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  • प्रमोद द्विवेदी की कहानी ‘कमोड’

     

    प्रमोद द्विवेदी बहुत रोचक विषयों पर पठनीय कहानियाँ लिखते हैं। यह उनकी नई कहानी है। आप भी पढ़ सकते हैं-

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    साहेब चार माह से कष्टशैय्या पर थे। सब कुछ बिछौने पर निपट रहा था। पड़े-पड़े ही एक  दिन उन्होंने वकील मुन्नालाल जांगिड़ को बुलवा कर बाहोश वसीयत लिखवा दी। वारिस के नाम पर एक बेटी ही थी। जो कुछ था, सब उसके नाम कर दिया। गीता प्रेस वाले कल्याण के सारे अंक, विवेकानंद साहित्य, रजनीश साहित्य और कैसेट शास्त्री पुस्तकालय को भिजवा दिए। लगे हाथ दधीचि संस्था की जयश्री बर्थवाल की तरफ से आया देहदान का फार्म भी भर दिया। पत्नी को हिदायत दे दी कि मृत्यु के बाद बाम्हन भोज जैसे फालतू काम काम मत करना। जी करे तो मंदिर में जाकर गरीबों को खिला देना।

     मोटे चश्मे में आधी सदी गुजार चुकीं उनकी पत्नी सुलेखा देवी रह-रह कर पूछ लेतीं, “ साहेब  अंतिम इच्छा रह गई हो तो बताया जाए…। ”  इस पर अल्प मौन के बाद उनका एक ही जवाब होता, “ राजे जल्दी एक कमोड वाली लैटरीन जरूर बनवाय लियो…।” वे कपार पर हाथ धरकर बोलतीं, “आपका जीवन तो निकल लिया। कमोड काहे के लिए… हम दो ही प्राणी तो हैं …फिर अंतिम समय कोई राम का नाम लेता है, प्रभु को याद करता है… पर आपकी सुरत तो इधर कमोड में धरी रहती है। एक बार बोलिए, राम सियाराम…राधे गोविंद।” पर वे बुदबुदाते रहते…“बंदगी में तिरे भला ना हुआ….कमोड…कमोड… दिवाली से पहले देसी हटवा कर कमोड लगवाय लियो…राजे। हमारी जैसी गत किसी और की ना होय…।”

     उनकी इस पीड़ा पर माहौल दुखभरा हो जाता…। एक ही बेटी थी नीलाक्षी जिसने घरवालों से लड़कर अंतरजातीय विवाह किया था। पर किस्मत दगाबाज निकली। पति रोजाना एक नंबर की लाटरी खेलने वाला, दारूबाज और नाकाम निकला। पांच साल पहले उसे छोड़कर वह नैहर में ही बस गई थी। पर बोझ बनने के बजाय माता-पिता का सहारा बनने के लिए बीएड किया और  धारादेवी महाविद्यालय में मास्टरनी बन गई। पिताजी को बप्पा जी ही कहती थी। उसकी देखादेखी सब उन्हें बप्पा जी कहते थे। सुलेखा देवी ही उन्हें साहेब कहती थीं। वे खाद्य निरीक्षक के पद से रिटायर हुए थे और नौकरी में साहेब ही कहे जाते रहे। इस तरह घर में भी साहेब हो गए।

    साहेब की खासियत कहिए या ऐब कहिए, कमाऊ सरकारी विभाग में रहने के बावजूद एक एमआइजी फ्लैट से ज्यादा हासिल नहीं कर पाए। दफ्तर के तिमंजिला मकानधारी, खबोड़े बाबुओं की शान देखकर सुलेखा देवी सदैव ताना मारती रहीं , “ईमानदारी का चंदन रगड़े रहो स्वामीजी … मिलैगो तो बाबा जी का घंटा…।”

