• लेख
  • कोआन, जॉन रॉल्स और विदुषी विद्योत्तमा 

    कम से कम एक दशक से युवा लेखक प्रचण्ड प्रवीर ‘कल की बात’ नामक एक सीरीज़ लिख रहे हैं। इस सीरीज़ की तीन किताबें आ चुकी हाँ और अभी तीन और किताबें आने को तैयार हैं। ख़ैर इसी सीरीज़ के लिए लिखी एक टिप्पणी ‘विदुषी विद्योत्तमा’ को पढ़कर यह टिप्पणी लिखी है डॉ. राजेश्री दत्ता कुमार ने। राजश्री दत्ता ने दिल्ली विश्वविद्यालय में दर्शनशास्त्र में परास्नातक मेँ स्वर्णपदक प्राप्त करने के बाद भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, दिल्ली से दर्शन शास्त्र में नारीवाद पर पीएचडी की है। उन्होँने शिक्षा, जेण्डर, डिजिटल परिवर्तन, भू-स्थानिक और स्पेस-एको सिस्टम के क्षेत्रों में योगदान दिया है। जमशेदपुर मेँ पली-बढ़ी राजेश्री इन दिनोँ गुड़गाँव मेँ रहती हैँ। आप यह टिप्पणी पढ़िए। नीचे ‘विदुषी विद्योत्तमा’ भी संलग्न है- मॉडरेटर 

    =====================

     

    मैं उन गिने-चुने लोग में से हूँ जो प्रचण्ड प्रवीर की  ‘कल की बात’  सीरीज को काफी गम्भीरता से पढ़ते हैं। मैंने ‘कल की बात’ सीरीज की ‘षड्ज’, ‘ऋषभ’ और ‘गान्धार’ पढ़ी है। इसके अलावा मैं उनकी अप्रकाशित ‘कल की बात’ की नियमित पाठिका हूँ। आमतौर पर कुछ लिखना, उसपर हिन्दी में लिखना मेरे लिए बहुत मुश्किल है। दर्शनशास्त्र में पीएचडी करने के बाद, ‘नारी, न्याय और विधि’ (वीमेन, लॉ एण्ड जस्टिस) पुस्तक की लेखिका होने के बाद, जिस तरह मैंने ‘मल्टी-स्टेकहोल्डर स्ट्रैजजी कंसल्टेंसी’ सर्विसेज दी है, साहित्य और दर्शन मुझसे छूट-सा गया है। फिर भी ‘कल की बात-२७३ – विदुषी विद्योत्तमा’ पढ़ने  के बाद समय निकाल कर मेरे लिए यह लिखना महत्त्वपूर्ण हो गया है कि कहीं यह हम सबसे छूट न जाए। कहीं आने वाली पीढ़ियाँ मुझसे यह न पूछे कि, तुमने तो पढ़ा था। तुमने क्यों न लिखा? तुम्हें बताना चाहिए था। दायित्व समझ कर मैं यह लिखने को विवश हूँ कि ‘कोआन’, ‘ज़ेन बौद्ध दर्शन’, ‘जॉन रॉल्स’ और नारीवाद किस तरह इस कहानी में गुँथे हुए हैं।

     इस छोटी-सी कहानी को पढ़ने के लिए कुछ मूलभूत बातें मैं सतर्क पाठकों को याद दिलाना चाहूँगी।
    १. वैदिक विवाह सूक्त में ‘सविता’ (शाब्दिक अर्थ – पिता) अपनी पुत्री सूर्या का विवाह ‘सोम’ से करते हैं। आज भी विवाह मन्त्रों में कन्या का विवाह पहले सोम, फिर गन्धर्व, उसके बाद अग्नि से होता है और मानवीय पति उसका चौथा पति होता है।
    २. कोआन एक तरह की कहानी, पहेली, संवाद को कहा जाता है जो कि चीन के जेन बौद्ध दर्शन में अपना स्वभाव जानने के लिए और बौद्ध दर्शन की विवेचना के लिए प्रयोग में आता है।
    ३.  गेटलेस गेट (The Gateless Barrier) तेरहवीं सदी का 48 ज़ेन कोआन (कोअन) का एक संकलन है, जो रिनज़ाई स्कूल के अभ्यास में व्यापक रूप से उपयोग किया जाता है। इसके संकलनकर्ता मुमोन थे। यह ज़ेन बौद्ध धर्म में आत्म-ज्ञान की एक विधि है, जो आमतौर पर एक गुरु के व्यक्तिगत मार्गदर्शन में की जाती है। “गेटलेस गेट” नाम का अर्थ है “कोई द्वार बाधा नहीं”। इसका उद्देश्य पारंपरिक विचारों की बेड़ियों से मुक्त होकर दुनिया को देखना है। कहानी में प्रयुक्त बहुत से कोआन इस किताब से लिए गए हैं।

