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  • पंखुरी सिन्हा की कहानी ‘मृग मरीचिका और कस्तूरी कथा’

     

    पंखुरी सिन्हा की कहानियों ने इक्कीसवीं शताब्दी के पहले दशक में आलोचकों-पाठकों सभी को प्रभावित किया था। वह कविताएँ भी लिखती हैं, हिंदी अंग्रेज़ी दोनों भाषाओं में लिखती हैं और प्रकाशित हैं। यह उनकी नई कहानी है। समकालीन जीवन संवेदनाओं से लबरेज़। आप भी पढ़कर अपनी राय दें-

    =====================जब तक वह साथ रहा, सब भला चंगा रहा। दिन राजी ख़ुशी, हंसी ठहाकों, रमन चमन में, पंख लगाकर कैसे उड़ गए पता ही नहीं चला। लेकिन उसके ट्रिप पर जाते ही एक अपरिचित डर ने लतिका को घेर लिया। वह आत्माओं, स्पष्ट शब्दों में कहे तो भूतों के अपने खौफ से बखूबी परिचित थी, लेकिन उसकी इंटेंसिटी, ख़ौफ़नाक डिग्री, उसकी मारक तीव्रता और बेदम कर देने वाली निरंतरता से अपरिचित थी। उसने अब तक मैट्रिमोनियल वेबसाइट पर तमाम विधुरों के प्रस्ताव इसी डर की वजह से ठुकरा दिए थे। लेकिन, मयंक उसकी ज़िन्दगी में बेमौसम की बहार सा आया, मानसून से पहले किसी तपते दिन में टूटकर हुई बारिश की तरह, जिसने उसे सराबोर कर दिया, किसी आंधी और तूफ़ान की तरह जो उडा ले गया उसे। ठगी सी देखती रह गयी वह, अब उसके जाने के बाद अकेली उसके घर में खुद को! अपने घर में, वह होता तो फ़ौरन कहता। इन तीन महीनों में, इतना प्यार दिया उसने उसे कि उसका स्पर्श, उसकी आवाज़, उसकी खुशबू अब भी जेहन में मौजूद महसूस हो रहीं थीं। फिर यह किन आहटों पर चौंक कर बेआराम हो रही थी वह? मयंक के रहते कभी नहीं सुनी ऐसी कोई ध्वनि! भरम है, मन का खौफ! काश मयंक कुछ दिन और रुक जाता! जल्दी आऊंगा, बोल कर गया है। अबकी साथ ले जाऊँगा, बोलकर गया है। घर के चप्पे चप्पे से वाकिफ करवा कर गया है। काम ही ऐसा है कि काम तो तीन महीने पूरा काम, फिर तीन महीने पूरा आराम। कोई ऐसा वैसा काम नहीं, अमेज़न के जंगलों में नेचुरल गैस ढूंढना। दिलेरी चाहिए, बहादुरी चाहिए और जाने कैसा फौलाद का जिगर! जंगल में पहुँच कर आधा सफर उस विशाल जंगली नदी पर कभी छोटे जहाज़, कभी छोटी सी नाव में! लतिका ने साथ जाने की बहुत ज़िद की, तो मयंक ने कहा था ‘देखो, कहीं, एनाकोंडा फिल्म की शूटिंग न हो जाए!’ ‘लेकिन, तुम जो इतनी बार जाते हो’, लतिका ने भी मचल कर कहा था। ‘मैं बचपन से जा रहा हूँ, मुझे इस तरह जाने की ट्रेनिंग मिली है, इंजीनियरिंग कॉलेज में दाखिला लेकर मैंने इन ट्रिप्स पर जाने की पढ़ाई पढ़ी है। जाओगी तुम, ऐसी भी क्या जल्दी?’ और चला गया था मयंक!

