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हिन्दी के क्रियोलीकरण के विरुद्ध


प्रसिद्ध पत्रकार राजकिशोर का यह लेख हिंदी भाषा के संकटों की चर्चा करता है. कुछ साल पहले लेखक यु. आर. अनंतमूर्ति ने अपने एक लेख में भारतीय भाषाओं पर अंग्रेजी के बढ़ते प्रभाव को लेकर कहा था कि अगर यही हाल रहा तो भारतीय भाषाएं किचेन लैंग्वेज यानी नौकरों-चाकरों से बातचीत करने की भाषा बनकर रह जायेगी. सचमुच यह प्रवृत्ति बढती जा रही है. राजकिशोर जी का लेख उसी की गंभीरता की ओर इशारा करता है और हम हिंदी वालों को अपने कर्त्तव्य की याद दिलाता है- जानकी पुल.
आजकल संसद सदस्यों, मध्य प्रदेश के विधायकों और देश भर के हिन्दी समाचार पत्रों के संचालकों तथा संपादकों को डाक से एक बड़ा-सा लिफाफा मिल रहा है। जिन्हें अभी तक यह लिफाफा नहीं मिला है, उन्हें दो-चार रोज में मिल जाएगा। जिन तक लिफाफा पहुंच चुका हैं, वे जब इसे खोलते  हैं, तो उन्हें एक पुड़िया में राख मिलती है। यह राख किस चीज की है? उनकी  इस उत्सुकता को मिटाने के लिए लिफाफा भेजने वालों ने अपना वक्तव्य  भी भेजा है। वक्तव्य में कहा गया है :
आज हिंदी दिवस के अवसर पर हम इंदौर नगर के बुद्धिजीवी गांधी प्रतिमा के समक्ष देश भर के लगभग सभी हिंदी अखबारों की एक-एक प्रति जुटा कर उनकी होली जलाने के लिए एकत्र हुए हैं। हम सब जानते हैं कि जब निवेदन के रूप में किए जाते रहे संवादात्मक प्रतिरोध असफल हो जाते हैं, तब विकल्प के रूप में एकमात्र यही रास्ता बचता है, जो हमें गांधीजी से विरासत में मिला है।\’
यह वक्तव्य का बहुत छोटा-सा हिस्सा है। वक्तव्य इंदौर में हिन्दी दिवस (14 सितंबर) पर जारी किया गया था। इसमें विस्तार से बताया गया है कि अंग्रेजी शब्दों को जबरदस्ती ठूंस-ठूस कर हिन्दी को एक ऐसी मिश्रित भाषा बनाया  जा रहा है जिसमें हिन्दी के शब्द सिर्फ 30 प्रतिशत हों और अंग्रेजी शब्दों का अनुपात 70 प्रतिशत हो जाए। यह भाषा कैसी होगी, इसका एक नमूना इंदौर के ही एक स्थानीय समाचार पत्र से लिया गया है – \’इंग्लिश के लर्निंग बाय फन प्रोग्राम को स्टेट गव्हमेण्ट स्कूल लेवल पर इंट्रोड्यूस करे, इसके लिए चीफ मिनिस्टर ने डिस्ट्रिक्ट एज्युकेशन आफिसर्स की एक अर्जेंट मीटिंग ली, जिसकी डिटेल्ड रिपोर्ट प्रिंसिपल सेक्रेटरी जारी करेंगे।\’
जी हां, यह कोई हंसाने के लिए
