अशोक वाजपेयी ने अपने स्तंभ ‘कभी-कभार’ में कल लेखकों की मदद के लिए एक कल्याण कोष बनाये जाने की अपील की है. अपील तो उन्होंने वरिष्ठ लेखकों से की थी लेकिन प्रथम प्रतिक्रियास्वरूप युवा लेखक विनीत कुमार ने अपनी पहली प्रकाशित पुस्तक ‘मंडी में मीडिया’ की रायल्टी इस मद में देने की घोषणा की है. उनकी यह पहल स्वागतयोग्य है. ऐसे दौर में जब हिंदी समाज कुनबों-कबीलों में बंटा हमेशा युद्धरत रहता है इस तरह की पहल उसकी सामूहिकता, सामाजिकता को बल मिलता है. विनीत कुमार ने घोषणा करते हुए ऐसे ही कुछ सवालों को टटोलने का प्रयास भी किया है. प्रस्तुत है उनका यह लेख जिसे पढकर मुझे उम्मीद है कि कुछ और लेखक भी आगे आयेंगे- जानकी पुल.
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अशोक वाजपेयी ने ‘कभी-कभार’( जनसत्ता, 2 सितंबर) के जरिए वरिष्ठ लेखकों से अपील की है कि वे “लेखकों की मदद” के लिए एक कल्याण कोष बनाएं. इससे आनेवाले समय में जरुरतमंद लेखकों को मदद मिल सकेगी. इसके साथ ही युवतर लेखकों और वर्चुअल स्पेस पर सक्रिय हम जैसे खुदरा-खुदरी टिप्पणीकारों के प्रति उम्मीद जतायी है कि सोशल नेटवर्किंग आदि का उपयोग कर इसे अभियान की शक्ल दें.
अशोक वाजपेयी से घोर वैचारिक असहमति, उनकी साहित्यिक-सांस्कृतिक गतिविधियों के प्रति गहरा असंतोष और शक-शुबहा रखते हुए भी मैं उनकी इस पहल का स्वागत करता हूं और इस कोशिश के साथ अभी से ही साथ खड़ा हूं. अशोक वाजपेयी की इस पहल का स्वागत इसलिए भी किया जाना चाहिए कि उन्होंने बाकी दूसरे महंत साहित्यकारों की तरह व्यस्ततम और छक्का-पंजा जीवन जीते हुए भी उनसे अलग जरुरतमंद लेखकों के प्रति चिंता व्यक्त की है. फिलहाल लेखन के स्तर पर ही सही इस बात की जरुरत महसूस की है कि हमारे खाते में तमाम तरह की उपलब्धियों के शामिल हो जाने के बावजूद भी नैतिक जिम्मेदारी का कोना अगर खाली रह गया तो आनेवाले समय में मन कचोटेगा.
दूसरा कि ऐसी अपील देखते हुए हम जैसे यूथभ्रष्ट हिन्दी छात्रों का साहित्यिक समाज के प्रति जो मन तेजी उचटता चला गया है, एक बार फिर से भरोसा जमने की प्रक्रिया में शामिल होते महसूस कर पा रहे हैं. ये अशोक वाजपेयी के लिखने का ही प्रभाव है कि साहित्यिक समाज के प्रति शुष्क होती संवेदना गहरी और तरल होती महसूस कर पा रहा हूं. इस लिहाज से “लेखकों की मदद” शीर्षक से अपीलनुमा लिखा गया छोटा सा लेख उनके पुरस्कृत काव्य-संग्रह और चर्चित कविता से कम प्रभावशाली नहीं है. आनेवाले समय में इसे “रोजमर्रा की आपाधापी और जोड़-जुगाड़ की जिंदगी के बीच से बचा ली गई संवेदना” के रुप में याद किया जाएगा.
