बेस्टसेलर, युवा लेखन और ज्योति कुमारी का प्रथम कहानी संग्रह

एक अच्छी खबर है कि युवा लेखिका ज्योति कुमारी के पहले कहानी संग्रह ‘दस्तखत और अन्य कहानियाँ‘ की एक हजार प्रतियाँ महज दो महीने के अन्दर बिक गईं. यह युवा लेखकों का उत्साह बढाने वाला है. आज इसको लेकर वाणी प्रकाशन ने इण्डिया इंटरनेश्नल सेंटर में एक कार्यक्रम का आयोजन किया जिसमें युवा लेखन और बेस्टसेलर को लेकर एक परिचर्चा का आयोजन भी किया. प्रस्तुत है युवा लेखन और बेस्टसेलर को लेकर मेरा लेख-  जानकी पुल.
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हिंदी के साहित्यिक परिदृश्य के लिए यह एक घटना है. युवा लेखिका ज्योति कुमारी के पहले कहानी संग्रह ‘दस्तखत और अन्य कहानियां’ की १००० प्रतियाँ सिर्फ दो महीने में बिक गई. वाणी प्रकाशन के प्रबंध निदेशक अरुण माहेश्वरी ने बताया कि सबसे सुखद यह रहा कि ये प्रतियाँ आम पाठकों ने खरीदी. यानी पुस्तकालयों के थोक खरीद के आधार पर यह आंकड़ा नहीं निर्धारित किया गया है. जानकर सुखद लगता है कि हिंदी में साहित्यिक पुस्तकों का बाजार विस्तृत हो रहा है. कहानी संग्रह के नए संस्करण के विमोचन के बहाने वाणी प्रकाशन ने बेस्टसेलर की अवधारणा और युवा लेखन को लेकर कार्यक्रम का आयोजन किया और बड़े स्टार पर लोगों का ध्यान इसकी तरफ खींचा.
यह युवा लेखन के लिए भी सुखद है कि एक प्रकाशक है जिसकी दिलचस्पी केवल उनकी किताबों को प्रकाशित करने में नहीं है, बल्कि वह उसे ब्रांड की तरह से प्रचारित-प्रसारित भी कर रहा है. सबसे बढ़कर यह कि उसकी किताबों को पाठकों तक पहुंचाने में दिलचस्पी ले रहा है. हिंदी के लिए यह नई बात है और युवा लेखकों के उत्साह को बढाने वाला भी है.
वैसे आज का युवा लेखक अपने लेखक होने को लेकर सजग है, वह कुछ और होने के बाद लेखक होना नहीं चाहता है, बल्कि लेखक होने के बाद कुछ और बनना चाहता है. वह लेखन को अपने कैरियर की तरह से देखता है. एक ज़माना था कि जब कोई व्यक्ति अपना परिचय लेखक के रूप में देता था तो सामने वाला पूछता था कि लेखक तो ठीक है लेकिन आप करते क्या हैं. लेखन को हिंदी समाज में हॉबी की तरह देखा जाता था या अकादमिक जगत तक सिमटी रहने वाली गतिविधि के रूप में. आज का अधिकांश युवा लेखन अकादमिक जगत के सर्टिफिकेट के बिना ही अपनी पहचान बना रहा है. यह युवा लेखन का आत्मविश्वास है, अपने लेखन पर भरोसा है और अपने पाठकों पर वह पकड़ जो हिंदी साहित्य के उस दौर की याद दिलाता है जब किताबें हजारों में बिका करती थी, बल्कि उस दौर के कई साहित्यिक उपन्यास लाखों में बिक चुके हैं.
आज हिंदी का युवा लेखक लोकप्रिय साहित्य लिखकर बेस्टसेलर नहीं होना चाहता है, बल्कि हिंदी का अधिकांश युवा लेखन गंभीर साहित्य को लोकप्रिय बनाने का उपक्रम है. अरुण माहेश्वरी ने एक बहुत अच्छी बात कही कि पहले युवा लेखक पहचान बनाने के लिए प्रकाशक के पास आता था लेकिन आज जब कोई युवा लेखक प्रकाशक के पास आता है तो उसकी पहचान पहले से बन चुकी होती है. आज सोशल मीडिया है, ब्लॉग हैं, वेबसाईट हैं. ये लेखक की पहचान बना रहे हैं, उनको पाठकों से जोड़ रहे हैं- सीधा.
बहरहाल, ज्योति कुमारी के प्रथम कहानी संग्रह की एक हजार प्रतियाँ दो महीन के अन्दर बिक गई. कुछ-कुछ ईर्ष्या हो रही है, लेकिन बहुत सारा आत्मविश्वास भी पैदा हो रहा है. यह मिथ टूटा है कि हिंदी में पाठक नहीं हैं. हिंदी में पाठक हैं, अगर कोई प्रकाशक उन तक पहुँचने के उपक्रम करता है तो पाठक उस प्रयास को हाथोहाथ लेते हैं. लेखकों को पाठकों से जोड़ने का वाणी प्रकाशन का प्रयास स्वागतयोग्य है. वह दिन दूर नहीं जब हिंदी के युवा लेखकों की किताबें लाखों में बिका करेंगी, तब जाकर सच्चे अर्थों में बेस्टसेलर की अवधारणा साकार होगी.  