बनाया गया काल्पनिक वाक्य नहीं है, वास्तव में उस अखबार में ऐसा ही छपा था। और यह कोई एक अकेली घटना नहीं है। हिन्दी के बहुत-से समाचार पत्र ऐसी ही भाषा के इस्तेमाल की ओर बढ़ रहे हैं। मामला अखबारों तक ही सीमित नहीं है। अंग्रेजी के बढ़ते हुए प्रकोप के परिणामस्वरूप और शब्द-निर्माण में हिन्दी वालों के आलस्य के कारण हिन्दी का जो रूप बन रहा है, उसकी कुछ बानगी भी इस वक्तव्य में पेश की गई है –
\’मसलन, छात्र-छात्राओं की जगह स्टूडेंट्स, माता-पिता की जगह पेरेंट्स, अध्यापकों की जगह टीचर्स, विश्वविद्यालय की जगह यूनिवर्सिटी, परीक्षा की जगह एक्जाम, अवसर की जगह अपार्चुनिटी, प्रवेश की जगह इंट्रेंस, संस्थान की जगह इंस्टीट्यूशन, चौराहे की जगह स्क्वायर, रविवार-सोमवार की जगह संडे-मंडे तथा भारत की जगह इंडिया। इसके साथ ही, पूरे के पूरे वाक्यांश भी हिंदी के बजाय अंग्रेजी के छपना, जैसे आउट ऑफ रीच, बियांड अप्रोच, मॉरली लोडेड, कमिंग जनरेशन, डिसीजन मेकिंग, रिजल्ट-ओरियंटेड प्रोग्राम आदि।\’
हिन्दी के सुविख्यात कथाकार तथा चित्रकार प्रभु जोशी, जो इंदौर में ही रहते हैं,  हिन्दी के इस क्रियोलीकरण से अरसे से चिंतित रहे हैं। इस मुद्दे पर वे विभिन्न समाचार पत्रों में लगातार लिखते भी रहे हैं। यह उन्हीं का आग्रह है कि हिन्दी-अंग्रेजी मिश्रण से पैदा हो रही दोगली हिन्दी को हिंग्लिश न कह कर क्रियोल कहा जाना चाहिए। क्रियोल उस भाषा को कहते हैं जो यूरोप के विभिन्न उपनिवेशों में सत्तारूढ़ जाति की भाषा और शासित समूहों की भाषा के मेलजोल से पैदा हुई है। उदाहरण के लिए, मारिशस की बोलचाल की भाषा क्रियोल है, जो भोजपुरी और फ्रांसीसी के मेल से जनमी है। क्रियोल में कोई गंभीर चीज नहीं लिखी जाती। वह मात्र वहां के साधारण लोगों की बोल-चाल की भाषा होती  है। प्रभु जोशी ही नहीं, हिन्दी के सभी स्वाभिमानी लेखकों और पत्रकारों को लगता है कि हिन्दी के क्रियोलीकरण की प्रक्रिया इसी प्रकार जारी रही, तो एक दिन हिन्दी लुप्त हो जाएगी और हम एक ऐसी खिचड़ी भाषा के वाहक कुली बन जाएंगे जिसमें हिन्दी की उपस्थिति नाम मात्र की होगी।
यह दुख हिन्दी लेखन में अकसर प्रगट किया जाता है। इस 14 सितंबर को भी बहुत-सी जगहों पर और बार-बार इसे अभिव्यक्त किया गया। लेकिन इसके प्रतिरोध का उपाय क्या है? सिर्फ रोने से भेड़िया भाग नहीं जाता। उसे डराना पड़ता है कि हम भी कुछ कर सकते हैं। यही सोच कर प्रभु जोशी तथा उनके भाषा-स्वाभिमानी मित्रों ने तय किया कि इस 14 सितंबर को इंदौर के किसी सार्वजनिक स्थान पर उन हिन्दी अखबारों (\’राष्ट्रीय सहारा\’ नहीं) की होली जलाई जाए जो हिन्दी को दूषित और प्रदूषित कर रहे हैं।  