    सचमुच, ऐसी क्या जल्दी? क्या बेचैनी है यह? यह कैसा ख़ौफ़? दिन भर किसी मकड़ी के जाले में जैसे उलझी रहती है वह! किसी टीनएज लड़की की तरह, डूबी हुई उसके प्यार में, डोलती फिरती है खाली घर में। कुछ है जो बहुत अविश्वसनीय सा लगता है। अविश्वसनीय लगती है यह गति जिसने टोर्नेडो की तरह उसे लाकर इस अजनबी घर में कैद कर दिया है! लेकिन, वह तो कैद में नहीं! प्रेम बंधन है जिसके मूर्त बाहु पाश को वह तरस रही है। अविश्वसनीय हैं, भटकती हुई आत्माएं, भूत कथाएं, पिशाचों की हस्ती। लेकिन हर बार की तरह, वह बेसमेंट में मुड़ती हुई डरती है, जाने पीछे क्या खड़ा मिल जाए! तब भी, जबकि उसकी कमीज़ें फैब्रिक सॉफ्टनर डाल कर धोती हुई, उनमें समा जाना चाहती है वह, उसकी बाहों में समाने की तरह। और ठीक उसी क्षण, जब वह मशीन पर झुकी थी, कपड़ों को वॉशर से ड्रायर में डालती हुई, उसने बेसमेंट की खिड़की से ठीक सामने, लॉन की घास पर एक जोड़ी कदमों को चलते देखा। ये तो किसी आगंतुक के चलने की राह भी नहीं। घर का पिछले हिस्सा है। पैर नाज़ुक से दिखे थे, ये बताना कठिन था कि स्त्री के थे या पुरुष के। तो उसकी सारी आशंका सच होने जा रही थी। कोई भटक रहा था यहाँ? कहीं कोई इंट्रूडर तो नहीं? उसने याद करने की कोशिश की, बेसमेंट में कोई फोन भी नहीं। सेल फोन भी किचन आइलैंड पर छोड़ आयी थी। यों जहाँ खड़ी थी, वहां से हिलने की हिम्मत नहीं थी। खुद को चिकोटी काट कर देखना चाहती थी कि सब सुन्न तो नहीं हो रहा, कहीं वह कोई दुःस्वप्न तो नहीं देख रही, या फिर अपने सीने पर हाथ रख कर देखना चाहती थी दिल धड़क रहा है या बंद हो गया!

    ठीक तभी, घंटी बजी। सन्नाटे को चीरती हुई या परे धकेलती उन अनाम शब्दों, वाक्यों, अधूरे लफ्जों को, जो किसी अदृश्य जाले में फंसे इधर उधर लटक रहे थे, घंटी की आवाज़ उस तक पहुंची तो उसे लगा ‘थैंक गॉड’, कोई इंसानी हस्ती है। लेकिन, अगर पैर किसी भटकती हुई रूह के हो सकते हैं तो वो घंटी क्यों नहीं बजा सकती? क्या भूतों के इंसानी शक्ल लेकर चकमा देने के किस्से मशहूर नहीं? और अगर असल इंसान की खाल में इंट्रूडर हुआ तो? कोई भला सामने से न आकर लॉन से घूमता हुआ क्यों आएगा? मयंक की बात याद आने लगी, ‘यहाँ बहुत से होम ब्रेक इन, शूट एट साइट होते हैं, दरवाज़ा हमेशा अच्छी तरह देख समझ कर खोलना, की होल, फिर स्टॉर्म डोर, और फिर पूछ कर ही।

    स्टेप बाई स्टेप ऐसा ही कर, लतिका ने अपने सीधे से बेताब सवाल को अपनी ही आवाज़ में रूपांतरित शब्दों में सुना, “हु इज़ इट?”

    “वालंटियर”, थोड़ी देर का विराम हुआ इस एक शब्द के बाद, और फिर उसी आवाज़ ने कहा, “फ्रॉम द कैंसर रिसर्च फाउंडेशन ऑफ़ अमेरिका”। लतिका ने दरवाज़ा खोल दिया। सामने एक अधेड़ उम्र की अमेरिकी भद्र महिला खड़ी थीं। “यहाँ साल भर के भीतर कैंसर से एक दर्दनाक मौत हुई थी”, महिला ने कहना शुरू किया तो लतिका उन्हें भीतर ले आयी। पहले उन्होंने मना किया फिर आकर सोफे पर बैठ गयी। “हमारी पॉलिसी है कि मृत्यु के एक साल के भीतर हम मृतक के घर एक बार ज़रूर जाते हैं। बाकी हमारी मीटिंग्स, शोध चर्चाओं की सूचनाओं की चिट्ठियां आप तक डाक से आती होंगी और आती रहेंगी।”

    “जी”, लतिका ने विनम्रता पूर्वक कहा तो महिला ने भी उतनी ही शिष्ट आवाज़ में उसका परिचय पूछ लिया, “आप?”

