गालीशिया में धारासार बारिश: गाब्रियेल गार्सीया मार्केस

जादुई यथार्थ को लातिनी अमेरिका के समाज, संस्कृति और परंपरा से निकालकर वैश्विक पहचान दिलाने वाले  महान कथाकार गाब्रियेल गार्सीया मार्केस को साहित्य का नोबेल पुरस्कार दिया गया था। उपन्यासों के अलावा कहानियों और संस्मरण के लिए भी उन्हें जाना जाता है। उनकी भाषा भी कम जादुई नहीं है। आज पढ़िए उनके एक संस्मरण ‘Watching It Rain in Galicia’ का हिन्दी अनुवाद। यह संस्मरण मूल रूप में 1983 में प्रकाशित हुआ था। अनुवाद किया है कवि, लेखक मनोज मोहन ने- मॉडरेटर 

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मेरे पुराने मित्र एक्तर रोहस एरासो, जो कि एक पेंटर, कवि और उपन्यासकार हैं, जिन्हें मैंने वर्षों से नहीं देखा था,ने जब मुझे माद्रिद में फ़ोटोग्राफ़रों और पत्रकारों के जमघट में घिरे देखा तो वे भावुकता से स्पंदित हो उठे और मेरे पास आकर धीमी आवाज़ में बोल पड़े : ‘याद रखो कि समय-समय पर तुम्हें स्वयं को भी खुश रखना चाहिए।’ वास्तव में महीने ही नहीं सालों गुज़र चुके थे, जब मैंने स्वयं को खुश करने के लिए कोई अच्छी-सी भेंट स्वयं को देने की सोची हो। इसलिए उस दिन अपने एक पुराने सपने को साकार करने का निर्णय लिया। वह थी— गालीशिया की यात्रा। खाने-पीने के शौक़ीन लोग गालीशिया के बारे में तब तक बहुत कुछ नहीं जान सकते जब तक कि उस क्षेत्र से जुड़े व्यंजनों का आनंद न ले लें। चेग्वारा की प्रसिद्ध उक्ति है, ‘अपने वतन की याद खाने-पीने की याद से शुरू होती है।’ सियेरा मैस्त्रा की एक रात युद्ध पर बातचीत करते समय उनके और उनके साथियों के मन में यह बात तब आयी होगी जब उनकी स्मृति में अपने वतन अर्जेंटीना के भुने हुए मांस के बड़े-बड़े टुकड़े याद आये होंगे। वहाँ जाने से पहले गालीशिया के प्रति मेरी आसक्ति उसके व्यंजन के बारे में सोचकर ही जागी। सच्ची बात तो यह है कि आर्कातक स्थित विशाल घर में, जहाँ पहली बार मृतात्माओं से मेरा सामना हुआ था, मेरी नानी ढलती हुई उम्र और क्षीण होती आँखों की रोशनी के बावजूद रोटी बनाने का काम बखूबी किया करती थीं। नदी में आयी बाढ़ ने चूल्हे को ध्वस्त कर दिया और किसी ने उसे फिर नहीं बनवाया तो नानी ने रोटी बनाना ही छोड़ दिया। लेकिन नानी के अंदर यह हुनर इतना जड़ जमा चुका था कि वह जब रोटी नहीं बना पायीं तो ‘हैम’ बनाना शुरू कर दिया। जायकेदार हैम, जिसे हम बच्चे पसंद नहीं करते थे। बच्चे बड़ों की बनायी नयी-नयी चीज़ों को कभी पसंद नहीं करते, फिर भी हैम का वह प्रथम अनूठा स्वाद मेरे मन-मस्तिष्क में हमेशा के लिए सुरक्षित हो गया। अपने गुजरे हुए दिनों में कई बार हैम खाने का मौक़ा मिला, लेकिन वह स्वाद कहाँ! चालीस साल बाद एक दिन अचानक बार्सीलोना शहर में खाये गये पोर्क के अगली रान के टुकड़े ने पुरानी स्मृति को फिर ताज़ा कर दिया। मेरी नानी द्वारा बनाये गये हैम के अनूठे स्वाद के साथ जुड़ी बचपन की सारी यादें, खुशियाँ, अनिश्चितताएँ और अकेले में बिताये वे क्षण सहसा मेरे मन-मस्तिष्क पर छा गये।