     ऐसा नहीं कि वे बेईमान या सुखपरस्त किस्म की पत्नी थीं, पर उनका मानना था कि दाल में नमक के बराबर भ्रष्टाचार कर लेना चाहिए ताकि एक घर, एक गाड़ी और कामचलाऊ बैंक बैलेंस हो। जैसे ही वे सरस क्षणों में साहेब को भ्रष्टाचार के लिए सहमत कर पातीं, किसी ना किसी अखबार में खबर छप जातीः नगर निगम का बाबू लाखों की घूस लेते पकड़ा गया…। इंदौर में ओवरसियर के घर से लाखों की नगदी मिली…। फिर क्या था, साहेब अपने जड़ीले उसूल का पर्चा हिलाते हुए दिखाते- “ देख रही हो राजे, करप्ट लोगों का क्या हाल होता है…। इनके तो चौराहे पर कोड़े लगने चाहिए…।” यह सुलेखा देवी को शांत करने के लिए काफी था।

     तो यह कमोड साहेब के जीवन में कैसे आया। दरअसल सीता कालोनी के जिस फ्लैट में साहेब यानी कृष्ण बिहारी गंगवार स्थाई तौर पर रहने के लिए आए तो वहां निपटने के लिए  देसी खुड्डी वाली लैट्रीन का ही प्रावधान था। साहेब ने इसे ही पसंद किया क्योंकि यह बात उनके संस्कार में डाल दी गई थी कि देसी लैट्रीन ही ज्यादा विज्ञानसम्मत है। इसमें निपटने वाले हमेशा स्वस्थ रहते हैं। फिर उन्होंने आस्था टीवी पर एक बार बाबा रामदेव को यह कहते सुना- “कमोड ही सारी बीमारियों की जड़ है। इसलिए पंजे के बल पर बैठकर फारिग होने का अभ्यास डालो। लघुशंका भी बैठकर करो। इससे शुगर या प्रोस्टेट जैसी बीमारी नहीं होगी।”

    इस प्रवचन से उनकी कमोड विरोधी धारणा को गहन बल मिला। उनका आत्मबल बढ़ा कि कि वे आजीवन भारतीय पद्धति से बैठकर ही निवृत्त होंगे। पर कहते हैं ना, विधाता को जो मंजूर होता है, वही होता है। एक दिन अचानक उन्हें अहसास हुआ कि उनके घुटने का पटेला हरकत करने लगा है। पहले उन्हें लगा कि सुबह की सैर के दौरान ज्यादा मशक्कत के कारण ऐसा हुआ होगा। उन्होंने बिना देरी किए पहले देसी इलाज किया। सरसों के तेल को लहसुन डालकर उबाला। घुटनों की मालिश की। थोड़ा आराम तो मिला। दो-चार दिन अकउवा का पत्ता गरम करके बांधा। पर उनकी समझ में आ गया कि असली मर्ज अभी पकड़ा नहीं गया। वे समझ गए कि ऐसे संकट में आर्थो वाले डॉक्टर की मदद लेनी चाहिए। लेकिन आदतन या चीकटपने के कारण पड़ोस के लड्डन उस्ताद को दिखाने से बाज नहीं आए। लड्डन के यहां सुबह से ही भीड़ लग जाती थी। कुछ तस्वीरें उसने अपने गद्देदार आसन के पीछे लगा रखी थीं। ये तस्वीरें ही उसकी मार्केटिंग करती थीं। एक तस्वीर में वह क्रिकेटर कपिल देव के साथ खड़ा था। उसका दावा था कि कपिल देव की एड़ी का पुराना दर्द उसने अपने मलहम और बालाजी की कृपा से ठीक किया था। एक तस्वीर में पहलवान सुशील कुमार के साथ दिख रहा था। अन्य तस्वीर में वह मायावती के पैर छूते दिखा। यानी लड्डन उस्ताद की योग्यता का प्रमाणपत्र इन्हीं तस्वीरों ने दे रखा था।

      साहेब ने सुबह-सुबह ही उसके दर पर दस्तक दे दी। उनके घुटने पर स्केल से हल्की थाप देकर लड्डन पहलवान के चेले ने उन्हें पेट के बल लिटा दिया। अंगूठा पकड़ कर नस खींची। फिर पीठ के बल लिटाकर घुटने मोड़े। साहेब की जान निकली जा रही थी। पर उन्हें उस्ताद पर भरोसा था। फिर एक काला मलहम निकालकर उनके घुटनों पर लगाया गया। एक पट्टी बांध दी गई। उस्ताद ने कहा, “बस एक हफ्ते के बाद छलांग लगाइए।”

