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  • राजुला मालूशाही की कथा: मृणाल पाण्डे

     

    हिंदी की प्रसिद्ध लेखिका मृणाल पाण्डे बच्चों को न सुनाने लायक बाल कथाएँ लिख रही थीं। यह 28 वीं कथा और इस सीरिज़ की अंतिम कथा। इन लोक कथाओं के माध्यम से हमने देश की विविधवर्णी छवियाँ देखी, कथाएँ देखी। सीरिज़ की अंतिम कथा कुमाऊँ की प्रसिद्ध राजुला मालूशाही की कथा पर आधारित है। मृणाल पाण्डे जी आगे फिर कोई कथालोक रचेंगी। इसी शुभकामना के साथ यह कथा पढ़ते हैं-

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    राजुला मालूशाही की कथा:

    ( ‘काथा रै गे छ फूल ढबौ: कथा ही बची रह गई फूल ढल गया।’)

    शरीर पहले आया।बाद में यादें।जनम जनम तक खींचते छोह मोह।मोह के दिन कब खतम हों? धान के छिलके जैसी याद ही बच रहे फिर भी प्रेम तो नक्षत्र ठहरा।कुंडली में उलटा हुआ कि सुलटा, वर्जित हो या अनकहा, अपने हिसाब से उगने डूबनेवाला हुआ।

    बाद को बचनेवाली हुई कथा।

    फिर पीढी दर पीढी ऐसी कथाओं को पवाड़े ‘दुंग तुकी दुंग दुंग’, हुडके की थाप के साथ घुमंतू कथावाचक गानेवाले हुए।

    फूल ढल जायें पर कथा नहीं ढलती।

    बाजी लोगों को बिरंचि की आन, कि गा गा के मनुख जात के बीज जो हैं, सो सदा जिंदा रखना।

    बर्फीले पंचचूली पहाडों में बसे भोट देश की उपरली, मल्ला दारमा घाटी के व्यापारी सुनपति शौक की बेटी राजुला शौक्याणा- और बैराठ के राजपूत कुंवर मालूशाह की इस कथा का फूल खिला था कभी।

    भोट देश सुंदरियों की भूमि, जभी उसको शौक्याणी देश भी कहनेवाले हुए।घाटी के सबसे बडे व्यापारी सुनपति का व्यापार हुणदेश (चीन) तक चलता।पर शौका और रजपूत दो अलग कबीले हुए।उन के युवाओं के बीच रिश्ता वर्जित रहा।

    उससे क्या?

    दो दिन की अट मिली तो मनुख भूल जाता है सारी वर्जना।अपनी नाडियों में हर पल बजता मृत्यु का संगीत।

    उसी संगीत की यह कथा माँ ने बचपन में घुमंतू गायकों से बार बार सुनी थी।हमने उनसे।

    हर बार उसमें अपना कुछ जोड़ने का मोह भला कोई कथाकार कहो कैसे छोड़े? ?अस्तु।)

    दूर पंचचूली पहाड़ की घाटी में नंदादेवी की छांव तले बसी रंगीली नगरी बैराठ के राजा दुलाशाह की रानी धर्मावती सौ सौ सुख पा के भी दुखी पराणी।संतानहीन हुई।ज़िद चढी कि मकरसंक्रांति को पैदल वह बागेश्वरनाथ के दरवाज़े पर जा कर उनसे संतान की भीख मांगेगी।

    संयोग से उसी दिन मंदिर में मन्नत माँगने आई जोहार दारमा इलाके के शौका कबीले के व्यापारी सुनपति की घरवाली गंगुली।

    आशुतोष आदिदेव की किरपा से रानी धर्मा को चाँद सा बेटा जनमा मालूशाह, और सुनपति शौक के घर जनमी परम रूपसी कन्या राजुला।

    सुनपति शौकाओं के कबीले का तगडा मुखिया हुआ।बचन और हुकुम दोनो पत्थर की लकीर।देश परदेश फैला हुआ था व्यापार, घर में सोना ही सोना।तब भी और और की भूख।लेन देन का हुआ वह पक्का।

    सामान क्या नहीं लाता बेचता था सुनपति? सोना चाँदी, ऊन, ऊनी वस्त्र, कस्तूरी मिरग का नाफ, शेर के नख- दंत, बाघों की खाल के आसन, मृगछाला, पंचमुखी रुद्राक्ष।साथ में नमक, सुहागा और गंधरैण से कार्तिकी शहद तक सब्ब जिनिस।

