दो पल की कशमकश का वक्फा

मूलतः पंजाबी भाषी तजेन्दर सिंह लूथरा हिंदी में कविताएँ लिखते हैं. हाल में ही उनका कविता संग्रह राजकमल प्रकाशन से आया है- \’अस्सी घाट का बांसुरीवाला\’. उसी संकलन से कुछ चुनी हुई कविताएँ- जानकी पुल.
——————————————————–


1.
अस्सी घाट का बाँसुरी वाला
इसे कहीं  से भी शुरू किया जा सकता है,
बनारस के अस्सी घाट की पार्किंग से लेकर,
साइबेरिया से आये पक्षियो, अलमस्त फिरंगियो,
टूटी सड़कों, बेजान रिक्शो, छोटी बड़ी नावों,
कार का शीशा ठकठकाते  नंग धड़ंग बच्चो,
कहीं से शुरूकहीं बीच मंझधार ले जाया जा सकता है|
तभी बीच कोई बाँसुरी बजाता है,
छोटी सी सुरीली तान,
बजाता, फिर रुक जाता,
अपने मोटे बांस पर टंगी,
बाँसुरियो को ठीक करने लगता,
कद मद्धम, उम्र अधेड़,
लाल टीका, सादे कपड़े,
आंखो में जगती बुझती चमक,
आंखे बंद कर तान लगता,
फिर आते जातो को उम्मीद से ताकने लगता|
बाज़ार, रास्तेरिक्शे, साईकल, दुकाने,
सब अपने में मगन,
बेसुरे मंत्र, तीखे हॉर्न,
कर  देते हर तान बेतान,
फिर उसे लगा कोई नहीं सुनेगा,
वो सारी हिम्मत इकठ्टी कर,
चौराहे  पर आ गया,
और बेधडक कुछ बजाने लगा,
आंखे बंद कर ध्यान धरे था,
अरे ! ये तो आरती थी,
मात-पिता तुम मेरे शरण पडू मैं किसकी?,
स्वामी शरण पडू मैं किसकी?\”,
यकायक उसने अपनी सारी ताकत झोंक दी,
तान ऊंची कर दी,
भाव लरजने लगे,
फूँक दिल से निकली,
बाँसुरी बजने नहीं बोलने गाने लगी,
अब ये साधारण आरती नहीं थी,
मजबूरी और शिकायत सय उसने फिर गया,
\”शरण पडू मैं किसकी ?,
स्वामी शरण पडू मैं किसकी?\”
वो बाँसुरी बजाते-बजाते,
झूमने और गोल-गोल घूमने लगा,
जैसे उसने सर पे कोई पर्वत उठा लिया,
और घूमने झूमने लगा,
मरती गंगा, बेसुरे मंत्र ,
अलमस्त फिरंगी, नंग धड़ंग बच्चे,
सब उसके साथ-साथ,
झूमने और घूमने लगे,
आरती क्रांति-गीत में बदल गयी,
वो ईश्वर से आंखे मिलाने लगा,
सीधे-सीधे, टेढ़े सवाल पूछने लगा,
बिजली  कड़की,
और गंगा उजियारी हो गयी,
बादल गड़गड़ाये और मंत्र सुरीले हो गये,
पानी बरसा और अलमस्त फिरंगी निर्वाण पा गये,
बेजान रास्ते, पान के खोखे सज संवार गये,
तभी क्रांति गीत खत्म हो गया,
कहीं कुछ ना बदला,
सब वैसा ही था,
उसने चुपचाप बाँसुरी मोटे बांस में खोंसी ,
और कंधे पर सलीब लादे घर वापस चल पड़ा,
आज भी दो चार बाँसुरियाँ ही बिकी थी,
वो आज भी आधा खुश ,
आधा उदास था,
उसे किसी इंकलाब की खबर ना थी,
बस मैं मन मसोसे चुपचाप खड़ा था,
कि आज फिर क्रांति हो नहीं पायी |
2.
एक कम महत्व वाला आदमी
हर घर हर जगह,
होता है एक काम महत्व वाला आदमी,
वो बोलता नहीं,
सिर्फ सुनता है,
सिर्फ पूछने पर देता है जवाब,
झिझक शंका रोज पूछता है उससे,
तुम कहाँ बैठोगे ?
तुमारा कमरा आज क्या होगा?
तुम्हारी चादर, तुमारा बिस्तार कब बदला जायगा ?
आज तुम्हरे खाने-सोने का समय कितना खिसकेगा?
इस बार तुमारी छुट्टी किसकी छुट्टी से करेगी?
अपने सारे सवालो के जवाब में,
वो एक कबाड़ी की तरह,
कचरे में हाथ डाल-डाल कर,
बाकि सबके बचे-छोडे,
कम महत्व के टुकडो की,
अनचाहे मान से थोडे काम से,
बोरी में भर लेता है,
आधी दिहाड़ी के लिए I
और एक दिन जब नहीं रहता,
ये कम महत्व वाला आदमी,
तो उसके तमाम सवाल,
उसकी झिझक उसकी शंका,
उसकी पिछली पंक्ति, उसका कोना,
उसकी ओधान, उतरन, बिछावन,
उसकी पोनी करवट,
उसकी कटी छुट्टी,
उसका टूटा, खिसका समय,
उससे भी कम महत्व वाले आदमी को,
बडे परोपकारी भाव से,
थमा दिया जाता है I
3.
तुम ये सब कैसे कर लेते हो?
तुमारी कोई छठी इन्द्री है,
या होती है तुम्हे आकाशवाणी,
तुम कैसे खडे होते हो,
दो पावों के बीच सीमा रेखा लेकर?
तुम कैसे जान लेते हो,
पाला कौन सा भारी है?
तुम बातों-बातों में,
कैसे कर लेते हो व्यंग्य,
तुम कैसे जीतते हो,
मेरा विश्वास,
जबकि अपना तो तुम,
अविश्वास भी नहीं बाँटते |
तुम्हारे दोनों हाथ मुस्कुरा रहे होते हैं,
जब लगते हो गले,
फिर कैसे भुंक जाता है,
तुमारी सांसो का ज़हर मेरी पीठ में?
तुम कैसे सूंघ लेते हो,
गाँव, धर्म और जाति की बू,
और इकट्ठी कर लेते हो,
भेड़ियो की भीड़?
तुम्हारी आंखे ही ऐसी हैं,
या तुम नज़र गडाये रहते हो?
ये तुम्हारी मुद्रा है,
या तुम घात लगाये रहते हो?
कैसे संतुलित करते हो,
क़ि में मरुँ तो नहीं,
पर सर भी ना उठा सकूँ|
बरुफ़ दिली और दिमागी तपिश को,
तुम कैसे बाँट देते हो?
तुम कैसे लटक जाते हो,

