हमसे बहुधा बाल साहित्य की उपेक्षा हो जाती है। समय पंख लगा कर उड़ जाता है। यदि हम यह तथ्य न भूलें कि हम बच्चों में पढ़ने की आदत विकसित कर पाने में असफल रहे तो आने वाली पीढ़ियाँ संस्कृतिविहीन होगी और हिन्दी के प्रति अनुदार। जानकीपुल यह घोषणा करते हुए हर्षित हो रहा है कि हम अब बाल साहित्य को अपनी पत्रिका में महत्त्वपूर्ण स्थान देंगे।
इस क्रम का आरम्भ हम कवि, लेखक और बाल साहित्यकार नवनीत नीरव की इस प्यारी कहानी से कर रहे हैं। यह आकर्षक चित्र भी नवनीत नीरव का ही बनाया हुआ है।
आजकल मैं बहुत खुश हूँ। सुबह-सवेरे अपने गाँव गलियों में, नदी के किनारे, बागीचे में, खलिहान में अपने दोस्तों संग मैं खूब मस्ती करती हूँ। दोपहर में जब सूरज आग के गोले बरसाने लगता है, तब मैं अपने दोस्तों के साथ घर के दालान में खेलने चली आती हू। रात को छत पर बाबा के पास सोती। उनसे कहानियाँ सुनते हुए तारे देखती। पढ़ाई तो बिल्कुल ही नहीं करती।
मेरी गर्मियों की छुट्टियाँ जो शुरू हो गई हैं।
मेरी अम्मा सुबह से ही घर के काम में लगी रहती। पसीने से तर-बतर होती। इतनी तर-बतर कि उनकी साड़ी का आँचल तक भींग जाता। घर में जब वे चलतीं, तो उनकी साड़ी से भद्द-भद्द की आवाज आती। वे फिर भी काम में लगी रहतीं। उनकी तो कोई छुट्टी भी नहीं होती।
आज का दिन भी उनका घर के कामों में बीता। रात को मैं जल्दी ही बाबा के साथ छत पर आ आई। आसमान बादलों से अटा पड़ा था। बहुत उमस थी। अम्मा रात का खाना छत पर लेकर आईं… वह पसीने से लथपथ थीं। गर्मी से परेशान और थकी हुई भी। चलने पर उनकी साड़ी भद-भद की आवाज करती।
अब मैं भी परेशान थी… अम्मा को परेशान देखकर। खाना खाकर मैं बाबा के पास लेट गई।
‘उफ़! ये हवा क्यों नहीं बह रही बाबा?’ मैंने बाबा से पूछ लिया।
‘वे अपने गाँवों में आराम कर रही होंगी न… दिन भर चलते-चलते थक जो गई होंगी।’ बाबा जवाब में बोले.
‘तो क्या आज हवा नहीं बहेगी?” मैं थोड़ी परेशान हो उठी थी।
‘एक सौ आठ ऐसे गाँवों के नाम लो, जिनके नामों के पीछे ‘पुर’ लगे हों।’ बाबा गंभीर होते हुए बोले।
“नाम लेने से क्या होगा बाबा? हवा बहने लगेगी?” मैंने पूछा।
“अपने-अपने गाँव का नाम सुनते ही हवाएँ, गाँव की गलियों से बाहर निकल आएँगी…” बाबा मुस्कुराए थे।
“राजपुर… इब्राहिमपुर…ब्रह्मपुर…”
मैंने अपनी याद से तीन-चार नाम जल्दी-जल्दी गिनाए। इस उम्मीद से कि हवा बहने लगेगी। लेकिन हवा तो टस से मस नहीं हुई। अब तो मुझे और गाँवों के नाम भी याद नहीं…
मथुरापुर, रामपुर, बख्तियारपुर… बाबा ने एक साथ कई नाम लिए।
फिर बड़े भैया ने कुछ गाँवों नाम जोड़े।
तब तक अम्मा दूध लेकर छत पर चली आई थीं। कुछ नाम उन्होंने भी गिनाए।
दस…पन्द्रह…सत्रह…छब्बीस…चालीस… सैंतालीस….