    ४. मूर्ख कालिदास का विदुषी विद्योत्तमा से विवाह की कथा प्रसिद्ध किवदन्ती है और इसका कोई निश्चित प्रमाण नहीं मिलता ठीक वैसे ही जैसे रावणवध के बाद राम के कहने पर लक्ष्मण का रावण से विद्यादान की प्रार्थना रामायण के प्रसिद्ध संस्करणों में नहीं मिलती।

    ५. विद्योत्तमा ने कालिदास को ताना दिया था ‘अस्ति कश्चित् वाक् विशेष:’ (इस बात में कोई विशेषता है?) जिसके प्रथम शब्द से कुमारसम्भवम्, मेघदूतम् और रघुवंशम् जैसे काव्यों की रचना कालिदास ने की। ऋतुसंहार की कुछ पाण्डुलिपियाँ मिलती हैं जिसमें पहला शब्द ‘प्रचण्डसूर्य’ की  अपेक्षा ‘विशेषसूर्य’ मिलता है।
    ६. यह भी कहा जाता है कि कालिदास का मूलनाम ‘मेधारुद्र’ या ‘मातृगुप्त’ था। मोहन राकेश की ‘आषाढ़ का एक दिन’ कालिदास का नाम ‘मातृगुप्त’ हो जो बाद में काश्मीर के नरेश बनते हैं। जयशंकर प्रसाद के ‘स्कंदगुप्त’ नाटक में ‘मातृगुप्त’ कालिदास ही हैं।

    ७. कहानी के अन्तिम कोआन में यह अवधारणा प्रतीत होती है कि पुरुष न्याय करने और न्याय पाने की अवधारणा को व्यक्तिगत सम्बन्धों में लागू करना चाहता है और यह उसकी असफलता का मूल कारण है।

    सबसे पहले मैं कोआन के सम्बन्ध में एक छोटी-सी टिप्पणी करना चाहूँगी। नीचे दिए कोआन पर विचारते हैं।

    दो भिक्षु हवा में फहराते मन्दिर के झण्डे के बारे में तर्क कर रहे थे। पहले ने कहा, “झण्डा हिलता है।“ दूसरे ने कहा, “हवा बहती है।“ ऐसे दोनों झगड़ रहे थे और सहमत नहीं हो रहे थे। हुई-नेंग, जो छठा कुलपति था, बोला, “भिक्षुओं, झण्डा नहीं हिलता। हवा नहीं बहती। तुम्हारा दिमाग चलता है। दोनों भिक्षु चकित रह गए।

    ‘विदुषी विद्योत्तमा’ में कहे गए और गुँथे हुए कोआन की अपेक्षाकृत यह कोआन स्पष्टतया भौतिकवाद (एम्पिरिसिज़्म) और आदर्शवाद (आइडिलिज़्म) के साथ-साथ जेनो (495-435 ई.पू.) के गति सम्बन्धित पैराडॉक्स (असत्याभास) की याद दिलाता है।

    इसी कड़ी मेँ एक बहुत प्रसिद्ध कोआन को मैँ उद्धृत करना चाहूँगी: –

    गुतेई से जब भी ज़ेन के बारे में कोई सवाल पूछा जाता तो वह अपनी उँगली उठा देता। एक प्रशिक्षु युवक उसकी इसी तरह नकल करने लगा। जब कोई लड़के से पूछता कि उसके गुरु ने क्या उपदेश दिया है, तो लड़का अपनी उँगली उठा देता।
    गुतेई ने लड़के की शरारत के बारे में सुना। उसने उसे पकड़ लिया और उसकी उँगली काट दी। लड़का रोता हुआ भाग गया। गुतेई ने उसे आवाज़ दी और उसे रोका। जब लड़के ने गुतेई की ओर सिर घुमाया, तो गुतेई ने अपनी उँगली उठाई। उसी क्षण लड़के को ज्ञान प्राप्त हो गया।
    गुतेई जब इस दुनिया से जाने वाले थे, तो उन्होंने अपने भिक्षुओं को अपने आस-पास इकट्ठा किया। उन्होंने कहा, “मैंने अपनी ज़ेन -उँगली अपने गुरु तेनरीयू से प्राप्त की और अपने पूरे जीवन में मैं इसे समाप्त नहीं कर सका।” फिर उनका निधन हो गया।
    मुमोन की टिप्पणी: ज्ञान, जिसे गुतेई और लड़के ने प्राप्त किया, उसका उँगली से कोई लेना-देना नहीं है। अगर कोई उँगली पकड़ता है, तो तेनरीयू इतना निराश हो जाएगा कि वह गुतेई, लड़के और पकड़ने वाले को एक साथ खत्म कर देगा। गुतेई तेनरीयू की शिक्षा को कमतर आँकता है, लड़के को चाकू से मुक्त करता है। चीनी देवता की तुलना में जिसने एक हाथ से पहाड़ को एक तरफ धकेल दिया बूढ़ा गुतेई एक खराब नकलची है।

