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  • कथा-कहानी
  • दौलत कुमार राय की कहानी ‘आहुति’

     ‘आहुति’, दौलत कुमार राय की यह कहानी अयोध्या के ‘राम मंदिर’ निर्माण पर आधारित है। दौलत राजनीति विज्ञान के विद्यार्थी हैं, उन्होंने इसी वर्ष उक्त विषय से स्नातकोत्तर किया है।‌ उनकी कहानी के प्रकाशन का यह पहला अवसर है – अनुरंजनी

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    आहुति

    शाम के तकरीबन 5 बज रहे होंगे। कलकत्ता शहर से दसियों कि.मी. दूर एक सुदूर गाँव के लिए, देश के किसी भी ग्रामीण इलाके की तरह ये वक़्त आमतौर पर मवेशियों का चारागाहों से घर की तरफ लौटने का होता है। दिसम्बर – जनवरी की कड़ाके की ठंड में यूँ भी इस वक़्त तक लोग अपने कामों से निजात पाकर अलाव के पास जमा होने लगते है। गाँव में अभी भी काम सिर्फ जीवनयापन का साधन समझा जाता है, जीवन का आखिरी उद्देश्य नहीं, सो लोगों के पास पर्याप्त वक़्त होता है एक – दूसरे से मिलने – जुलने का, सुख – दुख जानने का, गली के कुत्ते से लेकर देश के प्रधानमंत्री तक के बारे में अपनी राय बनाने का और उसपर चर्चा करने का, फलाने ने दो कट्ठा खेत खरीद लिया, फलाने का बेटा शहर जाकर किसी बड़ी कंपनी में सुपरवाइजर लग गया है, फलाने के घर की बहु – बेटी अकेले हाट पर जाने लगी है, इत्यादि इत्यादि बातें करने का। कई बार तो लोग खुद अपने बारे में उतना नहीं जानते जितना पड़ोस की काकी, दूर के चाचा और मूँहबोले भाई को उनके बारे में खबर होती है। ऐसे में सड़क किनारे धुनी रमाये लोगों की आँखें कैमरे से भी तेज रहती है। आसपास से गुजर रहे हर व्यक्ति को इन देशी कैमरों से स्कैन होकर ही गुजरना पड़ता है। कुछ पात्र बस हल्की – फुलकी बातों का हिस्सा बनकर अलाव की तेज आग में खत्म हो जाते हैं, वहीं कुछ रोचक पात्र देर तक सुलगते रहते और लोगों का मनोरंजन करते रहते हैं। 

           ठीक इसी खलिहरपन भरी शाम में, एक बजाज प्लेटिना मोटरसाइकिल ने उन सार्वजनिक नज़रों से स्कैन होते हुए गाँव में प्रवेश किया। वैसे तो कार – मोटरसाइकिल अब शहरों से लेकर गाँवों तक में इतनी आम हो गई है कि लोग उसे नज़र उठा कर देखने की भी ज़हमत नहीं करते मगर  छोटे कस्बों में आज भी अपरिचित वाहनों और इंसानों के प्रति एक खास आकर्षण होता है। आकर्षण का दूसरा कारण यह भी था कि मोटर साइकिल उस मकान के पास आकर रुकी जहां सामान्यतः उसे नहीं रुकनी चाहिए थी, जिसकी उम्मीद किसी को नहीं थी। वाहन चालक के चेहरे पर से हेलमेट उतरने के बाद चारों तरफ की सार्वजनिक निगाहें इस बात की पुष्टि कर रही थी कि आदमी गाँव का नहीं है। कपड़े, कंधे पर लटके बैग और चेहरे पर जमी धूल उसे डाकिया तो नहीं लेकिन उसी के आसपास के व्यक्तित्व की तरह प्रदर्शित कर रही थी। संचार क्रांति के बाद इस दौर में अब डाकियों का गाँव मे प्रवेश करना लोगों को रोमांचित नहीं करता बल्कि कौतूहल मे डालता है। वह समय कब का ढल चुका, जब खाकी वर्दी मे लिपटे, साइकिल की घंटी टनटनाते इन संदेशवाहकों को देखकर लोग दरवाजे की ओर दौड़ लगाते थे।

          बहरहाल समय के साथ अपनी प्रासंगिकता खो चुके इस नए जमाने के डाकिए ने सामने के एक अति सामान्य से घर मे दस्तक दी। पुरानी टीन के उस जर्जर दरवाज़े ने शायद लंबे समय के बाद किसी दस्तक को महसूस किया था। इसलिए सामान्य से थोड़ी ज्यादा खटखटाहट के साथ भीतर के बाशिंदों को इसकी खबर दी।

        चंद ही मिनट बाद अंदर से कोई 80 – 85 बरस की एक औरत ने बमुश्किल दरवाज़ा खोला तो संदेशवाहक ने एक लिफ़ाफ़ा उनकी तरफ बढा कर साइन लेने के लिए बैग में से डायरी निकालने लगा। जरूरी औपचारिकता के बाद ‘बजाज प्लेटिना’ वापिस दूसरी तरफ़ मुड़कर कुछ ही देर में धूल उड़ाती हुई कहीं खो गई। चारों तरफ़ की निगाहों ने सबकुछ देखा, डाकिए को भी, चिट्ठी को भी, मोटर साइकिल को भी, दरवाज़े पर खड़ी उस बूढ़ी काया को भी। फिर ये सब मिलकर अलग – अलग कहानियों का हिस्सा बनकर अलाव की आग के साथ देर तक सुलगते रहे। 

