• कविताएं
  • रतन पंडोरवी की शायरी

    शाइर हमारे सीरीज़ में प्रत्येक सप्ताह उर्दू के एक जाने-अनजाने शाइर तथा उनके कलाम से रूबरू कराएँगे। इस सीरीज़ की पहली कड़ी में पेश हैं शाइर ‘रतन पंडोरवी’
    रला राम उर्फ़ रतन पंडोरवी उर्दू के प्रसिद्ध शाइर, सिद्ध जोगी, ज्योतिषी और फ़ारसी के उस्ताद थे। उनका जन्म 07 जुलाई 1907 को पंजाब के ज़िला गुरदासपुर के पंडोरी गाँव में हुआ था। शादी नहीं की, जीवन भर पंडोरी में व्यास नदी के किनारे वीराने में स्थित एक शिव मंदिर में जोगी की ज़िन्दगी गुज़ारी। रतन पंडोरवी ने तक़रीबन 2 दर्ज़न से अधिक किताबें लिखीं, जिनमें फ़र्शे-नज़र(1965), बहिश्ते-नज़र(1974), अंदाज़े-नज़र(1975), पयामे-नज़र(1981), आख़िरी नज़र(1984), हुस्ने-नज़र(2009), सिर्रे-मग़फ़रत(1980), पैग़ाम अमल, रुबाइयाते-रतन(1982), नौ रतन (1953), हिंदी के मुसलमान शायर(1982), फ़न्ने-तारीख़ गोई(1984) आदि प्रमुख हैं।

    बक़ौल अल्लामा-ए-दौराँ डॉ. अंदलीब शादानी “रतन साहिब फ़क़त नाम के रतन नहीं सचमुच के रतन हैं और पाक व हिन्द की बाज़ मुमताज़ अदबी अंजुमनों ने उन्हें मुम्ताज़ुलशुअरा औ लिसानुलहिन्द वगरैह के ख़िताबात से बेसबब नहीं नवाज़ा। तहज़ीब-ओ-तमद्दुन की पुरशोर दुनिया से अलग और दूर बसने वाले इस दरवेश-ए-हक़ परस्त का कलाम जब हमारे सामने आता है तो वो बे-इख़्तियार हमारा दामने-दिल थाम लेता है।”

    रतन पंडोरवी, दिल शाहजहानपुरी के शिष्य थे, उनके रोग-ग्रस्त हो जाने के बाद जोश मलसियानी से इस्लाह लेने लगे और इस रवायत को आगे बढ़ाते हुए ख़ुद ने भी तीन दर्ज़न से अधिक शागिर्दों की रहनुमाई की, जिनमें प्रसिद्ध शाइर राजेन्द्र नाथ रहबर (‘तेरे ख़ुशबू में बसे ख़त’ के ख़ालिक़) और सरदार ज्ञान सिंह शातिर (साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता) क़ाबिल-ए-ज़िक्र हैं। रतन पंडोरवी 4 नवम्बर 1990 को पठानकोट में इस नश्वर संसार से विदा हुए। रतन साहब को पंजाब सरकार ने अपने सर्वोच्च साहित्यिक सम्मान “शिरोमणि साहित्यकार सम्मान” से भी सम्मानित किया था।

    प्रस्तुति है युवा शोधार्थी और लेखक अभिषेक कुमार अम्बर की- मॉडरेटर

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    ग़ज़ल – 1

    मौजों ने हाथ दे के उभारा कभी कभी
    पाया है डूब कर भी किनारा कभी कभी

    करती है तेग़-ए-यार इशारा कभी कभी
    होता है इम्तिहान हमारा कभी कभी

    चमका है इश्क़ का भी सितारा कभी कभी
    माँगा है हुस्न ने भी सहारा कभी कभी

    तालिब की शक्ल में मिली मतलूब की झलक
    देखा है हम ने ये भी नज़ारा कभी कभी

    शोख़ी है हुस्न की ये है जज़्ब-ए-वफ़ा का सेहर
    उस ने हमें सलाम गुज़ारा कभी कभी

    फ़रियाद-ए-ग़म रवा नहीं दस्तूर-ए-इश्क़ में
    फिर भी लिया है उस का सहारा कभी कभी

    मुश्किल में दे सका न सहारा कोई ‘रतन’
    हाँ दर्द ने दिया है सहारा कभी कभी

    ग़ज़ल- 2

    अक़्ल वाले क्या समझ सकते हैं दीवाने की बात
    अहले-गुलशन को कहाँ मालूम वीराने की बात

    इस क़दर दिलकश कहाँ होती है फ़र्ज़ाने की बात
    बात में करती है पैदा बात दीवाने की बात

    बात जब तय हो चुकी तो बात का मतलब ही क्या
    बात में फिर बात करना है मुकर जाने की बात

