाँ हैं? चले गए क्या? हम बताते कि वे स्टूडियो में हैं, तो कहते, “वहाँ ले चलो।” फिर वे भी स्टूडियो में आकर बैठ जाते। कई बार ऐसा भी होता कि हम उन्हें बताते कि राम कुमार जी जा चुके हैं। “बोले कि फिर आऊँगा।”
एक बार बीमारी के दौरान राम कुमार जी अपनी बहन को भी साथ लेकर रज़ा साहब से मिलने आए थे। वे सब कुछ देर स्टूडियो में रज़ा साहब के साथ बैठे। जब रज़ा साहब को थकान महसूस हुई, तो वे अपने कमरे में लेटने चले गए। राम कुमार जी भी कुछ देर उनके कमरे में उनके पास बैठे रहे और फिर अपने घर लौट गए।
राम कुमार जी का बार-बार आना, रज़ा साहब का उन्हें गर्मजोशी से मिलना और कभी-कभी दोनों का एक-दूसरे के पास बैठे रहना, बिना एक शब्द बोले- इन सबमें उनकी मित्रता की गहराई दिखाई देती थी। उस रिश्ते में न औपचारिकताओं की ज़रूरत थी, न हर बार कुछ कहने की। कभी बातचीत, कभी ख़ामोशी और कभी केवल एक-दूसरे की उपस्थिति ही पर्याप्त थी।
उस मित्रता को शब्दों में पूरी तरह बयान कर पाना शायद संभव नहीं है। वह उन रिश्तों में से थी, जिनकी गहराई को समझने के लिए उनके बारे में कही गई बातों से अधिक, उनके बीच बिताए गए मौन को महसूस करना पड़ता है।