        कुछ पल यूँ ही दरवाज़े पर खड़े होकर संदेशवाहक को जाते हुए देखने के बाद जब प्रतिमा वापिस घर की तरफ लौटी तो अहाते में रामप्रवेश बाबू कोई महीनों पुरानी मैगजीन के पन्नों को बड़े ही सलीके से उलट रहे थे।                                                        

       “सुनिए ज़रा खोल के देखिए ना किसने क्या भेजा है?” प्रतिमा एक स्वाभाविक अरुचि के साथ लिफ़ाफ़ा उनके सामने रख कर वापिस घर मे कहीं ओझल हो गई।  

    लगभग पूरे तरीके से लोक-समाज से कटे हुए, उम्र के आख़िरी कुछ साल बड़ी बेतरतीबी से खर्च कर रहे इस वयोवृद्ध दंपति को अपने पल – पल का हिसाब रखती तरतीबवार दुनिया मे किसने याद करने की ज़हमत उठाई, इस बात ने रामप्रवेश बाबू को भी उतना ही अचरज में डाला जितना कुछ देर पहले प्रतिमा को! हाथ के सहारे बमुश्किल उठते हुए उन्होंने लिफ़ाफ़ा खोला तो भेजने वाले की जगह बड़े-बड़े अक्षरों मे ‘राम मंदिर समिति’ लिखा हुआ था।

        ‘राम मंदिर समिति’! ये तीन लफ़्ज़ जैसे लफ़्ज़ न होकर नमक की पुड़िया हो जो सेकंड के सौंवे हिस्से में रामप्रवेश बाबू से लिपट कर उनके वर्षों पुराने जख्मों को ज़रा सा कुरेद वापिस लिफ़ाफ़े पर अंकित हो गई हो। एक बार को तो ख़्याल आया कि दूर झटक दे मगर फिर थोड़ा संयम दिखाते हुए उन्होंने लिफ़ाफ़ा खोला। 

          दरअसल कलकत्ता शहर से पचास किलोमीटर दूर एक सुदूर बस्ती के इन दो सीलनदार कमरों के बाहर पूरा देश इन दिनों एक जश्न में डूबा हुआ था। एक ऐसा जश्न जिसका इंतज़ार न जाने कितने सालों से इस देश की बहुसंख्यक आबादी कर रही थी। जिसको पाने के लिए आज़ादी के संघर्ष के बाद कुछ सबसे बड़े जनआन्दोलनों में से एक खड़ा हुआ था या यूँ कहिए खड़ा किया गया था जिसको लेकर न जाने कितनी जायज़-नाजायज़ कुर्बानियाँ दी और ली गईं थीं और अंततः इन सब का परिणाम जब अयोध्या के सीने पे खड़े मुस्कुराते हुए विजय का उल्लास पैदा कर रहा हो, तो  भारत जैसे उत्सव धर्मी देश में भला जश्न क्यूँ ना मनाया जाए?  

           देशभर में बैठे तमाम टीवी चैनलों और अखबारों के कर्ता – धर्ता को पहले से निर्देश दिया जा चुका था कि हिंदुस्तान का कोई भी परिवार इस गर्वोनुभूति से वंचित न रह जाए सो मीडिया संस्थान भी इस उत्सव को महोत्सव में बदलने के लिए हर संभव प्रयास में जुटे थे। 

          मंदिर उद्घाटन सिर्फ मंदिर उद्घाटन न था बल्कि कई सारे कार्यक्रमों का एक ‘कम्प्लीट पैकेज’ था जिनमें से एक कार्यक्रम के लिए उन सब परिवारों को भी बुलावा भेजा गया था जिनके कोई सदस्य मंदिर निर्माण के पुण्य कार्य में वीरगति को प्राप्त हुए थे। उन सभी बलिदानियों के नाम शिला-पट्ट पर खुदवाये गए थे, जिसका अनावरण उनके परिजनों के हाथों बड़े-बड़े नेताओं की मौजूदगी मे होना तय हुआ था। ये बुजुर्ग दंपति भी सौभाग्य या दुर्भाग्य से उनमें से एक थे। 

           रामप्रवेश बाबू ने जब लिफाफा बंद किया तो उनके चेहरे पर एक गंभीर सी शिकन साफ़ उभर आई। वे वापिस पहले की तरह ही चारपाई पर लुढ़क गए। 