मेरी अपनी समझ है कि साहित्य के प्रति भरोसा और उससे हम जैसे भटके हुए छात्रों के लिए प्रतिबद्धता का पाठ ऐसी ही लेखन सामग्री बनती है न कि वे तथाकथित कालजयी और सार्थक कविताएं जो किताबों के पन्नों तक जितनी ही विश्वसनीय, प्रभावशाली और अर्थपूर्ण लगती है, कवि के निजी जीवन और व्यवहार की परिक्रमा करते हुए जब दोबारा हम तक वापस आती है तो उतनी ही झूठ,विद्रूप और अर्थहीन लगने लग जाती है. जिसके भीतर की तरलता, संवेदना की गहराई और विचारों की परिपक्वता सिर्फ और सिर्फ एक साहित्यिक रचना की संज्ञा पाकर स्थिर हो जाती है. उसके भीतर के सारे हलचल, बेचैनी और उद्बबोधित करनेवाले तत्व कवि की स्ट्रैटजी जान पड़ते हैं जो कि कई बार तो तत्काल और अक्सर आगे जाकर बेपर्द हो जाते हैं. शायद यही कारण है कि जब हम रचना के जरिए बननेवाले परिवेश की तलाश असल जिंदगी में करने की कोशिश करते हैं तो आखिर में आकर निराशा और फ्रस्ट्रेशन के अलावे कुछ अलग नहीं पाते. अशोक वाजपेयी की ये अपील लेखन और परिवेश के बीच के भयावह अंतराल को कुछ हद तक कम करती है.
दूसरा कि उन्होंने लेखकों की मदद के क्रम में वैचारिक असहमति, पंथ और वाद के आधार पर विभाजन करने और उस आधार पर निर्णय लेने का जो निषेध किया है, वो अधिक महत्वपूर्ण है. इसमें ये बात शामिल है कि सारी कोशिशें एक लेखक के जीवन को सहेजने और सहयोग करने की हो न कि किसी पार्टी या दल के कार्यकर्ता भर को. इससे मदद तो जो होगी सो होगी ही, साथ ही बाड़े और पाड़े में फंसा-धंसा हिन्दी समाज एक बार इससे बाहर निकलकर सोच सकेगा. व्यक्तिगत तौर पर इस पहल का समर्थन करना मुझे इसलिए भी जरुरी लगा कि साहित्य की चौखट पर जहां मिनट-मिनट में कालजयी,सार्थक,शाश्वत और प्रतिबद्धता जैसे शब्दों की हांक लगती रहती है, वहां खड़े होकर भी अशोक वाजपेयी वर्चुअल स्पेस तात्कालिकता,उसकी हरकतों में संभावना देख रहे हैं और ये मानते हैं कि इसमें शामिल लोग अगर इस पहल को लेकर सक्रिय होते हैं तो बहुत जल्द ही इसे अभियान की शक्ल में देखा-जाना जा सकेगा.
कालजयिता, सामाजिक प्रतिबद्धता,सार्थक और शाश्वत लेखन जैसे डंडे-बेंत की मार से बचने के लिए हम जैसे खुदरा-खुदरी ब्लॉगरों, टिप्पणीकारों ने वर्चुअल स्पेस की ओर जो रुख किया, अशोक वाजपेयी हमारे इस भगोड़ेपन के प्रति भी उम्मीद रखते हैं, इससे बेहतर और क्या हो सकता है ?आज से चार-पांच साल पहले जिस सोशल नेटवर्किंग और वर्चुअल स्पेस लेखन के प्रति जिन स्थापित साहित्यकारों के मन में दुराग्रह रहा हो, साहित्य के सौन्दर्यशास्त्र और भाषाई तमीज के छिन्न-भिन्न हो जाने का भय व्यापता रहा हो, अब उसी लेखन और सक्रियता में न केवल उम्मीद बल्कि माहौल बनाने की ताकत दिखाई दे रही हो, इसे महज उम्मीद भर तक देखने के बजाय “भूल-सुधार” का मामला समझा जाए तो क्या गलत होगा ? ये अलग बात है कि जब आज से पांच साल पहले किसी ने ऐसे स्थापित और मूर्धन्य साहित्यकारों के पास किसी तरह की अर्जी नहीं भेजी तो अब सर्टिफिकेट जारी करने का जश्न क्यों बनाएं या फिर ये क्यों भूल जाएं कि झक मारकर ऐसे साहित्यकारों ने वर्चुअल स्पेस पर अपने बिचड़े जहां-तहां जरुर छींट डाले हैं, जो हिन्दी समाज की उसी गुणा-गणित, चेला-चमचई का डिजिटल और वेब संस्करण है और उन्हें ही उम्मीद भरी नजरों से देख रहे हैं..लेकिन…
