काफ़िर कवि की कविताएँ

अच्छी कविताएँ उदासी को दूर कर देती है। सबसे अच्छी कविताएँ वह होती हैं जिनको पढ़कर मन उदास हो जाता है। कवि काफ़िर की कविताएँ मुझे तक ऐसे लेखकों-मित्रों के रास्ते आई जिनके पसंद, जिनके चयन मुझे पसंद आते रहे। काफ़िर मूलतः प्रेम के कवि हैं लेकिन उनकी अनेक कविताओं में सूक्ष्म राजनीतिक दृष्टि भी है। यह समय इतना राजनीतिक है फ़िलहाल कि प्रेम कविताओं का मौसम नहीं लग रहा। काफ़िर की कुछ दूसरी तरह की कविताएँ पढ़िए जिनमें राग और विराग का गहरा द्वंद्व है- मॉडरेटर
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1
महानिर्वाण
 
उफ़नती नदी तैरना नहीं
डूबना सिखाती है।
 
किनारे पर पहुँचना कायरों का काम है।
 
नाव –
एक सहमे हुए आदमी की ईजाद।
2
इतवार
 
मैं स्टालिन को फ़ोन करता हूँ
अर्ज़ी भेजता हूँ
माओ को,
मिन्नत करता हूँ
हिटलर की,
लेनिन के आगे हाथ जोड़ता हूँ।
 
पर कोई भी
नहीं ख़ारिज कर पाता
हफ़्ते से:
इतवार को।
 
…और मुझे फिर तुम्हारे बग़ैर
काटना पड़ता है
एक और दिन।
3
डर – 1
 
राजधानी के बाहर
जंगल से
आवाज़ आती है –
“बुद्धम् शरणम् गच्छामि”
 
और राजा डरता हुआ
अपने बच्चों को
महल में छुपा लेता है।
4
 डर – 2
 
जब लोग एक-दूसरे के
प्रेम में पागल होने लगे।
 
उन्होंने जंग का ऐलान करना ही मुनासिब समझा।
5

ढोल के भीतर
हर रात
उसे देना पड़ता है
अपने सतीत्व का सुबूत
बिस्तर पर !
निर्वस्त्र होकर !
मर्ज़ी या मर्ज़ी के बग़ैर
 
और दूर कहीं गूंजने लगते हैं
राम राज्य की जय-जयकार के नारे
6

कश्मीर / राष्ट्र
एक कारागार
जहाँ फ़ौजी जूतों की ताल पर
गाया जा रहा है – राष्ट्र गान
7

बीज
 
युद्ध के दौरान भी
वो लाता रहा किताबें
अपने बच्चों के लिए
 
ताकि वो ना लड़ें
आने वाले युद्धों में
8
बुद्धिजीवी
 
जंग के दौरान
वो चुप रहा।
जंग ख़त्म होने के बाद
उसने गहरी आह भरी
और ख़ामोश हो गया।
9

बहस
1
दो जन बहस रहे थे।
जब सारे तर्क ख़त्म हो गए
उनमें से एक ने
मंत्र उच्चारण शुरू किया।
 
और बहस ख़त्म हो गई।
 
2
दो जन बहस रहे थे।
जब सारे तर्क ख़त्म हो गए
उनमें से एक ने
गालियाँ देना शुरू किया।
और बहस ख़त्म हो गई।
10

सभ्यता
 
क़त्ल करने के लिए
चाक़ू की जगह
बन्दूक़ का इस्तेमाल किया जाना

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