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  • कथा-कहानी
  • निहाल पराशर की कहानी ‘कहानी फैक्ट्री’

    आज पढ़िए युवा लेखक निहाल पराशर की कहानी ‘कहानी फैक्ट्री’। यह कहानी भोपाल से निकलने वाली पत्रिका ‘वनमाली कथा’ में प्रकाशित हुई है। यह कहानी मुझे कई कारणों से अच्छी लगी इसलिए आप लोगों के लिए प्रस्तुत कर रहा हूँ। कहानी में एक स्तर पर गंभीर और लोकप्रिय साहित्य का विमर्श भी है तो दूसरी तरफ़ आज का समय और लेखन पर उसके दबावों के संकेत भी हैं, लेकिन बिना लाउड हुए। साथ ही, कहानी बहुत रोचक शैली में लिखी गई है। समय निकालकर पढ़ियेगा- मॉडरेटर

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    जब मैं पहली बार उससे मिला तब भी मैं जानता था मैं एक बड़े कहानीकार से मिल रहा हूँ। इतने सालों से उसे पढ़ते आया था। मुझे सबसे पहले उससे पूछना चाहिए था, “आप कहानी कैसे लिखते हैं?” पर मैंने पूछा, “आप सिगरेट पीते हैं?”

    “छोड़ने की कोशिश कर रहा हूँ।” फिर वो चुप रहा। “तुम्हारे पास सिगरेट है क्या?” मेरे पास सिगरेट थी। और हम दोस्त बन गये।

    मैं तो कहीं से भी शुरू हो गया! ये भला क्या कहानी हुई? शुरू से शुरुआत करता हूँ।

    1.

    दिल्ली एक बड़े समुद्र की तरह है, जहाँ हमारे छोटे शहरों की नदियाँ मिलती हैं। स्कूल के बाद एक बड़े शहर जाना था क्योंकि मेरे शहर में अब मेरे लिए कुछ बचा नहीं था। किसी ने पूछा भी नहीं, मैंने सोचा भी नहीं। बड़े शहर का मतलब हम सभी को पता था- और मैं दिल्ली की ट्रेन पर सवार था। ये सफ़र भले ही सोलह घंटे का था, लेकिन मेरे परिवार को इस सफ़र को पूरा करने में कई पीढ़ियाँ लग गयीं। मैं अपने परिवार से पहला था जो दिल्ली यूनिवर्सिटी तक पहुँच पाया। घर वालों ने वही सोचा था- आर्ट्स लिया है, साथ ही साथ UPSC की तैयारी भी कर लेगा।

    लेकिन मैं हाथ से निकल चुका था। UPSC का U भी मुझे छू ना सका। पर थियेटर पूरा का पूरा शरीर के अंदर घुस गया। दिल्ली यूनिवर्सिटी जाते ही अगर आप थियेटर के वायरस से टकरा जायें तो जीवन बहुत अलग हो जाता है। अजीब-अजीब नाम के साथ आप रहने लगते हैं- काफ़्का, दोस्तोवेस्की, ब्रेख़्त, दारियो फ़ो, बेकेट- इनको अगर नहीं जाना तो काहे का DU थियेटर वाला? मैंने भी कुछ नाम रट लिए थे। कोई भी मिलता, उसे ये नाम चिपका देता। और सिग्नल दे देता कि मैं कहानियों को जानता हूँ, मैं कहानीकारों को जानता हूँ। मैं आम इंसान नहीं हूँ। मैं इंटेलेक्चुअल बनने की राह पर था।

    पर ये तो इंटलेक्चुअल दिखने की कोर्स के सेट नाम हैं। इसके अलावा अगर कोई नाम लेता तो हम नये बने इंटेलेक्चुअल की बोलती बंद हो जाती। “मिथिल कुमार को पढ़े हो?” थर्ड ईयर के अनिल भैया ने मुझसे पूछा। “नहीं मैं फ़िलहाल इंडियन राइटर्स को नहीं पढ़ रहा हूँ।” मैंने फर्स्ट ईयर के एरोगेंस के साथ जवाब दिया।

    अनिल भैया शायद सही में इंटेलेक्चुअल बन चुके थे। इसलिए वो बस मुस्कुराए और कहा, “जब इंडियन राइटर्स को पढ़ने का समय आये तब मिथिल कुमार को पढ़ लेना।” लेकिन मैं नहीं रुका। “अभी मैं काफ़्का को पढ़ रहा हूँ। इससे अच्छा कोई क्या ही होगा! एवरेज राइटर्स को पढ़ने का मन नहीं है।”

    अनिल भैया ने इसके बाद कुछ नहीं कहा और नाटक की रिहर्सल करने लगे। लेकिन मैंने अपनी मोबाइल के नोट्स में चुपके से मिथिल कुमार लिख लिया था। मैं जानता था अनिल भैया किसी का भी नाम ऐसे ही नहीं लेते। वो सच में कोई अच्छा राइटर ही होगा। लेकिन जैसे कॉलेज के समय अपने हार्ड डिस्क में खूब सारी फ़िल्म इकट्ठा करके उन्हें देखना भूल जाते हैं, वैसे ही अपने नोट्स में कई राइटर्स के नाम के बीच मिथिल कुमार को भी मैं भूल चुका था।

    मुझे क्या ही मालूम था इस राइटर से भविष्य में मेरा सामना होने वाला था।

    कॉलेज के दिन बीत रहे थे। थियेटर में मन लग चुका था। साल भर के अंदर ही दिल्ली के प्रेम में मैं चूर हो चुका था। नहीं, उसका नाम दिल्ली नहीं था। मैं असल में पारुल के प्रेम में चूर हो रहा था- और लोगों को कहता कि मैं दिल्ली से प्यार करता हूँ। असल में पारुल दिल्ली से ही थी। लाजपत नगर से। उसके साथ दिल्ली की सड़कें नापते हुए मैं हर कदम प्यार में डूबता जा रहा था। हम दोनों साथ ही थियेटर करते थे। मुझे आश्चर्य होता है कि पाँच महीने में मुझे इतना ज़्यादा प्यार कैसे हो गया कि जब उसने बोला, “इट्स ओवर रोहन…” मैं अपने आपको सम्भाल नहीं पाया। अभी तो मुझे दिल्ली से प्यार हुआ था। और अभी… बस अभी… सब ख़त्म!

    “लेकिन क्यों? सब तो सही चल रहा है?”

    “तुम बहुत कंट्रोल करते हो। मुझे तुम्हारे साथ घुटन होती है। डोंट गेट मी रॉंग। तुम अच्छे हो। बेहतर हो सकते हो।”

    मैं बच्चों की तरह रोने लगा था। ऐसे कोई रिश्ता कैसे ख़त्म कर सकता है? और अगर मैं बेहतर हो सकता हूँ तो मुझे मौक़ा तो दो बेहतर होने का! पर ये सब मैं अपने मन में बोल रहा था, पारुल से नहीं। पारुल ने मुझे रोता देख मेरे सिर पर हाथ रखा, बिल्कुल वैसे जैसे माँ मुझे रोता देख समझाती थी। “रो मत। यू विल ग्रो अप। मैं तुम्हारे लिए ये किताब लेकर आयी हूँ, इसे हमारा क्लोज़र समझना।”

    क्लोज़र! मतलब इसके बाद हम दोनों एक-दूसरे के लिए ख़त्म हो जाएँगे? जब कॉलेज में मिलेंगे तो दोस्त की तरह मिलेंगे या वो भी नहीं? एक रिश्ते में क्लोज़र कैसे आता है? शायद ऐसे ही… इसके बाद पारुल मुझे लाजपत नगर के ‘मैक डी’ में फ़्रेंच फ़्राइज़, आलू टिक्की बर्गर और एक किताब के साथ अकेला छोड़ कर चली गई। कुछ देर बाद मैं भी अपने ब्रेकअप को भूल कर आलू टिक्की बर्गर खा रहा था। फ़्रेंच फ़्राइज़ सॉगी हो चुके थे। और मेरी नज़र किताब पर लिखे नाम पर गई- मिथिल कुमार… उपन्यास का नाम था ‘अख़बार का अंतिम पन्ना’।

    2.

    ‘उस अंतिम क्षण के लिए जब मैं दुनिया से विदा लूँगा… दुनिया पर हँसते हुए।’

    मिथिल कुमार के उपन्यास के पहले पन्ने पर ये लिखा था।ये जो भी राइटर रहा होगा, आख़िर उसके जीवन में इतने लोग आये होंगे, लेकिन डेडिकेशन के लिए उसे यही किताबी लाइन मिली? कितनी अजीब सी लाइन है ये? ‘जीवन के अंतिम क्षण’ को कौन किताब डेडिकेट करता है? आप मेहनत करके एक किताब लिखते हैं, इतने सारे लोग आपका साथ देते हैं… और आप उसे जीवन के अंतिम क्षण को समर्पित कर देते हैं! शीयर एरोगंस!