हिन्दी दिवस पर शहर की गांधी प्रतिमा के आसपास लगभग पचास लोग एकत्र हुए और उन्होंने हिन्दी के सभी समाचार पत्रों की होली जलाई (ऊपर जिस राख की चर्चा की गई है, वह इन्हीं अखबारों की है।)। उन्होंने नारे लगाए, भाषा का क्रियोलीकरण, बंद करो बंद करो। इस पवित्र और साहसिक कार्यक्रम में समाजवादी चिंतक अनिल त्रिवेदी,  आदिवासी-बहुल क्षेत्र के सामाजिक कार्यकर्ता और कवि तपन भट्टाचार्य, प्रभु जोशी, जीवन सिंह ठाकुर, प्रकाश कांत, कृष्णकान्त निलोसे, शशिकांत गुप्ते, विश्वनाथ कदम, ईश्वरी रावल, (श्रीमती) जनक पलटा मिगिलिगन  आदि सम्मिलित थे। < /span>
मानना होगा कि यह हिन्दी को बचाने की दिशा में एक ऐतिहासिक घटना है।  कुछ-कुछ वैसी ही जैसे ब्रिटिश राज में विदेशी कपड़ों की होली जलाने का रोमांचक कार्यक्रम। किसी सार्वजनिक स्थान पर जो शख्स विदेशी कपड़ों को जमा कर उनमें जलती हुई तीली लगाता होगा, वह  इस भावना से रोमांचित हो उठता होगा कि वह ब्रिटिश साम्राज्य का दहन कर रहा है। इंदौर की गांधी प्रतिमा के निकट जुटे इंदौर के जागरूक लगों को भी कुछ ऐसी ही अनुभूति हो रही होगी कि वे अंग्रेजी का दहन कर रहे हैं। अंग्रेज चले गए, तो अंग्रेजी क्यों रहे?
लेकिन रोम एक दिन में नहीं बना था न एक दिन में नष्ट हुआ था। इंदौर में जो हुआ,  वह पहली चिनगारी थी। हम मनाते हैं कि यह चिनगारी देश के कोने-कोने में पहुंचे और भारत को उसकी अपनी भाषाएं लौटाए। देश भर में इसलिए कि क्रियोलीकरण सिर्फ हिन्दी का नहीं, सभी भारतीय भाषाओं का हो रहा है। किसी-किसी भाषा में तो बेशर्मी के साथ यह भी प्रस्तावित किया जा रहा है कि हमें अपनी लिपि छोड़ कर रोमन लिपि अपना लेनी चाहिए। जाहिर है, समस्या खतरनाक बिन्दु पर पहुंच गई है। बल्कि बहुत-से लोग समस्या को ही समाधान मानने लगे हैं। मैं तो सुझाव दूंगा कि फिलहाल हिन्दी वालों को अपनी भाषा से संबंधित दूसरे काम छोड़ देना चाहिए और लंका दहन के कार्यक्रम में शामिल हो जाना चाहिए। भेड़िया एकदम दरवाजे तक आ चुका है।

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प्रसिद्ध पत्रकार राजकिशोर का यह लेख हिंदी भाषा के संकटों की चर्चा करता है. कुछ साल पहले लेखक यु. आर. अनंतमूर्ति ने अपने एक लेख में भारतीय भाषाओं पर अंग्रेजी के बढ़ते प्रभाव को लेकर कहा था कि अगर यही हाल रहा तो भारतीय भाषाएं किचेन लैंग्वेज यानी नौकरों-चाकरों से बातचीत करने की भाषा बनकर रह जायेगी. सचमुच यह प्रवृत्ति बढती जा रही है. राजकिशोर जी का लेख उसी की गंभीरता की ओर इशारा करता है और हम हिंदी वालों को अपने कर्त्तव्य की याद दिलाता है- जानकी पुल.