    चीन का रेशम, तिब्बती याक गाय की पूंछ के बने चंवर, मिरग की छाल, सोना, मूंगा और तरह तरह के रतन की भी खान उसके तंबुओं में हुई।

    सुनपति शौका अपने भोट देश से कभी ऊपर की तरफ तिब्बत जाता तो कभी नीचे दूनागिरी परबत की घाटी में बसी नगरी बैराठ।कस कर भावताव करता, और भर झोली रुपया और दूना कीमती माल ले कर लौटता सुनपति।साथ में सदा रहती लाड लडैती बेटी राजुला और उसकी माँ गंगुली।

    इसी बीच एक बार जब वह हुणिया देश के राजा ॠषिपाल के देश व्यापार को गया तो बूढे राजा ने जुवाब कहलाया सुना राजुला शौक्याणा जैसी बान (सुंदरी) इलाके में नहीं।मुझसे शादी करा दो तो जो मेरा सो उसका।

    लालच मे उमर का विचार किये बिना वाग्दान कर आया हो सुनपति शौका।

    घर पर रजुला की चाची हुई उसकी प्यारी।अक्सर दोनो बरफ लदे पहाडों पर घूमती बतियातीं।जमुनोत्री शिखर पर खड़ी राजुला ने एक बार मृगी जैसे नयन उठा कर चाची से चार सवाल पूछे:

    ‘इस दुनिया का आधार कौन? दुनिया का सबसे सुंदर नगर, सबसे दुरलभ फूल, और सबसे सजीला वीर कौन?’

    चाची बोली, री, नन्ही सी है तू, पर तेरे सवाल तुझ से कहीं बडे हैं।

    तो सुन, दुनिया का आधार है, पर्वतों का राजा हिमालय जिसकी गोद में जनम ले कर, हम सबके शरीर पले हैं।यह जब तलक है, तब तलक हम सब हैं |

    हमारी दुनिया का अधार तिब्बत से बैराठ तक व्यापार चलानेवाला शौका कबीले का मुखिया तेरा पिता सुनपति है।उसका कहा कभी न टालना।तभी हमारी पालना होगी |

    फूलों में दुर्लभ फूल है ब्रह्म कमल, जहाँ ब्रह्मा जी सोते हैं, और जो सिरफ हमारी नंदा देवी की गोद में ही खिलता है।

    वीरों में इन दिनों जिसकी सबसे अधिक जयजयकार सुनती हूं, वह है दूनागिरि पर्वत के पास बसी वैराठ नगरी के राजा दुलाशाह का सपूत मालूशाह।

    एक रहस्य बताऊं? जब तेरी माँ को संतान नहीं हो रही थी, वह बागनाथ के मंदिर में संतान माँगने वैराठ नगर गई थी।उसी समय दुलाशाह की रानी धर्मावती भी बागनाथ ज्यू की शरण में आई।भगवान के सामने खडी दोनो एक साथ रोईं, फिर उनने साथ साथ बागनाथ ज्यू से संतानवती होने का वर माँगा था।उनकी किरपा से नवें महीने रानी धर्मावती को लड़का हुआ, जेठनी जी की गोद आई तू।

    बिछुडने से पहले दोनो ने अंकवार भेंट कर सोचा था कि हममें से एक को बागनाथ ज्यू बेटा दें, एक को बेटी तो अहा हम दोनो समधिनें बन जायें।

    आगे जैसी होनी।

    इतना सुनना था कि रजुला को रट लग गई बैराठ जाने की।बाप के तंबू में धडधडाती चली गई।सुनपति भारी मुनाफा कमाने की खुशी में साथी सौदागरों के साथ च्याक्ति के प्याले भर भर पीता था।बाप की गोद में बैठ कर राजुला बोली, मुझको तुम्हारे साथ बैराठ नगर जाना है।

    च्याक्ती के सुरूर से लाल सुनपति की आंखों में हंसी तैर गई।राह बडी दुर्गम है, बिटिया, वह बोला, व्यापारियों की टोली के साथ बरफ के बीच जानी अनजान जगहों पर रुकने में भी, चलने में भी तकलीफ ही तकलीफ।अहा ब्रह्मकमल जैसी सुकुमार मेरी लली कैसे चल सकेगी तू?