    पर मैं उस समय हर तरीक़े से इतना ख़ाली था कि उसके उपन्यास को पढ़ता गया। ‘अख़बार का अंतिम पन्ना’ दर असल मिथिल कुमार के पत्रकार जीवन में घटे और देखे गये सच्ची घटनाओं पर आधारित उपन्यास था।

    ये उनका पहला उपन्यास था। इसके लिए उन्हें साहित्य अकादमी का युवा पुरस्कार भी मिला था। पर अवार्ड के परे ये मिथिल कुमार फैन्स के बीच सबसे लोकप्रिय रचना थी। इसके अलावा भी उन्होंने दस-बारह और किताबें लिखी थी। और वो लगातार लिख ही रहे थे।

    मैंने जब उपन्यास पढ़ना शुरू किया तो मैं मिथिल कुमार से इम्प्रेस होना भी नहीं चाहता था। मैं तो उसे कोसना चाहता था। ये पारुल का सबसे फेवरेट राइटर था। उसके मन में बेकार की बातें इसने ही अपने किताबों से भरी होंगी! ऐसा मैं सोच रहा था। लेकिन अंतिम पन्ने तक पहुँचते-पहुँचते मैं भी उस छोटे से कल्ट का हिस्सा बन चुका था जिसे ‘मिथिल कुमार फैन क्लब’ कहा जा सकता है। मैंने भले ही इंटेलेक्चुअल बनने की प्रक्रिया में खूब सारे लेखकों को पढ़ा हो, वो सब सच में महान भी थे, लेकिन मिथिल कुमार को पढ़ कर लगा मैं थोड़ा समझदार हुआ हूँ। हर किताब के साथ ये नहीं होता- लेकिन इस किताब के साथ वो हुआ। मुझे पहली बार लगा लेखक बनना एक बड़ा काम है। और मैं इस काम के लिए तैयार था। एक लेखक अपना वंश बढ़ाना जानता है। वो शब्दों से अपने प्रशंसक भी पैदा करता है और नये लेखकों को भी। प्रशंसक तो ख़ैर प्रशंसक हैं। लेकिन नये लेखक बनाना वंश बढ़ाना है।

    ‘अख़बार का अंतिम पन्ना’ 1990 के भारत में सेट है। कहानी आसिफ़ नाम के एक नये बने पत्रकार के इर्द-गिर्द घूमती है। आसिफ़ बड़ी उम्मीदों के साथ जर्नलिस्ट बना है- जैसा हर बाईस साल के इंसान को लगता है, आसिफ़ को भी लगता है वो दुनिया बदल देगा। दिल्ली में पले-बढ़े आसिफ़ को बिहार के नक्सली इलाक़े कैमूर में एक बड़े नक्सल लीडर से मिलने भेजा जाता है, तब वो पहली बार दुनिया की सच्चाई को क़रीब से देखता है। एक आइडियल वर्ल्ड में जीने का सपना उसे बहुत छिछला नज़र आने लगता है। वो समझता है एक बहुत बड़ी आबादी के लिए सिर्फ़ जीना ही बड़ी बात है। हमारे आसपास इतना कुछ घट रहा होता है जिससे हम अनभिज्ञ रहते हैं। हमारा जीवन दुनिया को कोसते हुए आगे बढ़ता है। ये उपन्यास मिडिल क्लास के सभी प्रपंचों को सामने लेकर आता है।

    मिथिल कुमार का कहना था कि ये कहानी उनके दोस्त आसिफ़ नाम के पत्रकार की थी जो दिल्ली के एक समृद्ध अपर-मिडिल क्लास परिवार से संबंध रखता था। वो इतना अरामतलब जीवन जी रहा था कि उसे मालूम ही नहीं था इस देश में मुस्लिम होना क्या होता है। आसिफ़ और मिथिल ने एक साथ ही अख़बार में पत्रकारिता शुरू की थी। रिपोर्टिंग के लिए देश के अलग-अलग हिस्सों में वो साथ ही गये भी थे। कैमूर भी वो साथ गये थे जहाँ वो क़रीब दो महीने रहे। इसके बाद आसिफ़ कहीं ग़ायब हो गया। मिथिल ने उसे खोजने की बहुत कोशिश की, लेकिन वो कभी मिला नहीं। उस समय आसिफ़ के ग़ायब होने पर काफ़ी हो-हल्ला भी हुआ था। लेकिन कुछ सालों में सब आसिफ़ को भूल गये। पर मिथिल ने आसिफ़ को खोजना कभी बंद नहीं किया।

    इसी खोज की प्रक्रिया में उन्होंने ये उपन्यास लिखा था। उनका मानना था कि आसिफ़ दुनिया में लिखा सब पढ़ जाता है। वो जहाँ भी होगा, इस उपन्यास को ज़रूर पढ़ेगा। ये उपन्यास एक उम्मीद के साथ लिखा गया था। हर कहानी जिसमें एक उम्मीद की किरण हो, आपके अंदर भी कुछ रोशनी पैदा करती है। मिथिल कुमार की किताब के साथ ऐसा ही था।

    कॉलेज का अंतिम साल था। मैं भी एक लेखक बन गया।

    लिखना एक अलग प्रक्रिया है। आपने भले ही लाखों बड़े राइटरों को पढ़ा हो- जब आप लिखने बैठते हैं तो आप और आपकी सच्चाई ही सामने होती है! मेरे जीवन में ऐसा कुछ घटा नहीं था जिसके कारण मैं बड़ा कुछ लिख दूँ। मिला-जुला कर एक ही दुःख था- पारुल से हुआ ब्रेकअप। लेकिन जबसे शुभांगी मेरी गर्ल फ्रेंड बनी थी, ये दुःख भी जाता रहा। वैसे शुभांगी मेरा लिखा सब पढ़ती थी। ये उसके प्यार दिखाने का तरीक़ा था। पर मेरी एक कविता में पारुल का ज़िक्र था- ‘तुम्हारे घुंघराले बालों में मैं अपने जीवन के सभी शाम बिताना चाहता हूँ…’ तो उसने मुझसे पूछा, “मेरे तो स्ट्रेट बाल हैं। तो ये किसके घुंघराले बालों के बारे में लिख रहे हो? पारुल के कर्ली हेयर्स इतने याद आ रहे हैं?” मैंने कविता वहीं चेंज की- तुम्हारे घने-सीधे बालों में मैं अपने जीवन के सभी शाम बिताना चाहता हूँ। पर बहुत देर हो चुकी थी।

    ख़ैर, मुद्दे की बात ये कि मुझे लिखने के लिए कुछ मिल ही नहीं रहा था। मैं लिखता तो क्या ही लिखता? कहानी लिखना, उपन्यास लिखना तो बहुत दूर की बात थी। मैं यहाँ एक ढंग की कविता नहीं लिख पा रहा था! फिर मैं दुनिया के महान लेखकों की तरफ़ बढ़ा। सभी किताबें सच में पढ़ने लगा। अब समय था कि मैं दुनिया के लिए नहीं अपने लिए इन लेखकों को पढ़ूँ।

    दरियागंज की सड़कों पर मुझे मिथिल कुमार की दस किताबें एक साथ बहुत कम क़ीमत पर मिल गयीं। मैं दूसरे लेखकों को भी पढ़ना चाहता था। लेकिन मैं लगातार मिथिल कुमार को पढ़ता गया। हर कहानी में मेरे आसपास की दुनिया- लेकिन ऐसा लगता जैसे मैं इस दुनिया को जानता भी नहीं हूँ। हर कहानी के अंत में मेरा ख़ुद के लिए ग्लानिभाव बढ़ता जा रहा था। पर सबसे मज़ेदार बात ये कि भले ही कहनियाँ का विषय भारी रहा हो, पर लिखने की शैली और क्राफ़्ट इतना दमदार था कि आप कहानी में फँसते ही चले जाते हैं। हर किरदार निखर कर बाहर आता है। इंटेलेक्चुअल दिखने का नाटक नहीं लगता। कहानी में कहानीपन मौजूद। उफ़्फ़!

    इसी बीच मुझे भी मेरी पहली कहानी मिल गई। बचपन के दिनों की एक घटना याद आयी। मैंने पहली कहानी लिखी। कहानी दोस्ती की थी। एक दोस्त को संतरा बहुत पसंद होता है तो दूसरा दोस्त कहानी के अंत में संतरे का पेड़ बन जाता है। इस कहानी का नाम नहीं सूझ रहा था तो मैंने इसका नाम रखा- ‘संतरे का बीज खाने से पेट में संतरे का पेड़ उग जाता है’। हर जगह इस कहानी को भेजने लगा। किसी पत्रिका में, तो किसी दोस्त को। मिथिल कुमार का ईमेल एड्रेस भी उनकी किताबों में लिखा होता था। मैंने एक मेल उन्हें भी भेजा।

    ‘मिथिल कुमार जी,

    मैंने आपकी सभी किताबें पढ़ी हैं। आपको पढ़कर ही लिखना भी शुरू किया है। मुझे जितनी ख़ुशी आपको पढ़कर होती है। उतनी शायद ही किसी और को पढ़कर होती है।

    मैं इस मेल के साथ अपनी पहली कहानी भेज रहा हूँ। आप बताइएगा आपको कैसी लगी।

    इंतज़ार में।

    रोहन।’

    मेल भेज कर मैं भूल भी गया। कॉलेज के अंतिम दिन थे। अब मैं ही कॉलेज के थियेटर ग्रुप का प्रेसिडेंट था। नाटक करता। फर्स्ट ईयर का कोई लड़का मेरे सामने ज़्यादा काफ़्का और दोस्तोवेस्की करता तो मैं भी मिथिल कुमार का नाम पूछ लेता। वो चुप हो जाता, और मैं रिहर्सल करवाने चला जाता।

    कई दिनों बाद मुझे मेल आया। ‘मिथिल कुमार’ की तरफ़ से।

    ‘रोहन,

    मैंने तुम्हारी कहानी पढ़ी। मासूमियत है। क्राफ़्ट की समझ है तुम्हारे पास, जो बहुत कम लोगों के पास होती है। लिखते रहो।

    पर मुझे कहानियाँ भेजने की ज़रूरत नहीं है। किसी को भी भेजने की ज़रूरत नहीं है। ख़ुद के लिए लिखो। मेरी या किसी और की वैलीडेशन के लिए नहीं।

    बाक़ी, जीवन रहा तो मिलेंगे।’

    इस मेल के दूसरे हिस्से से तो मुझे मतलब ही नहीं था। ‘क्राफ़्ट की समझ है तुम्हारे पास’ मैं तो यहीं अटक गया। मुझे मिथिल कुमार का वैलीडेशन मिल गया था। इससे मुझे ये फ़ायदा तो हुआ कि मैं झट से दूसरी कहानी लिखने लगा। ये थोड़ी लंबी कहानी थी। इसके बाद तीसरी कहानी… और फिर ख़ूब सारी कहानियाँ।

    3.