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7 thoughts on “बेस्टसेलर, युवा लेखन और ज्योति कुमारी का प्रथम कहानी संग्रह”

  1. चमत्कार! चमत्कार को नमस्कार!!" वैसे आज का युवा लेखक अपने लेखक होने को लेकर सजग है, वह कुछ और होने के बाद लेखक होना नहीं चाहता है, बल्कि लेखक होने के बाद कुछ और बनना चाहता है. वह लेखन को अपने कैरियर की तरह से देखता है." बिल्कुल सच कहा.. आज सब कुछ मैनेजमेंट और प्रोमो, प्रोमोट का युग है..ज्योति कुमारी का नाम पुस्तक मेले में ही हिट हो गया था.. इधर कविता के क्षेत्र में भी कुछ नए आलोचकों द्वारा नए कवियों को इसी तरह प्रोमोट कर उन में विलक्षण प्रतिभा और कविताएं बताई जा रही है ताकि…..?

  2. मेरे लिए तो यह चिंता की बात है मित्र ….| जिस दौर में अच्छे लेखन को समीक्षकों , हिंदी के आकाओं और तदनुसार पाठकों द्वारा भी हतोत्साहित किया जा रहा हो , और साधारण-औसत लेखन को इतना चढ़ाया बढाया जा रहा हो , उसमे ख़ुशी किस बात की | उसमें तो मातम ही मनाया जा सकता है |

  3. युवा लेखक अपने लेखक होने को लेकर सजग है,
    वह कुछ और होने के बाद लेखक होना नहीं चाहता है, बल्कि लेखक होने के बाद कुछ और बनना चाहता है. वह लेखन को अपने कैरियर की तरह से देखता है. एक ज़माना था कि जब कोई व्यक्ति अपना परिचय लेखक के रूप में देता था तो सामने वाला पूछता था कि लेखक तो ठीक है लेकिन आप करते क्या हैं.

    स्वप्न लोक??

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बेस्टसेलर, युवा लेखन और ज्योति कुमारी का प्रथम कहानी संग्रह