सभी धीरे-धीरे, सोच-सोचकर नाम ले रहे थे… मैं चुपचाप उन्हें सुनती रही।
अचानक मुझे शरारत सूझी. मैंने कुछ नाम ख़ुद से बनाए और तपाक से बोल दिया…
“दिल्लीपुर, मुम्बईपुर, चेन्नईपुर…’
‘नहीं…नहीं. ये तो किसी गाँव के नाम नहीं हैं… ऐसे तो हवा बहने से रही!’ बाबा ने टोक दिया।
मैं उदास हो गई और झटपट जाकर अम्मा की गोद में दुबक गई। अम्मा मेरे सिर पर हाथ फेरते हुए फुसफुसाई – ‘गोपालपुर’। कहते हुए अम्मा की आँखें चमक उठीं थीं।
‘अरे! ये तो अम्मा के गाँव का नाम है… नानी का गाँव… नहीं-नहीं। नानी का घर तो दूसरा होगा न!’ मैं सोच में पड़ गई। मैं अम्मा से पूछना चाहती थी… नानी के गाँव का नाम। लेकिन पूछ न सकी।
‘पुर’ नाम के गाँवों की गिनती जारी थी। चाँद आसमान में चढ़ रहा था।
‘…. अब गिनती सत्तर पार चली गई है। बाबा, अम्मा, भैया… सबकी आवाजें धीमी-धीमी आ रही हैं। सभी न जाने कितने गाँवों के नाम जानते हैं। मुझे तो बिल्कुल भी नहीं पता।
मुझे लगा कि नदी के किनारे खड़े पीपल के पत्ते खड़कने लगे हैं। हवा चलने लगी है… ठंडी हवा…ओह! कितनी राहत। सारी गर्मी गायब…
अब हवा तेज हो रही है। इतनी तेज कि मैं बिस्तर समेत उड़ने लगी हूँ। पीछे-पीछे अम्मा भी उड़ रही हैं… मुस्कुराती हुईं। उनका पल्लू भी हवा में लहरा रहा है। अब उससे भद-भद की आवाजें नहीं आ रहीं।
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नवनीत नीरव बच्चों में पढ़ने की आदत का विकास के लिए एक मिशन पर हैं। पिछले डेढ़ दशक से, वे बाल सााहित्य और लााइब्रेरी के विकास के लिए देश के अलग-अलग राज्यों के सुदूर क्षेत्रों में सक्रिय रहे हैं। उन्होंने विभिन्न भाारतीय भाषाओं के बाल साहित्य को समृद्ध बनाने के प्रयास किए हैं। वर्तमान में, वे राजकीय शिक्षकों के सााथ मिलकर बाल सााहित्य के माध्यम से बच्चों को सीखने और सोचने के लिए प्रेरित करने के तरीके सिखा रहे हैं। अब तक बच्चों के लिए इनकी लिखी तीन पिक्चर बुक्स प्रकाशित हैं। एक बाल उपन्यास ‘नाच’ एकलव्य भोपाल से शीघ्र ही प्रकाशित होने वाला है।
7 Comments
कहानी मुस्कुरा उठती है जब शब्दों से चित्र बनने लगते है। निर्मल वर्मा की तरह आप भी शब्दों से चित्र गढ़ने में माहिर है।
बचपन मे जब बिजली नही होती थी तो हम भी छत लेटा करते थे और टूटते तारो को देख हम भी ऐसा ही कुछ करते थे। माँ कहती थी इससे इच्छा पूरी होती है। आज महसूस हुआ कि हम अपने बच्चे के साथ कभी छत पर सोए ही नही।
कहानी अपने बचपन मे ले गयी।
धन्यवाद
हम सब भाई-बहन बचपन मे नानी घर जब छुटटीयो मे जाते तो ज्यादातर छत पर ही सोते ।जब कभी हवाये नही चलती नानी हमसे पुर वाले गाँव का नाम बुलवाती। इस तरह हमे बहुत सारे गाँवो का नाम याद हो जाता। इस कहानी ने फिर से बचपन के वही सुनहरे दिन याद दिला दिए।
बहुत ही सुंदर कहानी। नवनीत जी लिखने के साथ ही कहानियां भी बहुत अच्छे तरीके से पढ़ते हैं। शिक्षकों के लिए आयोजित उनकी बाल साहित्य कार्यशाला से हमारे सीतामढ़ी के शिक्षक समूह ने बहुत कुछ सीखा और लिखा भी।
नवनीत जी को शुभकामनाएं और धन्यवाद 🌻
– प्रियंका, सीतामढ़ी
Bahut bdhiya
बहुत सुंदर। बांधे रखा, पूरी कहानी पढ़ने तक। बधाई।
मुझे भी अपने बचपन के वो दिन याद आ गए जब अम्मा के साथ शाम से ही हम छत पर पहुंच जाते थे.
शुक्रिया इस सुन्दर कहानी के लिए
Wakai mazedar kahani hai. Jis tarah shabd samne a rhe the mere samne wo drishya dikh rha tha!