    ‘मैं, मृतक की रिप्लेसमेंट हूँ, नयी पत्नी’, लतिका के भीतर से एक आवाज़ ज़ोर से चिल्लाई, लेकिन फिर पता नहीं क्या सोच कर वह बोल गयी, “मैं बहन हूँ उसकी, सामान लेने आयी थी। मम्मी पापा भी उसे बहुत मिस करते हैं।” कहकर लतिका ने रुआँसा चेहरा बनाया।

    “हाँ, बहुत अच्छी औरत थी वह। जब तक अटेंड कर सकी हमारी हर मीटिंग अटेंड की। अपने बहुमूल्य अनुभव साझा किये। उनके पति कभी नहीं आये साथ। अच्छा ही हुआ, अंत के आस पास वो बहुत खुल कर बोलने लगीं थीं।”

    कहकर  उन्होंने एक बहुत गहरी, अर्थपूर्ण दृष्टि से लतिका  की ओर देखा।

    “क्या कहती थी दीदी?”

    “क्या जीजू ने अंतिम दिनों में दीदी का साथ नहीं दिया?” लतिका की अपने पति के बारे में जानने की इच्छा इतनी तीव्र हो उठी कि वह सम्पूर्ण जासूसी पर उतर आयी।

    “साथ नहीं दिया? जान ले ली उसकी! इस हद तक फर्टिलिटी ट्रीटमेंट करवाया और तब तक करवाता रहा जब तक उसे कैंसर नहीं हो गया!” अजनबी महिला की आँखें भर आयीं।

    महिला ने जैसे तय कर लिया था कि निकलना भी पड़ा तो प्रोफेशनल दायरे से निकलकर इस केस की अंदरूनी बातें, जितनी भी वह जानती थी लड़की के घर वालों तक पहुंचा देगी। वह जानती थी लड़की अपनी फैमिली के संपर्क में थी, लेकिन पता नहीं कितना कहा होगा! पति की उपेक्षा ने उसे बहुत अकेला कर दिया था। हेयर लॉस के बाद से बातें भी बहुत कम होतीं थीं उनकी। दिन भर वह अपने मोबाइल पर ही लगा रहता।  बैडरूम अलग, खाने पीने की रूटीन अलग। और फिर आप जानतीं होंगी, उसकी लम्बी पोस्टिंग अमेज़न के जंगलों में होती थी। छुट्टियों में भी कहीं और रहने लगा था। हाँ, पैसे की दिक्कत उसने नहीं होने दी। लेकिन, प्यार मिलता तो कुछ और समय तक ज़िंदा रहती वह।

    “अच्छा, अब मैं चलती हूँ”, अपनी बात ख़त्म कर वह उठ खड़ी हुईं और एक संदिग्ध दृष्टि लतिका पर गड़ा दी कि कहीं तुम इस घर की नयी औरत तो नहीं? नयी गृहस्वामिनी हो तो भी सुन लो, ज़रूरी बात तुम्हारे लिए बताने आयी हूँ।

    लतिका को जैसे साँप सूंघ गया था, काटो तो खून नहीं वाली हालत! मयंक ने उसे ठीक उलट एक कहानी सुनाई थी। घबराहट शायद एक मामूली सा भाव था, लतिका को लग रहा था वह एक ऐसी नांव में सवार कर दी गयी है, जिसमें बे पेंदी के लोटा की तरह पानी तेज़ी से भरता जा रहा है। नाँव डूबने को है, कोई बचाने वाला तैराक नहीं और उसे बिल्कुल नहीं आता तैरना! वह इस हद तक सकते में थी, कि बहन होने का विश्वास करने लायक अभिनय करना भी भूल गयी थी। यह एहसास उसे महिला के साथ बाहर लॉन में निकल आने पर हुआ था। फिर उसे, लगा था बहन होती तो भी ऐसी ही बेदम, बेआवाज़ हो गयी होती। कई बार सगे सम्बन्धी भी हर बात पे नहीं रो पाते। क्या पता, बहन को कुछ एहसास भी हो? ऐसा कोई चौंका देने वाला नहीं था, लतिका का बर्ताव!