    इसका ये मतलब क़यामत अब दुबारा आएगी
    कह गए हैं बातों-बातों में वो फिर आने की बात

    बात पहले ही न बन पाये तो वो बात और है
    सख़्त हसरत नाक है बन कर बिगड़ जाने की बात

    दास्ताने-इश्क़ सुन कर हम पे ये उक़्दा खुला
    दर हक़ीक़त इश्क़ है बे-मौत मर जाने की बात

    अब्र छाया है चमन में और साक़ी भी करीम
    ऐसे आलम में न क्यों बन जाये पैमाने की बात

    इसमें भी कुछ बात है वो बात तक करते नहीं
    सुन के लोगों की ज़बानी मेरे मर जाने की बात

    बात का ये हुस्न है दिल में उतर जाये ‘रतन’
    क्यों सुनाता है हमें दिल से उतर जाने की बात

    ग़ज़ल – 3

    शबे-फ़ुर्कत थे फ़क़त दो ही सहारे मुझ को
    देखता था मैं सितारों को सितारे मुझ को

    क्यों न हों उन के सितम जान से प्यारे मुझ को
    नफ़अ से बढ़ के हैं उल्फ़त में ख़सारे मुझ को

    अपनी हस्ती के सिवा कोई सहारा न मिला
    बे-सहारा ही मिले और सहारे मुझ को

    मैं ने जिस वक़्त किनारों की तमन्ना छोड़ी
    ख़ुद ब-ख़ुद लेने चले आये किनारे मुझ को

    उठ के पहलू से चले हो तो बताते जाना
    छोड़ कर जाते हो अब किस के सहारे मुझ को

    सोचता हूँ तो सहारों का सहारा मैं हूँ
    फिर कहां देंगे सहारा ये सहारे मुझ को

    क्या ये अंदाज़ उन्हें तू ने सिखा रक्खे हैं
    क्यों रुलाते हैं ये हँसते हुए तारे मुझ को

    कितने नादिम हैं वो ख़ुद वादा फ़रामोशी पर
    अब बुलाते भी नहीं शर्म के मारे मुझ को

    वो बहर-तौर मिरी जान के दुश्मन ठहरे
    लेकिन इस पर भी हैं सौ जान से प्यारे मुझ को

    इश्क़ की राह में ये कौन सी मंज़िल आई
    ख़ाक के ज़र्रे हुए आँख के तारे मुझ को

    हाए वो वक़्त कि जब चार हुई थीं आँखें
    आज तक याद हैं अन्दाज़ तुम्हारे मुझ को

    दौड़ कर मैं ने ‘रतन’ धार पे गर्दन रख दी
    तेग़-ए-क़ातिल ने किये ऐसे इशारे मुझ को।

    ग़ज़ल- 4

    ख़ुदाया हुस्न वालों पर इनायत ये भी की होती
    दहन शीरीं तो बक्शा था ज़बाँ शीरीं भी दी होती

    बराबर के तमाशे में ग़ज़ब की दिल-कशी होती
    भड़कते हैं इधर शोले उधर भी कुछ लगी होती

    तिरे ग़म में ख़ुशी से हम सुपुर्दे-ख़ाक जब होते
    ख़ुशी को तो खुशी होनी ही थी ग़म को खुशी होती

    ख़ताएँ ही मिरी मुझ को दरे-रहमत पे ले आईं
    भटक जाता ख़ताओं से अगर कुछ भी कमी होती

    कलेजे से लगा रक्खा है दुनिया भर का ग़म हम ने
    यही है ज़िन्दगी या रब तो ये हम को न दी होती

    सज़ा तो इश्क़ ने पाई महब्बत की अदालत में
    तक़ाज़ा ये था पाए-हुस्न में बेड़ी पड़ी होती

    मुकम्मल आदमीयत से अगर ये बहरा-वर होता
    फरिश्तों से भी फिर हासिल बशर को बरतरी होती

    ‘रतन’ हुस्ने-ज़बाँ के साथ अगर हुस्ने-बयाँ होता
    जहाँ में क़ाबिले-तक़लीद तेरी शायरी होती।

    ग़ज़ल – 5

    क्या तिरी दरिया दिली है ऐ-खुदा मेरे लिये
    हर क़यामत हर मुसीबत हर बला मेरे लिये

    हर जफ़ा हर जौर हर सख़्ती रवा है आप को
    हर शिकायत हर गिला है ना-रवा मेरे लिये

    तेग़े-अबरू, तेग़े-चीं, तेग़े-नज़र, तेग़े-अदा
    कितनी तलवारों का पहरा रख दिया मेरे लिये