    हमारा जिया जा रहा जीवन बेहद आम होता है। कहानियों का संसार इस आम जीवन में रोमांच लेकर आता है। मैं कहानियाँ इसलिए नहीं लिखता कि मुझे कहानियाँ लिखना पसंद है। मैं इसलिए लिखता हूँ कि इस पहाड़ से जीवन को कुछ मतलब दे सकूँ। बहुत कोशिशों के बाद भी मैं इसे मतलब नहीं दे पाता। पन्ने ख़त्म होते हैं। जीवन बीतता चला जाता है।

    कॉलेज के बाद बहुत तरह की नौकरियों के बावजूद मेरे अंदर का लेखक ज़िंदा रह गया। मैंने कहानियों में अपना घर खोज लिया था। मैं जैसा जीवन जीना चाहता था, वैसी कहानियाँ लिखता। जैसा जीवन जी रहा हूँ लिखने में कुछ मज़ा नहीं आता। फैंटसी कहानियाँ, एक अलग जीवन की कहानियाँ, मिथकों पर कहानियाँ- ये मुझे आकर्षित करते।

    याद आता कॉलेज के दिनों में मैं कैसी कहानियाँ लिखता था। वो अब बचकानी जान पड़ती। मेरे पसंद के लेखक भी बदलते गये। जो पहले पसंद थे, अब उन्हें पढ़ने का मन नहीं करता। हमेशा लगता कुछ नया चाहिए। कुछ नये के चक्कर में दुनिया भर के लेखकों को पढ़ लेता।

    नौकरी के साथ-साथ ही मैंने अपनी पहली किताब लिखी। हिन्दी में। रोमांटिक उपन्यास। किताब ख़ासी पॉपुलर हुई। लोगों ने कहा हिन्दी को चेतन भगत मिल गया है। मुझे इसी बात से कोफ़्त हुई। ये क्या तुलना है? क्या हिन्दी को एक नया रोहन मिला है- ऐसा कोई क्यों नहीं लिख सकता! लेकिन लोगों को तुलना पसंद है। ख़ैर, मुझे पता था एक किताब से कुछ नहीं होता। इसलिए मैंने दूसरी किताब लिखी, फिर तीसरी। सही मायने में पॉपुलैरिटी तो तीसरी किताब के बाद ही बढ़ी। मुझे अच्छा भी लग रहा था। मेरी सभी किताबों पर फ़िल्म बन रहे थे। एक लेखक के तौर पर सफलता क्या होती है? इस देश में, या फिर इस देश के बाहर भी, अगर आपकी किताब पर, कहानी पर, सिनेमा बन जाये तो आप सफल हो। कोई बोले या ना बोले, लेकिन चाहते सब यही हैं।

    अलग-अलग लिटरेचर फेस्टिवल वाले बुलाने लगे, मैं जाने लगा। झूठ नहीं बोलूँगा, एक समय के बाद लिटरेचर फेस्टिवल जाना सबसे उबाऊ काम हो जाता है। कई लिटरेचर फेस्टिवल तो ऐसे हैं जहाँ साहित्य से बेहतर गोलगप्पे मिलते हैं। आप गोलगप्पे के शौक़ीन हैं तो इस फेस्टिवल में ज़रूर जाइए। लेकिन लिटरेचर के लिए नहीं।

    ट्विटर पर किसी ने मेरे बारे में लिखा कि ‘अगर रोहन किसी भी लिटरेचर फेस्टिवल में हो तो समझ जाइए वहाँ का खाना वहाँ के साहित्य से बेहतर होगा!’ मुझे हँसी आयी। एक समय के बाद इस तरह की बात पर आप बस हँस सकते हैं। अगर आपके लिखे की लड़ाई राजमा-चावल से हो रही हो तो आप कैसे जीत जाएँगे? आपका कुछ भी लिखा दम बिरयानी से कैसे जीत सकता है? खाना इंसानी सभ्यता की सबसे बड़ी उपलब्धि है। हज़ारों सालों से जो आर्ट-फॉर्म सर्वाइव कर रहा है, उससे कोई भी लेखक एक कहानी में कैसे बेहतर बन जाएगा? इसलिए मैं भी इन फेस्टिवल में तब ही जाता जब ये बिल्कुल मालूम हो जाये कि खाना और ख़ातिरदारी बढ़िया होने वाली है। क्योंकि मैं बाज़ारू लेखक के तौर पर जाना जाता था, इसलिए मेरी ख़ातिरदारी भी अच्छी होती थी। मैंने देखा था बढ़िया साहित्य लिखने वालों की दशा। सिर्फ़ इसलिए कि उनके पास ऑडियंस नहीं थी, लिटरेचर फेस्टिवल के आयोजक भी उन्हें सेकंड क्लास सिटिज़न की तरह देखते थे।

    पटना से एक लिटरेचर फेस्टिवल का न्योता आया। मैं अपनी फ़िल्म पर काम कर रहा था। बहुत व्यस्त था। लेकिन मेरे अंदर का बिहारी, पटना के इस न्योते को इंकार ना कर सका। मैं मुंबई से फ़्लाइट लेकर पटना पहुँचा।

    इवेंट बहुत सामान्य था। लेकिन मेरे रहने की सबसे बढ़िया व्यवस्था की गई थी। मैं अपने होटल के कमरे में पहुँचा तो मैंने इवेंट के सारे डिटेल पढ़े। दो दिन का फेस्टिवल। देश भर से लेखकों को बुलाया गया था। कुछ पहचाने नाम भी थे। कुछ बिल्कुल अनजान। मेरा सेशन दूसरे दिन था। दूसरे दिन दोपहर के एक सेशन के बारे में पढ़ते हुए मेरी नज़र रुकी। ‘मिथिल कुमार’। दोपहर का एक सेशन मिथिल कुमार का था!

    कई सालों बाद इनका नाम पढ़ रहा था। कॉलेज के समय मैंने इनकी खूब सारी किताबें पढ़ी थी। मैं तो लेखक भी इनके कारण ही बना था! लेकिन समय के साथ मैं इतना व्यस्त हुआ कि अपने प्रिय लेखक को ही भूल गया। मैं आज तक मिथिल कुमार से नहीं मिला था। ये पहला मौक़ा था जब मैं उनसे मिल सकता था। मैंने ऑर्गनाइज़र को फ़ोन लगाया। “मिथिल कुमार कहाँ रुके हैं?”

    “सर, वो तो आपके पास ही एक होटल में रुके हैं। लेकिन बस कुछ देर में फेस्टिवल में पहुँचने वाले हैं। आप आ रहे हैं क्या सर?”

    “हाँ, मैं भी कमरे पर क्या करूँगा। फेस्टिवल ही आता हूँ।”

    मैं कॉलेज के उस रोहन को याद करने लगा जो कई साल पहले मिथिल कुमार से एक ब्रेकअप के दौरान मिला था। आज मैं उस लेखक से मिलने वाला था।

    4.

    मैं इस बात को अच्छे तरीक़े से जानता था कि इस फेस्टिवल में भी मुझे पसंद करने वाले कम ही लोग हैं। मेरी अपनी ऑडियंस थी, अपने पाठक थे। लेकिन सीरियस साहित्य वाले लेखक मुझे पसंद नहीं करते। पर जैसे ही मैं फेस्टिवल पहुँचा और पूरी भीड़ मेरे साथ सेल्फ़ी लेने के लिए पागल हो गई, तो ये साबित हो चुका था कि मुझे ढेला फ़र्क़ पड़ता है कोई मेरे बारे में क्या सोचता है।

    भीड़ से निकाल कर ऑर्गनाइज़र ने मुझे एक राइटर्स लाउंज नाम के कमरे में सुरक्षित पहुँचा दिया। पुराने-नये सभी राइटर्स यहाँ थे। कुछ पहचान वाले भी मिले। मेरी नज़र मिथिल कुमार को खोज रही थी। वो कई दिनों से ग़ायब ही थे। समय इतनी तेज़ी से बदला था कि अब उनके किताबों के बारे में बात भी बहुत कम जगह होती थी। जबकि मैं ये मानता हूँ कि उनकी सभी किताबें अब ज़्यादा प्रासंगिक हैं। अगर उनके पहले उपन्यास की ही बात करें तो उसका कोर आईडिया है कि समाज का एक वर्ग, जो समृद्ध है, वो समाज के दूसरे वर्ग से कितना एलियन हो चुका है। और बदलते समय के साथ तो ये सब बहुत ही तेज़ी के साथ हुआ है। पर अभी कोई उनके लिखे के बारे में बात ही नहीं करता। इस फेस्टिवल में उन्हें बुलाया गया था, इस बात पर आश्चर्य तो हुआ ही था मुझे।

    कमरे के एक कोने में मैंने मिथिल कुमार को देखा। इस समय उनकी उम्र कुछ साठ के आसपास रही होगी। देखने में अपनी उम्र से कम लग रहे थे। पचास के क़रीब। हाथ में एक चाय लिए सोफ़े पर ऐसे बैठे थे जैसे उस कमरे का राजा वही हों! शरीर में वही एरोगेंस जो उनकी राइटिंग में मैंने पाया था। ये एक अलग एरोगेंस होता है। ये तब आता है जब आपको अपने काम पर विश्वास हो, जब आप जानते हैं कि आप एक बेहतर कलाकार हैं। ऐन आर्टिस्ट्स एरोगेंस- जो असल में एक कलाकार की सबसे बड़ी पूँजी होती है। इसी एरोगेंस के सहारे वो दुनिया से लगातार लड़ पाता है। मुझे पहली बार ही मिथिल कुमार को देख कर रश्क हुआ। क्या मेरे पास ये एरोगेंस कभी भी आ पाएगा? शायद नहीं।

    मैं मिथिल कुमार के पास गया। वो किसी से बातचीत कर रहे थे। शायद वो मुझे नहीं जानते थे, इसलिए मेरे वहाँ होने को उन्होंने एकनॉलेज नहीं किया। वो सामने वाले लेखक से बहस कर रहे थे। “आज से डेढ़ सौ साल पहले देश की क्या परिकल्पना थी? मैं सिर्फ़ इस देश की बात नहीं कर रहा हूँ। सभी देशों की बात कर रहा हूँ। कोई भी कहीं भी आ-जा सकता था। तिब्बत के आम लोगों के लिए भारत अलग नहीं था। लोग डिसाइड करते थे देश क्या है। लेकिन अब आपके दिमाग़ में भी देश इतना हावी हो चुका है कि आप अपनी किताब देश को समर्पित कर रहे हैं! क्या चूतियापे की बात है।” सामने वाले लेखक ने अपनी नयी किताब देश को समर्पित की थी और वो मिथिल कुमार को अपनी किताब गिफ्ट करने आये थे। लेकिन जैसे ही मिथिल कुमार ने उसका डेडिकेशन वाला पन्ना देखा, उन्हें ग़ुस्सा आ गया। और इस राइटर को खरी-खोटी सुना दी। सामने वाले लेखक भी नाराज़ हुए, अपनी कुछ बात रखी। पर मिथिल कुमार ने उन्हें चुप करा दिया। “डोंट डिफेंड योर स्टूपिडिटी!” लेखक वहाँ से चले गये। अब मैं मिथिल कुमार के सामने अकेला था।

    “हेलो सर। मैं रोहन। कॉलेज के समय से आपको पढ़ता आया हूँ। मैं भी राइटर हूँ। इंफ़ैक्ट, मैं राइटर ही आपके कारण बना हूँ।” मैं ये बोलना चाहता था। “आप कहानी कैसे लिखते हैं?” मैं ये पूछना चाहता था। लेकिन कुछ देर उनके पास खड़े रहने के बाद मैंने पहला सवाल पूछा, “आप सिगरेट पीते हैं?”