           गाँव में किसी भी छोटी-बड़ी खबर को फैलते देर नहीं लगती। अलाव के पास बैठे अनुभवी लोगों का समूह खत को देखकर उसका मज़मून भाँप लेने की कला मे निपुण थे। रात के पहले पहर तक जनवरी की सर्द हवा के साथ यह खबर भी लोगों को छूकर गुजरने लगी। आस्था और गर्व की इस इबारत को गढ़ते हुए देखना भला किसका सपना नहीं होगा। मगर सबको पता था कि इसका साक्षी बन पाने का अवसर सिर्फ देश के विशिष्ट और अति – विशिष्ट लोगों को ही मिल सकता है। शायद ही किसी ने सोचा हो कि इस सूची में उनके पड़ोस का भी कोई परिवार शामिल हो सकता है। लिहाजा रात में सुनी खबर की पुष्टि के लिए सुबह से ही लोग बेचैन दिख रहे थे। धीरे – धीरे लोगों की भीड़ रामप्रवेश बाबू के दरवाजे पर लगने लगी। लोग आमंत्रण पत्र को हर तरफ़ से उलट – पलट कर आश्वस्त हो रहे थे तथा रामप्रवेश बाबू और उनके भाग्य पर मर मिट रहे थे। लोगों के व्यवहार में यूँ अपने प्रति आए इस अचानक से परिवर्तन ने दोनों को असमंजस में डाल दिया। वह समझ नहीं पा रहे थे कि इसपर खुश हुआ जाए या इसके पीछे के कारण को याद करके मातम मनाया जाए?

          खैर अभी लोगों के इस अस्वाभाविक आकर्षण एवं सम्मान से वे खुश ही हुए! आखिर एक लंबे सन्नाटे के बाद जीवन में एक हलचल सी हुई थी। मनुष्य आखिर होता तो मनुष्य ही है! यश और ख्याति उसे स्वभावतः आकर्षित करती है। चाहे उसका स्रोत कुछ भी रहा हो, चाहे उसका मोल कुछ भी चुकाना पड़ा हो। लंबे समय बाद उनको भी इस बड़ी-सी दुनिया का एक छोटा सा हिस्सा होने का सुखद एहसास हो रहा था। लोगों से पूरी तरह घिरे रामप्रवेश बाबू को इस बात से आश्वस्ति मिली कि कम से कम इनलोगों को यह याद तो है कि उनके परिवार ने कितनी बड़ी कीमत चुकाई थी और आज जो यह सब कुछ हो रहा है उसकी बुनियाद में वे लोग किस तरह नींव का  पत्थर बनकर खड़े हैं। दुःख, अवसाद और उम्र के मिले – जुले प्रभाव से जो रामप्रवेश बाबू की कमर सामान्य से थोड़ी ज्यादा झुक गई थी, उसमें अनायास ही थोडा तनाव आ गया। चेहरे पर से मरघट की उदासी कुछ देर के लिए जाती रही लेकिन दिन भर के तमाम हलचलों के बाद लोगों की आवाजाही जब थोड़ी कम हुई तो जैसे मरहम का असर भी कम होने लगा। दिन भर शहीद के माँ – बाप होने का बोझ कंधे पर रखे-रखे शरीर और मन दोनों थकने लगा था। हर लौटने वाले के साथ यह गर्व भी किश्तों में जाता रहा। आखिरी आदमी के दरवाज़ा छोड़ते ही रामप्रवेश बाबू अपनी पत्नी के साथ वापिस लौट चुके थे। घर अपने पुराने स्वरूप में आ चुका था। भीड़ में अक्सर अपने असली हालातों को झुठलाना सरल होता है मगर अकेलापन सच्चाई के ज़्यादा करीब होता है। अचानक इन कुछ घंटों के हलचल ने प्रतिमा, रामप्रवेश बाबू, और घर की दर-ओ-दीवार तीनों की सहजता को कम कर दिया था। कुछ देर पहले तक चेहरे पर मुस्कान के साथ लोगों को विदा कर रहे दोनों पति – पत्नी अब एक दूसरे से आँखें चुरा रहे थे।  

         रात ढलने लगी थी मगर आज प्रतिमा रसोई बनाने नहीं गई।  उसे पता था कि निवाला दोनों मे से किसी के गले नहीं उतरेगा। लंबे वक़्त तक एक – दूसरे के साथ रहते – रहते दोनों को एक – दूसरे की मनः स्थिति के बारे मे इतना अंदाजा तो हो ही गया था। कई घंटों की मुर्दा-शांति के बीच, शून्य को निहार रही प्रतिमा की आँखें अनायास ही रामप्रवेश बाबू की आँखों से मिली। जब्त की बांध टूट गई। उसने अचानक जोर से पास मे लेटे पति का हाथ पकड़ लिया! वक़्त पहले थोड़ा थमा फिर लम्हा – लम्हा पीछे की तरफ लौटने लगा। अगले कुछ घंटों में दोनों ने पिछले 33 साल और उसके एक – एक पल को वापिस से महसूस किया। कितना बेरहम रहा था वह समय इन दोनों के लिए। जिसमें सिर्फ इन्होंने खोया, पाया कुछ भी नहीं! सुख और दुःख के दो पहलू वाला सिक्का दुख की तरफ पलट के इतना स्थायी हो गया कि वापिस कभी दूसरी तरफ पलटा ही नहीं। 