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मूलतः पंजाबी भाषी तजेन्दर सिंह लूथरा हिंदी में कविताएँ लिखते हैं. हाल में ही उनका कविता संग्रह राजकमल प्रकाशन से आया है- ‘अस्सी घाट का बांसुरीवाला’. उसी संकलन से कुछ चुनी हुई कविताएँ- जानकी पुल.
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1.
अस्सी घाट का बाँसुरी वाला
इसे कहीं  से भी शुरू किया जा सकता है,
बनारस के अस्सी घाट की पार्किंग से लेकर,
साइबेरिया से आये पक्षियो, अलमस्त फिरंगियो,
टूटी सड़कों, बेजान रिक्शो, छोटी बड़ी नावों,
कार का शीशा ठकठकाते  नंग धड़ंग बच्चो,
कहीं से शुरूकहीं बीच मंझधार ले जाया जा सकता है|
तभी बीच कोई बाँसुरी बजाता है,
छोटी सी सुरीली तान,
बजाता, फिर रुक जाता,
अपने मोटे बांस पर टंगी,
बाँसुरियो को ठीक करने लगता,
कद मद्धम, उम्र अधेड़,
लाल टीका, सादे कपड़े,
आंखो में जगती बुझती चमक,
आंखे बंद कर तान लगता,
फिर आते जातो को उम्मीद से ताकने लगता|
बाज़ार, रास्तेरिक्शे, साईकल, दुकाने,
सब अपने में मगन,
बेसुरे मंत्र, तीखे हॉर्न,
कर  देते हर तान बेतान,
फिर उसे लगा कोई नहीं सुनेगा,
वो सारी हिम्मत इकठ्टी कर,
चौराहे  पर आ गया,
और बेधडक कुछ बजाने लगा,
आंखे बंद कर ध्यान धरे था,
अरे ! ये तो आरती थी,
मात-पिता तुम मेरे शरण पडू मैं किसकी?,
स्वामी शरण पडू मैं किसकी?”,
यकायक उसने अपनी सारी ताकत झोंक दी,
तान ऊंची कर दी,
भाव लरजने लगे,
फूँक दिल से निकली,
बाँसुरी बजने नहीं बोलने गाने लगी,
अब ये साधारण आरती नहीं थी,
मजबूरी और शिकायत सय उसने फिर गया,
शरण पडू मैं किसकी ?,
स्वामी शरण पडू मैं किसकी?”
वो बाँसुरी बजाते-बजाते,
झूमने और गोल-गोल घूमने लगा,
जैसे उसने सर पे कोई पर्वत उठा लिया,
और घूमने झूमने लगा,
मरती गंगा, बेसुरे मंत्र ,
अलमस्त फिरंगी, नंग धड़ंग बच्चे,
सब उसके साथ-साथ,
झूमने और घूमने लगे,
आरती क्रांति-गीत में बदल गयी,
वो ईश्वर से आंखे मिलाने लगा,
सीधे-सीधे, टेढ़े सवाल पूछने लगा,
बिजली  कड़की,
और गंगा उजियारी हो गयी,
बादल गड़गड़ाये और मंत्र सुरीले हो गये,
पानी बरसा और अलमस्त फिरंगी निर्वाण पा गये,
बेजान रास्ते, पान के खोखे सज संवार गये,
तभी क्रांति गीत खत्म हो गया,
कहीं कुछ ना बदला,
सब वैसा ही था,
उसने चुपचाप बाँसुरी मोटे बांस में खोंसी ,
और कंधे पर सलीब लादे घर वापस चल पड़ा,
आज भी दो चार बाँसुरियाँ ही बिकी थी,