    “छोड़ने की कोशिश कर रहा हूँ।” फिर वो चुप रहे। “तुम्हारे पास सिगरेट है क्या?” मेरे पास सिगरेट थी। और हम दोस्त बन गये।

    कमरे के बाहर निकल कर सिगरेट पीने की जगह थी। हम उस तरफ़ बढ़ रहे थे। मिथिल कुमार अपनी मस्ती में चल रहे थे। मैं कुछ बिना मतलब की बातें कर रहा था। “मैंने आपकी किताबें पढ़ी हैं। ‘अख़बार का अंतिम पन्ना’ मुझे बहुत पसंद है।”

    “हाँ, वो काफ़ी लोग पसंद करते हैं। बहुत से नये लड़के जो पत्रकारिता शुरू करते हैं मुझसे अभी भी मिलते हैं। कहते हैं इस किताब के कारण ही उन्होंने पत्रकार बनने का फ़ैसला लिया।”

    “और आपको ये बात कैसी लगती है?” हमने सिगरेट जला ली थी।

    मिथिल कुमार कुछ देर सोचते रहे फिर बोले, “अच्छी लगती है। कई इंसान आपके लिखे के कारण अपने जीवन का सबसे बड़ा फ़ैसल ले लेते हैं। दिस मेक्स मी हंबल।”

    मैं ऐसे जवाब की उम्मीद नहीं कर रहा था। मुझे लगता था मिथिल कुमार हर बात पर एक ग़ुस्से से भरा जवाब देंगे। लेकिन ऐसा नहीं था। वो हर बात का तार्किक जवाब देते। सोचते, फिर बोलते। मुझे अच्छा लगा जिस लेखक को कॉलेज के दिनों में मैंने प्यार किया था उसने मुझे निराश नहीं किया। दूर से एरोगेंस बहुत अच्छा लगता है। लेकिन ज़रूरी है कि जब बातचीत हो तो सामने वाला इंसान एक इंसान की तरह ही बात करे।

    सिगरेट ख़त्म होने वाली थी। अब तक मिथिल कुमार ने मेरे बारे में कुछ भी नहीं पूछा था।

    “मैंने तुम्हारी किताब पढ़ी है।” एक चुप्पी के बाद उन्होंने कहा। मैं अकचका गया।

    “जी?”

    “दो किताबें पढ़ी है तुम्हारी। एक कहानी संग्रह और एक उपन्यास। “बस नंबर 374” तुमने ही लिखा है ना?”

    “जी। मेरी पहली किताब थी।” मैं अभी तक इस आश्चर्य में था कि इस इंसान को मेरे बारे में सब पता था और इसने मुझे ही पता नहीं चलने दिया! इसको मैं क्या कहूँ?

    “तुम अच्छा लिखते हो। कुछ चीज़ें मुझे पसंद नहीं आयीं। पर मुझे वैसे भी कुछ पसंद नहीं आता। मेरी भी एक दिक़्क़त है। पर क्राफ्ट तो है तुम्हारे पास। तुम्हारी कहानियों में समाज और बेहतर तरीक़े से उतर जाये बस। दैट इज़ वेरी इंपोर्टेंट। पर मुझे पता है भविष्य में अच्छा लिखोगे।”

    मैं बस हाँ-हाँ में सिर हिला कर रह गया। एक तरह की सफलता के बाद लोग आपके मुँह पर सच नहीं बोल पाते। पर मिथिल कुमार को किसी बात से फ़र्क़ नहीं पड़ता था। बहुत दिनों बाद किसी ने मुझे वो कहा जो उसने मेरे लिखे में महसूस किया- ना बहुत अच्छा, ना बहुत बुरा। ऐसा लगा मैं उस ईमेल का जवाब पढ़ रहा हूँ जो कई साल पहले मैंने मिथिल कुमार को भेजा था। मैं बोलना चाहता था कि मैंने सबसे पहले आपको ही अपनी कहानी भेजी थी। लेकिन बोल नहीं पाया। फिर लगा मैं जो ये पल जी रहा हूँ अद्भुत है। मैं यहाँ ज़रूरत से ज़्यादा बोल कर कुछ भी ख़राब नहीं करना चाहता था।

    “पटना पहले आये हैं?”

    “अरे, बहुत बार। बहुत से लेखक हुए हैं यहाँ से। कुछ अच्छे दोस्त भी। किसी ना किसी बहाने से आना लगा रहता है।” फिर उन्होंने मुझसे पूछा, “ड्रिंक करते हो?”

    “कभी-कभी। यहाँ तो शराबबंदी है वैसे भी।”

    मिथिल कुमार ने मुस्कुराते हुए अपनी जेब से एक छोटी बोतल निकाली और मेरी तरह बढ़ाया। ऐसा लगा जैसे कॉलेज का कोई सीनियर मुझे शाम के समय हॉस्टल की छत पर शराब गिफ्ट कर रहा है। मैंने इधर-उधर देखा और एक घूँट पी गया। बिल्कुल नीट! ऐसा लगा मेरा गला जल गया! मैंने कई सालों से इस तरह की व्हिस्की नहीं पी थी। मैंने देखा मिथिल कुमार ने एक साँस में पूरी बोतल ख़त्म कर दी। सच कहूँ तो मुझे विश्वास नहीं हुआ। क्या है ये इंसान?

    हम वापस राइटर्स लाउंज में आ चुके थे। इसके बाद मिथिल कुमार अपने कुछ पुराने दोस्तों के साथ व्यस्त हो गये। मैंने देखा वो छिप कर लगातार शराब पी रहे थे। उन्होंने कुछ इंतज़ाम कर के अपनी छोटी बोतल फिर से भर ली थी। जैसे ही उन्हें लगता कोई नहीं देख रहा, वो एक घूँट व्हिस्की पी लेते। जिस व्हिस्की को पी कर अभी तक मैं हिला हुआ था, उसका उनके शरीर पर कुछ असर ही नहीं हो रहा था। कई सालों का रियाज़ है, ऐसा साफ़ दिख रहा था। उन्हें सिर्फ़ ऐसा लग रहा था कि कोई उन्हें नहीं देख रहा। वहाँ मौजूद हर इंसान इशारों में यही बात कर रहा था- ‘ये फिर से शुरू हो गया।’

    वहाँ मौजूद लेखकों के बीच ये बात आम थी कि मिथिल कुमार को शराब की लत है। मैं क्योंकि हमेशा इन लेखकों से एक दूरी पर रहा, इसलिए मुझे उनकी शराब की लत के बारे में मालूम नहीं था। मिथिल कुमार ने दूर से मुझसे इशारे में शराब पीने के लिए पूछा। मैंने कान पकड़ने का इशारा किया। वो मुस्कुरा दिये।

    5.

    अगली सुबह मेरी नींद मिथिल कुमार के फ़ोन से ही खुली।

    “रोहन, मैं मॉर्निंग वॉक के लिए गांधी मैदान जा रहा हूँ। उठ गये हो तो चलो।” मैं अभी भी नींद में ही था। पर मैंने पूरी कोशिश की कि उन्हें इस बात का पता ना चले। “जी मैं भी आता हूँ।”

    मैं मॉर्निंग वॉक करने वाला इंसान ही नहीं हूँ। लेकिन मैं ज़्यादा से ज़्यादा समय मिथिल कुमार के साथ बिताना चाहता था। मैं जानता था कि वापस लौटने के बाद मैं अपने जीवन में व्यस्त हो जाऊँगा। मिथिल कुमार भी अपनी दुनिया में खो जाएँगे। इसलिए मैंने बिस्तर का प्रेम त्याग दिया और गांधी मैदान का चक्कर लगाने लगा।

    मैं आश्चर्य में था कि जो आदमी कल लगातार इतनी शराब पी रहा था, वो आज इतना फ्रेश कैसे दिख रहा है! पर वो दिख रहे थे। मुझे देखते ही उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, “अरे, तुम तो ज़बरदस्ती आये हो ऐसा लग रहा है। सुबह वाले राइटर नहीं हो क्या?”

    “बिल्कुल भी नहीं। मैं तो रात के समय ही लिख पाता हूँ। आप सुबह लिखते हैं क्या?”

    “हाँ, आज सुबह अपना राइटिंग सेशन कर के ही वॉक पे निकला हूँ।”

    अभी साढ़े सात बज रहे थे। इन्होंने अपना राइटिंग सेशन कर भी लिया था! ये इंसान हर बार मुझे अचंभित कर रहा था। पर मैंने अपने सवालों का सिलसिला जारी रखा। “आजकल क्या लिख रहे हैं? पिछले कई सालों से आपकी कोई किताब नहीं आयी।”

    “मैंने शुरुआत में बहुत किताबें जल्द छपवा दीं। जबकि मुझे और समय देना चाहिए था। पचास की उम्र तक मेरी बारह-तेरह किताबें आ चुकी थीं। फिर मैंने सोचा मैं बस एक किताब लिखूँगा। एक किताब जो मेरे लिखे सबकुछ से बेहतर हो। अब इस बात को दस साल बीत चुके हैं। अब लगता है शायद मुझे वो कहानी मिल गई है।”

    “क्या है वो कहानी?”