     पर हफ्ता क्या पार होता, वे बैठने को तरस गए। सुबह निवृत्त होने जाते तो उठने के लिए जान लगानी पड़ जाती। यह दिन का सबसे दुष्कर कार्य था। ऐसे में याद करते- काश, घर में एक विलायती लैट्रीन भी होती। कम से कम इस समय घुटनों का कचूमर तो नहीं निकलता। यह पीड़ा उन्होंने पत्नी और बेटी को भी बताई। वे इस संताप में शरीक तो थीं, पर यह भी कह देतीं कि दो दिनों की ही बात है। पट्टी उतरते ही ठीक हो जाएगा। यानी कमोड के प्रति उनका राग एकदम नहीं बढ़ा।

    लेकिन पट्टी उतरने के बाद भी साहेब के घुटने चर्र-चर्र करते रहे। लड्डन उस्ताद की प्रामाणिकता पर फौरन शक करने के बजाय उन्होंने कहा, “उस्ताद उत्ती राहत नहीं है, जैसी आशा थी।”

    लड्डन ने बेरुखी से कहा, “छूमंतर विद्या हमारे पास तो है नहीं दादा। बरसों का रोग धरे हो, कुछ महीने तो इलाज करो…राजमा तो नहीं खाते ज्यादा…। वात वाली चीजें छोड़ दो…। मेथी वाला पानी पियो…। तिल के तेल की मालिश करो।”

    साहेब का जी धक से बोल गया। कुछ महीने सुनते ही उन्हें लगा कि उनके घुटनों का इलाज इस बतोलेबाज के पास नहीं है। यहां से निराशा मिलते ही उनका जी धक-धक करने लगा। उन्हें तय किया,आज बीपी जरूर चेक करेंगे।

    वे पट्टी उतरवाकर घर आ गए। नासिकाग्र पर ध्यान कर मालवीय नगर वाले डॉ प्रेमनाथ चोपड़ा के बारे में सोचने लगे, जिनके बारे में विख्यात था कि वे कभी नारायणदत्त तिवारी का भी इलाज कर चुके थे। साहेब ने फौरन गूगल में सर्च करके धड़कते दिल से उनके क्लीनिक का नंबर ढूंढ़ा। उनसे वक्त भी मांग लिया।

     डॉ चोपड़ा वाकई कमाल के डॉक्टर थे। उनके क्लीनिक में किसी हस्ती की तस्वीर तो नहीं थी। पर एक शानदार सनद मढ़ी हुई टंगी थी। उस पर लिखा था कि जर्मनी की एक अस्थिरोग विशेषज्ञ संस्था ने उन्हें सम्मानित किया था। साहेब ने सनद देखते ही कसम खा ली कि जीवन भर किसी सड़कछाप हाड़ उस्ताद के पास नहीं जाएंगे।

     डॉ चोपड़ा ने फौरन उनके घुटनों का एक्स-रे करवाया। अपने हाथ से घुटनों को परखा। बड़े सहज भाव से बोले, “सर, बड़ा कामन है इस एज में। बस एक काम कीजिए। घुटने मोड़ने नहीं हैं। पाल्थी नहीं मारनी। वज्रासन में नहीं बैठना। दौड़ना एकदम नहीं। सूर्य नमस्कार नहीं करना…बस सिर्फ हल्का वॉक कीजिए…मतलब चहलकदमी। और एक खास बात…इंग्लिश कमोड ही इस्तेमाल करना। देसी कतई नहीं।”

     साहेब धर्मसंकट में पड़ गए, “डॉक्टर साहब अभी तो घर में इंडियन ही है। बैठकर ही करना पड़ता है।”

    डॉ चोपड़ा ने चिंतित होकर कहा, “मेरे ख्याल से वैरी रिस्की…आप देख लीजिए…। अरेंज कीजिए। आपके लिए ठीक रहेगा। एक महीने दवा खाइए। कुछ एक्सरसाइज फिजियो वाला आपको बताएगा..। पर प्लीज बैठना एकदम नहीं है अभी। आपके कार्टिलेज पूरा घिस गए है। ग्रीसिंग खत्म हो गई है। ज्यादा लापरवाही हुई तो नी रिप्लेसमेंट ही चारा है।”

