ये भी कोई जाने की उम्र होती है- दीप्ति नवल

ऋतुपर्णो घोष का जाना सचमुच अवाक कर गया. साहित्य और सिनेमा के खोये हुए रिश्ते को जोड़ने वाले इस महान निर्देशक को आज दीप्ति नवल ने बहुत आत्मीयता से याद किया है. पढ़ा तो साझा करने से खुद को रोक नहीं पाया- जानकी पुल.
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जाने क्या दिक्कत थी कि उनकी तबीयत अक्सर ऊपर-नीचे होती रहती। शायद उस दिन भी उनकी तबीयत ठीक नहीं थी, जब वह अपनी निर्देशित फिल्म चित्रंगदा: द क्राउनिंग विश के लिए नेशनल फिल्म स्पेशल ज्यूरी अवॉर्ड ले रहे थे। यकीनन, राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों से उनका अटूट रिश्ता था। बधाई देने के लिए मैंने उन्हें फोन किया। बताया गया कि उनकी तबीयत बिगड़ रही है। वह कुछ वक्त अस्पताल में भी रहे। यह जानते हुए कि उनकी तबीयत ठीक नहीं है, कॉल करती थी। पता चलता कि उनकी सेहत में सुधार हो रहा है। लेकिन अफसोस, ऋतुपर्णो समय से पहले ही इस दुनिया से अलविदा हो गए। पचास साल से कुछ महीने कम की उम्र में थे। ये भी कोई जाने की उम्र होती है!

यादों में थोड़ी पीछे जाती हूं। एक दिन उनका फोन आया। वह मुझे बताने लगे कि एक फिल्म बनाने का इरादा है। फारुख शेख के साथ वह मुझे उस फिल्म में लेना चाहते थे। उन्होंने मुझसे पूछा कि क्या आप काम करना चाहेंगी? मैंने कहा- आपके निर्देशन में काम करने की तो मेरी कब से तमन्ना है, कब से काम करना है? उस तरफ से उनकी आवाज आई- जल्दी ही बताता हूं। बांग्ला फिल्म सत्यान्वेषी के बाद वह इसी फिल्म पर काम करने वाले थे, पर यह ख्वाब अधूरा ही रह गया। फिलहाल सत्यान्वेषी भी अधूरी रह गई है। उनके साथ फिल्म मेमोरीज इन मार्च में काम करने का मौका मिला। वह बतौर निर्देशक इस फिल्म से नहीं जुड़े हुए थे, बल्कि वह मेरे को-स्टार थे। कैमरे के पीछे रहकर काम करना और कैमरे के सामने काम करना- दो अलग चीजें हैं। कई निर्देशक जब खुद कैमरे के सामने आते हैं, तो अपनी छाप नहीं छोड़ पाते। इसी तरह कई अभिनेता जब कैमरे के पीछे जाते हैं, तो नीरस साबित होते हैं। लेकिन मेमोरीज इन मार्च में ऐसा कुछ भी नहीं लगा। फर्क सिर्फ इतना था कि कैमरे के पीछे रहकर सिनेमाई परदे पर कूची चलाने वाला वह शख्स कैमरे के सामने अपने अभिनय से सैल्युलाइट पर रंग भर रहा था। उन्होंने तनिक भी एहसास नहीं होने दिया कि एक डायरेक्टर एक्टिंग कर रहा है और यह भी नहीं कि एक सधी हुई अभिनेत्री के सामने खड़ा हूं। स्क्रीन पर हम दोनों की केमेस्ट्री आलोचकों से लेकर दर्शकों तक को खूब भाई। काफी तारीफें हमें मिलीं। यह एक कूचीकार की खासियत होती है कि वह कला की हर विधा को अपने रंगों से जिंदादिल बनाता है।


पश्चिम बंगाल की धरती ने कई महान कूचीकार पैदा किए, उनमें ऋतुपर्णो घोष का नाम भी है। उनकी उनीसे अप्रैल से लेकर चित्रागंदा: द क्राउनिंग विश  तक को देखिए, ऐसा लगेगा कि वह बड़े परदे पर हर एक इमेज को रंग रहे हैं। मुझे काफी मलाल है कि उनके निर्देशन में मैं काम न कर सकी, जबकि इस बार मैं पश्चिम बंगाल में तीन महीने रहकर बांग्ला भाषा सीखने वाली थी। उनका जाना भारतीय सिनेमा के लिए कभी न पूरी हो सकने वाली क्षति है।