    ठीक इसी तरह बहुत से कोआन और उसपर टिप्पणियाँ ‘अनात्मवाद’, ‘अनित्यता’, ‘दुख’, ‘प्रतीत्यसमुत्पाद’, ‘उपयोगिता’, व्यावहारिक ज्ञान, प्रत्युत्पन्नमतित्व जैसे विचारों के प्रति ध्यानाकर्षण के लिए हैं।

    ‘विदुषी विद्योत्तमा’ पर नारीवादी दृष्टिकोण

    प्रचण्ड प्रवीर ने महिलाओं की संरक्षणवादी ‘न्याय’ (Women’s care driven ‘justice) और ‘न्याय के रूप में निष्पक्षता’  (Justice as fairness) की रॉल्स की धारणा के बीच तनाव की सूक्ष्मता को दिखाया है। हालाँकि, कल की बात शृंखला की कहानियों को नारीवादी दृष्टिकोण से और करीब से जाँचने की आवश्यकता है। दिलचस्प बात यह है कि प्रचण्ड की कहानियाँ हमेशा महिलाओं के इर्द-गिर्द केन्द्रित रही हैं, जिससे मैं कभी-कभी महिलाओं के चरित्र-चित्रण में उनके सूक्ष्म वस्तुकरण से असहज हो जाती हूँ।
    ‘विदुषी विद्योत्तमा’ पर वापस आते हुए, मैं जॉन रॉल्स (1921-2002) द्वारा प्रस्तुत न्याय के आधारभूत सिद्धांतों की झलक पा कर मैँ प्रभावित हुई। जॉन रॉल्स ने अपनी प्रसिद्ध रचना ‘ए थ्योरी ऑफ़ जस्टिस’ में जोर देकर कहा कि एक अच्छे समाज की विशेषता कई गुणों से होती है। न्याय एक अच्छे समाज का पहला गुण है। दूसरे शब्दों में, न्याय आवश्यक है लेकिन एक अच्छे समाज की पर्याप्त शर्त नहीं है। जो लोग तर्क देते हैं कि न्याय को सामाजिक उन्नति और प्रगति के रास्ते में आने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए, वे समाज के नैतिक पतन का जोखिम उठाते हैं। एक न्यायपूर्ण समाज में, न्याय सामाजिक संरचना की नींव के रूप में स्थापित होता है। इसलिए सभी राजनीतिक और विधायी निर्णय न्याय की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए डिज़ाइन किए जाने चाहिए।
    निष्पक्षता के रूप में न्याय के उनके सिद्धांत में एक ऐसे स्वतंत्र नागरिकों के समाज की कल्पना की गई है, जिनके पास समान बुनियादी अधिकार हैं और जो एक समतावादी आर्थिक प्रणाली के भीतर सहयोग करते हैं। राजनीतिक उदारवाद के बारे में उनका विवरण लोकतंत्र में राजनीतिक शक्ति के वैध उपयोग को संबोधित करता है, जिसका उद्देश्य यह दिखाना है कि स्वतंत्र संस्थाओं द्वारा अनुमत विश्वदृष्टि की विविधता के बावजूद स्थायी एकता कैसे प्राप्त की जा सकती है।
    ‘ए थ्योरी ऑफ़ जस्टिस’ में, रॉल्स स्वतंत्रता और समानता के बीच एक सैद्धांतिक सामंजस्य के लिए तर्क देते हैं। रॉल्स एक निष्पक्ष स्थिति (‘अज्ञानता के आवरण’ के साथ मूल स्थिति) का एक मॉडल प्रस्तुत करते हैं, जिसके भीतर पक्ष काल्पनिक रूप से न्याय के पारस्परिक रूप से स्वीकार्य सिद्धांतों का चयन करेंगे। रॉल्स अपने सिद्धांत को व्यक्तियों को उनके सामाजिक और आर्थिक संदर्भों से अलग करके ‘अज्ञानता के आवरण’ के पीछे रखते हैं।
    शायद रॉल्स के न्याय के सिद्धांत का सबसे प्रभावशाली विचार वह प्रसिद्ध ‘विचार प्रयोग’ (थॉट एक्सपेरिमेण्ट) है जिसे उन्होंने “मूल स्थिति” कहा था। मूल स्थिति एक काल्पनिक परिदृश्य है जिसमें व्यक्तियों के एक समूह को समाज की राजनीतिक और आर्थिक संरचना के बारे में एक समझौते पर पहुँचने का कार्य दिया जाता है, जिस पर एक बार समझौता हो जाने के बाद, उन्हें कब्जा करना होता है। सरल शब्दोँ मेँ समाज के हर व्यक्ति के पास राजनैतिक और आर्थिक प्रगति करने के, उसपर अपना बोलबाला बनाने के समान अवसर होँ।
    हालाँकि,  होता यह है कि प्रत्येक व्यक्ति “अज्ञानता के पर्दे” के पीछे विचार-विमर्श करता है। प्रत्येक व्यक्ति के पास ज्ञान का अभाव है, उदाहरण के लिए: उसकी पृष्ठभूमित जैसे लिंग, जाति, आयु, बुद्धि, धन, कौशल, शिक्षा और धर्म के बारे में। हर सदस्य अपने बारे में केवल यही जानता है कि उसके पास आपसी सहयोग की एक स्थायी प्रणाली में पूरी तरह से और स्वेच्छा से भाग लेने के लिए आवश्यक बुनियादी क्षमताएँ हैं। प्रत्येक व्यक्ति जानता है कि वह समाज का सदस्य हो सकता है।