    साहेब हारे हुए योद्धा की तरह चले आए। गनीमत यह रही कि उन्होंने डॉ चोपड़ा को यह नहीं बताया कि वे लड्डन उस्ताद से इलाज करवा कर यहां आए हैं, वरना डांट भी पड़ती।

    घर में आते ही, दवा के थैले को पिटारे की तरह खोलते ही एलान कर दिया,  “भई अब कमोड का इंतजाम करना ही होगा। डॉ चोपड़ा ने भी कह दिया कि लैट्रीन के लिए बैठना खतरे को दावत देने जैसा है।”

    आज उन्होंने माहिर वकील की तरह कमोड के पक्ष में दलील दीं। डॉ चोपड़ा के हवाले से अपना पक्ष पुख्ता किया। मां-बेटी सन्न-गन्न सुन रही थीं, जैसे उनके कमोड विरोधी मत को ध्वस्त कर दिया गया हो। एक-दूसरे को देखते जा रही थीं- चौपाई याद कर रही थीः हुइहै वही जो राम रचि राखा…यानी कमोड स्थापना अटलनीय संभावना थी।

     अब नई चिंता तो यह थी कि कमोड स्थापना में कितनी धनराशि खर्च होगी। नीलाक्षी ने जी कर्रा करके कहा, “अम्माजी कमोड मेरी तरफ से। एक बार मार्केट से रेट ट्राई कर लेते हैं। उनके कलर भी देख लेते हैं। आजकल तो इनके रंग भी कई आ गए हैं।”

    अम्मा जी सदैव ही धवल समर्थक रही थीं, इसलिए उन्होंने बेनियाजी से कहा, “इत्ता मगजखपाई मत करो नीलू। सफेद सदाबहार होता है। बाकी अमीरों के चोंचले हैं।” नीलाक्षी ने कहां, “ऐसा नहीं, असल में रंगीन कमोड को बार-बार चमकाने की जरूरत नहीं पड़ती। सफेद में जल्दी पीलापन आ जाता है। भद्दा लगता है। इसलिए आजकल कलरफुल लग रहे हैं।” साहेब ने इस चिंतन को दोयम मानते हुए कहा, “कलर को गोली मारो यार… अभी इस्टीमेट ले लो यार..ओफ्फ। पता नहीं कमोड में बैठने की नौबत आएगी कि नहीं…।”

    इस पर सुलेखा देवी भावुक हो जातीं, “कुभख्या मत बोलिए…कमोड आपके लिए ही लगेगा। हम सब अभ्यास कर लेंगे…नीलाक्षी कह रही थी कि कमोड वाले से सफाई की कोई समस्या नहीं है, आजकल जेट फिट हो जाता है, उसी की  तेज धार से सफाई हो जाती है…।” इस वर्णन से साहेब को बड़ी राहत मिलती। वे नास्तिक की तरह कहते, “तैंतीस करोड़ देवताओं के बजाय, पूजा तो कमोड के महान आविष्कारक की करनी चाहिए…।” बस, इसी बात पर सुलेखा देवी भिनक जातीं, “तुम्हारी बुद्धि पर पथरा पड़ गए हैं। कहां देवता, कहां कमोड..छि…।”

     सचमुच पुरानी देसी सीट निकालकर नई कमोड की सीट लगाना कोई बड़ा काम नहीं था। बस एक दिन का काम। प्लंबर रमेश लाल ने आकर खर्चा बता दिया। उसे ठेका ही दे दिया गया। मान लिया गया कि वह दो-तीन सौ की हेरफेर करेगा। इस बीच एडवांस प्लानिंग के तहत, एक दिन के नित्यकर्म से निपटने के लिए निकटतम पड़ोसी सोनेलाल वर्मा से सहयोग की अपील हुई। हालांकि सोनेलाल का परिवार बड़ा था। मोदी युग में भी उसके अंगने में चार बच्चे खेल रहे थे। चौथे नंबर पर लड़का था, इसलिए विराम लग गया। या कहें उसके इंतजार में ही पहले तीन लड़कियों का अवतरण हुआ।