    33 साल पहले   

    साल था 1990 का। अक्टूबर अपनी अलसाई सी सुबह के साथ आखिरी पड़ाव पे था। सर्द हवा की छुअन नसों में सिहरन पैदा करने लगी थी। आमतौर पर यह मौसम महीनों की तपती गर्मी से झुलसे त्वचा और मन – मस्तिष्क के लिए बड़ा सुकून भरा होता है मगर उस बार वह कोई आम साल नहीं था। देश का माहौल, मौसम के मिज़ाज के विपरीत, जेठ की गर्मी से भी ज्यादा गरम था! अलाव की जगह सांप्रदायिकता की ज्वाला देश के कोने – कोने में धधक रही थी। सन् सैंतालिस के बाद भारत फिर उस दौर से गुजर रहा था जब दो सबसे बड़े मजहब एक दूसरे पर तलवार खींच कर खड़े थे। वर्षों से साथ रह रहे पड़ोसी एक-दूसरे को शक की नज़र से देख रहे थे। एक दोस्त दूसरे से ख़ौफ़ खा रहा था। वर्षों पुरानी एक कृत्रिम दीवार, जिसे बड़ी मशक्कत के साथ सांप्रदायिक ताकतों ने खड़ी की थी, उसे लंबे समय बाद फिर से नंगी आँखों से देखा जा सकता था। लोगबाग दूसरे मज़हब के मोहल्ले से गुजरने से बचने लगे थे। शहरों में तूफान से पहले की शांति को साफ महसूस किया जा सकता था। हालाँकि अब भी थोड़े बहुत गैरतमंद लोग बचे थे जिनको इस देश की साझा संस्कृति पे भरोसा था। मगर चिड़ियाँ चाहे जितनी भी कोशिश कर ले उसकी चोंच का पानी जंगल की आग तो नहीं ही बुझा सकता और जब आग को भड़काने के लिए योजनाबद्ध तरीके से आँधियों का प्रबंध कर दिया जाए तब भला कौन इससे महफ़ूज बचता!

          उन्हीं आँधियों के बीच चक्रवात का काम माननीय आडवाणी जी की रथयात्रा कर रही थी। जिन्हें पूरे देश का चक्कर लगा कर अयोध्या पहुँचना था। यात्रा जहाँ – जहाँ से होकर गुजर रही थी, लोगों में उत्तेजना का संचार हो रहा था। देश की बहुसंख्यक आबादी का वर्षों पुराना सपना “रामलला हम आएंगे मंदिर वही बनाएंगे” साकार होती दिख रही थी।  

           कुल मिलाकर कमोबेश देश का कोई भी कोना इससे अप्रभावित नहीं था। फिर बंगाल तो वैसे भी इस तरह की हलचलों का केंद्र रहा है। विभाजन की तलवार ने जिन सूबों की छाती को सबसे ज्यादा छलनी किया था, उसमें बंगाल भी एक था। कहते हैं कि इतिहास को याद करके रोया जा सकता है, खुश हुआ जा सकता है मगर उसे बदला नहीं जा सकता मगर जब वर्तमान कुछ इस तरह अतीत का बदला चुकाने का मौका दे तो भला कौन चुप रहेगा। 

            23 अक्टूबर को रथ यात्रा जैसे ही पटना पहुँची वैसे ही बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव ने सांप्रदायिक तनाव का हवाला देकर यात्रा रोकने का आदेश दे दिया। फिर क्या था आनन – फानन मे आडवाणी जी को गिरफ्तार कर लिया गया, पर क्या यह बात इतनी जल्दी खत्म होने वाली थी!  अगले दिन जैसे ही यह खबर आम हुई पूरे देश मे बवाल मच गया। जो थोड़ा-बहुत लिहाज बच गया था वह भी टूटने लगा। सड़क से लेकर संसद तक हंगामा मच गया। लोग आर-पार की लड़ाई का मन बना चुके थे। दशकों से सुलग रही चिंगारी ज्वाला बनकर उठ खड़ी हुई थी। 

            उन्ही दिनों कलकत्ते मे एक राजस्थानी परिवार रहा करता था। 5 सदस्यों का एक हँसता खेलता परिवार! घर के मुखिया रामप्रवेश राठौर एक किराने की दुकान चलाते थे। तथा घर को घर बनाने की जिम्मेदारी पत्नी प्रतिमा ने अपने कंधों पर ले रखा था। 25 सालों के लंबे साथ के बावजूद भी दोनों ने एक-दूसरे को शिकायत का मौका कम ही दिया था। 

            देश के रंग बदलते मौसम से अछूते इस परिवार में एक अलग ही रंगीनी बिखरी हुई थी। अगले महीने के तीसरे हफ्ते मे रामप्रवेश बाबू अपनी जीवन भर की जमापूँजी और बिटिया पूर्णिमा दोनों से छुटकारा पाने की पूरी योजना बना चुके थे। बेटी की शादी के घर का माहौल वैसे भी किसी उत्सव से कम नहीं होता। और यह तब थोड़ा और बढ़ जाता है जब बेटी इकलौती हो। इंसान अपनी औकात से बाहर जाकर हर मुमकिन ख़ुशी अपनी बिटिया की झोली मे डालकर विदा करना चाहता है।  

    “अरे प्रतिमा! जल्दी नाश्ता लगा दो आज दुकान जाते हुए हलवाई से मिलता जाऊँगा, उसने कब से बोला हुआ है आने को। अब अकेला आदमी कहाँ-कहाँ जाए!” रामप्रवेश बाबू ने जल्दी-जल्दी में पूजा खत्म करते हुए बोला। 

    “हाँ बस 5 मिनट रुकिए” प्रतिमा ने जवाब दिया।

    “ये तुम्हारे दोनों राजकुमार कहाँ गए है इतनी सुबह-सुबह?” उन्होंने एक नज़र कमरे की तरफ़ घुमाई। 

