पाकिस्तानी अंग्रेजी साहित्य का बढ़ता रुतबा और बाज़ार

बीसवीं शताब्दी का अस्सी का दशक भारतीय अंग्रेजी उपन्यासों के लिए टर्निंग पॉइंट का दशक माना जाता है. सलमान रुश्दी को बुकर पुरस्कार मिलने के बाद अचानक भारतीय अंग्रेजी लेखक परिदृश्य पर छाने लगे. विक्रम सेठ, अमिताव घोष के लेखन की धमक साहित्यिक हलकों में ही नहीं बाज़ार में भी सुनाई देने लगी. प्रकाशकों द्वारा इन लेखकों को मोटे-मोटे एडवांस दिए जाने की ख़बरें आने लगीं. भारत में ये लेखक सेलिब्रिटी की तरह देखे जाने लगे. अचानक से जैसे भारतीय अंग्रेजी लेखन में प्रतिभा का विस्फोट हुआ. सफल लेखकों की लंबी कतार लग गई. अगर बुकर पुरस्कार को सफलता का एक पैमाना मानें तो इन सालों में कई लेखकों की किताबें उसमें शोर्टलिस्ट हुई. उससे भी बड़ी बात है कि अरुंधती राय, किरण देसाई जैसी लेखिकाओं को बुकर मिला भी. बुकर तो ‘व्हाइट टाइगर’ जैसे उपन्यास को भी मिला. लेकिन लगता है भारतीय अंग्रेजी लेखकों का बाजार उतरने लगा है.
पिछले दो-तीन सालों से पाकिस्तानी युवा अंग्रेजी लेखक परिदृश्य पर छाते जा रहे हैं. शायद इसी को ध्यान में रखते हुए प्रसिद्ध साहित्यिक पत्रिका ‘ग्रांटा’ ने अपना नया अंक, अंक संख्या ११२ पाकिस्तानी लेखन पर एकाग्र किया है. यह नहीं भूलना चाहिए कि अंग्रेजी उपन्यास विश्व बाज़ार का हिस्सा हैं. उसमें आजकल पाकिस्तान के ‘एक्जाटिक’ कहानियों की धूम है. लगता है ‘एक्जाटिक इंडिया’ की जगह ‘एक्जाटिक पाकिस्तान’ ने ले ली है. ९/११ के बाद के विश्व में अंग्रेजी बाज़ार का ध्यान मुस्लिम समाज की ओर गया है और पाकिस्तान उसका केन्द्र बनता जा रहा है. मोहसिन हामिद, मोहम्मद हनीफ और दनियाल मुइनुदीन वे तीन लेखक हैं जिन्होंने पाकिस्तानी लेखन की इस नई छवि के निर्माण में बड़ी भूमिका निभाई है. ग्रांटा के इस नए पाकिस्तानी अंक में ये तीनों ही मौजूद हैं. इनमें चौथा नाम थोड़ा ग्लेमरस है फातिमा भुट्टो का. पाकिस्तान के सबसे अभिशप्त समझे जानेवाले राजनीतिक परिवार की इस लेखिका के पास अपने परिवार को लेकर ही कहने को इतना कुछ है कि जब हाल में उसकी किताब आई- ‘सॉंग्स ऑफ ब्लड एंड सोर्ड’ तो वह दुनिया भर में बिक्री और आकर्षण का केन्द्र बनी. यह संस्मरणात्मक पुस्तक अपने आपमें किसी उपन्यास से कम कथात्मक नहीं है. शायद इसीलिए दिनानुदिन उसकी पहचान बड़ी होती जा रही है. दरअसल, इस किताब में बढती रुचि अपने आपमें इस बात का प्रमाण है कि पाकिस्तान के साहित्य में इस नई बढती रुचि का क्या कारण है. पाकिस्तानी समाज की सामंती संरचना, राजनीति की विडंबना, आतंकवाद की भूमि के रूप में उसका कुख्यात होना. प्रशासन में ऊपर से नीचे तक फैला भ्रष्टाचार- अच्छे उपन्यास की सारी संभावनाएं वहाँ मौजूद हैं. जिनकी मांग भी है. यही कारण है कि हाल के दिनों में पाकिस्तान से आने वाला ज़्यादातर साहित्य इन्हीं विषयों के इर्द-गिर्द घूमता है. मोहम्मद हनीफ के उपन्यास ‘द केस ऑफ एक्स्प्लोडिंग मैन्गोज़’ की कथा तानाशाह जनरल जिया के शासनकाल और उसकी हत्या की गुत्थी के इर्द-गिर्द घूमती है. उस जिया उल हक के जिसने पाकिस्तान में धर्म के राज को सख्ती से लागू किया. इसी तरह मोहसिन हामिद के बेहद चर्चित उपन्यास ‘रिलक्टेंट फंडामेंटलिस्ट’ का विषय उसके नाम से ही ज़ाहिर है आतंकवाद है. दनियाल मुइनुदीन ने उपन्यास की जगह कहानियों का सहारा लिया ताकि पाकिस्तानी समाज की जटिलताओं, विडंबनाओं को अलग-अलग ढंग से दिखाया जा सके. उसकी कहानियों में पाकिस्तानी उच्चवर्गीय समाज की सडांध है. मनोहर श्याम जोशी के शब्दों में कहें तो ‘मीठी सडांध’, प्रशासन का भ्रष्टाचार है. एक तरफ धार्मिक कट्टरता बढ़ रही है तो दूसरी ओर पाकिस्तान के उच्चवर्ग में पश्चिमी समाज का अंधानुकरण बढ़ रहा है. उसने अपनी कहानियों एक तरह से पाकिस्तान के रूलिंग क्लास को एक्स्पोज़ कर दिया है. शायद यही कारण है कि अमेरिका और ब्रिटेन में उनके किताब के राईट्स के लिए बोली लगानी पड़ी थी.