अपने बचपन के अनुभव के आधार पर उस अनूठे स्वाद का पारंपरिक स्रोत तलाशने निकला तो मैंने उसे पाया गालीशिया जैसे ग़ैर-शहरी क्षेत्र में, मई महीने की हरियाली में, समुद्र और घनघोर बारिश और कभी न थमनेवाली हवा के आवारा झोंकों में। तब जाकर मैं समझ सका अपनी नानी के भोलेपन को, जिसने उसके इर्द-गिर्द एक ऐसी तिलिस्मी दुनिया रच डाली थी जिसमें सब कुछ संभव था। लेकिन तर्क पर आधारित किसी विश्लेषण के लिए कोई गुंजाइश न थी और तब मैं समझ सका उसके अनजान आनेवाले मेहमानों के लिए स्वादिष्ट व्यंजन बनाने के उत्साह और दिन भर गीत गुनगुनाने की आदत को। जब भी मेरी नानी ट्रेन की सीटी सुनती तो बोल पड़ती थी कि ‘तुम्हें मांस और मछली दोनों ही तैयार रखने चाहिए, क्योंकि तुम नहीं जानते कि दिन के खाने पर आनेवाला व्यक्ति क्या पसंद करे।’ वह एक लंबी उम्र बिताकर गुज़रीं, आँखों की क्षीण रोशनी के बावजूद दिमाग़ी हालत में पूरी दुरुस्त वह अपने बीते हुए यादगार पलों के क़िस्से इस तरह सुनाती थी जैसे सब कुछ उसी समय आँखों के सामने घट रहा हो। सांतियागो दे कंपोस्तेला में पिछले सप्ताह जब मैं अपने गालीशियाई मित्र से इस बारे में चर्चा कर ही रहा था तभी वह बोला कि तुम्हारी नानी निश्चित रूप से गालीशिया की रहनेवाली होंगी, इस बारे में कोई संदेह नहीं हो सकता, क्योंकि वह सनकी थीं। सच तो यह है कि सभी गालीशियाई मित्रों के बारे में जिनको जानता हूँ या जिन लोगों से मिला हूँ, लेकिन उनको समझने का समय पास में नहीं था तब भी, मैं कह सकता हूँ कि मुझे उनकी जन्म राशि मीन लगती है।’
मैं नहीं जानता कि लोग खुद को सैलानी बताने में क्यों शर्म महसूस करते हैं। मैंने अपने सैलानी मित्रों को यह कहते सुना है कि वे सैलानियों से ज्यादा मेलजोल रखना नहीं चाहते। शायद वे यह नहीं जानते कि वे अपने को कितनी ही दूरी पर रखें, हैं तो सैलानी ही। अगर मैं किसी ऐसी जगह जाता हूँ जिसके संबंध में मेरी जानकारी सतही है तो मैं निसंकोच एक सैलानी बन जाता हूं, तब मैं ज़ल्दबाज़ी में आयोजित उस यात्रा का हिस्सा बन जाता हूँ, जिसमें खिड़की के बाहर का दृश्य गाइड के द्वारा यों बयान किया जाता है, ‘भाइयो और बहनो आपके बायीं ओर या दायीं ओर…..’ तब मुझे उस जगह के बारे में छोटी-छोटी जानकारियाँ मिल जाती हैं और जब मैं अकेले जाता हूँ, तो सभी पर्यटक-स्थलों को देखने की कोई ज़रूरत महसूस नहीं करता।
किसी भी तरीक़े से सांतियागो दे कंपोस्तेला सैलानियों की जिज्ञासा को शांत करने में बिना समय गँवाये सारी जानकारी दे देता है : अपनी सभ्यता, समग्रता और समयातीत अवस्था के कारण यह शहर इतनी जल्दी प्रभावित करता है मानो वही सैलानी की जन्मस्थली हो। मेरा हमेशा से यह विश्वास रहा है और अब भी क़ायम है कि सियेन जैसा सुंदर चौराहा दुनिया भर में कहीं नहीं है। लेकिन मैं यह मानने लगा हूँ कि सांतियागो दे कंपोस्तेला ख़ूबसूरती में कहीं से भी कम नहीं है। इसकी मदमस्त हवा इस शहर की उम्र को नज़रअंदाज़ कर देती है और लगता है कि यह शहर बस पिछले ही दिन एक ऐसे व्यक्ति द्वारा सँवारा गया है जिसके पास गुज़रते वक़्त का कोई एहसास नहीं था। यह एहसास केवल चौक से ही नहीं बल्कि शहर के हर कोने में और प्रतिदिन के जीवन में बसी आबोहवा को देखकर होता है। यह मस्त नौजवानों का जिंदादिल शहर है जिसकी जवानी कभी नहीं ढलती, मानो एक उम्र ठहर गयी हो।