इन तमाम तरह की धक्का-मुक्की के बीच अशोक वाजपेयी को आश्वस्त तो किया ही जा सकता है कि जब तक उनकी ये पहल महज “पब्लिसिटी स्टंट” या “विरेचन” भर का हिस्सा नहीं रहती है, हम खुदरा लेखक उनके साथ हैं. इसी कड़ी में मैंने लेख पढ़ने के तुरंत बाद ही ये तय किया कि-
“मंडी में मीडिया”( वाणी प्रकाशन,2012) जो कि मेरी पहली किताब है, भविष्य में उसकी जो भी रॉयल्टी मिलेगी, उसे इस कोष में जमा कराउंगा. ये सिर्फ एक साल की मिलनेवाली रॉयल्टी नहीं बल्कि जब तक आती रहेगी, इस कोष के लिए सुरक्षित रखूंगा. मुझे नहीं पता कि ये राशि कितनी होगी और इससे किस हद तक मदद पहुंच सकेंगी लेकिन किताब को लेकर जिस तरह की प्रतिक्रिया मेरे पास अब तक आती रही है, उम्मीद है कि ये चुटकी भर की मदद जरुर हो जाएगी. दूसरा कि इस किताब से संबंधित भविष्य में दूसरे जो भी आर्थिक लाभ होते हैं, उसे भी इस कोष में जमा कराउंगा.
फिलहाल मैं अपनी इस कोशिश को मॉनिटरी न देखकर पूरी तरह भावनात्मक फैसले के रुप में देख रहा हूं. राशि बहुत छोटी या थोड़ी बेहतर हो सकती है जिसका कि मुझे बिल्कुल भी अंदाजा नहीं है लेकिन इस किताब में जो तासीर पैदा करने की कोशिश की गई है, उसमें कहीं न कहीं उन साहित्यकारों के स्वर और मिजाज शामिल हैं जिन्हें हम हिन्दी समाज के लिजलिजेपन और बहुत ही टटपुंजिए स्वार्थ के बीच शामिल होनेवाली गतिविधियों से आजीज आकर भूलते चले गए. हम अपने इस फैसले के जरिए उन साहित्यकारों के शब्दों को फिर से जीना चाहते हैं जो मीडिया,मनोरंजन,टेलीविजन पर लिखते हुए आज भी स्मृतिकोश का हिस्सा बनकर कीबोर्ड के आसपास नाचते रहते हैं.
अशोक वाजपेयी ने लेखकों का सहयोग करने के संदर्भ में कल्याण-कोष,मदद जैसे शब्दों का प्रयोग किया है, मैं अपने को उन शब्दों से अलग करते हुए ये समझता हूं कि मेरे इस छोटे से फैसले से एक तो किसी साहित्यकार का कल्याण संभव नहीं है और न ही इसे मदद की श्रेणी में रखा जाना चाहिए. ये पूर्वज या समकालीन लेखकों की वैचारिक और शाब्दिक संपत्ति का इस्तेमाल करने के क्रम में उनकी बौद्धिक सम्पदा का किराया भर है. मैं इसे अपने बाकी के फैसले की तरह ही निहायत स्वार्थ के अधीन लिया गया फैसला मान रहा हूं. ये किसी भी तरह की म्युचुअल फंड या जीवन बीमा कंपनी में निवेश के बदले किया जानेवाला निवेश है. फर्क सिर्फ इतना है कि इसके लिए मैंने टीवी और रेडियो पर किसी बैंक या कॉर्पोरेट का विज्ञापन देखकर भरोसा पैदा करने के बजाय अशोक वाजपेयी के लिखे पर भरोसा करके उस हिन्दी समाज के प्रति दोबारा से यकीन की तरफ लौटना चाहता हूं जहां मुझे पैसे से अधिक दूसरी चीजों की जरुरत है.