    “ऐसे कैसे बता दूँ? तुम मुझे बंबई बुलाओं। ख़ातिरदारी करो। फिर बताऊँगा।” और वो हँसने लगे। मिथिल कुमार मेरे साथ चुहल कर रहे थे। वो लेखक जिसका लिखा मैं पढ़ा करता था, एक दोस्त की तरह चुहल कर रहा था। मैं इस बात से ही खुश था।

    मॉर्निंग वॉक के बाद हम एक चाय की दुकान पर रुके। मैंने चाय के लिए बोला। मिथिल कुमार ने चाय के लिए मना कर दिया। उन्होंने इशारे से मुझे अपनी शराब की बोतल दिखलाई। मेरी आँखें आश्चर्य से बड़ी होती गयीं। सुबह-सुबह शराब! ये तो मैं सोच भी नहीं सकता था।

    चाय की दुकान पर हमारी बातचीत का सिलसिला चलता रहा। “आप पर बीच में कोई पुलिस केस भी हुआ था ना? मैंने उस खबर को बहुत फॉलो नहीं किया। लेकिन बहुत सारे प्रोग्रेसिव राइटर्स के साथ आपके बारे में भी ऐसा कुछ पढ़ा था।” मुझे आठ-दस साल पुरानी एक खबर याद आयी।

    मिथिल ने इसे भी एक खबर की तरह ही लिया। “जब से ये आदमी आया है, हम जैसे राइटर्स की दिक़्क़तें भी बढ़ गई हैं। सिर्फ़ हम क्यों- देश में जितने भी तरक़्क़ी पसंद लोग हैं, वो सब शक के घेरे में हैं।” फिर उन्हें हँसी आ गई। “लेकिन जो भी कहो, मुझ पर केस बहुत मज़ेदार है। मैंने बाक़ी राइटर्स का केस भी देखा। किसी के भी केस में वो बात नहीं जो मेरे केस में है।”

    मुझे मिथिल की रहस्यमयी बातों में मज़ा आने लगा था। “ऐसा क्या ख़ास है आपके केस में?”

    “तुम फॉलो करो यार। एक बढ़िया कहानी है। तुम्हें लिखना चाहिए। मेरी पहली उपन्यास में माओवादी किरदार है- रावुला- तुमने तो पढ़ा ही होगा। नावेल में जो प्रोटैगेनिस्ट है, आसिफ़, वो रावुला से मिलता है और दोनों की दोस्ती होती है। आसिफ़ एक नयी दुनिया देखता है, समाज को देखने का एक नया पर्सपेक्टिव उसे मिलता है। तो केस ये है कि मैंने उपन्यास ‘मैं शैली’ में लिखी है, इसका मतलब आसिफ़ मैं ही हूँ। और मेरा सच में कोई दोस्त है जिसका नाम रावुला है। पुलिस मुझसे रावुला का पता पूछ रही है। मुझ पर नक्सल सिंपथाइज़र होने का आरोप तो है ही। पर असली केस ये है कि जिस तरह नावेल में अंत में आसिफ़ मरता है- उसका आरोप भी मुझ पर है कि मैंने और रावुला ने मिल कर आसिफ़ की हत्या की हो सकती है!”

    “क्या? आप ये सच बोल रहे हैं?”

    “इससे अच्छा कहानी का प्लॉट मुझे दे दो तो मैं नाम बदल दूँगा! ‘अख़बार का अंतिम पन्ना’ से दिक़्क़त हर सरकार को रही है। मेरे बारे में तरह-तरह की बात सब बोलते हैं। पर पिछले दस-बारह सालों में ऐसा लगने लगा है मैं किसी फ़ार्स का पार्ट हूँ। मुझे विश्वास ही नहीं हो रहा ये सब सच है! एवरीथिंग लुक्स लाइक ऐन इल्यूज़न टू मी।”

    ये सब सच में एक अब्सर्ड नाटक जैसा लग रहा था- जैसे डारियो फ़ो ने इस नाटक के सारे अंश लिखे हों। हँसी भी आती और दुःख भी होता। पर मिथिल कुमार ने इस बात पर एक लंबी घूँट ली और उनके लिए सब सामान्य हो गया।

    इसके बाद का दिन फेस्टिवल में बीता। दोपहर में मिथिल कुमार का सेशन था। कल तक तो मैं बस मिथिल कुमार को सुनना चाहता था। आज मैं नशे में मिथिल कुमार कैसा बोलेंगे इस बात के लिए उत्साहित था।

    दोपहर का सेशन शुरू हुआ। मिथिल कुमार को “उपन्यास विधा की संरचना और नया दौर” पर बोलना था। मैंने देखा मंच पर मिथिल कुमार ने शराब की एक छोटी सी घूँट ली और फिर अपना नाम पुकारे जाने का इंतज़ार करने लगे।

    मंच पर दो-तीन वरिष्ठ लेखक थे। मिथिल सबसे अलग बैठे थे। किसी से बातचीत नहीं कर रहे थे। जैसे ही उनका नाम लिया गया सभी लोग मंद-मंद मुस्कुराने लगे। सभी जानते थे कि मिथिल हल्के नशे में थे।

    मिथिल ने बोलना शुरू किया। एक-एक शब्द बेइंतहा क्लैरिटी के साथ, एक-एक वाक्य बहुत मेहनत से लिखा गया, पूरा वक्तव्य ही शानदार। कोई कह नहीं सकता ये इंसान नशे में था! लोग लिख कर इतना अच्छा नहीं बोल सकते जितना सुंदर मिथिल कुमार अभी बोल रहे थे। मैं लगातार इस इंसान से रश्क करता जा रहा था।

    उन्होंने सबसे पहले इस टॉपिक के एक-एक शब्द को तोड़ा और उसके बारे में बात की। ‘उपन्यास-विधा-संरचना-नया-दौर’- हर शब्द को बारीकी से समझाया। इसके बाद उन्होंने नये दौर के बारे में अपनी बात रखी। उनका कहना था- नया समय सिर्फ़ एक इल्यूज़न तो नहीं? ऐसा तो नहीं कि सारी कोशिशें हमें किसी पुराने समय में भेजने की है और उस पर डेवलमेंट और अर्बनाइज़ेशन का गिफ़्ट पैक लगाया गया है? उनकी बातों में ह्यूमर भी था, जो उनकी राइटिंग की एक ख़ास पहचान थी। मैं उनकी ह्यूमर का हमेशा से फैन रहा हूँ।

    मैं भी मंच से बोलता हूँ तो सामान्य बात है आप अपने से बेहतर व्यक्ति से सीखते हैं। लेकिन ये इंसान मुझसे बहुत आगे था। कुछ लोगों का खेल इतना बढ़िया होता है कि आप उनसे सीख ही नहीं सकते, बस मुरीद हो सकते हैं। मैं मंद-मंद मुस्कुरा रहा था। बाक़ी सभी लोग आश्चर्य में मिथिल कुमार का वक्तव्य सुन रहे थे।

    इसके बाद मेरा सेशन था। मेरी लोकप्रियता के कारण ज़्यादा लोग सेशन में ज़रूर आये थे। लेकिन उन्हें मालूम ही नहीं था कि दोपहर के समय एक जादू इसी हॉल में घटित हुआ है। और बड़े नाम के चक्कर में लोग एक बड़े जादूगर के जादू को देखने से वंचित रह गये। पर ये दुनिया का नियम है। नाम होने का अपना जादू है।

    मेरे सेशन में मिथिल कुमार भी मुझे सुन रहे थे। इसलिए मैं थोड़ा नर्वस भी था। जैसे-तैसे मैंने सेशन ख़त्म किया। जो लोग सेल्फ़ी लेने आये थे, उनके साथ सेल्फ़ी करवाया। फिर मैं मिथिल कुमार को खोजने लगा। वो  हॉल में अंतिम कुर्सी पर बैठे मेरा इंतज़ार कर रहे थे। मैं मुस्कुराता हुआ उनके पास पहुँचा।

    “तुम तो बहुत अच्छा बोलते हो रोहन।” मिथिल मेरी तारीफ़ कर रहे थे।

    “आप ये सब ऐसे ही बोलते हैं या मेरा मज़ाक़ उड़ा रहे हैं?”

    “मज़ाक़ उड़ाने वाली तो कोई बात नहीं है। अच्छा बोलते हो। लोग तुमसे प्यार करते हैं। और क्या चाहिए एक राइटर को। अच्छा सुनो, डिनर का क्या प्लान है?”

    “अभी तक तो कुछ सोचा नहीं है। आप बताइए।”

    “यहाँ के कुछ राइटर पीछे पड़े हुए हैं। लेकिन मैंने बहाना बना दिया है। सोचा तुमसे पूछ लूँ। मेरे कमरे पर चलो। थोड़ा खाएँगे, थोड़ा पियेंगे।” मिथिल कुमार ने इस हक़ से कहा कि मैं ना कर नहीं पाया। किसी गुरुत्वाकर्षण शक्ति के कारण मेरा सिर अपने आप हाँ में हिल चुका था। कुछ देर बाद हम मिथिल कुमार के कमरे में थे।

    मुझे उम्मीद थी कमरे में सामान बेतरतीब फैला होगा। लेकिन जैसे ही मैं कमरे में गया मुझे फिर से आश्चर्य हुआ। मिथिल कुमार का कमरा बेहद व्यवस्थित था। सभी सामान अपनी नियत जगह पर थे। कुछ देर बाद ही मैं समझ चुका था मिथिल को सबकुछ व्यवस्थित रखने का ओ.सी.डी है यानी ऑब्सेसिव कम्पल्सिव डिसऑर्डर। शराब की बोतल उनके पास थी। हम बैठ कर शराब पीने लगे।

    “मैंने कभी सोचा नहीं था कि आपके साथ बैठ कर कभी शराब पियूँगा।” मैंने पहली घूँट के साथ ही मिथिल कुमार से ये बात कही।

    “शराब पीना कौन सी बड़ी बात है।” मिथिल कुमार ने सिगरेट जलाते हुए कहा। “मुंबई में कैसा चल रहा है तुम्हारा?” उन्होंने मुझसे सवाल पूछा।

    “सब ठीक है। किताबों पर फ़िल्म बन रही है। मैं कुछ वेब-सिरीज़ लिख रहा हूँ।”

    “मतलब तुम्हारी दुकान बढ़िया चल रही है?”

