बिखरता समाज और ‘अंतिम आश्रय’ 

इस साल एक ऐसा उपन्यास आया जिसको पढ़कर मैं बहुत बेचैन हो गया। उपन्यास है त्रिपुरारि शरण का ‘अंतिम आश्रय’ उपन्यास के केंद्र में विस्थापित होता परिवार है और बुजुर्गों का अकेलापन है। सेतु प्रकाशन से प्रकाशित इस उपन्यास को पढ़कर मैंने यह टिप्पणी लिखी है। आप भी पढ़ सकते हैं- प्रभात रंजन 

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त्रिपुरारि शरण का उपन्यास ‘अंतिम आश्रय’ मैंने बहुत पहले मँगवा लिया था, कई बार पढ़ने की कोशिश की लेकिन उपन्यास बीच में रह जाता था। कारण क्या था पता नहीं, लेकिन उपन्यास के परिवेश से अपना बचपन याद आने लगता था और उपन्यास बीच में ही रह जाता। कारण कहानी नहीं अपनी भावुकता थी जिसका साधारणीकरण उपन्यास की कथा के साथ होने लगता था। बहरहाल, दिल्ली में सीजीपी आंदोलन के दिन आकस्मिक छुट्टी मिलने से दो दिनों तक उसी उपन्यास को पढ़ता रहा। त्रिपुरारि जी का पहला उपन्यास ‘माधोपुर का घर’ भी मैंने पढ़ा था। उसके केंद्र में गाँव था माधोपुर तो इस उपन्यास के केंद्र में गाँव है केशोपुर। परिवेश वही है बिहार का मुज़फ़्फ़रपुर और उसके आसपास के क्षेत्र।

लेकिन मैं पहले ही बता देना चाहता हूँ कि उपन्यास में गाँव की कोई नॉस्टेलजिक सी कहानी नहीं है, उपन्यास की सवा सौ साल विस्तृत कथानक में बिहार का वह मध्यवर्ग है जो विस्थापित होता चला गया, अपने समाज से कटता चला गया, वह किसानी है जिससे लोग कटते चले गये। पहले शिक्षा के नाम पर यहाँ की प्रतिभाएँ बाहर जाती रहीं और फिर दुनिया में नाम रोशन करती रहीं, अपनी मिट्टी वीरान होती गई। फुनगी तो फैलती गई, जड़ अकेला रह गया।  

आप चाहें तो इस उपन्यास को बिहार के मध्यवर्ग के इतिहास की तरह भी पढ़ सकते हैं और शायद इस तरह से बिहार पर कभी नहीं लिखा गया है। यह एक तरह से बिहार को लेकर लिखी गई एलिगरी है, वह भी बिना लाउड हुए, अत्यंत सूक्ष्मता से, जैसे अंदर ही अंदर हूक उठ रही हो। जैसे कोई कलाकार बड़ी नात्मयता से अपनी उदासी को कला का रूप दे रहा हो। वह समाज को ऊष्मा, लगाव, गर्मजोशी के लिए जाना जाता था अब उसका वह स्वरूप शेष नहीं रहा। बिखरते जाने को ही हमने समृद्धि समझ लिया।  

यह बहुस्तरीय उपन्यास है जिसके केंद्र में हैं रमा देवी और परिधि पर बहुत से किरदार हैं जो सब किसी न किसी रूप में उनसे जुड़े हुए हैं। बिहार में शिक्षा सेवा में अपने पति के साथ सम्मानित नौकरी करने के बाद अपने बेटे-बेटी को अच्छी तरह सैटल करवा देने के बाद उनके सामने एक ऐसी क्राइसिस उभर आती है जिससे उपन्यास का शीर्षक अपनी सार्थकता को सिद्ध करता दिखाई देता है। असल में यही क्राइसिस हमारे समय की, विस्थापित होते जा रहे समाज की सबसे बड़ी क्राइसिस बन गई है जिसके बारे में आज तक ठीक से लिखा नहीं गया है।  

क्राइसिस अपने आप में एक बड़ा सवाल है कि आत्मसमान से जीवन बिताने वाली एक स्त्री का अपने पति के निधन के बाद अंतिम आश्रय क्या होता है? उपन्यास में एक स्थान पर यह आता भी है कि स्त्री का अंतिम आश्रय तो उसके बेटे का घर ही होता है। लेकिन अगर बेटा माँ के साथ रहना न चाहता हो तो? क्या बेटी के घर में रहना चाहिए? अंतिम आश्रय को लेकर रमा देवी की जो तलाश है वह बहुत मार्मिक बन पड़ा है इस उपन्यास में।