    “पता नहीं सुबह बता कर गए थे कि 1 घंटे मे लौट आएँगे, मगर अभी तक इनका कोई पता नहीं है। जाने कहाँ निकल जाते हैं। घर मे दसियों काम हैं मगर मजाल है एक पत्ता भी इधर उधर कर दें ये लोग”! प्रतिमा के चेहरे पर थोड़ी चिंता और थोड़े गुस्से का मिला-जुला भाव उभर आया। 

            नई-नई जवानी की दहलीज़ पर कदम रख रहे श्याम सिंह और अवध सिंह के बीच 2 सालों का अंतर था। दोनों ने साथ ही में पिछले बरस दसवीं का इम्तिहान पास किया था। अमूमन यह वह उम्र होती है जब बच्चों का दायरा घर और परिवारवालों से बाहर निकलता है। पहली बार उनकी अबूझ निगाहों का सामना समाज की जटिलताओं से होना शुरू होता है। वह अब दुनिया को माँ-बाप की नहीं बल्कि अपनी आँखों से देखना शुरू करता है। जीवन के यह कुछ साल व्यक्तित्व के आकार लेने के होते हैं। ऐसे में अगर एहतियात ना बरती जाए तो आज़ाद आँखों में गुलाम और बनावटी सपने सर उठाने लगते हैं। कुछ ऐसा ही श्याम और अवध के साथ भी हो रहा था। वे भी इन दिनों इन्हीं सब जद्दोजहद से दो-चार हो रहे थे। वैसे भी नया खून बदलाव चाहता है। वह चाहे अपने भीतर हो या फिर बाहर के समाज में। युवाओं का यही मजबूत पक्ष भी है और कमजोर पक्ष भी। जिनका इस्तेमाल कई बार कुछ चालाक लोग अपने फायदे के लिए कर लेते हैं। 

           एक ज़रा सी बात पर आर-पार करने की मनः स्थिति वाली यह उम्र श्याम और अवध को भी उस रास्ते पर ले आई थी जहाँ अगर समय रहते न रुका जाए तो रुकना उतना ही मुश्किल होता है जितना बाँध का लिहाज तोड़ चुकी बरसाती नदी का। इन दिनों, इनका भी उठना-बैठना ऐसे लोगों के साथ ही हो रहा था, जिन्होंने अपने मन से ही खुद को धर्मरक्षक मान लिया था। और धर्म के नाम पर हर अधर्म करने को तैयार थे। घर में अक्सर प्रतिमा पूजा के बाद अपने बच्चों के माथे पर तिलक लगाते हुए कहती, “धर्म तुम्हारी रक्षा करे”! लेकिन माँ की इस बात से उलट, तथाकथित धर्मरक्षक उन्हें यह समझाने में कामयाब हुए थे कि “उन्हें धर्म की रक्षा करनी है”!

    24 अक्टूबर 1990   

            विक्टोरिया मेमोरियल से तकरीबन आधे किलोमीटर दूर एक छोटे से मैदान में सभा चल रही थी। यही कोई 20 – 30 नौजवान अपने हाथों मे बाँस की लाठी को शस्त्र की तरह पकड़े एक कतार मे खड़े थे तथा दूसरी तरफ़ एक प्रौढ़ व्यक्ति जबरदस्त लय मे व्याख्यान दे रहे थे। रौबीले अंदाज तथा खास तरह की वेश-भूषा से वे सभा के अध्यक्ष लग रहे थे। 

    “मेरे नौजवान साथियों, बड़े अफसोस की बात है कि आज हमारे हिन्दू समाज का युवा-वर्ग धर्म के प्रति अपने उत्तरदायित्व को भूलता जा रहा है! अंग्रेजों की इस शिक्षा व्यवस्था ने हमारे बच्चों को अपनी संस्कृति से इतना दूर कर दिया है कि आज हम अपने ही देश मे प्रवासियों की तरह जिंदगी बीता रहे हैं! हमने जिस भारत की भूमि पर जनम लिया, जिसकी मिट्टी को माँ की तरह सीने से लगाया, उसी जमीन पर इन इस्लामी आक्रांताओं ने हमें इस हाल मे ला दिया है कि हम अपने आराध्य भगवान श्री राम की जन्मभूमि पर उनके लिए एक मंदिर तक नहीं बनवा पा रहे! आज आदरणीय आडवाणी जी के धर्मध्वजा को पवित्र भूमि तक पहुँचने से पहले ही रोक दिया गया, और पूरा देश हाथ पर हाथ धरे तमाशा देख रहा है! हमारी अपनी मातृभूमि पर ही हमारी आस्था का मखौल बनाया जा रहा है। मेरे बच्चों! यह वक़्त है अपनी-अपनी  कमर कस लेने का। धर्मयुद्ध के लिए हर तरीके से तैयार रहने का। ध्यान रहे मुसलमानों के लिए दुनिया में पचासों देश है, लेकिन हमारे लिए सिर्फ एक! और अगर हम इस ज़मीन से बेदखल हुए तो दुनिया मे कहीं सर छुपाने को जगह नहीं मिलेगी।”