    बहरहाल एक दिन के लिए सोनेलाल ने अपनी देसी लैट्रीन के दरवाजे साहेब के परिवार के लिए खोलने का एलान कर दिया। यह भी कहा, “पड़ोसी धर्म के लिए इतनी मदद तो करनी ही चाहिए…।” सोनेलाल की नफासतपसंद, गोरी बीवी ने बस हिदायत जरूर एडवांस में दे दी कि फिनायल जरूर डाल दीजियो…मतलब करबे के बाद…।”

    सब कुछ फायनल हो गया। कमोड के लिए धनराशि आ गई। पड़ोसी भी मदद के लिए तैयार हो गया। पर ऐन मौके पर प्लंबर रमेश दास पलायित हो गया। बताया गया कि उसे डेंगू हो गया है। एक हफ्ते के लिए कमोड परियोजना टल गई। साहेब अपनी इच्छाशक्ति से रोज निवृत्त होते रहे। तकलीफ होती थी, पर इस उम्मीद में थे कि जल्द ही कमोड कृपा से उनका संकट दूर हो जाएगा। वैसे, दवाओं से आराम भी मिल रहा था। फिजियोथैरेपी भी चल रही थी। विटामिन डी के लिए सर्दियों की धूप में भी बैठ रहे थे। पत्नी और बेटी ने यू-ट्यूब से ज्ञान ग्रहण करके उनके लिए एक तेल भी बना दिया था, जिसकी मालिश साहेब दिन में एक बार जरूर कर रहे थे।

     पर किसे पता कि बेपीर विधना ने क्या कहानी लिख रखी है। रात बारह बजे, अच्छा-खासा इंग्लैंड-ऑस्ट्रेलिया मैच की हाइलाइट्स देखकर लेटे थे। बीपी बढ़ने के पेट में थोड़ी हलचल थी। राहत के लिए रात तीन बजे फारिग होने के लिए उठे तो नींद सवार थी और वे आंख मूंदे ही पूरा बैठ गए। पर उठते समय  शरीर और घुटनों ने साथ नहीं दिया और रपट कर कूल्हों के बल गिर गए। पड़े-पड़े चिल्लाते रहे। गनीमत थी कि दरवाजा नहीं बंद था। पत्नी और बेटी ने उनके भारी शरीर को किसी तरह उठाया। उनकी पीड़ा से पता चल गया था कि वे अब खड़े होने की दशा में नहीं है।

    रात तो जैसे-तैसे कट गई। पीड़ा में यही कहकर कोसते रहे, कमोड होता तो यह नौबत   नहीं आती। सुलेखा देवी और नीलाक्षी को लगा, जैसे सारा अपराध उनका ही है। सुलेखा देवी ने साहेब की गीली आंख का मैला कोना साफ करते हुए कहा, “बस अब आप ठीक हो जाइए। कमोड में ही जाएंगे।” साहेब ने हारी हुई मुस्कान होठों पर लाते हुए, “अब तो यार अगले जन्म में ही कमोड में जा पाएंगे। उठ जाएं इत्ता ही काफी है…।” बेटी ने कहा, “बप्पा जी निराश मत होइए…आजकल मेडिकल साइंस एडवांस हो गई है। आप एकदम ठीक होंगे और आपको अब बैठने की जरूरत नहीं पड़ेगी। प्रॉमिस…।”

    मगर साहेब ने तो जैसे अपना भविष्य पढ़ लिया था। उन्हें आभास था कि कूल्हे की हड्डी एकदम टूट गई है। अब यह जुड़ भी जाए, पर छह माह तक तो बिस्तर से उठना मुश्किल है। असल में उनके पिता जी भी अस्सी की उम्र में इसी दशा को प्राप्त हुए थे। बिस्तर में कढ़िलते हुए उनके दिन निकले। रात भर दोहा-चौपाई गाकर साल भर निकाल दिए। पर फर्क इतना था कि उन्होंने कमोड को कभी याद नहीं किया।