    दुकान शब्द सुनते ही मुझे हँसी आ गई। “ऐसा कह सकते हैं।”

    “मुझे भी बंबई आना है यार। अपनी कहानी फ़ैक्ट्री लगानी ही लगानी है।” मिथिल कुमार ने सिगरेट का एक लंबा कश लेते हुए कहा। मैं समझ नहीं पाया इस बात का क्या जवाब दूँ। मैं बस उन्हें देखता ही रह गया।

    कुछ देर की चुप्पी के बाद मैंने पूछा, “बंबई आना है मतलब?”

    “बहुत कहानियाँ हैं मेरे पास। फ़िल्मों के लिए अलग तरह की कहानियाँ। मार्केट के हिसाब से। कुछ जान-पहचान वाले हैं वहाँ। वो हमेशा बोलते रहते हैं बंबई शिफ्ट हो जाने के लिए। पर मुझे लखनऊ की आदत हो गई है। जो भी हो, सारा काम निपटा कर अब बंबई शिफ्ट होना है। कहानी फ़ैक्ट्री लगाऊँगा। तुम भी कुछ गाइड करना।”

    मुंबई की अपनी एक चाल है। हर कोई इसके साथ सामंजस्य नहीं बैठा पाता। लेकिन अगर किसी को सिनेमा लिखना है तो इस शहर आना ही पड़ता है। साठ की उम्र में बहुत कम लोग ही आते होंगे। पर आते तो फिर भी हैं। बीत चुके पूरे जीवन का सपना पूरा करने। शहर का आश्चर्यलोक उन्हें अपनी तरफ़ आकर्षित कर ही लेता है।

    “आपका परिवार?”

    “मेरा कोई परिवार नहीं है। जो लोग थे वो चले गये। शादी की नहीं। एक लंबा रिलेशन था। वो भी ख़त्म हो गया।” मिथिल ने अपने जीवन को चंद संक्षिप्त वाक्यों में समेट दिया।

    “तब तो आप आराम से शिफ्ट कर सकते हैं।”

    मिथिल कुमार के चहरे पर मंद मुस्कुराहट थी। “कई साल पहले बंबई गया था। कोई डायरेक्टर था जो ‘अख़बार का अंतिम पन्ना’ पर फ़िल्म बनाना चाहता था। मढ़ आइलैंड में रहने का इंतज़ाम करवाया था। उसकी फ़िल्म की शूटिंग चल रही थी। बहुत अलग माहौल होता है शूटिंग का।”

    “फिर फ़िल्म बनी आपकी कहानी पर?”

    “मेरा झगड़ा हो गया डायरेक्टर से। वो कहानी को समझ ही नहीं पा रहा था। मिडियोकर माइंड। वो रावुला को एक हीरो की तरह देख रहा था। जबकि उसे बस एक इंसान की तरह देखने की ज़रूरत थी। और आसिफ़ के किरदार को बहुत बेवकूफ समझ रहा था। आसिफ़ एक सेंसिटिव लड़का है जो पहली बार समाज की रियलिटी देख कर पागल हो जाता है। मेरे लिए आसिफ़ असल में बुद्ध है। लेकिन ये वो समझ ही नहीं पा रहा था। ख़ैर, एक-दो बार और बंबई जाना हुआ। लेकिन बहुत नहीं। मुझे वो शहर पसंद है। वर्सोवा में बहुत से सिनेमा वाले रहते हैं ना?”

    मैंने मुस्कुराते हुए हाँ में सिर हिलाया।

    “रोहन, तुम जो भी कहानी लिखते हो, ऐसा लगता है बाज़ार के लिए लिख रहे हो। इसमें कुछ ग़लत नहीं है। लेकिन उसमें से तुम ग़ायब मत रहो। ए स्टोरी नीड्स ए पार्ट ऑफ़ योर सोल। तुम्हारे पास क्राफ़्ट अद्भुत है। इसलिए मैं जानता हूँ तुम बेहतर लिख सकते हो।” मिथिल कुमार मुझे समझा रहे थे। “अपने लिए लिखो। दुनिया तुम्हें बहुत तरह के बहाने देगी अपनी बात नहीं कहने के लिए। बट इट इज़ योर ड्यूटी टू राइट फॉर योरसेल्फ। तुम सिर्फ़ वही कर सकते हो।”

    एक-एक शब्द जो मिथिल कुमार कह रहे थे उसे मैं समझने की कोशिश कर रहा था। सभी शब्द उनके अंतर से निकल रहे थे। ये किसी तरह के दिखावे के शब्द नहीं थे। एक बड़ा भाई जिस तरह छोटे भाई को समझाता है, वैसे शब्द।

    देर बहुत हो चुकी थी। मुझे सुबह मुंबई वापसी की फ़्लाइट लेनी थी। मिथिल कुमार को भी सुबह की ट्रेन से लखनऊ लौटना था। मैंने उन्हें अलविदा कहा और अपने होटल के लिए निकल पड़ा। जाते-जाते मिथिल कुमार ने कहा, “तुम तो बंबई बुलाओगे ना?”

    “बिल्कुल सर। आप आइये जब भी मन हो। मेरे घर पर ही रुकिए। मैं मढ़ आइलैंड में ही रहता हूँ।” मिथिल इस बात पर हँस दिये।

    “जल्दी आता हूँ। तुम्हारे साथ ही कहानी फ़ैक्ट्री लगाऊँगा।”
    6.

    जब मैं मुंबई में नहीं रहता था तब मुझे वो सारी बातें बेमानी लगती थीं जो लोग इसके बारे में कहते हैं। ये शहर कभी नहीं रुकता; बहुत तेज़ गति से बढ़ता है; द सिटी हैज़ स्पीड। कई साल बीतने के बाद ही पता चलता है कि सच में ये शहर एक अलग गति से बढ़ता है। बाक़ी शहर में लोग चलते हैं। यहाँ दौड़ना पड़ता है। आप नहीं दौड़ेंगे तो लोग ये भी भूल जाएँगे आप किसी रेस का हिस्सा भी थे। आपने भले ही ये डिसाइड नहीं किया हो। आपको कुछ सालों बाद बस पता चल जाता है आप भी उसी रेस का हिस्सा थे जिसको कई बार आप बस दूर से देखते रहे हैं।

    मुंबई जाते ही मैं अपने काम में व्यस्त हो गया। एक राइटर डेडलाइन टू डेडलाइन ही जी रहा होता है। काम का प्रेशर तो था ही। एक रेस में दौड़ने लगा।

    पटना में मिथिल कुमार से मुलाक़ात के कुछ छः महीने बाद मुझे उनका फ़ोन आया। “रोहन, मिथिल बोल रहा हूँ, लखनऊ से।”

    “अरे, मिथिल सर, कैसे हैं आप?” मैंने इन छः महीनों में मिथिल कुमार को फ़ोन नहीं किया था। ध्यान ही नहीं आया। फ़ोन पर उनका नाम पढ़ते ही एक अपराधबोध हुआ। मैं अपने व्यवहार से अधिक विनम्र होकर बातचीत करने लगा।

    “तुम्हारी एक वेब-सीरीज़ आयी है। वही देख रहा था। बहुत ही ख़राब काम है यार। तुमसे बेहतर की उम्मीद है मुझे।”

    मेरी नयी वेब-सीरीज़ आयी थी जिसकी मेरे दोस्तों ने लगातार तारीफ़ की थी। इंस्टाग्राम पर तारीफ़ों का पुल बांध चुके थे। मैं पिछले तीन दिनों से सातवें आसमान में थे। पर मिथिल ने मेरी उड़ान की हवा निकाल दी। मैं सुबह-सुबह क्रिटिसिज्म सुनने के मूड में था भी नहीं। फिर भी मैंने हँसते हुए कहा, “सर, वो अलग लोगों के लिए है। आप हमारी टारगेट ऑडियंस नहीं हैं। इसलिए आपको पसंद नहीं आएगी।”

    “ये क्या गोलमोल बात कर रहे हो? कहानी तो कहानी है। किरदार तो ठीक से लिखोगे ना? लोग तो बदलते रहेंगे। तुम तो वही हो। मैं तुम्हें सुनना चाह रहा था। ऐसे कैसे लगेगी अपनी कहानी फैक्ट्री?”

    मुझे अचानक याद आया कि पटना में मिथिल कुमार ने ज़ोर देकर इस बारे में मुझसे कहा था। मैं बात को टालना चाहता था। “आपकी कहानी पर सीरीज़ बनाते हैं सर। तब ही मुंबई का उद्धार होगा।”

    “हाँ, तुम बंबई वालों का काम देख कर तो मुझे भी ऐसा ही लगता है।” ये कह कर मिथिल हँसने लगे।

    “रोहन मैं तुम्हें ह्वाट्सऐप पर अपना अकाउंट डिटेल भेज रहा हूँ। दस हज़ार रुपये डाल देना।”

    मुझे दो सेकंड लगे समझने में कि मिथिल कुमार ने क्या कहा है। फिर मैं तुरंत समझ गया। उन्होंने इतने हक़ से पैसे माँगे थे कि मैंने तुरंत ही कहा, “जी, जी बिल्कुल।”

    अगले पाँच मिनट में मुझे ह्वाट्सऐप पर उनका मेसेज आ चुका था। छठे मिनट में मैं उनको पैसे ट्रांसफ़र कर रहा था। मैं जानता था इस पैसे का वो क्या करेंगे- शराब पियेंगे। लेकिन मेरी हिम्मत नहीं हुई कि मैं उन्हें इसके लिए मना कर सकूँ। वैसे भी मिथिल कुमार नशे की हालत में बेहतर सोचते थे।

    सारी व्यस्तता के बीच मैं समय निकाल कर उनसे बात कर ही लेता था। एक दिन फ़ोन पर उन्होंने मुझे बताया, “मुझ पर जो पुलिस केस है वो बहुत ही मज़ाक़िए तरीक़े से आगे बढ़ रहा है। अब पुलिस लगभग रोज़ ही मुझसे बात करने आती है। उनके सवाल बहुत ही मज़ेदार होते हैं यार। तुम्हें बताऊँगा तो तुम भी हँस दोगे!”