    जॉन रॉल्स के न्याय के दो सिद्धांत

    रॉल्स ने न्याय के अपने विचारों को न्याय के अपने दो सिद्धांतों में निष्पक्षता के रूप में व्यक्त किया:
    1. समान स्वतन्त्रता सिद्धांत: हरेक को समान बुनियादी स्वतंत्रता का अधिकार का होना, जैसे कि भाषण, सभा, विवेक की स्वतंत्रता, और व्यक्तिगत स्वतंत्रता आदि।
    2. अन्तर का सिद्धांत: सामाजिक और आर्थिक असमानताओं को दो शर्तों को पूरा करना है:
    a. उन्हें निष्पक्ष समानता के अवसर की शर्तों के तहत सभी के लिए खुले पदों और पदों से जोड़ा जाना चाहिए।
    b. उन्हें समाज के सबसे कम-सुविधा प्राप्त सदस्यों (अंतर सिद्धांत- डिफरेंस प्रिन्सिपुल) के लिए सबसे अधिक लाभ पहुँचाना चाहिए।
    न्याय का पहला सिद्धांत, सभी के लिए समान बुनियादी स्वतंत्रता पर जोर देता है, जिसे महिलाओं के अधिकारों और स्वतंत्रताओं के लिए एक आधार के रूप में व्याख्या किया जा सकता है, जिसमें राजनैतिक भागीदारी, भाषण की स्वतंत्रता और शारीरिक स्वायत्तता शामिल है। कल की बात के संदर्भ में, नायक अनजाने में न्याय को परिभाषित करने का प्रयास करते समय ‘मूल स्थिति’ के रॉल्स के ढाँचे में कदम रखता है। एक स्वतंत्र महिला और नारीवादी होने के नाते, विद्योत्तमा निश्चित रूप से सोचती है कि पुरुष मुख्य रूप से आर्थिक और राजनीतिक असमानताओं को संबोधित करने के संदर्भ में न्याय को समझते हैं, लैंगिक असमानता के सामाजिक और सांस्कृतिक आयामों की उपेक्षा करते हैं, विशेष रूप से परिवार के भीतर।
    नारीवादी विद्वानों ने तर्क दिया है कि रॉल्स का न्याय का सिद्धांत, विशेष रूप से “मूल स्थिति” की उनकी अवधारणा, महिलाओं के अनुभवों और दृष्टिकोणों की उपेक्षा करती है। उनका तर्क है कि “मूल स्थिति”, जहाँ व्यक्तियों को उनकी सामाजिक पहचान से अलग रखा जाता है, लैंगिक असमानता की ऐतिहासिक और सामाजिक वास्तविकताओं और महिलाओं के जीवन पर इसके प्रभाव को समझने में विफल रहती है। नारीवादियों का तर्क है कि रॉल्स अवैतनिक घरेलू श्रम, देखभाल और श्रम के लिंग आधारित विभाजन को समझने में विफल रहते हैं। उनकी यह धारणा घरेलू अन्याय को देखने में विफल रही है।
    सुजैन मोलर ओकिन (न्याय, लिंग और परिवार- 1989), शायद सबसे प्रभावशाली नारीवादी आलोचक हैं। उनका तर्क है कि रॉल्स एक लिंग-तटस्थ (जेण्डर न्यूट्रल) नागरिक की कल्पना करते हैं, लेकिन व्यवहार में परिवारिक मामलों में न्याय लागू करने में विफल रहते हैं, जिसे वे एक “निजी” संस्था मानते हैं। रॉल्स न्याय की नींव से परिवार को बाहर रखते हैं।
    इसके अलावा, हम युर्गेन हेबरमास (Jürgen Habermas – जन्म 1929) की संचार नैतिकता (कम्युनिकेटिव एथिक्स) में नारीवादियों की ‘न्याय’ की खोज के लिए उत्तर खोज सकते हैं जो इस विचार पर केंद्रित है कि नैतिक मानदंडों को तर्कसंगत, खुले और समावेशी संवाद की प्रक्रिया के माध्यम से स्थापित किया जाना चाहिए, जहाँ सभी प्रभावित पक्षों को भाग लेने और आम सहमति तक पहुँचने का समान अवसर मिले। हेबरमास आपसी समझ के महत्व और प्रभावित लोगों की सहमति से निर्धारित मानदंडों की वैधता पर जोर देते हैं।