    पर नहीं।मालू के दर्शन की गुप्त साध गाँठ में बाँध चुकी राजुला ने हठ ठान रखा हुआ।

    ह्यूं(हिम) पडो बरफ सुआ, पंछी होती उडी आती मैं तेरी तरफ…

    चंपा फूली, जुई फूली, सरसों फूली चैता,

    राह तेरी तकती मैं खुद्द अजानी बनी मैता(मायके)..

    बेटी की दिन दिन सूखती काया देख माँ गंगुली शौक्याण हुई चौकन्नी।लाड से सर गोद में रख कर पूछा, री ये तुझे इन दिनों टकटकी लगा के पहाडों के पार देखता क्यों पाती हूं? मन में जो कष्ट है, माँ की गोद में डाल दे। जी हलका हो जायेगा।

    माँ की गोद में मुख डाल कर रजुला सब्ब कह गई।

    माँ को न कहने जैसा न अनकहने जैसा।

    बहुत सोच कर आंसू रोकती हुई बोली, इस बार अपने बाप के साथ बैराठ जाकर उससे मिल और कह कि जो तू असल कत्यूरियों का जाया है और तूने  धर्मावती का दूध पिया है, तो आके मुझको अभी शौक देश आ कर बैराठ ले जा, वरना मेरा लालची बाप अपना बनिज ब्यापार बढाने को मेरा हाथ हुणिया राजा ॠृषिपाल को पकडा देगा।’

    करम गति जो है सो टारे नाहीं टरे।

    रात सोई तो कुलदेवता भैरव ने सपने में आकर मना किया, ‘लली मत जा।मालू तेरे कबीले का नहीं।तेरा उसका मिलना वर्जित हुआ।बाप और हुणिया राजा के विपिरीत जाकर बरफ भरी राह पर चलने से भी जियादे दुक्ख पायेगी तू।’

    रजुला को न डिगती देख आखिरकारी भैरव देवता उड कर उससे पहले जा पहुंचे बैराठ और मालूशाह को बारह बरस के लिये नींद में सुला आये।

    आगे सुनो।सारे देवी देवताओं का स्मरण कर रजुला ने याचना की कि वे उसे भव बाधा पार कर मालू तक जानें में मदद करें।और अष्टमी के दिन बैराठ नगरी जा ही पहुंची राजुला।देवी का दिन हुआ अष्टमी, चैत का मास। लोगबाग सब जा रहे थे द्रोणागिरि देवी के थान।चल दी राजुला भी।मां दर्शन करा दे।जहाँ कहीं भी है वह बैरी, जिसके लिये माँ जनम से पहले मुझे प्रेम की डोर से बाँध आई थी।

    बाप के बाजार जाते ही अभिसारिका राजुला छुप कर जा पहुंची बैराठ के राजमहल।हरा भरा नगर, फ़ूल, पोखर की जलकुंभी की गंध, वनहंस, सब बगुले के बच्चे की तरह उसकी छाती के भीतर पंख खोले साथ साथ चले।हवा की तरह अबाध।

    भीतर से भी भीतर।

    अहा कार्तिकेय जैसा सजीला मालू छपरखट पर सोता था।गहरी नींद के घर में तृप्त बच्चे जैसा।जैसे भोर की स्निग्ध धूप हिमालय की चोटी पर शीश धरे सोती हो।प्रेम और आह्लाद से अलस रजुली को टकटकी लग गई।

    पर भैरव देवता का ताना सम्मोहन जाल काटना किसी के बस में नहीं था।

    बहुत जगाने पर भी मालू न जागा तो कोई आ न जाये इस डर से चुपचाप उसके नाम चिट्ठी छोडी और साथ लाई हीरे की अंगूठी उसे पहिना वापिस चली आई राजुला शौक्याणी।

    ‘सुनपति शौका की लली, गांगुली शौक्याण की चेली,’ यहाँ हुडके पर थाप देकर उसांस छोड़ते कथावाचक कहते हैं, ‘हा हा हा!’