यही इस उपन्यास का क्वेस्ट है कि आज जब मध्यवर्गीय परिवार के बच्चे विदेश जा रहे, समृद्ध होते जा रहे, पीछे रह जाने वाले उनके माता-पिताओं का आश्रय कहाँ होना चाहिये? उपन्यास में एक किरदार प्रेमशंकर हैं जो अपने गाँव से बचपन में ही कलकत्ता चले गये थे। वहाँ बड़े व्यापारी बने, बड़ा घर बनाया। कोई कमी नहीं है। बच्चे भी विदेश में हैं। सब खुश हैं। लेकिन अकेलापन का क्या करें। वे रमा देवी के बालसखा होते हैं। और बेहद बुढ़ापे में रमा देवी को खोजते खोजते आ जाते हैं, दशकों बाद। वह उनके सामने अपने अकेलेपन को बाँट लेने का प्रस्ताव रखते हैं। मार्केस के उपन्यास ‘लव इन द टाइम ऑफ़ कॉलरा’ में तो दो बूढ़े मिलकर सह-जीवन बिता सकते हैं लेकिन बिहार के समाज में यह संभव नहीं है।

रमा देवी अपनी मास्टरनी बेटी रोशनी के साथ रहती हैं लेकिन कैंसर से उसका भी निधन जल्दी हो जाता है। अंत में वह प्रेमशंकर के साथ मिलकर गरीब बच्चों की पढ़ाई के लिए छात्रवृत्ति की शुरुआत कर ओल्ड एज होम में रहने लगती हैं। इस उपन्यास की विशेषता यह है कि इसमें इस बात को किसी त्रासद घटना की तरह नहीं रखा गया है, कोई गिल्ट भाव नहीं है। उपन्यास के अंत में रमा देवी की पोती और उनकी सहेली का बेटा मेलबर्न में मिलते हैं, जहां पोती अपने उस अंकल को सूचना देती है कि वह जीवन का शतक पूरा करने वाली हैं और एक ओल्ड एज होम में रह रही हैं। उन्होंने फ़ेसबुक चलाना सीख लिया था, ईमेल करना सीख लिया था। उपन्यास की कहानी एक भरे-पूरे परिवार की कहानी से शुरू होती है, धीरे धीरे उस परिवार से जुड़े लोग सफलता-समृद्धि की सीढ़ियाँ चढ़ते चले जाते हैं, लेकिन उस परिवार की जगह आभासी संसार लेने लगता है।

उपन्यास ‘अंतिम आश्रय’ गाँव से मोहभंग का उपन्यास है लेकिन शहर भी इसके लिए कोई बड़ी संभावना नहीं है। बिहार के सामाजिक टूटन की ऐसी कहानी मुझे नहीं लगता है कि अभी तक लिखी गई है। एक परिवार की कहानी जैसे पूरे बिहार का रूपक बन जाती है।  

उपन्यास अपने गाँव-जवार की याद तो दिलाता ही है लेकिन उसके प्रति गहरे शोक से भर जाता है। त्रिपुरारि शरण की भाषा बहुत जीवंत है इसलिए परिवेश के साथ उसकी सुगंध-दुर्गंध को भी महसूस किया जा सकता है। उपन्यास एक भयानक भविष्य की ओर ले जाता है, जिसमें अकेलापन नियति है और पारंपरिक पारिवारिकता की विदाई कठोर सच।

त्रिपुरारि शरण का पहला उपन्यास ‘माधोपुर का घर’ में जो लेखकीय संकोच था लेखक इस उपन्यास में उससे मुक्त दिखाई देते हैं। गाँव उसमें भी था, उजाड़ उसमें भी था लेकिन उपन्यास का कथावाचक कुत्ता था जो पढ़ने वालों को भावुकता से भर देता था। लेकिन ‘अंतिम आश्रय’ उपन्यास भावुकता से पूरी तरह मुक्त दिखाई देता है। मुझे आश्चर्य होता है कि हिन्दी में इस तरह के उपन्यास क्यों नहीं लिखे गये। प्रेमचंद की परंपरा के नाम पर एक ख़ास क़िस्म का आदर्शवाद तो हिन्दी के मुख्यधारा के उपन्यासों में दिखाई देता है लेकिन अपने वर्गीय यथार्थ से टकराने का साहस उसमें नहीं है। अंतिम आश्रय उपन्यास उस यथार्थ को उजागर कर देता है जिसको हिन्दी उपन्यासों ने लगातार छुपाने का काम किया है।

हिन्दी में इस साल प्रकाशित उपन्यासों में ‘अंतिम आश्रय’ सबसे अलग है। उपन्यास का प्रकाशन सेतु प्रकाशन ने किया है। 

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