दिल्ली जैसे शहर में पिछले बारह सालों से छोटे- बड़े कम से कम आधे दर्जन अस्पतालों में भर्ती होने और इलाज कराने का अनुभव रहा है. हमने एम ए के दौरान वो भी दिन देखें हैं जब हम जैसे सैकड़ों छात्रों के बीमार होने पर जेब और अकाउंट में पांच हजार रुपये भी नहीं होते थे लेकिन परमानंद हॉस्पीटल में जैसे पूरा हॉस्टल घुस जाता था और देखते ही देखते न जाने कितने हजार घंटेभर में जमा हो जाते थे और अब अक्सर उन दिनों से भी गुजरना होता है, जब हम खुद कैब को फोन करते हैं, उसी परमानंद और सर गंगाराम की इमरजेंसी तक पहुंचते हैं और बिस्तर पर लेटे-लेटे कार्ड स्विप करके खुद ही एडमिट हो जाते हैं..पत्रकार,लेखक और प्रोफेसर दोस्तों के बीच बीमार हो जाना गुनाह जैसा लगता है और बताना किसी अपराध से कम नहीं. तब लगता है, हम लिखते हुए, पहले से ज्यादा सभ्य होने की प्रक्रिया में शायद ज्यादा अलग-थलग और अकेले पड़ते जाते हैं.
मेरा ऐसा सोचना शायद गलत भी हो लेकिन इतना तो जरुर है कि जिस बीमार लेखकों की मदद की बात अशोक वाजपेयी कर रहे हैं, उस मदद में सिर्फ और सिर्फ आर्थिक मदद शामिल नहीं है. अभी ओमप्रकाश वाल्मीकि को सिर्फ पैसे नहीं, जूठन का वो पाठक और हिन्दी समाज चाहिए जो धीमी आंच पर दलिया सीझाकर( पकाकर) लाए, उनके हाथ उठने के पहले पानी का ग्लास आगे कर दे. इस हिन्दी लेखक समाज के बीच से कोई बेटी-बहू-भतीजी-भतीजा-भाई बनकर निकल आए. बाबा नागार्जुन को सिप्ला और रेनबेक्सी के बजाय नरम हाथों से तालमखान की खीर मिलती तो शायद कुछ साल और जी जाते. हमने विष्णु प्रभाकर की खांसी डीयू के दर्जनभर छात्र के चले जाने और बतियाने से रुकती देखी है.
मैं फिर कहता हूं किसी बीमार लेखक के इलाज के लिए धन संग्रह करना और उनका सहयोग करना, सिर्फ और सिर्फ एक व्यक्ति को बचाना भर नहीं है, उसके भीतर के लेखक को भी बचाना है और इस बचाने में उनका आत्मसम्मान, उसकी मान्यताएं, पसंद-नापसंद,वैचारिकता और उसके जिया गया अतीत भी शामिल है. अगर ऐसा नहीं है तो किसी भी बीमार लेखक की मदद के लिए दो-चार लाख रुपये जमा करना बहुत आसान है. इतना काम तो फेसबुक की दो-चार स्टेटस भर से हो सकता है या फिर जिन लेखकों ने प्रगतिवाद,प्रयोगवाद और नई कविता छोड़कर उसके पहले के काल या उनकी मान्यताओं को लेकर लिखा है तो चांदनी चौक,सदर बाजार,खारी बावली में पड़े सैकड़ों धन्ना सेठ हैं जो आनन-फानन में दो-चार-दस लाख जुटा देंगे. लेकिन क्या सवाल सचमुच किसी लेखक के इलाज कराने और उन्हें बचाने भर का है ?
आप सोचिए न, जो लेखक जिंदगी भर सत्ता प्रतिष्ठानों और सरकार से लड़ता रहा, खुलकर असहमति व्यक्त करता रहा, आप उनकी मदद के लिए सरकार के आगे गुहार लगा रहे हैं..सुनकर उन पर क्या बीतती है, कभी इस पर गंभीरता से विचार किया गया है ? पूरी जिंदगी वो आपका-हमारा लेखक है, हमारे पाठ्यक्रम का हिस्सा रहा है और जब वो किताबों पर समीक्षा लिखने की स्थिति में नहीं रहता, सेमिनारों में बोलने लायक नहीं रह जाता, सद्यःप्रकाशित किताबों पर फौरी टिप्पणी देने और फ्लैप लिखने लायक नहीं रह जाता, पुस्तकालयों में आपकी किताबें घुसवाने लायक नहीं रह जाता तो वो सरकार और राष्ट्र का लेखक हो जाता है ? आप आखिर लेखक को उस गाय की तरह क्यों समझते हैं जिन्हें जिंदगीभर दूहने के बाद गली में पेट लवर्स के भरोसे छोड़ दिया जाता है ?