वो आज भी आधा खुश ,
आधा उदास था,
उसे किसी इंकलाब की खबर ना थी,
बस मैं मन मसोसे चुपचाप खड़ा था,
कि आज फिर क्रांति हो नहीं पायी |
2.
एक कम महत्व वाला आदमी
हर घर हर जगह,
होता है एक काम महत्व वाला आदमी,
वो बोलता नहीं,
सिर्फ सुनता है,
सिर्फ पूछने पर देता है जवाब,
झिझक शंका रोज पूछता है उससे,
तुम कहाँ बैठोगे ?
तुमारा कमरा आज क्या होगा?
तुम्हारी चादर, तुमारा बिस्तार कब बदला जायगा ?
आज तुम्हरे खाने-सोने का समय कितना खिसकेगा?
इस बार तुमारी छुट्टी किसकी छुट्टी से करेगी?
अपने सारे सवालो के जवाब में,
वो एक कबाड़ी की तरह,
कचरे में हाथ डाल-डाल कर,
बाकि सबके बचे-छोडे,
कम महत्व के टुकडो की,
अनचाहे मान से थोडे काम से,
बोरी में भर लेता है,
आधी दिहाड़ी के लिए I
और एक दिन जब नहीं रहता,
ये कम महत्व वाला आदमी,
तो उसके तमाम सवाल,
उसकी झिझक उसकी शंका,
उसकी पिछली पंक्ति, उसका कोना,
उसकी ओधान, उतरन, बिछावन,
उसकी पोनी करवट,
उसकी कटी छुट्टी,
उसका टूटा, खिसका समय,
उससे भी कम महत्व वाले आदमी को,
बडे परोपकारी भाव से,
थमा दिया जाता है I
3.
तुम ये सब कैसे कर लेते हो?
तुमारी कोई छठी इन्द्री है,
या होती है तुम्हे आकाशवाणी,
तुम कैसे खडे होते हो,
दो पावों के बीच सीमा रेखा लेकर?
तुम कैसे जान लेते हो,
पाला कौन सा भारी है?
तुम बातों-बातों में,
कैसे कर लेते हो व्यंग्य,
तुम कैसे जीतते हो,
मेरा विश्वास,
जबकि अपना तो तुम,
अविश्वास भी नहीं बाँटते |
तुम्हारे दोनों हाथ मुस्कुरा रहे होते हैं,
जब लगते हो गले,
फिर कैसे भुंक जाता है,
तुमारी सांसो का ज़हर मेरी पीठ में?
तुम कैसे सूंघ लेते हो,
गाँव, धर्म और जाति की बू,
और इकट्ठी कर लेते हो,
भेड़ियो की भीड़?
तुम्हारी आंखे ही ऐसी हैं,
या तुम नज़र गडाये रहते हो?
ये तुम्हारी मुद्रा है,
या तुम घात लगाये रहते हो?
कैसे संतुलित करते हो,
क़ि में मरुँ तो नहीं,
पर सर भी ना उठा सकूँ|
बरुफ़ दिली और दिमागी तपिश को,
तुम कैसे बाँट देते हो?
तुम कैसे लटक जाते हो,

7 thoughts on “दो पल की कशमकश का वक्फा

  1. bahut behtareen kavitayen hain. . bansurivala ka falak vistrit hai aur samvednaao se otprot..do pal ka vakfaa.. vaah kya baat hai.. hardik badhai luthra ji ko aur prbhat ji ko dhanyvaad itni sundar kavitayen padhvane ke liye..

  2. Pingback: ai nude

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