       साहेब का मामला ज्यादा ही गंभीर निकला। डॉक्टर ने कह दिया, “इस उम्र में ऑपरेशन भी मुसीबत है। बीपी हाई है, आपकी शुगर भी बढ़ी हुई है। पैर को सीधा खींचकर बांध दिया है। इसी हालत में अभी दो माह रखना है। हीलिंग हो जाएगी तो चमत्कार समझो…। तब तक हड्डी जोड़ने वाली दवा चलती रहेगी।” पता नहीं, ऐसी कोई दवा थी कि नहीं, पर तसल्ली सबको थी।

    साहेब लेटायमान अवस्था में ही घर आ गए। टीवी की तरफ उनका मुंह कर दिया गया ताकि दिन भर खबर देखते रहें और कांग्रेस को कोसने का सुख प्राप्त करते रहें। उन्हें अब भी भरोसा था कि मोदी जी के हाथों ही भारत और यह जगत सुरक्षित है। सुलेखा देवी ने बेटी को कसम दिला रखी थी कि साहेब को भड़काने वाली कोई राजनैतिक चर्चा ना की जाए। प्रियंका और राहुल का गुणगान तो कतई ना हो…।

    साहेब की इस अवस्था को देखते हुए कमोड परियोजना फिर टल गई। मां-बेटी ने खुद ही विचार कर लिया कि चार-पांच माह से पहले ये बिस्तरमुक्त नहीं होने वाले। इसलिए धन को यहां क्यों लगाया जाए। रमेश से क्षमायाचना के साथ एडवांस के तीन सौ रुपए वापस ले लिए गए। पर वादा किया गया कि भविष्य में जब भी कमोड का ख्याल आया तो उसे ही याद फरमाया जाएगा।

    हालांकि साहेब अब भी अवसर पाते पूछ लेते, “कमोड वाला काम करवा लिया क्या…?” पर उन्हें यह कहकर शांत करा दिया जाता कि तनाव में हड्डी और ज्यादा कमजोर पड़ जाती हैं। आप ठीक हो जाओ, एक ही दिन में इंतजाम हो जाएगा…।

    साहेब हताश होकर कहते, “तुम लोग अपने मन की करते हो…ध्यान रखो, एक दिन सबको कमोड की जरूरत पड़ने वाली है, ये हड्डियां बड़ी बेवफा होती हैं…। कुछ सोचकर ही विलायतियों ने इसका आविष्कार किया होगा…।” वे कमोड को लेकर इतना गंभीर हो जाते कि कई बार सुलेखा देवी सोचने लगतीं कि इनका दिमाग फिर तो नहीं गया है। आजकल अजीब बातें करते हैं…कल कह रहे थे कि अंग्रेज तलवार और बंदूक ही नहीं अपने साथ मच्छरदानी और कमोड भी लेकर आए थे।

    किंतु यह कहना गलत था कि साहेब की सहज चेतना पर कोई असर पड़ा हो। अब भी नोटबंदी पर वे हांफते हुए लंबी बहस कर सकते थे। सारे टीवी एंकरों के नाम उन्हें याद थे। रुबिका लियाकत, नग्मा और अंजना की बात वे ऐसे करते जैसे उनसे एक भावुक नाता बन गया हो। मजाक में कह भी देते, “आज श्वेता सिंह उदास दिख रही है। अर्णब गोस्वामी दुबरा गया है।” जाहिर है, टीवी ना होता तो यह गद्देदार पलंग भी उन्हें शरशैय्या जैसा ही लगता।