    राजुला को बाप के साथ देश वापिस आया देखा तो भैरव देव ने चैन की सांस ली।छोरी उनके ही कुल थान की हुई।उसका अरिष्ट कट जायेगा सोच कर देवता ने सम्मोहन का घेरा हटा दिया।

    जैसे ही घेरा हटा बैराठ नगरी में मालू जाग गया।

    जागा तो एक अजीब सी खुशबू आई।फिर चिट्ठी और हाथ की अंगूठी पर नज़र फिर गई राजकुंवर की।

    चिट्ठी उठा कर पढने लगा मालू।

    अहा पृथ्वी की किसी पगडंडी ने न देखी होगी राजुला ऐसी कन्या जो अकेली आ कर अपना पिरेम जता कर पानी के वेग से लौट जाये।न होती चीठी तो पता भी न चलता कि उसके शयन कक्ष में जो सुगंध व्यापी थी वह किस रूपसी के केशों से झरी थी।हंस के पंख, नौले का पानी, सबसे अधिक उजले होंगे उसके पैर जिनमें चिपकी लाल लाल कोई भागवान काई उसके कालीन पर अब भी चिपकी थी।कौन सी लहर उसे लेने आई थी, हाय वह दे ख न पाया।

    हा! हा! हा! दुंग तुकी दुंग दुंग! मनुख मर जाते हैं, बोल रह जाते हैं।हा! हा! हा!

    ओ री रजुला! तेरा मेरा क्या हो? तेरा सुनपति शौका जैसा बाप और मेरा राजघराना कभी राज़ी होंगे?

    संसार का सारा बैराग छा गया मालू के मन में।सीधा जा पहुंचा गुरु गोरखनाथ के आश्रम में कि मुझे दीक्षा दो बाबा, जोगी बन जाता हूं करके।

    लंबी साधना के बाद दीक्षा का टैम आया तो गुरु ने आदेश दिया, तुझको एक बार बैराठ जा कर माता के हाथ से खाना खाना पडेगा तब तेरी दीक्षा पूरी होगी।

    गुरु की बात कौन टाल सकता है भाई।वह भी गुरुओं के गुरु गोरखनाथ।

    गया मालू।बैराठ गया।मां खुशी से पगला गई।साफे की किनारी से आंखें पोंछते बाप ने पहले टेढी निगाह से देखा फिर लिपटा लिया।

    अहा रे माया! दुंग तुकी दुंग दुंग!

    खाना खा कर मालू माँ के रोके न रुका।यक्षिणी सिद्ध हुई उसको।वह ले उडी उसको सीधे राजुला के देस दारमा जोहार।जोगी के भेष में मालू गगास नदी के किनारे बने शिवमंदिर में चिमटा गाड कर वहीं रम गया।

    उधर अपने जासूसों से रजुला के बाप को खबर हुई कि उसकी पीठ पीछे छोरी राजमहल जा कर मालू को हीरे की अंगूठी पहनाय आई है तो कोप से नाच उठा।

    तिब्बत देश के हुणिया राजा की वाग्दत्ता है तू।तेरी हिम्मत कैसे हुई अपनी छाँह भी उस मालूशाह के महल में डालने की?

    बेटी पर तलवार लिये सात सात भडों का पहरा बिटा कर कुचक्री बाप ने हुणिया राजा से कहा, हो जमाई जू छोरी को ले जाओ, फिर शुक्रास्त हो जायेगा उसके बाद मलमास लगनेवाला है।अंतिम महूरत अब्भी ही हुआ।

    बूढा राजा तुरत बारात ले कर आन पहुंचा।

    कुचक्री सुनपति ने अपने भड के हाथ शिवमंदिर के जती को विष की खीर भेजी।खाते ही जोगी बेहोश हो गया।भड यह मान कर कि अब तो राजकुमार मालूशाह दम तोड ही देगा, लौट आया।

    राजुला को बता दिया गया कि जती बन कर आया बैराठ का राजकुमार मालू शिवमंदिर में मरा पडा है।वह बिलख कर गिर पडी।पर सुनपति को अपने व्यापार की चिंता थी।उसकी लडकी राजा की रानी बनी तो तिब्बत से चीन देश तक व्यापार का सारा मारग उसके कब्जे में होगा।

    जियो! उसने भड से कहा।एकाधिकार! बेटी को तालाबंद कर दिया जुलमी ने!

    मनुखों के मुख कान बंद कर भी दो तो क्या? ईश्वर ने और भी तो पराणी रचे हैं जो मनुखों जैसे डरपोक लालची नहीं होते?

    सदा से आजाद फिरनेवाले बनपंछियों के मन में बार बार जंगल आ कर उनके बीच रमनेवाली सुनपति शौका की राजुला की सिसकियाँ सुन कर बडी करुणा उपजी।अहा बिन आजादी के बंद ऐसी अपरूप कन्या मालूशाह की जगह बूढे के साथ ब्याही जायेगी क्या?