आजकल संसद सदस्यों, मध्य प्रदेश के विधायकों और देश भर के हिन्दी समाचार पत्रों के संचालकों तथा संपादकों को डाक से एक बड़ा-सा लिफाफा मिल रहा है। जिन्हें अभी तक यह लिफाफा नहीं मिला है, उन्हें दो-चार रोज में मिल जाएगा। जिन तक लिफाफा पहुंच चुका हैं, वे जब इसे खोलते  हैं, तो उन्हें एक पुड़िया में राख मिलती है। यह राख किस चीज की है? उनकी  इस उत्सुकता को मिटाने के लिए लिफाफा भेजने वालों ने अपना वक्तव्य  भी भेजा है। वक्तव्य में कहा गया है :
आज हिंदी दिवस के अवसर पर हम इंदौर नगर के बुद्धिजीवी गांधी प्रतिमा के समक्ष देश भर के लगभग सभी हिंदी अखबारों की एक-एक प्रति जुटा कर उनकी होली जलाने के लिए एकत्र हुए हैं। हम सब जानते हैं कि जब निवेदन के रूप में किए जाते रहे संवादात्मक प्रतिरोध असफल हो जाते हैं, तब विकल्प के रूप में एकमात्र यही रास्ता बचता है, जो हमें गांधीजी से विरासत में मिला है।
यह वक्तव्य का बहुत छोटा-सा हिस्सा है। वक्तव्य इंदौर में हिन्दी दिवस (14 सितंबर) पर जारी किया गया था। इसमें विस्तार से बताया गया है कि अंग्रेजी शब्दों को जबरदस्ती ठूंस-ठूस कर हिन्दी को एक ऐसी मिश्रित भाषा बनाया  जा रहा है जिसमें हिन्दी के शब्द सिर्फ 30 प्रतिशत हों और अंग्रेजी शब्दों का अनुपात 70 प्रतिशत हो जाए। यह भाषा कैसी होगी, इसका एक नमूना इंदौर के ही एक स्थानीय समाचार पत्र से लिया गया है – इंग्लिश के लर्निंग बाय फन प्रोग्राम को स्टेट गव्हमेण्ट स्कूल लेवल पर इंट्रोड्यूस करे, इसके लिए चीफ मिनिस्टर ने डिस्ट्रिक्ट एज्युकेशन आफिसर्स की एक अर्जेंट मीटिंग ली, जिसकी डिटेल्ड रिपोर्ट प्रिंसिपल सेक्रेटरी जारी करेंगे।
जी हां, यह कोई हंसाने के लिए बनाया गया काल्पनिक वाक्य नहीं है, वास्तव में उस अखबार में ऐसा ही छपा था। और यह कोई एक अकेली घटना नहीं है। हिन्दी के बहुत-से समाचार पत्र ऐसी ही भाषा के इस्तेमाल की ओर बढ़ रहे हैं। मामला अखबारों तक ही सीमित नहीं है। अंग्रेजी के बढ़ते हुए प्रकोप के परिणामस्वरूप और शब्द-निर्माण में हिन्दी वालों के आलस्य के कारण हिन्दी का जो रूप बन रहा है, उसकी कुछ बानगी भी इस वक्तव्य में पेश की गई है – मसलन, छात्र-छात्राओं की जगह स्टूडेंट्स, माता-पिता की जगह पेरेंट्स, अध्यापकों की जगह टीचर्स, विश्वविद्यालय की जगह यूनिवर्सिटी, परीक्षा की जगह एक्जाम, अवसर की जगह अपार्चुनिटी, प्रवेश की जगह इंट्रेंस, संस्थान की जगह इंस्टीट्यूशन, चौराहे की जगह स्क्वायर, रविवार-सोमवार की जगह संडे-मंडे तथा भारत की जगह इंडिया। इसके साथ ही, पूरे के पूरे वाक्यांश भी हिंदी के बजाय अंग्रेजी के छपना, जैसे आउट ऑफ रीच, बियांड अप्रोच, मॉरली लोडेड, कमिंग जनरेशन, डिसीजन मेकिंग, रिजल्ट-ओरियंटेड प्रोग्राम आदि।