    नारीवादी आलोचकों का तर्क है कि हेबरमास का संचारात्मक तर्कसंगतता का सिद्धांत वास्तव में सार्वभौमिक नहीं हो सकता है। ऐसा इसलिए क्योंकि सभी समान रूप से मुखर नहीं होते। जो अपनी बात कह नहीं पाते , वे सार्वजनिक बहस में कहीं पीछे छूट जाते हैं।
    दक्षिण एशियाई महिलाओं के संदर्भ में, हेबरमास के तर्कसंगत प्रवचन के आदर्श को बहिष्कारवादी कहा जा सकता है, जो संभावित रूप से उन महिलाओं की आवाज़ और दृष्टिकोण को चुप करा सकता है जिन्हें अलग तरीके से संवाद करने के लिए समाजीकृत किया जा सकता है या जिन्हें सार्वजनिक बहस में भागीदारी करने में बाधाओं का सामना करना पड़ सकता है।
    रॉल्स और हेबरमास की नारीवादी आलोचनाएँ न्याय और राजनीतिक दर्शन के सिद्धांतों को विकसित करते समय लिंग, शक्ति और सामाजिक संदर्भ पर विचार करने के महत्व पर प्रकाश डालती हैं। वे महिलाओं के सामने आने वाली विशिष्ट चुनौतियों का समाधान करने और अधिक समावेशी और न्यायसंगत समाज बनाने के लिए अमूर्त, सार्वभौमिक सिद्धांतों से आगे बढ़ने की आवश्यकता पर जोर देते हैं।
    नारीवाद यही आक्षेप करता है कि आज के समय में भी विद्योत्तमा अपने प्रखर रूप मेँ बहुतों को स्वीकार्य नहीं है। मुझे आशा है भारतवर्ष मेँ ऐसी विद्योत्तमाएँ जन्म लेती रहेँगी, जहाँ नायक न केवल उनके विदुषी होने पर अपितु स्वतंत्र नारी समझ कर उन्हें यथोचित सम्मान देंगे। यह विचारणीय है कि क्या न्याय का इतना ही हासिल है कि हम राजैनतिक और आर्थिक कब्जे की उम्मीद करें?
    विदुषी विद्योत्तमा कहानी में अन्तिम संवाद पर गौर करते हैं-
          विद्योत्तमा ने अविचलित होकर कुछ गर्व से कहा, “मातृगुप्त ने मिले हुए राज्य को भोग करते हुए विद्योत्तमा से कहा मेरा शासन, मेरा काव्य, विद्योत्तमा के विरह के कारण तुच्छ है। यह सुनकर विद्योत्तमा ने मातृगुप्त की नाक पकड़ कर मरोड़ दी।“  मैँने कहा, “विद्योत्तमा ने मातृगुप्त की नाक इसलिए मरोड़ी क्योँकि मातृगुप्त राजधर्म मेँ न्याय करना चाहता है न्याय के अभिलाषी तुच्छ प्रार्थी की तरह। व्यवहार मेँ न्यायाधीश प्रार्थी नहीँ होता।“ अर्पिता दीदी ने झिड़क कर कहा, “अब खाना खालो वरना चन्द्र ग्रहण लग जाएगा।“
    जहाँ तक मेरी समझ है, इस कथा में विदुषी विद्योत्तमा इशारों में अपनी महत्ता मातृगुप्त को उसकी विरह-वेदना में दिखाना चाहती है। परन्तु ऐसा दिखाना नायक को अखर गया है। वह साफ कहता है कि वेदना को किसी पुरस्कार से पूर्ति करके वह न्याय  करेगा, जहाँ वह स्वयं ही प्रार्थी है, अभिलाषी है तथा  इस स्थिति से  खिन्न है। अपनी खिन्नता मिटाने के लिए वह  पुरुषवादी दृष्टिकोण अपनाता है जहाँ वह सबसे एक समान व्यवहार करना चाहता है। यही अर्पिता दीदी की असहजता  का कारण प्रतीत होता है जहाँ कथा समाप्त होती है।
    क्या लेखक पुरुषवादी दृष्टिकोण को वैध ठहराना चाहता है या केवल इसे प्रकट करना  चाहता है, यह कथा से स्पष्ट नहीं है। मैं समझती हूँ समकालीन साहित्य पर नारीवादी टिप्पणियाँ हमारे विमर्श को समृद्ध करेंगी।