           अध्यक्ष जी ने सम्बोधन खत्म भी नहीं किया था कि चारों ओर से भारत माता की जय के नारे गूँजने लगे। नौजवानों की भुजाएँ फड़कने लगी। सीने में धर्मयुद्ध और उसमें अपनी शहादत की कामना हिलोरें लेने लगी, लाठियों पर हाथों की पकड़ और मजबूत हो गई। 

           युवाओं का यह जोश देखकर अध्यक्ष जी ने अपने सम्बोधन को यही रोक दिया और पास बने दो कमरों की ऑफिस की तरफ बढ़े। साथ मे कुछ लड़कों को भी अंदर आने का आदेश मिला। अंदर तीन -चार  लोग पहले से ही बैठे थे। अध्यक्ष जी ने पास खड़े एक 24 – 25 साल के लड़के का परिचय अपने बेटे के रूप में शाखा के स्वयंसेवको से करवाया। 

    “साथियों ये विजय है। मेरा इकलौता बेटा! आज ही दिल्ली से आया है।”

    विजय ने एक-एक कर सभी लड़कों से जोशीले अंदाज मे हाथ मिलाया। उसके हाथ में ना लाठी थी, ना धर्मध्वजा, ना ही उसने खाकी पैंट पहन रखा था। अध्यक्ष जी ने विजय को अपने राजनीतिक जीवन से दूर ही रखा। यही कारण था कि ‘जामिया मिलिया’ जैसे प्रतिष्ठित संस्थान से पत्रकारिता की पढ़ाई कर आजकल दिल्ली में एक मीडिया हाउस के साथ काम कर रहा था। 

    “सनातन वीरों! नियति ने तुम्हें इस लायक बनाया है कि तुम देश और धर्म के काम आ सको। यह सौभाग्य सबके हिस्से नहीं आता। अब विजय को ही देख लो, ना संगठन के कार्यों में रुचि है ना अपने धर्म की महानता की जानकारी। यहाँ तक कि देश और धर्म के दुश्मन, उन मलेच्छों के साथ उठने-बैठने तक से भी परहेज नहीं है। खैर मुझे इसका दुःख नहीं। शायद ईश्वर की यही मर्जी है। आखिर अफसोस करूँ भी क्यूँ? जब तक मेरे ये सैकड़ों बच्चे मेरे साथ हैं सनातन का कोई बाल भी बाँका नहीं कर सकता।” अध्यक्ष जी ने एक बार फिर से सामने खड़े नौजवानों को संबोधित किया। 

    कमरे में खड़े श्याम, अवध समेत सभी लड़कों के चेहरे पर एक विशिष्ट बोध स्वतः ही जागृत हो गया। सबने अपनी तुलना विजय जैसे धर्म विमुख लोगों से की। समाज में अपने विशिष्ट स्थान को देखकर गर्व से सीने के आकार में कुछ इंच की बढ़ोतरी हो गई। 

    अध्यक्ष जी ने मौके की नज़ाकत को देखते हुए बड़ी धीमी आवाज में लड़कों को आगामी योजना के बारे में जानकारी दी। आज की सभा यहीं बर्खास्त कर दी गई।

     दिन के दो पहर से ज्यादा बीत चुके थे जब श्याम और अवध घर में दाखिल हुए। अम्मा जिनकी आँखें सुबह से बाट जोह रही थी, बेटों को सामने पाकर बरस पड़ी। लेकिन बेटे तो घर की जिम्मेदारी से बड़ी जिम्मेदारी निभाने का सौगंध ले चुके थे। अम्मा की आवाज़ उनके कानों तक नहीं पहुँच रही थी। अभी-अभी अध्यक्ष जी के जोरदार भाषण ने शायद कानों में जगह ही नहीं छोड़ी थी। दिल मे एक अलग उल्लास था। आखिर इतने लोगों मे से जिन 5 लोगों को अयोध्या जाने के लिए चुना गया था ये दोनों भाई उसमे शामिल थे। और जो व्यक्ति धर्म-कार्य जैसे बड़े उद्देश्य के लिए बने हों उनकी नज़रों मे भला घर-गृहस्थी के छोटे-मोटे कार्य के क्या मायने रह जाते हैं! अपने इसी स्वाभिमान और हृदय में प्रज्वलित अग्नि के साथ अम्मा को अनदेखा-अनसुना करते हुए दोनों अपने कमरे की तरफ बढ़े और लकड़ी की आलमारी से कुछ कपड़े निकालकर एक थैलीनुमा बैग मे डालने लगे। अम्मा जो खुद ही बोलती और खुद ही सुनती हुई तंग आ चुकी थी, एक पानी का ग्लास और प्लेट मे खाना लेकर बेटे के कमरे की तरफ़ जाने को हुई। दुनिया भर की माएँ अपने आप मे एक शोध का विषय हैं कि जहाँ लोग गुस्से और आवेश मे क्या नहीं कर गुजरते वहीं इन माओं के स्वभाव में यह उतार-चढ़ाव कैसे आता है कि चंद मिनट पहले अपनी औलाद को लानत भेजते हुए भी उन्हें उनके भूखे होने का बोध रहता है। बहरहाल अम्मा कमरे में पहुँची तो बेटों को कपड़े बाँधते देखकर स्वाभाविक सा सवाल पूछा -“कहाँ जाने की तैयारी हो रही है?”