हिन्दी के सुविख्यात कथाकार तथा चित्रकार प्रभु जोशी, जो इंदौर में ही रहते हैं,  हिन्दी के इस क्रियोलीकरण से अरसे से चिंतित रहे हैं। इस मुद्दे पर वे विभिन्न समाचार पत्रों में लगातार लिखते भी रहे हैं। यह उन्हीं का आग्रह है कि हिन्दी-अंग्रेजी मिश्रण से पैदा हो रही दोगली हिन्दी को हिंग्लिश न कह कर क्रियोल कहा जाना चाहिए। क्रियोल उस भाषा को कहते हैं जो यूरोप के विभिन्न उपनिवेशों में सत्तारूढ़ जाति की भाषा और शासित समूहों की भाषा के मेलजोल से पैदा हुई है। उदाहरण के लिए, मारिशस की बोलचाल की भाषा क्रियोल है, जो भोजपुरी और फ्रांसीसी के मेल से जनमी है। क्रियोल में कोई गंभीर चीज नहीं लिखी जाती। वह मात्र वहां के साधारण लोगों की बोल-चाल की भाषा होती  है। प्रभु जोशी ही नहीं, हिन्दी के सभी स्वाभिमानी लेखकों और पत्रकारों को लगता है कि हिन्दी के क्रियोलीकरण की प्रक्रिया इसी प्रकार जारी रही, तो एक दिन हिन्दी लुप्त हो जाएगी और हम एक ऐसी खिचड़ी भाषा के वाहक कुली बन जाएंगे जिसमें हिन्दी की उपस्थिति नाम मात्र की होगी।
यह दुख हिन्दी लेखन में अकसर प्रगट किया जाता है। इस 14 सितंबर को भी बहुत-सी जगहों पर और बार-बार इसे अभिव्यक्त किया गया। लेकिन इसके प्रतिरोध का उपाय क्या है? सिर्फ रोने से भेड़िया भाग नहीं जाता। उसे डराना पड़ता है कि हम भी कुछ कर सकते हैं। यही सोच कर प्रभु जोशी तथा उनके भाषा-स्वाभिमानी मित्रों ने तय किया कि इस 14 सितंबर को इंदौर के किसी सार्वजनिक स्थान पर उन हिन्दी अखबारों (राष्ट्रीय सहारा नहीं) की होली जलाई जाए जो हिन्दी को दूषित और प्रदूषित कर रहे हैं।  हिन्दी दिवस पर शहर की गांधी प्रतिमा के आसपास लगभग पचास लोग एकत्र हुए और उन्होंने हिन्दी के सभी समाचार पत्रों की होली जलाई (ऊपर जिस राख की चर्चा की गई है, वह इन्हीं अखबारों की है।)। उन्होंने नारे लगाए, भाषा का क्रियोलीकरण, बंद करो बंद करो। इस पवित्र और साहसिक कार्यक्रम में समाजवादी चिंतक अनिल त्रिवेदी,  आदिवासी-बहुल क्षेत्र के सामाजिक कार्यकर्ता और कवि तपन भट्टाचार्य, प्रभु जोशी, जीवन सिंह ठाकुर, प्रकाश कांत, कृष्णकान्त निलोसे, शशिकांत गुप्ते, विश्वनाथ कदम, ईश्वरी रावल, (श्रीमती) जनक पलटा मिगिलिगन  आदि सम्मिलित थे।
मानना होगा कि यह हिन्दी को बचाने की दिशा में एक ऐतिहासिक घटना है।  कुछ-कुछ वैसी ही जैसे ब्रिटिश राज में विदेशी कपड़ों की होली जलाने का रोमांचक कार्यक्रम। किसी सार्वजनिक स्थान पर जो शख्स विदेशी कपड़ों को जमा कर उनमें जलती हुई तीली लगाता होगा, वह  इस भावना से रोमांचित हो उठता होगा कि वह ब्रिटिश साम्राज्य का दहन कर रहा है। इंदौर की गांधी प्रतिमा के निकट जुटे इंदौर के जागरूक लगों को भी कुछ ऐसी ही अनुभूति हो रही होगी कि वे अंग्रेजी का दहन कर रहे हैं। अंग्रेज चले गए, तो अंग्रेजी क्यों रहे?