    खूब ढ़ेर सारी तसल्ली देकर वालंटियर चली गयी। लतिका ने कुछ और देर रुकने को कहा तो बोली, “बहुत से घरों में जाना है, बहुत से मिलते जुलते केसेज़!” हाथ मिलाकर वालंटियर रवाना हो गयी। उसके रुखसत होने के कुछ देर बाद तक लतिका बगीचे में टहलती रही। घास में पीले रंग के फूल खिल आये थे। कुछ वीड्स भी कास के फूलों की तरह खिले थे। सच, अपने देश में लोग गड्ढों में कास की भी तस्वीरें सजाते हैं और यहाँ वीड किलर्स ले कर दीवाने हैं ज़रा सा गोल, सफ़ेद, रुई से खिले फूलों को हटाने के लिए! सबको घास एकदम हरी और मखमली चाहिए। लतिका का लॉन की सेवा में जुटने का मन नहीं हुआ। अप्रैल का महीना था। वसंत अपने चरम पर।  हवा खुशनुमा थी। उसमें तमाम अजनबी फूलों के पराग थे। लतिका का इस प्रायद्वीप में यह पहला वसंत था, अनेकानेक रंगों में पेड़ों की शाखों पर प्रस्फुटित होता हुआ! जहाँ रंग नहीं थे, वहां भी मेपल के पत्तों में कलियाँ थीं और एक ताज़ी खुशबू पहुँच रही थी लतिका तक। जैपनीज़ मेपल की मैरून कलियाँ पूरे शहर की सुर्ख़ियों में थीं।

    लेकिन, इस दिलकश समां में भी लतिका का दिल न लगा। उचाट मन लिए वह भीतर जाकर सोफे पर पड़ रही। फिर न जाने किस बेचैनी से संचालित एकदम उठी और कुछ खोज निकालने के इरादे से मयंक की स्टडी में चली गयी। स्टडी क्या लम्बा चौड़ा कमरा था, बिस्तर और किसिम किसिम की रेक्लाइनिंग कुर्सियों वाला ! कहाँ से शुरू करे वह? ‘मेरी नंबर वन हॉबी है, थ्रिलर्स पढ़ना, मर्डर मिस्ट्रीज़’! एक दम शुरूआती दिनों में उसने कहा था और एकदम आम बात लगी थी। उसके अपने भाई की भी यही हॉबी थी। अगाथा क्रिस्टी और शेरलॉक होम्स की किताबें उसके घर में बचपन से ही ऐसी बिखरी रहतीं थीं जैसे मम्मी की सरिता और गृहशोभा। लेकिन, उसके बाद मेडिकल थ्रिलर्स की इतनी किताबें थीं कि लतिका का सर घूम गया। उनमें से एक, जिसका शीर्षक ‘ब्लड टेस्ट’ था, उठा कर वह एक आराम कुर्सी में धंस गयी।

    पहले पन्ने पर मयंक का नाम लिखा था। उसके क्लासिक साइन ऑफ अंदाज़ में, जिससे उसने उसके दिल, उसके दिमाग, उसकी समूची ज़िन्दगी पर वो हस्ताक्षर किया था कि वही जानती थी!  उसके नीचे किताब खरीदने की तारीख थी, महीने और साल के साथ। कहीं कोई बात नहीं थी चौकाने वाली। किताब ज़रूर कुछ ख़ौफ़नाक हो सकती थी। अस्पताल में काम करने वाला एक असिस्टेंट, धीरे धीरे कुछ मरीज़ों को पोटैशियम दे देकर मारता है, इस तरह कि पकड़ा न जाए। लेकिन अंत में, तब पकड़ा जाता है जब बहुत से ठीक होते मरीज़, अचानक चल बसते हैं और सबकी पोस्ट मोर्टेम रिपोर्ट में पोटैशियम की मात्रा अधिक पायी जाती है। कुछ समय तक अस्पताल में, कृत्रिम ढंग से होने वाली मृत्यु का पता तो चल जाता है लेकिन हत्यारे की तलाश जारी रहती है। सभी सतर्क हैं। सबको नज़र रखने की हिदायत है। और ऐसे में, एक रात एक मरीज़ के इंट्रा वीनल आयरन इन्फ़्युज़न के दौरान नर्स उस असिस्टेंट को बिना कारण पोटैशियम मिलाते रंगे हाथ पकड़ लेती है। होता ये है कि हत्या करने की आदत हो जाने के बाद, उससे रहा नहीं जाता। मरीज़ों को एक साथ बहुत ढेर सारा पोटैशियम चढ़ा कर वह उन्हें तड़प तड़प कर मरता देखता। लतिका ने भी इंटरनेट पर सर्च कर देखा था कि खून में अचानक पोटैशियम की मात्रा बढ़ने से हृदय गति में किस किस्म के जानलेवा उतार चढ़ाव आ सकते हैं।