    साहेब की असहाय अवस्था ने घर में एक सामाजिक परीक्षण की स्थिति भी पैदा कर दी थी। सुलेखा देवी रोज उनसे शिकायत करतीं कि फलनवा आपको देखने नहीं आया। गुप्ता जी हाइड्रोसील का ऑपरेशन कराके आए थे तो आप ऐसे देखने के लिए भागे थे, जैसे किडनी बदली गई हो…। मां-बेटी ने तो सूची बना रखी थी कि कौन साहेब को देखने आया, कौन नहीं। उनकी काली सूची में अब तक रायजादा परिवार, साहिल चौधरी, मिसेज कानूनगो व अन्य का नाम  दर्ज हो चुका था। पर कुल मिलाकर इतनी निराशाजनक हालत भी नहीं थी। रोज कोई ना कोई आ ही जाता। इनमें वे भी थे जो साहेब के साथ नगर निगम के पार्क में बैठकर ताश भी खेलते थे। कोई आता तो सुलेखा देवी का मन भी लग जाता। चाय के दौर के बीच आशादायी बातें भी हो जातीं। वार्तालाप के दौर में साहेब सबसे यह जरूर पूछ लेते,   “घर में कमोड है ना..?” इस तरह उन्होंने सबसे पुष्टि कर ली कि कोई इस उम्र में देसी लैट्रीन का इस्तेमाल नहीं कर रहा। इन्हीं बतकही के बीच ऑस्टियोपोरसिस या अस्थिभंगुरता का बखान हो जाता। दूध, विडामिन डी और धूप पर चिंतन हो जाता। ग्वारपाठा यानी एलोवेरा के गुणों पर भी चर्चा हो जाती। साहेब ने सबको बताया कि इंदौर की एक दुकान में एलोवेरा की जो बर्फी बनती है, वह एक्सपोर्ट होने लगी है।

     इसके बावजूद साहेब की सेहत में आशा के अनुरूप सुधार नहीं हो रहा था। उन्होंने पड़े-पड़े कुछ और रोग पाल लिए थे। बदन की नियमित सफाई के बावजूद पीठ में जख्म हो जाते। शुगर के कारण जल्दी भरते भी नहीं। दूसरा पैर भी सुन्न होने लगा था। नाड़ी तो एकदम ही आवारा हो चली थी। मन करता था कि कुछ गुनगुनाकर सांस को संभालें। पर इच्छा ही नहीं होती। उन्होंने मान लिया था कि मन ही सब कराता है। अगर वे लेखक होते तो जिस्म से बालू की तरह सरककर निकल रही जिंदगी पर कुछ लिखते जरूर। अब वे अपनी तरफ आती मृत्यु की आहट महसूस करने के बजाय इस बात पर यकीन नहीं कर पा रहे थे कि इस संसार से उन्हें भी एक दिन जाना है। वह सवाल भी उन्हें याद आया जो धर्मराज युधिष्ठिर से पूछा गया था-संसार में सबसे बड़ा आश्चर्य क्या है…? धर्मराज ने कहा था- सबसे बड़ा आश्चर्य यह है कि मनुष्य यह नहीं सोच पाता कि इस मर्त्यलोक से उसे भी एक दिन जाना है, जब कि वह रोज मरणलीला देखता है।

    दो-चार रोज से साहेब बेहद शांत हो चले थे। पहले उन्होंने टीवी का वाल्यूम कम करवाना शुरू किया। फिर आजिज होकर बोले, “इन खबरों से तो लगता है कि संसार में कुछ अच्छा है ही नहीं। इसे बंद ही कर दो और रजनीश वाली अष्टावक्र गीता लाकर दे दो। भंडरिया में रामायण के साथ ही रखी है।” सारी किताबें दान देने के बाद यही ज्ञान उन्होंने बचा कर रखा था।

    सुलेखा देवी को अनिष्ट की आशंका के बावजूद तसल्ली हुई कि आज उनकी पढ़ने की इच्छा हुई। फिर भी उन्होंने साहेब का मन टोहने के लिए पूछ लिया, “धार्मिक चैनल तो देख ही सकते हैं…। आजकल जया किशोरी के भजन बड़े अच्छे लगते हैं।”

    साहेब ने निर्णायक भाव से कहा, “अब आवाजें सुनने का मन ही नहीं करता। जी कर रहा है, त्रिकुटी पर ध्यान धरते हुए जरा उस नाद को सुना जाए जो ब्रह्म का स्वर है। मौन में भी एक अलौकिक स्वर होता है…।”

    सुलेखा देवी वाकई घबरा गईं, “हाय दइया…आपको क्या हो गया…हमारा जी घबरा रहा है..।”  कहकर उन्होंने बेटी को आवाज दी, पर ध्यान आया वह तो कालेज से आने के बाद श्रीश्री रविशंकर के भक्तों के बीच गई है। वहां कोई ऑनलाइन क्लास चलती थी। वहां से लौटकर कहती भी थी कि जीवन का मूल आनंद तो कहीं और ही है। बप्पाजी ठीक हो जाएं तो एक बार उन्हें क्लास ज्वाइन करवाती हूं…।