संभव है ये सब रुपक और लफ्फाजी लगे लेकिन लेखक सचमुच अंत तक लेखक की तरह बना रहना चाहता है और वो चाहता है कि जब भी मरे तो एक लेखक की हैसियत से मरे. मरते वक्त उसकी हड्डियां,दांत,आंख चाहे सलामत रहे न रहे, उसका आत्मसम्मान,वैचारिकी और साहित्य के प्रति भरोसा सही-सलामत रहे. उन्हें जो भी सहयोग किया जाए, कहीं से न लगे कि वो खैरात का हिस्सा है.
असल में एक लेखक को बचाने के पीछे अंत-अंत तक ये भरोसा कायम रखना जरुरी है कि उसने लिख-पढ़कर जो कुछ भी किया, अपने पीछे एक विरासत छोड़कर जा रहा है जिसे मौजूदा और आनेवाली पीढ़ी सहेजकर रखेगी या उसका हिसाब-किताब रखेगी. ऐसे में उस हिन्दी समाज की जिम्मेदारी ज्यादा बनती है जिसने उनके काम और नाम को भोगा और भुनाया है. मसलन हम अपने पापा से इस बात की जिरह भले ही न करें कि आपने मेरे लिए क्या बचाया या बनाया है लेकिन ये सवाल किताबों और लेखों के जरिए ही अपने पूर्ववर्ती लेखकों से तो जरुर करेंगे और उसी तरह अपनी कमाई का एक हिस्सा उन्हें अदा भी करेंगे. मसलन अशोक वाजपेयी ने वरिष्ठ लेखकों सहित आगे चलकर प्रकाशकों से भी इस दिशा में मदद करने की बात की है, इसे अमूर्तन में ले जाने के बजाए क्या इस फैसले पर तक पहुंचना मुश्किल है कि जिन भी दिवंगत लेखकों की याद में जो कुछ भी( रचनावली,पत्रिकाएं जिनमे मोटे विज्ञापन की रकम शामिल है, विशेषांक आदि) निकाले जाएंगे, उसकी रॉयल्टी और मुनाफे का आधा हिस्सा संपादक और संकलनकर्ता न रखकर इस कोष को दें जिससे कि जीवित और जरुरतमंद लेखकों की मदद की जा सकेगी.
इस घोषणा से संभव है कि तब दिवंगत रचनाकारों पर उत्सवधर्मी व्यावसायिक लाभ के मातम मनाने बंद हो जाएं और कई सारी रचनाएं आने से रह जाए लेकिन तब कम से कम हम समझ तो सकेंगे कि हिन्दी समाज क्या सचमुच घोषणाओं से आगे जाकर भी जी सकता है या नहीं ? और फिर जिस लेखक को जीते-जी उसके काम का पारिश्रमिक नहीं मिला, उनकी मौत पर चील-कौए( संकलनकर्ता और अतिथि-विशेष-संपादक) अपनी वजन क्यों बढ़ाएं ?
इसके साथ ही क्या ये संभव है कि अशोक वाजपेयी जैसे बाकी के लेखक-संपादक-कवि-साहित्यकार ये तय करें कि अपनी सबसे चर्चित और बिकनेवाली किताब की रॉयल्टी इस कोष को देंगे और वो जब तक रॉयल्टी मिलती रहे,तब तक के लिए होगी ?
संभव है ये सब आखिर में जाकर ढाक के तीन पात साबित हों लेकिन अगर हम एक व्यक्ति को बचाने के बजाय एक लेखक को बचाना चाहते हैं तो सिर्फ धन जुटाने के बजाय उसके भीतर की चटखनेवाली चीजों को बचाना कम जरुरी नहीं है. उसे ये एहसास कराना कि आपने लिखकर जो कुछ भी और जितना किया, वो अकारथ नहीं है और हम आपकी कोई मदद नहीं कर रहे अपना ही भविष्य सुरक्षित कर रहे हैं. हम अपने को महान के बजाय स्वार्थी करार देकर ही कुछ कर सकते हैं. नहीं तो हम अपनी तरफ से घोषणाएं करके अपनी ही विज्ञापनबाजी करने की फिराक में लगे रह जाएंगे.