लेकिन रोम एक दिन में नहीं बना था न एक दिन में नष्ट हुआ था। इंदौर में जो हुआ,  वह पहली चिनगारी थी। हम मनाते हैं कि यह चिनगारी देश के कोने-कोने में पहुंचे और भारत को उसकी अपनी भाषाएं लौटाए। देश भर में इसलिए कि क्रियोलीकरण सिर्फ हिन्दी का नहीं, सभी भारतीय भाषाओं का हो रहा है। किसी-किसी भाषा में तो बेशर्मी के साथ यह भी प्रस्तावित किया जा रहा है कि हमें अपनी लिपि छोड़ कर रोमन लिपि अपना लेनी चाहिए। जाहिर है, समस्या खतरनाक बिन्दु पर पहुंच गई है। बल्कि बहुत-से लोग समस्या को ही समाधान मानने लगे हैं। मैं तो सुझाव दूंगा कि फिलहाल हिन्दी वालों को अपनी भाषा से संबंधित दूसरे काम छोड़ देना चाहिए और लंका दहन के कार्यक्रम में शामिल हो जाना चाहिए। भेड़िया एकदम दरवाजे तक आ चुका है।

9 thoughts on “हिन्दी के क्रियोलीकरण के विरुद्ध

  1. राजकिशोरजी का यह आलेख 'हिंदुस्तान'में पढ़ा था.दुखद हैं की एक-दो नए कथाकार क्रियोलिकृत भाषा में लिखते हैं,और उन्हें सबसे बडी शह ज्ञानपीठ जैसी संस्था से मिलती है. शरद कोकास अपनी टिप्पणी में,मेरे जानते, थोडा उल्टा लिख गए हैं.बच्चों का प्रश्न फोर्टी थ्री यानी कितना नहीं होता,बल्कि तैतालीस यानी कितना होता है.हिंदी की गिनती की समझ हमारे बच्चों की सम्यक नहीं है.आप अंग्रेजी स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों से हिंदी महीनों के नाम शुद्ध शुद्ध नहीं लिखवा सकते, हिंदी शब्दों के हिज्जे वे कतई नहीं कर सकते.पाठ्यक्रमों में हिंदी की समझ मजबूत बनाने वाले पाठों को शामिल करने और उनका महत्व बच्चों को समझाने की जरूरत है. महज अंग्रेजी ज्ञान से गर्व-गझिन होने वाले दया के पात्र हैं.

  2. जब घर में एक बड़ा बच्चा पूछता है फोर्टी थ्री याने कितना ? तो लगता है ऐसे आंदोलन की अब ज़रूरत है ।

  3. नमस्कार !
    आज हमे पाने ही घर में हिंदी के लिए संघर्ष कर रहे है , जब कि आज हम सब पे हिंगलिश भारी पद रही है ,जब तक एम आदमी के दिलो दिमाग में स्वयं चेतना जाग्रत नहीं होगी तब शायद '' हिंदी '' हिंगलिश के रूप में ही हमरे सामने यहू कड़ी rahegi . जिस प्रकार आज़ादी के लिए बच्चा बच्चा जाग्रत था ठीक वैसे ही हिंदी के लिए बच्चा बच्चा नहीं माता पिता जाग्रत साथ होतो अलग ही नज़ारा होगा , अगर हमारे हिंदी साहित्यक ब्लॉग आखर कलश '' का हिंदी के विषय में जो भी सहयोग आप को हाज़िर है !प्रतीक्षा है
    सादर !

  4. इस आंदोलन को और तेज करना चाहिए… हम इतनी सी लड़ाई नहीं लड़ सकते तो क्या खाक साम्यवादी व्यवस्था की लड़ाई बात करते है…

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