भारत और पाकिस्तान के अंग्रेजी लेखकों में यही बुनियादी अंतर है. यह एक अजीब संयोग है कि भारतीय समाज और राजनीति की विडंबनाएं भारतीय-अंग्रेजी लेखकों की रचनाओं में नहीं दिखाई देती हैं। अमिताव कुमार ने अपनी पुस्तक बॉम्बे, लंदन, न्यूयॉर्क में इस संबंध में महत्त्वपूर्ण सवाल उठाए हैं। वे लिखते हैं कि ज्यादातर भारतीय अंग्रेजी उपन्यासों में भारतीय जन-जीवन नहीं आता है। अगर आता भी है तो सतही तौर पर। वे सलमान रूश्दी के उपन्यास ‘ग्राउंड बिनीथ हर फीट’ उदाहरण देते हैं। उपन्यास में पीलू दूधवाला नामक एक प्रांतीय नेता है, उसके चरित्र की एकमात्र विशेषता लेखक उपन्यास में बताता है कि वह गलत अंग्रेजी बोलता है। प्रांतीय नेता के रूप में लालू प्रसाद पर आधारित उस चरित्र के जीवन के विरोधाभास, विडंबनाएं उपन्यास में उभर कर नहीं आती हैं। गोया गलत उच्चारण के साथ अंग्रेजी बोलना बहुत बड़ा दोष हो। इसके विपरीत पाकिस्तानी लेखकों मोहसिन हामिद, मो. हनीफ आदि की सबसे बड़ी ताकत ही यही कही जा सकती है कि उनकी रचनाओं में पाकिस्तानी समाज के अंतर्विरोध बहुत विश्वसनीय तरीके से उभर कर आते हैं, अंधेरी सच्चाइयां सामने आती हैं। शायद इसी कारण, जैसे-जैसे वहां के समाज का संकट गहराता जा रहा है पाकिस्तानी अंग्रेजी लेखकों की रचनाओं की मांग बढती जा रही है।
ग्रांटा के नए अंक में मोहसिन हामिद की एक बहुत अच्छी कहानी है ‘बिहेडिंग,’ जो एक एक ऐसे लेखक के मन के संशयों, भय के बारे में है जो एक लगभग तानाशाही के हालत जैसे देश में रहता है, जहाँ जीवन से अधिक गंभीरता से धर्म को लिए जाता है. मोहम्मद हनीफ के ‘बट एंड भट्टी’ एक तरह के आतंक का वातावरण है, जिसका बहुत अच्छा उपयोग वे अपने मशहूर उपन्यास में कर चुके हैं. दानियाल मुइनुद्दीन की कविता है. इनके अलावा नए लेखकों में नदीम असलम भी हैं. कमिला शम्सी का एक बहुत अच्छा लेख है जो पाकिस्तानी पॉप गायन को लेकर है, जिसने पाकिस्तान के संगीत को आधुनिक पहचान दी. इस अंक में केवल अंग्रेजी लेखक ही नहीं हैं इसमें उर्दू, पंजाबी, बलूच, सिंधी आदि भाषाओं के अनुवाद भी हैं. उर्दू से इंतज़ार हुसैन जैसे बड़े पाए के लेखक हैं. हसीना गुल की कविता का अनुवाद है, जिसकी पंक्तियाँ हैं- हम सोचते हैं जीवन बस समय का गुज़ारना होता है/ जबकि दरअसल जीवन एक चीज़ है/ और समय कुछ दूसरी. पाकिस्तान की कला को लेकर भी लेख है. पाकिस्तान के साहित्य को लेकर किसी अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका का यह पहला ही अंक जो यह बताता है कि अंग्रेजी पाठकों की रुचि का केन्द्र पाकिस्तानी साहित्य होता जा रहा है.  इस लिहाज़ से ग्रांटा का यह अंक ऐतिहासिक कहा जाएगा और आने वाले समय में पथ-प्रदर्शक भी.         

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