    और फिर एक के बाद दूसरा, हफ्ते भर में ऐसे कितने उपन्यास पढ़ गयी वह। कितने तरीके हो सकते हैं, एक इंसान को मार कर बच निकलने के, ये इन किताबों को पढ़कर सीखा जा सकता था। क्या वह खुद ठीक पढ़ रही थी इन किताबों को? क्या उसकी सोच पर हावी नहीं हो गयीं थीं, किसी और की बातें? शुरूआती दिनों में भी मयंक ने पत्नी के प्रति गंभीर प्रेम का अपार प्रदर्शन किया था। किसकी माने वह? दोनों में से सच कोई एक बोल रहा था! लेकिन क्या ये ज़रूरी था? क्या ये सम्भव नहीं, दोनों के अंतर्मन अपने बच्चे की आखिरी कोशिश तक एकाकार रहे हों, बस ज़िम्मेदारी नहीं उठा पा रहे हों उस चाहत की! एक दूसरे पर थोप देना अपनी इच्छाओं का बोझ, दुनिया का सबसे आसान तरीका होता है। लेकिन मयंक की भाषा एकदम अलहदा थी। वालंटियर महिला की भी। रात को बगीचे में एक पत्ता भी खड़कता तो लतिका किसी तीसरी भाषा, किसी तीसरी आवाज़ के अंदेशे से चौकन्नी हो जाती। एक नया जीवन, इस घर की चौखट तक आते आते रह गया था।  उसकी जगह आ गयी थी मृत्यु और उठा कर ले गयी थी संभावित माँ को! गूंजते गूंजते रह गयी थी जैसे एक शिशु की किलकारी और उसकी जगह पसरा था सन्नाटा, गूंजा था उसके प्रेमी का आर्त नाद! जीवन और मृत्यु के बीच की यह प्रक्रिया खुद जीवित थी यहाँ, ठहरी हुई आस पास, अगल बगल, इर्द गिर्द, ज़िंदा अदेह साँसों में! निरंतर वस्त्र परिवर्तन कर रही थी आत्मा, कपाल कुण्डला, चामुंडा, कामाख्या, चंद्र घंटा, कुषुमान्डा, काल भैरव की फुसफुसाहटों में! जन्म देना चाहती थी लतिका और अब तक भस्म नहीं हुआ था कामदेव का पुष्प बाण! अभी मूर्छित नहीं हुए थे कामदेव! खुली नहीं थी, अभी शिव की तीसरी आँख और रोकना था उसे अपने इष्ट देव को त्रिनेत्र होने से! रोकना था उसे प्रलयंकर का तांडव और स्वयं नहीं जानती थी लास्य नाचना! वह पार्वती होना चाहती थी, होना आराध्या! जप, तप, जो मिले करने को तैयार थी विध्वंस रोकने को!

    वह याद करना चाहती थी मयंक का प्यार और उसकी आवाज़ में उसकी पत्नी की मौत का किस्सा दुहरा रहा था खुद को! ‘कितना कहा था मैंने बेबी हम एक बच्चा गोद ले लेंगे! केवल तुम्हारा प्यार भी पर्याप्त है मेरे लिए! लेकिन नहीं मानी तो नहीं मानी।’ ऐसी कितनी बातें बताई थीं मयंक ने और हर बार किस्से का खात्मा कुछ इसी तरह होता था कि ‘बेबी अब तुम मेरा प्यार हो मेरी ज़िन्दगी! तुम्हारी ख़ुशी, मेरी भी ख़ुशी है। जैसा तुम चाहोगी, ठीक वैसा ही होगा।’ लगातार कहता था वो ये कुछ! और जब इनसे भी मुलायम शब्दों के साथ चूमा था उसने लतिका को तन-मन कंचन हो गए थे, जीवन सोने पे सुहागा!

