युवा लेखिका पूनम दुबे का पहला उपन्यास आया है ‘चिड़िया उड़’। जानकी पुल पर उनके यात्रा वृत्तांत प्रकाशित होते रहे हैं और पसंद भी किए जाते रहे हैं।प्रभात प्रकाशन से प्रकाशित इस उपन्यास का एक छोटा सा अंश पढ़िए- मॉडरेटर
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कल्पना कथा
कप्पादोकिया में परियों की चिमनियों के ठीक ऊपर वह किसी चिड़िया सी उड़ रही थी.
अपनी बाहों को यूँ फैलाये हुए जैसे उसके गाँव में बाज़ उड़ा करते थे. गर्म हवा के गुब्बारों से भरे इस तुर्की आसमां में ऊँची उठ रही कल्पना की उड़ान के कई आयाम थे. एक वह भी… ।
कोर्ट की गहमा-गहमी भी कल्पना का ध्यान अपनी ओर नहीं खींच पा रही थी। उसकी आँखें टैब के लगातार बदलते पन्ने पर और दिमाग बचपन के उस खेल में खोया हुआ था। उसे अब भी याद है कि, स्कूल से घर आते हुए वह फूलदार झाड़ियों के पास ठिठक जाती। उसकी नज़र वहाँ उड़ रही तितलियों पर अटक जाती। नीली, पीली, लाल, सफ़ेद–जीवन के तमाम रंगों से खुद को रंग कर न जाने कहाँ से रोज़ इतनी सारी तितलियाँ वहाँ आ जातीं। उसे ये रंग मदहोश कर देते। वह उन तितलियों को देखते ही उन्हें पकड़ने को बेचैन हो जाती, मानों उनके पंख छीन कर रख लेगी! वह तितलियों को पकड़ती जाती और छोटा भाई राघव उन्हें डिबिया में बंद करता जाता।
तितलियों को पकड़ने और डिबिया में डालने का यह कार्यक्रम कभी-कभी बेहद लम्बा खिंच जाता, जिसकी झुंझलाहट राघव के मुँह से यूँ निकलती, “देखना ये तितलियाँ मरने के बाद दूसरा जन्म लेंगी, और तुझसे अपना बदला लेने आएँगी।”
वह राघव की बचकानी बात पर फिक से हंस देती…।
‘तितलियाँ अपना बदला लेने आएँगी ! पागल था राघव भी… । पर अगर यह उनका बदला नहीं है तो फिर क्या था?’
न जाने कितनी ही तितलियों के हत्या की गुनहगार थी! न जाने कितनी ही तितलियों की आज़ादी को छीन लिया था उसने! आखिर क्या मिल जाता था, उसे उन मासूम तितलियों को डिब्बियों में बंद करके घर ले जाने में? क्या यही वजह थी जो उसका जीवन भी एक डिबिया में सालों से बंद था. मान लो उसे इस डिबिया से छुटकारा मिल भी गया तो क्या वह फिर से उड़ पाएगी? या अपने टूटे पंख लिए किसी कोने में लाचार पड़ी रहेगी बिलकुल उन तितलियों की तरह! खयालों के इस सफ़र ने उसके आँखों के कोरों पर नमी ला दी थी। कोरों से पानी की उन अनचाही बूंदों को साफ़ करने के लिए उसने जैसे ही नज़रें ऊपर की, उसे शिखा आती दिखाई दी। शिखा उसके पास पहुंची ही थी कि अर्दली की आवाज़ भी उन दोनों तक पहुँची. ‘ग्यारह नंबर… ग्यारह नंबर अन्दर जाएँ।’
ग्यारह नंबर – इसी के इंतज़ार में तो थी वह वहाँ।
अर्दली की पुकार ने शिखा की आवाज़ में थोड़ी घबराहट घोल दी।
“सुनो, हमारी जज बदल गई है, और यह नई वाली थोड़ी कड़क है! प्लीज तुम कुछ मत बोलना, तुम मेरी क्लाइंट हो जो कहना है मै कहूँगी!”
“क्या मतलब बदल गई? और अगर मुझसे कोई सवाल पूछा जाएगा तो मैं ही जवाब दूँगी न ?
कल्पना की जुबाँ पर न चाहते हुए भी थोड़ी तीखी हो गयी थी।
“पूरे दो साल से घिस रहा है केस! पहली वाली जज रिटायर हो गई पिछले महीने. बड़ी मुश्किल से डेट मिली मुझे बस जल्दी केस क्लोज करना है!”
“मुझे भी शौक नहीं है यहाँ आकर मातम मनाने का! जरूरी मीटिंग छोड़कर आयी हूँ.”
शिखा को जवाब देती हुई उसकी आवाज़ का तल्ख़ लहजा अब भी वहीं था ।
“समझ गई बाबा! चलो अब अंदर चलें”!
शिखा मानो गुजारिश कर रही हो… ।
शिखा के साथ अन्दर घुसते हुए उसके दिमाग में आल्बेयर कामू की किताब ‘स्ट्रेंजर’ का वह दृश्य खुल गया जब पादरी बाज़ दफा कामू के नायक से अपने अपराध का प्रायश्चित कर लेने को कहता है और वह सीधा नकार देता है, खड़े शब्दों में कि वह अपराधी नहीं…
कल्पना कदम आगे बढ़ाती है, सोचते हुए, ‘यह निश्चय ही अपराध नहीं… ’