    मुझको तेरे वास्ते बे-मौत मर जाना पड़ा
    तू न लेकिन भूल कर भी जी सका मेरे लिये

    क्यों न मेरी बे-कसी पर रो उठे ख़ुद बे-कसी
    हो गया हर आसरा बे-आसरा मेरे लिये

    जो तिरे कूचे में आया वो सलामत कब रहा
    मर गयी है मह्ज मेरी ही क़ज़ा मेरे लिये

    हुस्न तेरा तेरी गुमराही का मूजब बन गया
    इश्क़ मेरा बन गया है रहनुमा मेरे लिये

    हो सका कोई न मुझ उफ़्तादा-पा का दस्तगीर
    मेरी मुश्किल ही हुई मुश्किल-कुशा मेरे लिये

    अब न जाऊँगा में उन के आस्ताँ पर ऐ-‘रतन’
    आस्ताँ से कम नहीं हर नक़्शे-पा मेरे लिये।

    ग़ज़ल – 6

    मैं महवे-खुदा तू शाने-ख़ुदा, मैं और नहीं तू और नहीं
    तू जलवा है मैं जलवा-नुमा, मैं और नहीं तू और नहीं

    मैं ज़र्रा हूँ ख़ुर्शीद है तू मैं फूल हूँ तू उस में ख़ुशबू
    तू अस-ए-बक़ा मैं शक्ले-बक़ा, मैं और नहीं तू और नहीं

    मैं बुलबुल हूँ, तू नग़मा है, मैं साज़ हूँ, तू उस का पर्दा
    मैं महवे-अदा तू हुस्ने-अदा, मैं और नहीं तू और नहीं

    तू हुस्ने-अज़ल मैं इश्क़े-अज़ल तू औजे-अबद मैं मौजे-अबद,
    हाकिम तू मिरा मैं हुक्म तिरा, मैं और नहीं तू और नहीं

    मैं तुझमें हूँ तू मुझमें है मैं ज़ाहिर हूँ तू बातिन है
    मैं तेरी ज़िया तू मेरी ज़िया, मैं और नहीं तू और नहीं

    तू क़ादिर है मैं क़ुदरत हूँ तू साने है मैं सनअत हूँ,
    है एक ही रिश्ता दोनों का, मैं और नहीं तू और नहीं।

    मैं बंदा हूँ तू मौला है मैं ख़ादिम हूँ तू आक़ा है,
    फिर क्यों मुझसे है बे-परवा मैं और नहीं तू और नहीं।

    तू हुस्ने-गुहर मैं ताबे-गुहर तू रूहे-बसर मैं शक्ले-बसर,
    फिर तू ही बता क्या फ़र्क़ रहा, मैं और नहीं तू और नहीं।

    हस्ती से मिरी हस्ती है तिरी बस्ती से मिरी बस्ती है तिरी
    आ शौक़ से मेरे दिल में आ मैं और नहीं तू और नहीं

    मैं तुझ को यगाना कहता हूँ सदमों पर सदमे सहता हूँ
    बेगाना न बन, कर तर्के-जफ़ा, मैं और नहीं तू और नहीं

    कितना ही रहे तू पर्दा-नशीं पोशीदा नहीं आँखों से मिरी
    पर्दा है अबस पर्दे को उठा मैं और नहीं तू और नहीं

    तू ख़ालिक़ है तख़्लीक़ हूँ मैं लोलाक की इक तस्दीक़ हूँ मैं
    ऐ सूरतगर सूरत तो दिखा, तू और नहीं मैं और नहीं

    तू हो के निहाँ है साफ़ अयाँ तू हो के अयाँ है खुद ही निहाँ
    वहदत है यही कसरत को मिटा मैं और नहीं तू और नहीं

    मैं रंगे-चमन तू बुए-चमन मैं जिस्मे-‘रतन’ तू रूहे-‘रतन’
    ये राज भी मैं ने जान लिया, तू और नहीं मैं और नहीं

    ग़ज़ल – 7

    पी लिया जब से तिरी तेग़-ए-अदा का पानी
    आग को हमने समझ रक्खा है ठंडा पानी

    उफ़ ये मज़बूर बशर और तकब्बुर इतना
    सख़्त हैरत है कि किस बिरते पे तत्ता पानी

    घर से निकला हूँ क़फ़न बाँध के मक़तल की तरफ़
    देख लूँगा कि सितमगर में है कितना पानी

    ज़िन्दगी रो के कटी मर के जहन्नुम पाया
    देखिये आग है उकबा तो है दुनिया पानी

    किस ने ये छेड़ दिया ज़ख़्मे-जिगर को ऐ दिल
    खून बन बन के मिरी आँख से टपका पानी

    इस तरफ आग कि सीने में भड़क उट्ठी है
    उस तरफ़ हुक्म कि हरगिज़ न मिलेगा पानी

    कभी दुनिया का सफ़र और कभी उक़्बा का
    यूँ ही भटकाता है इंसान को दाना-पानी

    प्यास है दिल में मगर हौसला पीने का नहीं
    किस क़दर तल्ख़ है दरिया-ए-वफ़ा का पानी