    “जैसे क्या पूछते हैं वो?”

    “सबसे पहली बात कि उन सभी ने मेरा उपन्यास पढ़ा है और अपने तरीक़े से पढ़ा है। उन्होंने कहानी को सच मान लिया है। सारे सवाल ऐसे होते हैं जैसे मैं क्राइम सीन पर हूँ और वो मुझसे क्राइम की डिटेल माँग रहे हैं। मैं बताता हूँ कि ये कहानी है तो वो कहते हैं कि ‘कहानी हमने भी पढ़ी है, इतनी सच तो कोई कहानी नहीं लगती।’ मैंने इसके जवाब में थैंक यू बोला तो वो बिफर गये! एक राइटर को तो वैसे भी इतनी कम तारीफ़ मिलती है! पर यहाँ तारीफ़ के साथ ही जेल भी मिलेगी।”

    मैंने चिंता के साथ पूछा, “आपको जेल तो नहीं होगी ना?”

    “नहीं, नहीं। ये बहुत अब्सर्ड केस है। इसमें जेल नहीं होगी। पुलिस वालों ने भी कहा है कि उनका भी समय बर्बाद ही हो रहा है। पर वो करें भी तो क्या करें! सरकार के किसी फेवरेट आदमी ने केस किया हुआ है।”

    “मिथिल सर, आप कुछ लिख पा रहे हैं क्या?”

    “कोशिश तो कर रहा हूँ। मैंने तुम्हें बताया था ना मेरी अगली किताब के बारे में? मुझे हर बात लगता है वो कहानी मुझे मिल गई हैं। पर हर बार ग़लत साबित हो जाता हूँ। ये समय बहुत अजीब है। हमारे सभी डर सच साबित हो चुके हैं। हम एक भयावह समय में जी रहे हैं।”

    “पर लिखना तो पड़ेगा ना? वरना एक राइटर तो मर जाएगा।”

    “इस समय में जो जीवित हैं क्या वो लेखक हैं? चारों तरफ़ तबाही दिख रही है और तुम सब फूल की सुंदरता पर कविता लिख रहे हो- क्या इसे लेखक होना कहते हैं? तुम्हें फूल की सुंदरता में क्रूरता नहीं दिखती क्या?” अचानक ही मिथिल कुमार ग़ुस्से में आ गये।

    मैं तो फूलों पर कवितायें लिखता भी नहीं हूँ। मैं तो कवितायें ही नहीं लिखता हूँ! पर सभी लेखकों का ग़ुस्सा आज मुझे झेलना पड़ा। मैंने चुपचाप उनकी बात सुनी। क्या ही कह सकता था? उनकी बात में कुछ ग़लत था भी नहीं। वो एक बेहद सेंसिटिव इंसान थे जो समय की क्रूरता को लगातार देख कर ग़ुस्से में आ ही जाएगा।

    इस फ़ोन कॉल के बाद मुझे ठीक नहीं लगा। मुझे अपनी राइटिंग के शुरुआती दिन याद आने लगे। मैं जब यूनिवर्सिटी में कहानियाँ लिखता था तो मेरी कहानी के किरदार कौन थे? मेरे कॉलेज के आसपास का पूरा संसार, जिसमें सभी मौजूद थे- साईं मंदिर के सामने सो रहे भिखारी; कॉलेज के कंस्ट्रक्शन में काम करने वाला मज़दूर; कॉमनवेल्थ गेम्स में विस्थापित झुग्गी-झोपड़ी वाले। मेरी कहानियों के संसार में इनका बराबर हक़ था। फिर ऐसा क्या हुआ कि समय के साथ ये मेरी कहानियों से भी विस्थापित हो गये?

    मिथिल कुमार से बातचीत के बाद काफ़ी देर तक एक उदासी में रहना पड़ता था। अंत में मैंने सोच लिया, जो भी हो जाये मिथिल से कम बातचीत करूँगा। मैं जीवन के इस पड़ाव पर ऐसे सवाल अफ़ोर्ड नहीं कर सकता था। ये सवाल आपको क्रिटिकली एक्लेम राइटर बनाते हैं- घर का खर्चा नहीं निकलवाते।

    कुछ दिन बीते। मैं मुंबई की गति में बह रहा था। फिर से मिथिल कुमार का फ़ोन आया। मैंने पिछले दो बार उनका कॉल रिसीव नहीं किया था। इसलिए इस बार बात करना ही था। इस बार वो पहले से ही नशे में थे। “आज बहुत ग़ज़ब हुआ रोहन। आसिफ़ मिलने आया था।” मैं फ़ुरसत में था तो मैंने भी उनके साथ मज़े लेना शुरू कर दिया, “क्या कह रह था आसिफ़?”

    “उसे ‘अख़बार का अंतिम पन्ना’ का अंत पसंद नहीं है। उसकी बात सच है। आसिफ़ की हत्या सिस्टम ने की है। पर इसका इल्ज़ाम रावुला पर है। उपन्यास इस बात पर ख़त्म होती है। लेकिन रावुला को न्याय नहीं मिलता। रावुला के न्याय में ही आसिफ़ का न्याय है। मैं चाहता हूँ उपन्यास का अंत बदल दूँ। पर अब कैसे होगा?”

    “आप एक नयी कहानी लिखिए जिसमें ये बात मौजूद हो?” मैंने उन्हें सुझाव दिया।

    “पर नई कहानी में एक नया आसिफ़ होगा। ये वो आसिफ़ नहीं होगा।”

    उनकी बात में तर्क था। मैंने आगे कुछ नहीं कहा।

    “रोहन, तुम्हें पता है मैं क्यों लिखता हूँ?”

    मैं अभी तक मज़े के मूड में था। “क्योंकि आप लिखना जानते हैं।”

    “एक समय के बाद तुम अपने लिखे किरदारों के साथ रहने लगते हो। अ राइटर इज़ अ गॉड इन हिज़ हेड। यही एक लेखक का दुर्भाग्य है। अगर तुम थोड़े भी सेंसिटिव हो तो ये दुनिया एक समय के बाद तुम्हें अच्छी नहीं लगेगी। तुम्हें लेखकों की एक दुनिया पसंद आने लगेगी। क्योंकि तुम ब्रुटैलिटी से दूर भागना चाहते हो। यू नीड योर ट्राइब। आई नीड माय ट्राइब। तुम अपने पसंदीदा राइटर्स के साथ रहने लगोगे। और ये सब तुम्हारे दिमाग़ में हो रहा है। इस दुनिया को कुछ फ़र्क़ नहीं पड़ेगा तुम्हारे दिमाग़ में चल रहे इस तूफ़ान से। बहुत हुआ तो तुम्हें पागल बोलना शुरू कर देगी। जैसा अब लोग मुझे बोलते हैं।”

    “आपने मेरे साथ ये सब क्यों शेयर करते हैं?” मैं मिथिल के अंदर के तूफ़ान को देख सकता था।

    तुम्हारे अंदर मैं आसिफ़ को देखता हूँ, रोहन। मैं आसिफ़ को बचा नहीं पाया। तुमने कई साल पहले मुझे अपनी कहानी भेजी थी ना? शायद तुम कॉलेज में थे। मुझे वो कहानी याद है। बहुत मासूम कहानी थी- एक बच्चे के संतरे का पेड़ बन जाने की कहानी। आसिफ़ वैसा ही था। जितनी मासूमियत तुम्हारी कहानी में थी, उतनी ही आसिफ़ में। तुम्हारे पास एक क्राफ्ट है जो सीखा नहीं जा सकता। वो आज तक है तुम्हारे पास। मेरी शिकायतें भी हैं तुमसे एक लेखक के तौर पर। पर तुम अपने लिए लिखो, किसी और के लिए नहीं। बी अ सेल्फ़िश बास्टर्ड।”

    मेरी धड़कन रुक चुकी थी। मैं अवाक् उनकी बात सुन रहा था। इस आदमी ने मुझे सिर्फ़ सरप्राइज़ किया है। मैं कुछ बोल ही नहीं पाया। उस फ़ोन कॉल पर भी अगले पाँच मिनट तक हम दोनों चुप रहे।

    फिर मैंने कहा, “मिथिल सर, आप सो जाइए। मैं आपसे मिलने जल्द लखनऊ आता हूँ।”

    “नहीं यार। यहाँ मत आओ। मुझे अपने पास मुंबई बुला लो।”

    मैं अभी इतना व्यस्त था कि मुझे उनकी बात बिल्कुल ही बेमतलब लगी। मैंने टालने के लिए उन्हें कह दिया, “जी सर। बहुत जल्दी आपको बुलाता हूँ। कहानी फ़ैक्ट्री के लिए ज़मीन भी देख चुका हूँ।” मुझे फ़ोन पर मिथिल कुमार का अट्टहास सुनाई दिया।

    7.