\’दैनिक हिंदुस्तान\’ से साभार 

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ऋतुपर्णो घोष का जाना सचमुच अवाक कर गया. साहित्य और सिनेमा के खोये हुए रिश्ते को जोड़ने वाले इस महान निर्देशक को आज दीप्ति नवल ने बहुत आत्मीयता से याद किया है. पढ़ा तो साझा करने से खुद को रोक नहीं पाया- जानकी पुल.
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जाने क्या दिक्कत थी कि उनकी तबीयत अक्सर ऊपर-नीचे होती रहती। शायद उस दिन भी उनकी तबीयत ठीक नहीं थी, जब वह अपनी निर्देशित फिल्म चित्रंगदा: द क्राउनिंग विश के लिए नेशनल फिल्म स्पेशल ज्यूरी अवॉर्ड ले रहे थे। यकीनन, राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों से उनका अटूट रिश्ता था। बधाई देने के लिए मैंने उन्हें फोन किया। बताया गया कि उनकी तबीयत बिगड़ रही है। वह कुछ वक्त अस्पताल में भी रहे। यह जानते हुए कि उनकी तबीयत ठीक नहीं है, कॉल करती थी। पता चलता कि उनकी सेहत में सुधार हो रहा है। लेकिन अफसोस, ऋतुपर्णो समय से पहले ही इस दुनिया से अलविदा हो गए। पचास साल से कुछ महीने कम की उम्र में थे। ये भी कोई जाने की उम्र होती है!

यादों में थोड़ी पीछे जाती हूं। एक दिन उनका फोन आया। वह मुझे बताने लगे कि एक फिल्म बनाने का इरादा है। फारुख शेख के साथ वह मुझे उस फिल्म में लेना चाहते थे। उन्होंने मुझसे पूछा कि क्या आप काम करना चाहेंगी? मैंने कहा- आपके निर्देशन में काम करने की तो मेरी कब से तमन्ना है, कब से काम करना है? उस तरफ से उनकी आवाज आई- जल्दी ही बताता हूं। बांग्ला फिल्म सत्यान्वेषी के बाद वह इसी फिल्म पर काम करने वाले थे, पर यह ख्वाब अधूरा ही रह गया। फिलहाल सत्यान्वेषी भी अधूरी रह गई है। उनके साथ फिल्म मेमोरीज इन मार्च में काम करने का मौका मिला। वह बतौर निर्देशक इस फिल्म से नहीं जुड़े हुए थे, बल्कि वह मेरे को-स्टार थे। कैमरे के पीछे रहकर काम करना और कैमरे के सामने काम करना- दो अलग चीजें हैं। कई निर्देशक जब खुद कैमरे के सामने आते हैं, तो अपनी छाप नहीं छोड़ पाते। इसी तरह कई अभिनेता जब कैमरे के पीछे जाते हैं, तो नीरस साबित होते हैं। लेकिन मेमोरीज इन मार्च में ऐसा कुछ भी नहीं लगा। फर्क सिर्फ इतना था कि कैमरे के पीछे रहकर सिनेमाई परदे पर कूची चलाने वाला वह शख्स कैमरे के सामने अपने अभिनय से सैल्युलाइट पर रंग भर रहा था। उन्होंने तनिक भी एहसास नहीं होने दिया कि एक डायरेक्टर एक्टिंग कर रहा है और यह भी नहीं कि एक सधी हुई अभिनेत्री के सामने खड़ा हूं। स्क्रीन पर हम दोनों की केमेस्ट्री आलोचकों से लेकर दर्शकों तक को खूब भाई। काफी तारीफें हमें मिलीं। यह एक कूचीकार की खासियत होती है कि वह कला की हर विधा को अपने रंगों से जिंदादिल बनाता है।

पश्चिम बंगाल की धरती ने कई महान कूचीकार पैदा किए, उनमें ऋतुपर्णो घोष का नाम भी है। उनकी उनीसे अप्रैल से लेकर चित्रागंदा: द क्राउनिंग विश  तक को देखिए, ऐसा लगेगा कि वह बड़े परदे पर हर एक इमेज को रंग रहे हैं। मुझे काफी मलाल है कि उनके निर्देशन में मैं काम न कर सकी, जबकि इस बार मैं पश्चिम बंगाल में तीन महीने रहकर बांग्ला भाषा सीखने वाली थी। उनका जाना भारतीय सिनेमा के लिए कभी न पूरी हो सकने वाली क्षति है।


‘दैनिक हिंदुस्तान’ से साभार 

6 thoughts on “ये भी कोई जाने की उम्र होती है- दीप्ति नवल

  1. hum unki kalpurn urja samman karate hai .unki kalapurn filmo ke liye ham unka aabhaar mante huye shradhanjali arpit karte hai premtanmye

  2. एक अच्छे निर्देशक को याद तो हमेशा ही किया जायेगा …मगर वह खाली स्थान जो रितुपर्णो छोड़ गए हैं उसका भरा जाना जल्दी संभव नहीं होगा !
    श्रद्धांजलि !!

  3. Pingback: bonanza 178

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