    फिर कैसी घबराहट थी यह? क्या केवल खौफ था अकेलेपन का? वह पास नहीं था और पास थीं बहुत सी ऊल जुलूल मुश्किलें! पता नहीं किस घबराहट के लम्हे में, उसने फ़ोन उठाया था। “माय लव, माय लाइफ, माय हैप्पीनेस, माय वर्ल्ड” जी गयी थी वह उसका सन्देश पढ़कर! क्यों सोचती है वह उलटा पुल्टा! पुरानी बात है कि सबके अपने सच होते हैं! इन्हीं सचों को खंगालते, पूरी ज़िन्दगी निकल गयी। इतनी दूरी आ गयी, उसकी पहली शादी, उसके पहले प्यार में कि फर्टिलिटी ट्रीटमेंट तो दूर बेबी के लिए ट्राई तक नहीं किया उन्होंने! दूरियां ही दूरियां और पाटना केवल उसकी ज़िम्मेदारी! इतने झुकाव की अपेक्षा कि झुक कर दुहरी हो जाए उसकी कमनीय काया! और इसलिए इकहरी ही छोड़ दी उसने ज़िन्दगी अपनी! ये तो  उसके एकाकीपन में मिठास की सेंध सा लगाता मयंक आ पहुंचा था। जिसको मोह लेना कहते हैं, वैसा ही कुछ हुआ था जीवन में पहली बार! बह जाने दिया था लतिका ने खुद को! लुभा लिए जाने का, मुग्ध हो जाने का आनंद उठा लिया था उसने एक बार! बिना ज़्यादा छान बीन! बिना तहकीकात!

    चिंहुक कर फोन उठाया था उसने। “दवा खायी बेबी?” उस मधुर सम्बोधन के आगे के सन्देश में लिखा था। एकदम से मतली आने लगी उसे। लगा दवा गले में अँटक गयी है और उबकाई के साथ सब कुछ खाया पीया बाहर निकाल देगी। पता नहीं क्या आया मन में एक बारगी, उसने उसकी कंपनी का नाम गूगल किया, शहर के ब्रांच ऑफिस का नंबर निकाला और मिला दिया! लाइन बिज़ी का टोन आया। झल्ला कर उसने फोन रख दिया। लगा जैसे बुखार आ जाएगा और उसके साथ ही बुखार उतरते वक़्त का पसीना भी! अब जो बिज़ी जैसा सिग्नल आया, उसका टोन बिज़ी से अलग था। यह आवाज़ उधर के फोन के व्यस्त होने की नहीं, इधर की लाइन के ठीक काम नहीं करने की थी। और तभी गराज खुलने की आवाज़ आयी। इससे पहले कि वह डर की गिरफ्त में जाती , गराज़ की ओर का लिविंग रूम का दरवाज़ा खुला। सामने, मयंक खड़ा था। “हाय बेबी! कहोगी नहीं, व्हाट ए प्लीजेंट सरप्राइज!” कहकर मयंक ने अपनी बाहें पसार दीं। इसका मतलब था कि लतिका को उनमें समा जाना था। यंत्रवत वह उठी और उसी की आगोश में, उसी से छिप गयी। शायद चेहरे पर हवाइयां उड़ रहीं हों! “ब्राज़ील में अचानक आंधी तूफ़ान आ गया।  ख़ास, जंगल के जिस कोने में हम थे, वहां। कोई वार्निंग नहीं। शायद खबर भी नहीं बने उसकी, ऐसे इंटीरियर में काम करते हैं हम! बॉस ने कहा वापस, तो हमने भी वो पहली फ्लाइट पकड़ी कि सीधा और जल्दी से जल्दी तुम्हारे पास! तुम खुश तो हुई न डार्लिंग मुझे देखकर!” अब मयंक उसे अपने सीने से हटाकर उसके चेहरे के भाव पढ़ रहा था। ‘फेस रीडिंग’, उसके ज़ेहन में ये जुमला कौंधा था और उसने अपने चेहरे पर उड़ते तूफ़ान को कुछ शांत करने की कोशिश की थी। मयंक के सीने से लगी वह सोच रही थी पहले पुलिस को फोन करे या पापा को? पुलिस के लिए सबूत चाहिए था! उसके इसी इंडिवीडुअलिस्टिक स्वभाव ने उसे मुसीबत में डाला था। कुछ दोस्त तो थीं हीं अमेरिका में! लेकिन, बाद में!

    “क्या बनाऊं तुम्हारे लिए? तुम फ्रेश हो जाओ तबतक फटाफट कुछ फेवरेट रेडी करती हूँ।” उसने जाने कहाँ से एक मुस्कराहट भी बटोर कर अपने चेहरे पर खींच ली थी। सेल फोन बगल में किचन स्लैब पर पड़ा था। मम्मी का नंबर चार कदम दूर था पर मिलाये कैसे? इतना रोमांटिक उसने मयंक को कभी नहीं देखा। “हनी सिवाय तुम्हारे मैं कुछ भी नहीं खाना चाहता!” उसने लतिका को गोद में उठा लिया था। ये लतिका की वयस्क ज़िन्दगी में पहली बार हो रहा था कि कोई उसे अपनी बाहों में उठाये सीढ़ियां चढ़ रहा था।