    “कल सुबह अयोध्या जा रहे हैं”, बेटों ने घर में प्रवेश करने के बाद से पहली बार अम्मा के किसी सवाल का जवाब दिया था और जवाब भी ऐसा कि अम्मा के पैर लड़खड़ा गए! हाथ से खाने की प्लेट गिर जाने को आई। प्रतिमा लाख अपनी दुनिया में खोई हुई रहती हो लेकिन उसे भी इस समय देश और अयोध्या के माहौल का थोड़ा बहुत अंदाजा तो था ही। वह फूट पड़ी लेकिन इस बार गुस्से से नहीं बल्कि करूणा से! बहन पूर्णिमा, जो कल रात पापा के लाए शादी वाले लहँगे की जोड़ी भाईयों को दिखाने जा रही थी सहसा दरवाज़े पर ही जड़ हो गई। उसे भाइयों की कही बात और उसके संभावित परिणामों का अम्मा से थोड़ा ज्यादा अंदाजा था! शाम को जब थके-हारे बाप की घर मे दस्तक हुई, जिन्हें अम्मा और बहन से थोड़ा और ज़्यादा इन सब चीज़ों का मतलब पता था, दसियों सालों से अपने बाप होने के रूखेपन और गंभीरता को किनारे कर बेटों को रुकने का आदेश देने के बजाय निवेदन की मुद्रा मे आ गए। 

          मगर अब शायद देर हो चुकी थी। घर के छप्पर में लगी आग को पानी के छींटो से बुझाया जा सकता है, मगर आग अगर ईंटो और दीवारों तक पहुँच जाए तो उसका बुझना नामुमकिन सा हो जाता है। श्याम और अवध अब रोक लिए जाने की हद से आगे निकल चुके थे! मगर रात भर चली इन आँसुओं की बौछारों ने ज्वालामुखी की अग्नि को इतना भर ज़रूर ठंडा कर दिया कि दोनों ने बैग मे ढेर सारे पोस्टकार्ड रख लिए और अम्मा-बाबूजी को रोज़ एक खत लिखने का वादा कर उन्हें आश्वस्त किया। अवध अपनी बहन से बहुत प्यार करता था सो उसने बहन को गले से लगाकर शादी तक हर हाल में लौट आने का एक और वादा कर बैठा। 

    सुबह संघ के अन्य कार्यकर्ताओं के साथ दोनों अपनी मंजिल की तरफ निकल पड़े। अयोध्या जाने के सारे रास्तों को पुलिस ने बंद कर रखा था। आने-जाने वाली तमाम गाड़ियों की चेकिंग हो रही थी। लिहाज़ा दसियों कि.मी. की दूरी लड़कों को पुलिस से बचते-बचाते पैदल ही तय करनी पड़ी।

    30 अक्टूबर 1990

            इधर केंद्र और राज्य दोनों ही सरकारों का दावा था कि विवादित स्थल पर एक परिंदा भी पर नहीं मार सकता। अयोध्या और आसपास के क्षेत्र को छावनी में बदल दिया गया था। मगर  इस बार नियति को शायद कुछ और ही मंजूर था। श्याम और अवध जैसे हजारों युवा सरकार के उस खोखले दावों को कुचलने अयोध्या पँहुच चुके थे। भीड़ ढाँचे की तरफ़ उन्मुक्त हाथियों के क़ाफ़िले की तरह बढ़ रही थी। सरकार ने इन्हें रोकने के लिए जो पुख्ता प्रबंध कर रखा था, वे  अपर्याप्त रहे। साधु-संतों और कारसेवकों ने शाम ढलते-ढलते उन बसों के ऊपर काबू करना शुरू कर दिया, जिन्हें पुलिस ने आपातकालीन स्थिति में लोगों को हिरासत में लेकर शहर के बाहर तक छोड़ने के लिए रखा था। लोगों ने बस ड्राइवर को नीचे उतार दिया, तथा खुद उनकी जगह बैठ गए। बैरिकेडिंग तोड़कर विवादित स्थल तक बढ़ने का सिलसिला शुरू होते ही आनन-फानन में पाँच हजार से ज्यादा की भीड़ वहाँ तक पहुँच गई। फिर जो हुआ उसका प्रत्यक्षदर्शी पूरी दुनिया रही। लोगों ने दोनों भाईयों को मस्जिद की गुंबद पर चढ़के भगवा झण्डा लहराते हुए देखा।

     इतिहास की धारा बदली जा चुकी थी। लोग सिर्फ झण्डा लहराने तक ही नहीं रुके, अगले दो-तीन दिनों तक शहर में अफरातफरी मचती रही। उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने पुलिस को कानून व्यवस्था बहाल करने के लिए खुली छूट दे दी। नतीजतन कई स्थानों पर कारसेवकों के ऊपर पुलिस ने फायरिंग कर दी।                     