    =======================

    विदुषी विद्योत्तमा

    कल की बात – २७३

    कल की बात है। जैसे ही मैँने लिफ्ट से निकलकर चौदहवीँ मञ्ज़िल की बेल-बूटे जड़े बन्द शीशम के दरवाज़े की घण्टी बजायी, अर्पिता दी ने मुस्कुराते हुए एकदम से दरवाज़ा खोला मानो मेरी ही प्रतीक्षा कर रही होँ। मैँने उन्हेँ पाँव छूकर प्रणाम किया तब वे कुछ नाराज़गी जाहिर करते हुए बोली, “यह ठीक नहीँ लगता। तुम मेरे लिए चन्द्रमा हो, जो इतने दिनोँ बाद घर आए हो।“ अर्पिता दीदी से बातोँ मेँ जीतना बड़ा मुश्किल है, खास कर जब वे बिना बात के प्रशंसा के पुल बाँधने लगती हैँ। मैँने सोफे पर बैठते हुए कहा, “और आप हमारे लिए पृथिवी हैँ। सभी भूले-भटके थके-हारे आपकी ही शरण मेँ आते हैँ।“ सुनकर अर्पिता दीदी हँसने लगी और बोलीँ, “आपके लिए बैँगन की सब्ज़ी बनाई है। वे अब रात को ग्यारह बजे तक आएँगे और तुम्हारी मुलाकात नहीँ हो पाएगी।“ मैँने कहा, “आपसे मिलना बहुत दिनोँ से मुल्तवी हो रहा था। आज इधर आना हुआ और सोचा कि आपकी विद्योतमा के दर्शन भी कर लूँ।“
    अर्पिता दीदी ने हँसते हुए कहा, “मुझे पता था कि तुम्हारा मेरे घर आना किसी और से मिलने का बहाना है। कोई बात नहीँ, पर विद्योत्तमा आ पाएगी या नहीँ, कौन कह सकता है। वैसे मैँने उसे बता दिया है कि तुमने उसका नाम ‘विद्योत्तमा’ रखा है। उसने एकदम बुरा नहीँ माना। हँस रही थी सुनकर।“  कहकर वे अन्दर रसोई मेँ चली गयी।
    शाम का समय था। अर्पिता दीदी की आदत है दूसरे से तीसरे की इतनी तारीफ कर देना कि सामने वाले को उसके बारे मेँ गहरी उत्सुकता हो जाए। उन्होँने बताया था कि उनके पड़ोस मेँ विद्योत्तमा रहती है जो अत्यन्त विदुषी है और अविवाहिता है। सुना है सुन्दर है, पर वह माप-तौल कम-ज्यादा हो सकता है क्योँकि एक स्त्री दूसरे स्त्री के रूप का बखान बहुत कम ही करती हैँ। अर्पिता दीदी का भरोसा भी नहीँ क्योँकि वह बढ़ा-चढ़ा कर तारीफ़ करती हैँ। विद्योत्तमा बीजिंग और क्योतो मेँ काफी समय गुजार कर आयी है। जैसा कि होता है कि विदुषी स्त्रियोँ को विद्वान पुरुष कम मिलते हैँ और यदि मिलते हैँ तो अहंकार का टकराव उन दोनोँ को मिलने नहीँ देता, इसका उन्हेँ गर्व भी था और दुख भी। मुझे आशा नहीँ थी कि विद्योत्तमा के दर्शन होँगे पर काम से इधर आना हुआ था इसलिए मिलने को चला आया। अर्पिता दीदी जब वापस आयी, तब मैँने पूछा, “आपने यह पियानो कब खरीदा? आप बजाती हैँ?” अर्पिता दीदी ने कहा, “तुम्हारे जीजाजी को शौक चढ़ा है पैसे बरबाद करने का। पाँच लाख का ग्रैण्ड पियानो ले आएँ हैँ, लेकिन काम से फुरसत मिले तब कुछ बजाएँ। तुम बता रहे थे कि तुमने हाल मेँ पियानो बजाना सीखा है।“
    मैँने उनको देखा और उठकर पियानो के पास बैठ गया। कीबोर्ड छूते ही धुन बज उठी और साथ ही गाना भी – “राग हो कोई मिलन का, सुख से भरी सरगम का, युग-युग के बन्धन का, साथ हो लाखोँ जनम का, ऐसे ही बहारेँ गाती रहेँ, और सजते रहे वीराने, जिन्हेँ सुन के दुनिया झूम उठे और झूम उठे दिल दीवाने…।” तभी किसी अनजान नारी स्वर ने पीछे से सुर मिलाया, “बेक़रार दिल, तू गाये जा, खुशियोँ से भरे वो तराने, जिन्हेँ सुन के दुनिया झूम उठे और झूम उठे दिल दीवाने।“  मैँने पलट कर देखा। एक साँवली स्त्री, आँखोँ मेँ खूब काजल लगाए, हरा ब्लाउज और सुनहरे पार की सफेद केरल साड़ी पहने, बालोँ में गजरा लगाए खड़ी मुस्कारा रही थी। अर्पिता दीदी ने आश्चर्य से कहा, “अरे वाह, तुम।“ विद्योत्तमा ने अर्पिता दीदी के  पाँव छूने की कोशिश की तब अर्पिता दीदी ने उसे गले लगाते हुए कहा, “यह ठीक नहीँ लगता। तुम मेरे लिए सूर्या सरीखी हो, इतने दिनोँ बाद घर आयी हो, देखो घर मेँ उजाला हो गया है।“ मैँने नज़रे चुराने की कोशिश की, कि उसे न देख सकूँ वह मानोँ सूरज थी, तब भी मैँ उसे देख पाया, जैसे सूरज को देखते हैँ, बिना उसे देखे।
    अर्पिता दीदी ने मुझे नज़रेँ चुराते देखकर कहा, “ये वे हैँ जो तुम्हेँ विद्योत्तमा कहते हैँ।“ मैँने खड़े होकर उनको नमस्ते किया और कहा, “जैसे आप अर्पिता दीदी के लिए सूर्या हैँ, मैँ सोम हूँ।“ विद्योत्तमा ने मुस्कुरा कर नमस्ते कहा और सोफे पर बैठ गयी। अर्पिता दीदी ने कहा, “ये बताओ तुम्हेँ ये गाने की क्या सूझी?” विद्योत्तमा ने कहा, “मैँ आपको एक कोआन सुनाती हूँ। एक भिक्षु ने विद्योत्तमा से विनीत होकर पूछा, ‘मैँने अभी-अभी मठ मेँ दाखिला लिया है। कृपया मुझे शिक्षा दीजिए।‘ विद्योत्तमा ने पूछा, ‘तुमने दिया गया खीर खा लिया?’ भिक्षु ने जवाब दिया, ‘जी, खा लिया।‘ विद्योत्तमा ने कहा, ‘तब तुम्हेँ अपना बर्तन भी धो देना चाहिए था।‘ उसी समय भिक्षु को आत्मज्ञान हो गया।“