    एक भुतैला, बनैला, डरावना सा रोमांच हावी हो रहा था उस पर। क्या वशीभूत होकर इस रोमांच के वह झेल जायेगी एक बलात्कार? क्यों नहीं कह देती चीखकर ‘झूठे हो तुम, फ़रेबी, मक्कार, हत्यारे! फंसाया है तुमने मुझे! जाने किस जाल में?’ अगर सीधा अभियोग नहीं तो अपना संदेह क्यों नहीं साझा कर लेती? क्या गला दबा देता वह उसका? क्या हथियार थे इस कमरे में? क्या वह अपने हाथों से चोट पहुंचाने के काबिल था?  किसके साथ हमबिस्तर होती रही थी वह? डूबती उतराती रही आनंद के ज्वार भाटे पर? जब अपने ऊपर झुके हुए धूर्त से अधिक घृणा उसे अपनी बेचारगी से हो आई तो आवाज़ में पास बची सारी मधुरता को लपेट समेट कर उसने कहा, “हनी, मैं फ्रेश होने जा रही थी जब तुम आये! थोड़े से हॉर्मोन पिल्स लिए थे, ब्लीडिंग अब बंद है लेकिन थोड़े से आफ्टर इफेक्ट्स हैं।”

    “तुम भी यार ऐन वक़्त पर गच्चा मार रही हो!” उसकी शकरपारे सी आवाज़ में पहली बार झल्लाहट साफ़ दिखाई दे रही थी। “वो क्या है कि शादी के बाद पहली बार काम से लौटा हूँ न! एक तड़प है, एक बेचैनी! जल्दी हो आओ जानम! ये रहा लू!” हाथों से इशारा करते हुए उसने कहा था। मुस्कराहट भी बटोर कर पोत, फैला ली थी उसने अपने चेहरे पर! वह चित्त जैसा होने को हुआ तो एड़ी चोटी का ज़ोर लगा कर लतिका उसकी गिरफ्त से छूट निकली और दौड़ती हुई ही बोली, “नीचे के वाशरूम में रखा था, पूरा फ्रेश होने का किट! प्लीज गिव मी फिफ्टीन मिनट्स स्वीट हार्ट!”

    बिजली की गति सी लपकती, नीचे पहुंचकर उसने फोन उठाया था और खुद को वाशरूम में बंद कर पापा का फोन मिलाया था। पहला ख्याल यही आया था कि इस दरवाज़े को तोड़ने में उसे दस मिनट से ज़्यादा नहीं लगेंगे। अभी अभी ऊपर उसकी आँखों में एक खूंखार चमक देखी थी लतिका ने! जंगली जानवर जैसी हिंसक! क्या उसे लगा था ख़त्म हो रहा है उसका खेल? और बिना नकाब, बिना दुराव छिपाव, अपनी असल आई डी के साथ, वह शिकार करना चाहता था डरती सहमती लतिका का! जैसे चील दबोचती है, गौरैय्या को!

    वह कैसे दे सकती थी यह कुत्सित सुख उसे? कैसे दे सकती थी खुद को इतने घने अपमान का दुःख? रोकना ही था उसे, जिसका आह्लाद दूसरे की पीड़ा में था। पापा का नंबर रिंग होने लगा तो उसे एहसास हुआ वह थर थर काँप रही थी। घबराहट इतनी थी कि पसीने छूट रहे थे, आंसू पलकों की कोरों तक भी पहुँच नहीं पा रहे थे। कहीं पापा बाथरूम में न हों! कैसे कहेगी उनसे कि दूसरी बार भी चूक गयी है वह! गलत खेल गयी है ज़िन्दगी की यह कीमती दूसरी पारी भी! कहीं नाराज़ न हों जाएँ पापा! रात आधी से ज़्यादा बीत चुकी होगी इंडिया में! मम्मी को फोन इस करके नहीं किया कि एक दम से परेशान हो जाएंगी! उन्हें कभी पता नहीं होता क्या करना है! पापा घबराते भी हैं तो रास्ता  बता देते हैं ज़रूर। पता नहीं कितने मिनट बचे हैं उसके पास! दिल धुक धुक कर रहा था कि जाने कब दुनिया का सबसे बड़ा केयरटेकर हाज़िर न हो जाए उसकी ख़बर तलाशता, “नॉक, नॉक, ऑल ओके हनी?” उसने सोच लिया था पापा को फ़ौरन कॉल बैक करने के लिए कहेगी, दौड़ कर गार्डन में चली जायेगी, एक दम आखिरी सिरे पर! अगर वह आ गया कहेगी पापा का बीच रात फ़ोन आया है, घर में किसी की तबियत ख़राब है। किस की तबियत ख़राब कहेगी वह? बिल्कुल अच्छी नहीं लगतीं ऐसी स्कूली बहानेबाज़ियाँ उसे! उसे लग रहा था, बेहोश हो जायेगी। “अर्जेंट है पापा, रियल इमरजेंसी”, उसने खुद को बोलते सुना और पलक झपकते बगीचे के अंतिम छोर पर पहुँच गयी। चप्पल उतार कर खड़ी हो गयी घास पर। घास में अब भी नमी थी। इस दोपहर भी सब वैसा ही था, शांत और सुन्दर! “ये आदमी फ्रॉड है” से शुरू होकर उसने पापा को सब कुछ बता दिया था!