    पंछियों की सभा हुई।मोनाल पक्षी ने बीडा उठाया कि वह खिडकी से भीतर किसी तरह परवेश करेगा और राजुला की मदद करेगा।घुसा।मोनाल घुस ही गया एक छोटे से सूराख से।सात सात भडों को चरका देकर वह जा पहुंचा राजुला के पास।चेली, वह बोला, तू शोक न कर, मालू मरा नहीं, गुरु की आन और शिव वरदान से जहर ने उसे बेहोश भर किया है, मारा नहीं।

    राजुला की सांस लौटी।विस्फारित आंखों से वह मुनाल को ताकती रही जब तक बाहर से दरवाज़े खुलने की आहट न आई।हम सिदुवा बिदुवा तांत्रिकों की मदद से तुम्हारा मिलन करायेंगे, फुसफुसा कर मुनाल पंछी उड गया।

    राजमहल की दासियों ने जबरन राजुला को शादी का जोडा पहनाया और सर से पैर तक गहने।

    बूढे हुणिया राजा ने कन्यादान के समय शौक्याणी का रूप देखा तो चुंधियाई आंखें और चुंधिया गईं।लार चुआता फेरे ले कर शादी के मंडप में जा बैठा।फिर परनपरानुसार उसने नवेली से पूछा बोल तू अपने शरीर अपनी कुंवारी कोख के बदले क्या मोल माँगती है?

    ‘बारह बरस तक तू मुझको अपनी बेटी की तरह रख।फिर मेरा तन मन धन तेरा ’ रजुला बोली।लार चुआता बूढा ॠषिपाल राजी हो गया।होश कहाँ था उसको ऐसी रुपसी बान को देखने के बाद?

    रो धो कर मां बाप ने राजुला को बिदा किया।

    गवनहारियाँ गाती रहीं,

    बाबा की मैं बैरी माई, कुघर बिकवाई झम्म!

    बाबा का लाडिला सोना, सुनपति की जाई झम्म!

    मैके की माटी मां हिराणी याद ही बची झम्म!

    पर बेटी को पराण की तरह जुदा करती माँ का दिल अन्यायी नहीं होता।

    सुनपति की पीठ पीछे राजुला की मां ने चुपचाप मालू की मां को खबर करा दी थी कि ऐसा अनर्थ हो रहा है।मालू रजुला की रक्षा को धर्मावती रानी ने राजा को बताये बिना  गुपचुप एक दस्ता सैनिक और अपने मायके के दो सिद्ध तांत्रिक भेज दिये जो शिवमंदिर के पीछे घाट में थे कि डोली रुके।

    ‘रस्ते में प्यास लगी है’, कह कर राजुला ने डोली शिवमंदिर के थान पर रुकवाई।खंभे के पीछे खडे मालू की माता धर्मावती के भिजवाये दो सिदुवा बिदुवा तांत्रिक बाहर आये और ‘जय गुरु की आन’, कह कर गोरखनाथ की धूनी की एक मुट्ठी राख उन्ने फेंकी।

    पालकी कहार बेहोश हुए।

    फिर दूसरी मुट्ठी राख की फेंक कर मंतर पढ कर दोनो प्रेमियों को तोता बना कर उनने उडा दिया।

    हुणिया राजा ॠषिपाल को खबर लगी,

    हाय हाय नथ को पंवर

    डोली रुकी वहां छिपा बैठा था भंवर…हा हा हा

    हुणिया राजा ने अपना तांत्रिक बुलाया।यह तांत्रिक बाज बन कर तोते तोती बन कर उडते प्रेमियों का पीछा करने लगा।

    धणिये का बीज

    राजा न खाये शक शुबहा

    वो रजुला उसकी चीज |

    मालू की माँ का भिजवाया भड मृत्युपाल सामने आया।उसने बाण मार कर ॠषिपाल के तांत्रिक को धरती पर गिरा दिया।

    खिन्न हो कर राजा रिखीपाल लौट गया हुणिया देस।

    देवी को तखत,

    तू मेरी जोग्याणी बनी सुआ, मैं तेरो भगत!

    सुनपति अक्कास की तरफ मुंह कर हाथ जोड कर कन्या से छिमा माँगता रहा।माया ने मुझको अंधा कर दिया था लली।जा चली जा।तू जी ले अपनी जिन्नगी।

    अंधे को जोत नीं, बैरी को ओट नीं, फूसफास से चोट नीं, हाड पर मांस नी, पत्थर पर घास नी।

    कानाबाती कुर्र, मालू राजुला फुर्र!

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