एक अच्छी खबर है कि युवा लेखिका ज्योति कुमारी के पहले कहानी संग्रह \’दस्तखत और अन्य कहानियाँ\’ की एक हजार प्रतियाँ महज दो महीने के अन्दर बिक गईं. यह युवा लेखकों का उत्साह बढाने वाला है. आज इसको लेकर वाणी प्रकाशन ने इण्डिया इंटरनेश्नल सेंटर में एक कार्यक्रम का आयोजन किया जिसमें युवा लेखन और बेस्टसेलर को लेकर एक परिचर्चा का आयोजन भी किया. प्रस्तुत है युवा लेखन और बेस्टसेलर को लेकर मेरा लेख-  जानकी पुल.
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हिंदी के साहित्यिक परिदृश्य के लिए यह एक घटना है. युवा लेखिका ज्योति कुमारी के पहले कहानी संग्रह ‘दस्तखत और अन्य कहानियां’ की १००० प्रतियाँ सिर्फ दो महीने में बिक गई. वाणी प्रकाशन के प्रबंध निदेशक अरुण माहेश्वरी ने बताया कि सबसे सुखद यह रहा कि ये प्रतियाँ आम पाठकों ने खरीदी. यानी पुस्तकालयों के थोक खरीद के आधार पर यह आंकड़ा नहीं निर्धारित किया गया है. जानकर सुखद लगता है कि हिंदी में साहित्यिक पुस्तकों का बाजार विस्तृत हो रहा है. कहानी संग्रह के नए संस्करण के विमोचन के बहाने वाणी प्रकाशन ने बेस्टसेलर की अवधारणा और युवा लेखन को लेकर कार्यक्रम का आयोजन किया और बड़े स्टार पर लोगों का ध्यान इसकी तरफ खींचा.
यह युवा लेखन के लिए भी सुखद है कि एक प्रकाशक है जिसकी दिलचस्पी केवल उनकी किताबों को प्रकाशित करने में नहीं है, बल्कि वह उसे ब्रांड की तरह से प्रचारित-प्रसारित भी कर रहा है. सबसे बढ़कर यह कि उसकी किताबों को पाठकों तक पहुंचाने में दिलचस्पी ले रहा है. हिंदी के लिए यह नई बात है और युवा लेखकों के उत्साह को बढाने वाला भी है.
वैसे आज का युवा लेखक अपने लेखक होने को लेकर सजग है, वह कुछ और होने के बाद लेखक होना नहीं चाहता है, बल्कि लेखक होने के बाद कुछ और बनना चाहता है. वह लेखन को अपने कैरियर की तरह से देखता है. एक ज़माना था कि जब कोई व्यक्ति अपना परिचय लेखक के रूप में देता था तो सामने वाला पूछता था कि लेखक तो ठीक है लेकिन आप करते क्या हैं. लेखन को हिंदी समाज में हॉबी की तरह देखा जाता था या अकादमिक जगत तक सिमटी रहने वाली गतिविधि के रूप में. आज का अधिकांश युवा लेखन अकादमिक जगत के सर्टिफिकेट के बिना ही अपनी पहचान बना रहा है. यह युवा लेखन का आत्मविश्वास है, अपने लेखन पर भरोसा है और अपने पाठकों पर वह पकड़ जो हिंदी साहित्य के उस दौर की याद दिलाता है जब किताबें हजारों में बिका करती थी, बल्कि उस दौर के कई साहित्यिक उपन्यास लाखों में बिक चुके हैं.
आज हिंदी का युवा लेखक लोकप्रिय साहित्य लिखकर बेस्टसेलर नहीं होना चाहता है, बल्कि हिंदी का अधिकांश युवा लेखन गंभीर साहित्य को लोकप्रिय बनाने का उपक्रम है. अरुण माहेश्वरी ने एक बहुत अच्छी बात कही कि पहले युवा लेखक पहचान बनाने के लिए प्रकाशक के पास आता था लेकिन आज जब कोई युवा लेखक प्रकाशक के पास आता है तो उसकी पहचान पहले से बन चुकी होती है. आज सोशल मीडिया है, ब्लॉग हैं, वेबसाईट हैं. ये लेखक की पहचान बना रहे हैं, उनको पाठकों से जोड़ रहे हैं- सीधा.
बहरहाल, ज्योति कुमारी के प्रथम कहानी संग्रह की एक हजार प्रतियाँ दो महीन के अन्दर बिक गई. कुछ-कुछ ईर्ष्या हो रही है, लेकिन बहुत सारा आत्मविश्वास भी पैदा हो रहा है. यह मिथ टूटा है कि हिंदी में पाठक नहीं हैं. हिंदी में पाठक हैं, अगर कोई प्रकाशक उन तक पहुँचने के उपक्रम करता है तो पाठक उस प्रयास को हाथोहाथ लेते हैं. लेखकों को पाठकों से जोड़ने का वाणी प्रकाशन का प्रयास स्वागतयोग्य है. वह दिन दूर नहीं जब हिंदी के युवा लेखकों की किताबें लाखों में बिका करेंगी, तब जाकर सच्चे अर्थों में बेस्टसेलर की अवधारणा साकार होगी.  


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