    अचानक हवा कुछ तेज़ हो गयी थी। क्रैब ऐप्पल और चेरी के फूल नीचे झर रहे थे। “बिल्कुल मत घबराना लता! बहुत से अपने लोग हैं वहां। दूर तो कई करीबी हैं, पास में भी बहुत सारे हैं। लता, ज़रा भी परेशान होने की ज़रूरत नहीं। मेरी बात ध्यान से सुनो,” पापा लगातार बोल रहे थे। लतिका के भीतर बर्फ की सिल्ली सा जम रहा ख़ौफ़, किसी झरने की तरह आँखों से बह रहा था। वह धार धार रो रही थी। उसने कसकर होंठ भींच लिए थे ताकि सस्वर रुलाई पापा को सुनाई न दे जाए। लगता था, उसकी हिचकियाँ बंध जाएंगी। “भीतर बिल्कुल मत जाना लतिका। पुलिस को फोन करो। वो किसी वीमेन’स हेल्प लाइन को फोन कर मदद करने वाली स्त्रियों को बुला देंगे। उनके साथ आज के आज, अभी के अभी निकल जाओ। उससे कहो, किसी मित्र का एक्सीडेंट हुआ है। वो ट्रौमा सेंटर में है और तुम्हें फ़ौरन पहुंचना है। अगर यह आदमी डिस्टर्ब करे तब पुलिस को तत्काल इंटरफेयर करने के लिए कहो। जल्दी करो बेटा। पुलिस का नंबर डायल करो। सबकुछ कह डालो उनसे। उनके साथ किसी सुरक्षित जगह पहुंचो। मैं तब तक निकटतम  मित्र से संपर्क करता हूँ। पता भेज रहा हूँ जल्दी। बिल्कुल तुम्हारे पास हूँ लता, तुम्हारे साथ।”

    रास्ता बिल्कुल साफ़ था। पुलिस पहुँचने वाली थी। उनके साथ कुछ देर अपने केस पर बोल चुकने के बाद, लता बेहतर महसूस कर रही थी। एक दम आज़ाद! अपने घर, अपने लॉन में किसी बेगानी की तरह अकेली खड़ी। अपना घर? ख़त्म हो चुकी उसकी प्रेम कहानी। फिर ये घर क्या? ये देश भी उसका नहीं। पुलिस भी बेगानी है। समस्या केवल एक है। वह अपनाना चाहती है ये सब कुछ—ये देश, ये हवा, ये मिटटी, ये पानी! ये व्यवस्था! निकालेगी कोई समाधान यहाँ की पुलिसिया व्यवस्था इसके लिए भी कि वह शान्ति पूर्वक रह सके यहाँ, कमा खा सके, घूम सके स्वंछंद। अभी तलाक में मयंक की आईडी का खुलासा होगा। वैसे पापा का अंदाजा सही था। इतने लाटरी स्कैम्स थे अखबारों की सुर्ख़ियों में, जो लड़कियों को प्यार के जाल में फंसा कर पैसे ऐंठते, क्या क्या नहीं करते थे! क्या क्या शक्ल ले रहा था व्हाइट कॉलर क्राइम!

    दूर से उसने पुलिस की नीली गाड़ी को पास आते देखा। एक नहीं दो दो। शायद एक उसके और एक मयंक के लिए। आखिरी बार, उसने अपने लगाए ट्यूलिप के बल्ब्स की ओर देखा। वे कल खिलने की तैयारी कर रहे थे।

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