     बड़ी मशक्क्त के बाद सुलेखा देवी ने बिना जिल्द की अष्टावक्र गीता लाकर साहेब को दे दी। प्रस्तावना पढ़ते ही औंघाने लगे। फिर कुछ पन्ने पलटकर सो गए। जीव–जगत और ब्रह्म की गुत्थी समझते ही वे थक जाते थे। बस एक ही अच्छी बात हुई कि उनका जीवन और परिजनों के प्रति मोह छंटने लगा। सुलेखा देवी को पास बैठाकर उन्होंने बड़े ज्ञान की बात की, “ जानती हो राजे, हमारे कष्ट के मूल में एक ही बात है कि हम क्षुद्र और निस्सार चीजों में ही सनकर रह जाते हैं। जब सार समझ में आता है तो बहुत देर हो जाती है..। आज हमें भी देर हो गई। कितनी तुच्छता में जीवन चला गया..हे प्रभु..।”

    सुलेखा देवी को अच्छा लगा कि उन्होंने प्रभु का नाम लिया। वे करीब जाकर बोलीं, “एक बार गुनगुनाइए- प्रभु मोरे अवगुन चित ना धरो…आप पुराने वाले घर में कितने मन से गाते थे…।”

     साहेब ने सिर हिलाया, “वे सुर ही नहीं रहे। सांस भी फांस जैसी फंसी लग रही है…।”

    सुलेखा देवी ने घबराकर कहा, “अच्छा रहने दीजिए…बस प्रभु का नाम लीजिए। नीलाक्षी को आ जाने दीजिए, उससे कुछ सुनेंगे।”

    साहेब हंसे, “मायाजाल में मत उलझाओ…उसकी भी व्यथा है। कितने नाजों से पाला था। एक कांटा भी नहीं चुभने दिया उसे। आज उसके जीवन में कितने कांटें हैं…। हमारा तो बंश ही डूब गया…। ”

    सुलेखा देवी को लगा, गलत चर्चा छेड़ दी। उन्होंने साहेब की आंख के कोने में सरके आंसू को पोंछते हुए कहा, “आप दुखी मत होइए। वह खुश है…।”

     इतने में नीलाक्षी भी आ गई। एक रहस्यमय मौन ने उसे भी सहमा दिया। घबराकर बोली, “अम्मा जी क्या हुआ…बप्पाजी ठीक हैं ना ?”

    पलंग से आई कराह भरी आवाज ने बताया, “सब ठीक है। जगत, प्रियजन सब मिथ्या हैं…। तमन्नाओं में उलझाया गया हूं, खिलौने देकर बहलाया गया हूं…।”

     मां ने इशारे से नीलाक्षी को पास ही बैठने को कहा। फिर धीमे से बोलीं, वह भजन तुम ही सुना दो-प्रभु मोरे अवगुन चित ना ना धरो…साहेब का सुनने का मन है।

     नीलाक्षी अंतरा लेकर गुनगुनाने लगी, एक लोहा पूजा में पूजत एक घर बधिक परो…।

    साहेब अनंत ध्यान में जाते दिखे। चेहरे पर शांति…मानों किसी से शिकायत नहीं…।

    विराम लेती सांस प्रमाण देती जा रही थीं कि जीवन अभी शेष है। भोर के दीये जैसा बुझता जीवन…।

    महादुख से कातर होती मां-बेटी ने एक दूसरे की ओर देखकर कहा-“इनके लिए प्रार्थना करते हैं…। अब हमारे वश में यही है..।”

    साहेब ने जैसे यह सुन लिया, “राजे बुरा मत मानियो…प्रभु की इच्छा है सो है…पर हमारी कसम तुम्हें… एक कमोड जरूर बनवाय लियो…।”

     ये साहेब के आखिरी शब्द थे।

                                     –  प्रमोद द्विवेदी,

                     305 एमरल्ड एपार्टमेंट, रामप्रस्थ ग्रींस, वैशाली, सेक्टर 7, गाजियाबाद

                                    मो-9667310319

                       Pdwivedi.js@gmail.com

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