            एक के बाद एक हो रहे इन घटनाओं का सिलसिला तकरीबन एक हफ्ते तक चलता रहा। इस बीच कोई ऐसा दिन नहीं रहा जब दसियों लोगों की मौतें नहीं हुई हो या कहीं से किसी दंगे-फसाद की खबर ना आई हो। बाबरी के ऊपर भगवा ध्वज लहराने और कारसेवकों के ऊपर गोलियाँ चलने की गूँज पूरे देश से सुनाई देने लगी। श्याम और अवध के जल्दी घर लौटने का वादा कभी पूरा नहीं हुआ। लेकिन दोनों ने जो रोज चिट्ठी लिखने का वादा कर, अपने बैग में ढेर सारे लिफ़ाफ़े रखे थे, उन्हीं में एक लिफ़ाफ़ा कुछ दिनों बाद घर के अहाते में पड़ा मिला। शायद किसी ने दरवाज़े के नीचे से सरका दिया था। पूर्णिमा की नज़र उसपर पड़ी तो उसने लिफ़ाफ़ा खोला। कागज पर लिखा था-  “प्यारी बहना, अम्मा-बाबूजी का ध्यान रखना! मै जल्दी ही लौट आऊँगा। तुम्हारी शादी के लिए लखनऊ से लहँगे का जोड़ा भी लाना है।”

    बहन की आँखें छलछला गईं! चिट्ठी देर से आई थी। तब तक घरवालों को ही नहीं पूरे देश को यह पता चल गया था कि मंदिर निर्माण के धर्म-कार्य ने जो कुछ और लोगों की बलि ली है, उसमें इन दोनों भाईयों का भी नाम है। श्याम सिंह, अवध सिंह समेत और कई लोग शहीद का दर्जा पा चुके थे। उनकी लाशों को खुली ट्रको में डालकर घुमाया जा रहा था और उसके साथ घूम रहे थे अगले कई साल तक पूरे देश को निगलने वाले काले बादलों के साये।

           योजनाकार, योजना की सफलता से खुश थे। देश की बड़ी आबादी बाबरी मस्जिद के हिन्दू पुजास्थली में तब्दीली को अयोध्या विजय की पहली सीढ़ी समझ रहे थे। मगर इस बीच कुछ परिवारों के लिए पूरी दुनिया ही  बदल गई थी। शहर के अखबारों में जैसे ही श्याम और अवध का गुंबद पर चढ़कर भगवा लहराने वाली तस्वीर छपी, अचानक से रामप्रवेश बाबू और उनका परिवार आम से खास हो गए। एक समुदाय के लिए वे हीरो तो बने ही लेकिन दूसरे समुदाय के लिए उनकी छवि किसी दुश्मन से कम ना थी। अगले ही दिन कोई चिंगारी बाज़ार के एक किराने की दुकान को जलाकर राख कर गई। लोग देश भर में हो रही बड़ी-बड़ी घटनाओं की आड़ में इस छोटी-सी घटना को जल्द ही भूल गए। एक घर जो कुछ दिनों पहले तक शादी के उल्लास मे डूबा हुआ था, वहाँ अब मुर्दा शांति छा गई थी। चंद दिनों पहले तक हलवाईयों और केटरिंग वालों के घरों, दुकानों का चक्कर लगाते जिनको साँस लेने की फुरसत नहीं थी, आज बिस्तर पर बेसुध पड़े थे। माँ रिश्तेदारों को न्यौता की जगह आँसू भेज रही थी। अब घर और देश, दोनों का दृश्य समान था, दोनों ही पर चीलें मंडरा रही थी।   

    21 जनवरी 2024

    प्रतिमा और रामप्रवेश बाबू एक दूसरे को सहारा देते हुए जब घर से निकले तो कल वाली भीड़ एक बार फिर उनके घर के सामने खड़ी थी। गाँववाले उन्हें स्टेशन तक छोडने आए। कुछ लोग उनसे  पुण्यभूमि की थोड़ी सी मिट्टी अपने साथ लाने का वचन ले रहे थे। ‘जय श्री राम’ के गगन भेदी नारों के बीच दोनों अयोध्या की ट्रेन मे बैठे। रास्ते भर दोनों पति – पत्नी एक दूसरे से नजरें चुराते रहे।  

         अयोध्या अपने पूरे शान – ओ – शौकत के साथ जगमगा रहा था। इतिहास रचा जा चुका था। देश के प्रधान खुद इन बुजुर्गों से मिलकर इनके त्याग को सलाम कर रहे थे। करोड़ों लोग शहीदों के वीरता की दुहाई दे रहे थे। अग्निवेदी की अग्नि विजय पताके की तरह लहलहा कर लोगों के नशों मे ज्वार पैदा कर रही थी। इन सब जगमगाहटों के बीच कुछ आँखों के कोर पर लुढ़क आए पानी की चंद बूंदों को देख सकने का ना किसी के पास वक़्त था ना ही जरूरत! अगली तारीख को रामप्रवेश बाबू और प्रतिमा पूरे दिन, विभिन्न कार्यक्रमों का हिस्सा होते रहे। लेकिन यज्ञस्थल के करीब ना जाने क्यूँ उनके कदम ठिठक गए। उन्होंने बड़े ही गौर से यज्ञवेदी को देखा। उससे उठने वाले धुएँ से उन्हें सैकड़ों चिताओं के एक साथ जलने की भयंकर बदबू महसूस हुई। दोनों वही बैठ गए और रात भर उसके बुझने का इंतजार करते रहे। सुबह लौटते वक़्त चुपके से प्रतिमा ने उसमें से थोड़ी सी राख उठाकर एक पीतल के पात्र में भर लिया।  

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