हर स्थिति और हर काल में और न्यूट्रल था हर हाल में

प्रसिद्ध कवि बोधिसत्व की यह कविता हमारे समाज पर गहरा व्यंग्य करती है. आप भी पढ़िए ‘न्यूट्रल आदमी’, बनिए नहीं- जानकी पुल.
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न्यूट्रल आदमी
वह हिंद केशरी नहीं था
वह भारत रत्न नहीं था
वह विश्व विजेता नहीं था
किंतु सदैव था
सर्वत्र था वह
और चाहता सब का साथ।
इंद्रप्रस्थ में
वह सड़क की तरह होना चाहता था
सबके लिए एक स्वीकार की तरह
बिछा पसरा खुला।
किले की ओर जाती
सड़क हो या
मथुरा की ओर खुलती हुई
कोई डाकू जाए
या कोई फकीर
वह सड़क ही तो है जो कोई अवरोध नहीं खड़े करती खुद से
विन्ध्यांचल में
सामने के आँगन में एक औरत रो रही है
कोई उसे घसीट कर कुहनियों से मार रहा है
फिर घुटनों से मारा उसने स्त्री के पेट में
गर्भ वाले पेट में
लेकिन कोई नहीं जो पड़े बीच में
जो लोग हैं पड़ोस में वे
न्यूट्रल रहना चाहते हैं
वे किसी भी दुनियादारी के चक्कर में आना ही नहीं चाहते
वैसे भी क्या जिन्दगी कम उलझने लेकर बैठी है उनकी
वे हर हाल में न्यूट्रल हैं।
दुर्गापुर में
जब पड़ोस की नव ब्याहता स्त्री जल गई
या जला दी गई
पड़ोस के न्यूट्रल लोग चुप थे
बस जलते समय उन्होंने खुद को न्यूट्रल बताने के लिए
बंद कर लीं खिड़कियाँ
बुझा दीं बत्तियाँ
म्यूट कर दिया अपना मोबाइल फोन
घर के बरतनों
को भी कर दिया गूंगा
जो अपने बस में था सब को कर दिया
न्यूट्रल
और ऐसे हो गए जैसे सो गए हों।
चाहे विन्ध्यांचल हो दुर्गापुर
ये न्यूट्रल लोग हर जगह मिलते हैं
ये न्यूट्रल लोग देश की सबसे विकट विरासत हैं
देवीपुरा में
उसके सामने ही एक तेरह साल की लड़की के साथ
तीन लोग करते रहे मनमानी
लेकिन वो अपनी केराने की दुकान पर बैठा रहा
धनिए और हल्दी के भाव-ताव में ध्यान लगाए
वो जानता था उस लड़की को भी और उन तीनों को भी
वो जानता था कि जो हो रहा है वो ठीक नहीं हो रहा है
लेकिन वो न्यूट्रल हो चुका था
इसलिए किसी के पक्ष में जा ही नहीं सकता था
जब लड़की ने उसे मदद के लिए पुकारा
तो उसने दूकान बंद कर दी
और अपनी बुआ के यहाँ चला गया घंटे भर के भीतर।
देवीपुरा हरियाना में पड़ता हो 
या आसाम में
भदोही, इलाहाबादया खेता सराय में
लेकिन न्यूट्रल आदमी आपको मिलेगा जरूर।
अयोध्या की सरयू में
पानी पी रही हिरनी को जब दशरथ का चमकता बाण बेध गया
जब श्रवण कुमार कमण्डल लेकर गिरा रक्त से लथपथ
जब रावण के घर्षण से सीता बिलपने लगी वन में
और उसके रनिवास की अशोक वाटिका में
अवरोध से घिरी,
जब द्रोपदी को घसीटा दु:शासन ने
दुर्योधन ने जंघा पर बैठने का किया संकेत
जब कर्ण ने कहा द्रौपदी को पुन्श्चली
वह तब भी वह सब कुछ देखता सुनता समझता न्यूट्रल बना रहा
न इधर रहा
न उधर रहा
वह केवल न्यूट्रल रहा
उसने न दशरथ का पक्ष लिया न श्रवण कुमार का
सीता न रावण
न द्रौपदी न कौरव
उसे किसी से कभी कोई लेना देना न था
वह तो न्यूट्रल था।
न्यूट्रल होने के लिए उसने बहुत कुछ सहा
कई पीढ़ियों के निरन्तर घोर तप के बाद
उसके संस्कार और सोच में आ पाई थी यह बात
कि कैसे रहा जाता है
हर हाल में न्यूट्रल।
आपको क्या लगता है
उसने जटायू को न समझाया होगा कि काहे इस सीता के लिए
पंख-प्राण खोते हो
देखो दूर गिरि के पास गिरे पड़े है कितने ही सुस्वादु शव
जीवन का मोल समझो पक्षिराज
किसी और के लिए इस प्रकार लड़ पड़ना व्यर्थ है
अर्थ इसमें हैं कि न्यूट्रल रहो और सुख से जियो।
वह इंद्रप्रस्थ में था
हस्तिनापुर में था
वह देवीपुरा में था
विन्ध्यांचल में था
वह दुर्गापुर में था
लंका में था
वह दण्डकारण्य में था
अयोध्या में था 
जिन नगरों वनों युगों का नाम नहीं ले पा रहा हूँ
वह वहाँ-वहाँ हर स्थान पर था
वह सतयुग में था
त्रेता द्वापर में था
कलयुग में आरम्भ से था वहलहलहाता
वह मुझमें था वह आपमें था और सबमें था अंकुरित होता उन्नति पाता
वह था हर स्थिति और हर काल में
और न्यूट्रल था हर हाल में।

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