    अर्पिता दीदी ने नाराज़गी से कहा, “अब तुम शुरू हो गयी अपनी पहेलियाँ बुझाना। मुझे ज़ेन और कोआन समझ नहीँ आते। ऐसे कोआन सुनाती रहोगी तो कौन सुनेगा तुम्हेँ?” मैँने हँस कर कहा, “अगर आपको बुद्ध मिले, बुद्ध को मार डालिए।“ अर्पिता दीदी अचरज मेँ खड़ी हो कर मेरे पास आयी और पूछा, “क्या कहा?” मैँने कहा, “आप बताइए आपके पैदा होने से पहले आपकी सूरत क्या थी? एक हाथ की ताली की आवाज़ कैसी होती है?” विद्योत्तमा ने मुझे कनखियोँ से देखा होगा जब मैँ अर्पिता दीदी की तरफ देख कर बातेँ  कर रहा था और वह ठीक मेरे पीछे थी। अर्पिता दीदी ने एकदम से कहा, “सूर्य-ग्रहण हो गया।“ मैँने प्रतिवाद किया, “आप भी कोआन-कोआन खेल रही हैँ?”
    अर्पिता दीदी ने कहा, “नहीँ नहीँ। तुम मेरे और विद्योत्तमा के बीच मेँ आ गए न। वह मुझे दिख नहीँ रही थी इसलिए मैँने कहा।“ कहकर वे हँसने लगीँ। विद्योत्तमा भी लाल हो गयी। अर्पिता दीदी ने कहा, “रुको मैँ पराँठे और सब्जी लेकर आती हूँ। तुम लोग शरबत पिओगे? मैँ भी कितनी बुद्धू हूँ। इतनी गर्मी है, पहले शर्बत पीना चाहिए।“
    विद्योत्तमा और मैँ हॉल मेँ बैठे थे लेकिन जैसे प्रभात के सूर्य के सामने चन्द्रमा की रोशनी फीकी पड़ जाती है, मैँ उसकी साड़ी की सरसराहट और चूड़ियोँ की खनखनाहट से सिहर जा रहा था। विद्योत्तमा ने मुझसे पूछा, “लगता है आपने कोआन पढ़े हैँ। आपके क्या विचार हैँ आपके, कोआन को लेकर।“ मैँने पहली बार उसे आँख भर कर देखा और कहा, “एक भिक्षु ने विद्योत्तमा से पूछा, ‘पथ क्या है?’ विद्योत्तमा ने कहा– एक आँख खोले आदमी का कुँएँ मेँ गिर जाना।” विद्योत्तमा ने हँसने लगी और बोली, “अस्ति कश्चिद्वाग्विशेषः?”
    अर्पिता दीदी अन्दर से शर्बत लेकर आयीँ और कहा, “तुम नहीँ जानती कि इस चार शब्द से चार कहानियाँ लिख दी जाएँगी।“ विद्योत्तमा ने कहा, “मैँने कुछ पूछा पर उन्होँने कसम खायी है कि कोआन मेँ ही बात करेँगे।“ अर्पिता दी ने मुस्कुरा कर मेरी ओर देख कर पूछा, “मुझे तो बता सकते हो।“ मैँने कहा, “आप सबसे बेहतरीन शर्बत का गिलास मुझे दीजिए।“ अर्पिता दीदी ने सोच कर कहा, “मेरे पास कोई ऐसा गिलास नहीँ है जिसमेँ बेहतरीन शरबत न हो।“ विद्योत्तमा ने हँस कर कहा, “वाह। लगता है आपको आत्मज्ञान हो गया है। कोआन की पहेलियाँ महायान की शिक्षा को बतलाने के लिए है।“ मैँने अर्पिता दीदी से कहा, “मैँ समझता हूँ ऐसे बहुत से कोआन प्रेम के लिए बनाने चाहिए। जिसे सच्चा प्रेम मिल जाएगा वह संसार के सत्य स्वभाव को जान जाएगा।“
    विद्योत्तमा ने मेरी  तरफ़ देखते हुए मुस्कुरा कर कहा, “विद्योत्तमा के पास एक प्रेम की अभिलाषा से आये युवक ने उसके रंगे पाँव पर अपना मस्तक रख कर कहा–  ‘मैँ आपसे प्रेम करना चाहता हूँ।‘ विद्योत्तमा ने उत्तर दिया– यदि तुम विद्योत्तमा को देखते ही प्रेम मेँ नहीँ हो फिर किस विधि से विद्योत्तमा से प्रेम कर पाओगे?”
    विद्योत्तमा के बड़े-बड़े मन्दिर की घण्टीनुमा सोने के झुमके मुझे अपने सम्मोहन मेँ ले रहे थे। मैँने कहा, “विद्योत्तमा के रूप से सम्मोहित होकर कामातुर व्यक्ति ने अपनी इच्छा को प्यार का नाम देकर विद्योत्तमा से पूछा कि सोम को प्रेम क्योँ नहीँ मिल पाता और विद्योत्तमा प्रेम मेँ असफल क्योँ हो जाती है? विद्योत्तमा ने मटके के शीतल जल से अभिषेक करते हुए कहा– सोम समोसा खाने की चाहत रखता है, पर माँगता खीर है। विद्योत्तमा ध्वनि का अर्थ आवाज़ समझ लेती है, इसलिए वह खीर परोस देती है।“ अर्पिता दीदी ने कहा,  “अच्छा, इसलिए सोम खीर खाने के बाद बर्तन नहीँ धोता है।“
    विद्योत्तमा ने अविचलित होकर कुछ गर्व से कहा, “मातृगुप्त ने मिले हुए राज्य को भोग करते हुए विद्योत्तमा से कहा मेरा शासन, मेरा काव्य, विद्योत्तमा के विरह के कारण तुच्छ है। यह सुनकर विद्योत्तमा ने मातृगुप्त की नाक पकड़ कर मरोड़ दी।“  मैँने कहा, “विद्योत्तमा ने मातृगुप्त की नाक इसलिए मरोड़ी क्योँकि मातृगुप्त राजधर्म मेँ न्याय करना चाहता है न्याय के अभिलाषी तुच्छ प्रार्थी की तरह। व्यवहार मेँ न्यायाधीश प्रार्थी नहीँ होता।“ अर्पिता दीदी ने झिड़क कर कहा, “अब खाना खालो वरना चन्द्र ग्रहण लग जाएगा।“
    विद्योत्तमा पियानो के पास खाली सीट पर बैठ कर गाने  लगी।

