मुझे तुम शोहरतों के दरमियाँ गुमनाम लिख देना

इस बार वीकेंड कविता में प्रस्तुत हैं जुबेर रज़वी की गज़लें. नज्मों-ग़ज़लों के मशहूर शायर जुबेर रज़वी किसी परिचय के मोहताज़ नहीं हैं. यकीन न हो तो उनकी नई ग़ज़लों का रंग देख लीजिए- जानकी पुल.
1.
वो बूँद-बूँद दमकता था मेंह बरसते में
ज़माना देख रहा था उसी को रस्ते में.

कुछ और भींग रहा था बदन पे पैराहन१   १. वस्त्र
खड़ा हुआ था वो गीली हवा के रस्ते में.

ये शामे-हिज्र ये तन्हाई और ये सन्नाटा
खरीद लाए थे हम भी किसी को सस्ते में.

जवाब के लिए बस एक सादा कागज़ था
मगर सवाल कई थे हमारे बस्ते में

न देखी जाए नमी हमसे उनकी आँखों में
बहुत हसीन जो लगता था हमको हँसते में.

खिराम२ उसका बहोत देर याद रहता था      २. मद्धिम चाल
वो एक शख्स जो मिलता था हमको रस्ते में.
2.
मुझे तुम शोहरतों के दरमियाँ गुमनाम लिख देना,
जहाँ दरिया मिले बेआब मेरा नाम लिख देना.

ये सारा हिज्र का मौसम ये सारी खाना-बीरानी१   १. घर की वीरानी
इसे ऐ जिंदगी मेरे जुनूं के नाम लिख देना.

तुम अपने चाँद तारे कहकशां चाहे जिसे देना
मेरी आँखों पे अपनी दीद२ की इक शाम लिख देना.  २. दर्शन

मेरे अंदर पनाहें ढूंढती फिरती है ख़ामोशी
लब-ए-गोया३ मेरे अंदर भी एक कोहराम लिख देना.   ३. बोलते होंठ

मैं अपनी दास्ताँ को आखिरे-शब तक तो ले आया
तुम उसका ख़ूबसूरत सा कोई अंजाम लिख देना.

वो मौसम जा चुका जिसमें परिंदे चहचहाते थे
अब उन पेड़ों की शाखों पर सुकूते-शाम४ लिख देना.   ४. शाम का सन्नाटा

शबिस्तानों५ में लौ देते हुए कुंदन के जिस्मों पे       ५. रात का ठिकाना  
हवा की उँगलियों से वस्ल का पैगाम लिख देना.

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मुझे तुम शोहरतों के दरमियाँ गुमनाम लिख देना

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मुझे तुम शोहरतों के दरमियाँ गुमनाम लिख देना

इस बार वीकेंड कविता में प्रस्तुत हैं जुबेर रज़वी की गज़लें. नज्मों-ग़ज़लों के मशहूर शायर जुबेर रज़वी किसी परिचय के मोहताज़ नहीं हैं. यकीन न हो तो उनकी नई ग़ज़लों का रंग देख लीजिए- जानकी पुल.
1.
वो बूँद-बूँद दमकता था मेंह बरसते में
ज़माना देख रहा था उसी को रस्ते में.

कुछ और भींग रहा था बदन पे पैराहन१   १. वस्त्र
खड़ा हुआ था वो गीली हवा के रस्ते में.

ये शामे-हिज्र ये तन्हाई और ये सन्नाटा
खरीद लाए थे हम भी किसी को सस्ते में.

जवाब के लिए बस एक सादा कागज़ था
मगर सवाल कई थे हमारे बस्ते में

न देखी जाए नमी हमसे उनकी आँखों में
बहुत हसीन जो लगता था हमको हँसते में.

खिराम२ उसका बहोत देर याद रहता था      २. मद्धिम चाल
वो एक शख्स जो मिलता था हमको रस्ते में.
2.
मुझे तुम शोहरतों के दरमियाँ गुमनाम लिख देना,
जहाँ दरिया मिले बेआब मेरा नाम लिख देना.

ये सारा हिज्र का मौसम ये सारी खाना-बीरानी१   १. घर की वीरानी
इसे ऐ जिंदगी मेरे जुनूं के नाम लिख देना.

तुम अपने चाँद तारे कहकशां चाहे जिसे देना
मेरी आँखों पे अपनी दीद२ की इक शाम लिख देना.  २. दर्शन

मेरे अंदर पनाहें ढूंढती फिरती है ख़ामोशी
लब-ए-गोया३ मेरे अंदर भी एक कोहराम लिख देना.   ३. बोलते होंठ

मैं अपनी दास्ताँ को आखिरे-शब तक तो ले आया
तुम उसका ख़ूबसूरत सा कोई अंजाम लिख देना.

वो मौसम जा चुका जिसमें परिंदे चहचहाते थे
अब उन पेड़ों की शाखों पर सुकूते-शाम४ लिख देना.   ४. शाम का सन्नाटा

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