    कुछ दिनों तक मिथिल कुमार का फ़ोन लगभग रोज़ आता। वो मुझसे अपने अलग-अलग उपन्यासों के किरदार के बारे में बात करते। जिस कहानी पर वो पिछले दस सालों से काम कर रहे थे, उसके बारे में लगातार बात करते। वो बताते उनकी कहानी कहाँ पहुँच चुकी है। वो आगे क्या सोच रहे हैं। मुझसे एक दोस्त की तरह कहानी पर फीडबैक भी लेते। उन्होंने अपनी कुछ पुरानी अप्रकाशित कहानियाँ भी मुझे भेजी। उनका कहना था इन कहानियों पर बढ़िया सिनेमा बन सकता है। मैं जानता था उनकी कहानियों का कोई मार्केट नहीं है। बंबई में सभी कॉमेडी और फील-गुड सिनेमा बनाना चाहते हैं। पर उन्हें ये बताने का क्या ही फ़ायदा होता? मैं उन्हें हिम्मत देता कि सभी कहानियों पर फ़िल्म बन सकती है।

    मैं जो फ़िल्में लिख रहा होता, उस बारे में अगर वो पूछते तो उन्हें बताता। वो मेरी ग़लतियाँ निकालते। जब वो बहुत ग़ुस्से में आ जाते तो मुझे कहते, “आई एक्स्पेक्ट मोर फ्रॉम यू रोहन!”

    कुछ समय बाद मैंने उन्हें अपनी कहानियों के बारे में बताना बंद कर दिया। मेरी कहानियों से मेरा घर चल रहा था। सच कहूँ तो मैं मिथिल कुमार जैसा जीवन नहीं जीना चाहता था। फिर हमारी बातचीत पैसे भर की रह गई। वो अमाउंट बताते, और मैं उन्हें वो ट्रांसफ़र कर देता। पैसे वो हमेशा हक़ से माँगते।

    कुछ समय बाद मैंने उनके मेसेज का रिप्लाई करना भी बंद कर दिया। आप एक तरफ़ा संवाद कब तक कर पायेंगे? मुझे कुछ और राइटर्स ने भी समझाया था कि मिथिल कुमार के सेहत के लिए मैं उन्हें पैसे भेजना बंद कर दूँ। मिथिल भी इस बात को समझ चुके थे। फिर उनकी तरफ़ से मेसेज आना भी लगभग बंद ही हो गया। कभी-कभार वो अपनी लंबी कहानी का कोई अंश भेज देते।

    मेरे पास उनकी कहानी पढ़ने का समय भी नहीं बचा। ना उनके किसी मेसेज पर थम्ब्स-अप का रिएक्शन ही भेज पाया। हमारी बातचीत ख़त्म ही हो गई। मुझे लगा ये ज़रूरी है।

    मिथिल कुमार से अंतिम बात हुए लगभग साल भर बीत चुका था। किसी दिन मुझे लगातार एक ही नंबर से फ़ोन आ रहा था। वैसे तो मैं अननोन नंबर के फ़ोन नहीं उठाता पर लगातार फ़ोन आने के कारण उठाना पड़ा। “तुम राइटर रोहन बोल रहे हो?”

    “जी बोल रहा हूँ। आप कौन?”

    “हम क्राइम ब्रांच की तरफ़ से बोल रहे हैं। हमारे पास कुछ फाइनेंसियल ट्रांजेक्शन के डिटेल आये हैं। तुम मिथिल कुमार को पैसे क्यों भेजते हो?”

    मेरी बोलती बंद हो गई। सच कहूँ तो मेरे पैर के नीचे से ज़मीन खिसक चुकी थी। फिर भी मैंने हिम्मत करके जवाब दिया, “वो मेरे सीनियर राइटर हैं। उम्र हो चुकी थी। इसलिए उनको मदद कर देता था जब भी वो मुझसे बोलते। क्या हुआ है सर?”

    “मिथिल कुमार नक्सल है। हमने उसे अरेस्ट किया है। लखनऊ आने के लिए तैयार रहना।”

    पुलिस अधिकारी ने फ़ोन काटा। मेरे अंदर का डर इतना बढ़ चुका था कि मैं कुछ और काम कर ही नहीं पा रहा था। मैं इस कॉल के बाद एक साथ ही आठ-दस सिगरेट पी चुका था।

    मुझे अपने बारे में कितना भ्रम था! मैं कोई क्रांतिकारी नहीं हूँ। मैं असल में एक डरपोक लेखक हूँ जिसने बस कॉलेज में ये सोचा था कि अपनी कहानियों के सहारे क्रांति ले आएगा। वो सब झूठ था! एक आडंबर कि मैं बाक़ी लोगों से बेहतर हूँ। पुलिस के एक कॉल ने मेरा सच मेरे ही सामने ला कर रख दिया था।

    बदहवासी में मैं पता करने लगा कि आख़िर मिथिल कुमार के साथ क्या हो रहा है। अब तक उनके अरेस्ट के बारे में आर्टिकल आ चुके थे। मैं इतना डरा हुआ था कि इंटरनेट पर इनकोग्नितो मोड में वीपीएन लगा कर ही सारी खबरें पढ़ रहा था। उन पर आरोप था कि अपने जवानी के दिनों में वो नक्सलाइट थे और अभी भी एक अर्बन नक्सल की तरह काम कर रहे हैं। उन पर सबसे बड़ा आरोप था कि उन्होंने रावुला नाम के एक नक्सल नेता के साथ मिल कर अपने साथी आसिफ़ की हत्या की थी। इसका सबूत उनका ही उपन्यास था, जो फर्स्ट पर्सन में लिखा गया था। मिथिल ने मुझे ये सारी बात हँसी-मज़ाक़ में बतायी थी। वो मज़ाक़ अब सच था।

    इसके बाद मुझे क्राइम ब्रांच की तरफ़ से कोई फ़ोन कॉल नहीं आया। ज़ाहिर बात हैं, मैंने अपनी तरफ़ से किसी भी तरह का संपर्क नहीं किया। पर मुझे हमेशा लगता कि कभी भी क्राइम ब्रांच से फ़ोन आ सकता है। मैंने एक नियम बना लिया था कि मिथिल के बारे में सारी खबरें सिर्फ़ इनकॉग्नितो मोड में, वीपीएन लगा कर ही पढ़ता या देखता।

    समय के साथ मेरा डर बढ़ता जा रहा था। ख़ुद को बेहतर सिटिज़न साबित करने के लिए मैंने कम पैसों में एक देशभक्ति वाली फ़िल्म के डॉयलॉग्स भी लिखे।

    एक दिन मैं फ़ेसबुक पर समय बर्बाद कर रहा था तो मुझे एक स्टेटस दिखा। “मिथिल कुमार बहुत याद आयेंगे।” थोड़ा स्क्रॉल किया, किसी और का पोस्ट दिखा, “मिथिल दा, इतनी जल्दी हमें छोड़ कर क्यों चले गये?” मेरी धड़कन रुक गई।

    किसी और लेखक का पोस्ट पढ़ा, “हमारे समय के सबसे बड़े उपन्यासकार मिथिल कुमार जिस तरह से गये वो भी उनके किसी उपन्यास के ही अंत जैसा है। ऐसा क्या सूझा होगा कि उन्होंने जेल की बाल्टी में अपना सिर डूबा कर आत्महत्या की?” मेरे हाथ से मोबाइल गिर चुका था।

    मिथिल कुमार ने आत्महत्या की? ऐसा कैसे हो सकता है? ये मैं क्या पढ़ रहा हूँ? मैंने इस बारे में पता लगाया। पुलिस का कहना था कि मिथिल जेल के बाथरूम में सुबह नहाने के लिए गये। बहुत देर तक बाथरूम का दरवाज़ा नहीं खुला तो बाक़ी क़ैदियों ने दरवाज़ा तोड़ा। उन्होंने देखा कि मिथिल का सिर पानी से भरी बाल्टी में डूबा हुआ था। इसे आत्महत्या कहा जा रहा था।

    मुझे इस खबर पर विश्वास नहीं हो रहा था। मिथिल आत्महत्या क्यों करेंगे? मैं अलग-अलग खबरें पढ़ने लगा। प्रगतिशील लेखकों ने सरकार पर हमला बोल दिया था। उनका कहना था मिथिल कुमार की हत्या हुई है, और प्रशासन ख़ुद को बचाने के लिए इसे आत्महत्या का नाम दे रहा है।

    मैं बदहवास सा सारी खबरें पढ़ता जा रहा था। मेरी आखें लाल हो चुकी थी। पता नहीं क्या सूझा और मैंने मोबाइल को ख़ुद से दूर फेंक दिया।

    शांति…

    पहली बार मुझे एहसास हुआ कि अब मिथिल नहीं रहे- एक दोस्त नहीं रहा। मैं रो पड़ा।

    मैं घर में अकेला था। कुछ देर की स्तब्धता के बाद मैं धीमी कदमों से अपनी बुक शेल्फ के पास गया। कई साल पहले लाजपत नगर में एक ब्रेकअप के बाद जो किताब मुझे पारुल ने दी थी, उसे शेल्फ से निकाला।

    पहले पन्ने पर लिखा था, ‘उस अंतिम क्षण के लिए जब मैं दुनिया से विदा लूँगा… दुनिया पर हँसते हुए।’

    यही वो लाइन थी जिससे मैं कई साल पहले मिथिल कुमार से टकराया था। मुझे उस दिन वो बहुत एरोगेंट लगा था। आज भी मुझे वो उतना ही एरोगेंट लग रहा था। ऐसा लगा वो हम सबका मज़ाक़ उड़ाता हुआ चला गया। सरकार, राइटर्स, फ़ेसबुक पर बैठे पाठक- सब मिथिल की मौत के बारे में अपनी  कमेंट्री दे रहे थे। और मिथिल इन सबसे दूर जा चुका था- इन सबका मज़ाक़ उड़ाते हुए।

    बाल्टी में सिर डूबा कर जीवन का अंत…? ए राइटर्स वे ऑफ़ एंडिंग हिज़ लाइफ़…

    सन्नाटा…

    मुझे एक शो का एपिसोड लिख कर प्रोडूसर को भेजना था। डेडलाइन थी। जब मैं वापस लैपटॉप पर काम करने गया तो मैंने देखा मिथिल कमरे के अंत पर खड़े मुस्कुरा रहे हैं। वो मुझसे कह रहे थे, “कहानी फ़ैक्ट्री लगेगी ही लगेगी।”

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    निहाल पराशर

    मुंबई

    nihalparashar24@gmail.com

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