    दर्द मेँ डूबी धुन हो
    , सीने मेँ इक सुलगन हो
    साँसोँ मेँ हलकी चुभन हो, सहमी हुई धड़कन हो
    दोहराते रहेँ बस गीत नए, दुनिया से रहेँ बेगाने
    जिन्हें सुन के दुनिया झूम उठे, और झूम उठे दिल दीवाने

    ये थी कल की बात!

    दिनाङ्क:   १४/०६/२०२५
    सन्दर्भ:     १. गीतकार : इरशाद, चित्रपट : दूर का राही   (१९७३)

    Leave a Reply

    Your email address will not be published. Required fields are marked *

    1 mins
    WordPress Center Ankara Escort: Beypazarı Escort, Pursaklar Escort, Etimesgut Escort İstanbul Escort: Esenyurt Escort, Bahçelievler Escort, Maltepe Escort Bursa Escort: Gürsu Escort, Keles Escort, İznik Escort What are the best budget smartphones available in 2025? Reason Why Everyone Love Travel Doubts About Lifestyle You Should Clarify Bootstrap Pricing Table for WordPress WooCommerce Referral Scheme WordPress Plugin Revolution Lightbox GSlider – Premium Gutenberg Slider Block For WordPress WP Animated Buttons | WPBakery Button Addon Filebob – File Sharing And Storage Platform (SAAS) Wiloke Business Hours For Elementor WooCommerce Product Licenser- Elite Licenser Pro Addon Dynamic Step Process Panels FirstData Payeezy Payment Gateway WooCommerce Plugin