जगह-जगह दीवारों के बीच से निकलनेवाले पौधे गुमनामी से बचने की लालसा दिखाते हैं और क़दम-क़दम पर चट्टानों से बनी आकृतियाँ मंत्रमुग्ध कर लेती हैं।
बेमौसम के आग उगलते सूर्य के साथ रुक-रुककर तीन दिन तक बारिश होती रही, फिर भी मेरे गालीशियाई मित्रों का ध्यान इस सुनहरे अंतराल की ओर नहीं गया और वे लगातार हो रही बारिश के लिए क्षमा याचना करते रहे। शायद वे इस बात से अनभिज्ञ थे कि बारिश के बिना गालिशिया नीरस हो जायेगा क्योंकि उनका देश मिथकीय देश है और जहाँ तक जानकारी है मिथकीय देशों में सूर्य कभी बाहर नहीं आता। ‘अगर आप पिछले सप्ताह आते तो सुहाना मौसम बिताते—संकोच के साथ वे कहते—माल के इस हिस्से की दृष्टि से मौसम का मिज़ाज काफ़ी अजीबोग़रीब है।’ मगर वे इस बात को भूल गये कि बल्ले-इनसलान रोसालिया दे कास्त्रो और सभी गालिशियाई कवि, जो कभी यहाँ रह चुके हैं, उनकी कृतियों में सृष्टि की शुरुआत से ही बारिश का वर्णन है और साथ में चर्चा है उस मदमस्त हवा के झोंके की भी, जो गालिशियाई लोगों को अन्य लोगों से भिन्न बनाता है।
शहर में बारिश हो रही थी, जीवंत खेतों में भी बारिश, सरोवरी और स्वर्ग जैसे एरोसा और विगो के नदी मुहानों पर भी बारिश और पुल के ऊपर बारिश, लगभग अवास्तविक प्लात्सा दे कंबोडोसा पर भी निर्भीक बारिश, यहाँ तक कि लोरोसा के द्वीप पर भी बारिश, जहाँ एक दूसरी दुनिया और समय का एक होटल है, जिसे इंतज़ार है क्रमशः बारिश के रुकने का, सनसनाती हवा के थमने का और सूर्य के उगने का, ताकि वहाँ फिर जीवन की शुरुआत हो। हम इस बारिश में चलते रहे—शालीनता के साथ शेलफिश खाते हुए, इस तहस-नहस दुनिया में बची है ज़िंदा शेलफिश, टेबल पर ये मछलियाँ काफ़ी ताज़ा दिखती हैं और सलाद भी मानो वहीं पर विकसित हो रहा है और हम सब जानते हैं, इसके बावजूद कि बारिश निरंतर जारी है, वह कभी रुकनेवाली नहीं है।
बहुत सालों पहले बार्सिलोना के एक रेस्तरां में लेखक अलवारो कनेकरोस को गैलेशियन व्यंजन के बारे में बातें करते सुना था। उनके वर्णन इतने मंत्रमुग्ध करनेवाले थे कि मैंने उसे एक गालिशियाई व्यक्ति का आत्मोदगार समझा। जहाँ तक मुझे याद है मैंने बहुत सारे प्रवासी गालिशियाई को गालिशिया का वर्णन करते सुना है और ऐसे संस्मरणों को बीते हुए कल के प्रति मोहग्रस्त पाया। गालिशिया में बीते हुए बेहतर घंटों को जब मैं याद करता हूँ तो सहसा विश्वास नहीं होता है कि वह सच ही था। क्या वह सब सच था? या अपनी नानी की तरह मैं भी गालिशिया का शिकार हो गया। गालिशियाई के बीच बैठे होकर, जैसा कि आप सब जानते हैं, यह बता पाना बहुत-बहुत मुश्किल है।

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