    मुझ को उस्ताद ने बक्शी है ‘रतन’ ये ताक़त
    बाँध लेता हूँ मैं दरियाए-सुख़न का पानी

    ग़ज़ल – 8

    लुत्फ़-ए-ख़ुदी यही है कि शान-ए-बक़ा रहूँ
    इंसान के लिबास में बन कर ख़ुदा रहूँ

    जब तुझ को मेरे सामने आने से आर है
    किस हौसले पे तुझ को ख़ुदा मानता रहूँ

    पर्दे में इक झलक सी दिखाने से फ़ायदा
    जल्वे को आम कर कि तुझे देखता रहूँ

    इक तू कि मेरे दिल ही में छुप कर पड़ा रहे
    इक मैं कि हर चहार तरफ़ ढूंडता रहूँ

    तू ही बता कि ये कोई इंसाफ़ तो नहीं
    तेरा ही जुज़्व होने पे तुझ से जुदा रहूँ

    भेजा है ऐ ख़ुदा मुझे क्या तू ने इस लिए
    हर वक़्त ज़िंदगी में रहीन-ए-बला रहूँ

    हर गाम मुझ को काबा ही मक़्सूद है रतन
    आया है वो मक़ाम कि हर दम झुका रहूँ

    ग़ज़ल -9

    हुस्न से दिल लगा के देख लिया
    इश्क़ को आज़मा के देख लिया

    कोई साथी नहीं मुसीबत में
    मौत को भी बुला के देख लिया

    मेरा जीना भी कोई जीना है
    जिस ने चाहा मिटा के देख लिया

    दहर बेगाना-ए-महब्बत है
    सब को अपना बना के देख लिया

    यक-ब-यक तिलमिला उठा है दिल
    किस ने पर्दा उठा के देख लिया

    बढ़ गई और बे-रुख़ी उन की
    क़िस्सा-ए-ग़म सुना के देख लिया

    मुतमइन ऐ ‘रतन’ जबीं न हुई
    हर जगह सर झुका के देख लिया

    ग़ज़ल – 10

    दिल बिक चुका है जब से किसी दिलरुबा के हाथ
    उठने लगे हैं प्यार से मुझ पर क़ज़ा के हाथ

    दोनों ने थाम रक्खी है किस्मत की बाग-डोर
    कुछ आदमी के हाथ है कुछ है ख़ुदा के हाथ

    कुदरत की बारगाह का इंसाफ़ देखिए
    बन्दे के हाथ कुछ नहीं सब कुछ ख़ुदा के हाथ

    तेरी निगाह में है मिरे दिल की आरज़ू
    फिर तुझ से माँगता फिरूँ मैं क्या उठा के हाथ

    वो और होंगे जिन की तमन्ना निकल गई
    हम तो उठाये बैठे हैं अब तक दुआ के हाथ

    देखेंगे हम भी हौसला उस पुर-ग़ुरूर का
    पैग़ाम हम भी भेजेंगे आहे-रसा के साथ

    जीते जी एक बार न मक़बूल हो सकी
    क्यों टूट कर न रह गये ऐसी दुआ के हाथ

    महरूमियाँ नसीब में लिक्खी हों जब ‘रतन’
    बे-फ़ायदा उठाये कोई क्यों दुआ के हाथ

    रतन पंडोरवी के चुनिंदा अशआर

    —–

    1.

    सर दरे-यार पे रख कर न उठाया हम ने
    बन्दगी में भी इक ऐजाज़ दिखाया हम ने

    2.

    दम भर में बुलबुले का घरौंदा बिगड़ गया
    कहता था किस हवा में कि फ़ानी नहीं हूँ मैं

    3.

    ख़ौफ़ क्या मुझ को किसी के खंज़रे-खूं रेज़ का
    मौत का आना है तब्दीले-मकाँ मेरे लिए

    4.

    ये कुदूरत ये तनफ़्फुर ज़िन्दगी के साथ है
    एक हो जाती है मिल कर अपने बेगाने की ख़ाक

    5.

    निशाने-सरबलंदी ऐ रतन पस्ती ने मिलती है
    बसर करता हूँ अपनी ज़िन्दगी में ख़ाक-सारों में

    6.

    सितारा मेरी किस्मत का कुछ इस अंदाज़ से टूटा
    कि सातों आसमाँ सहमे हुए मालूम होते हैं

    7.

    इस का ये मतलब क़ियामत अब दुबारा आयेगी
    कह गये हैं बातों बातों में वो फिर आने की बात

    8.

    रात महकी, चाँदनी छटकी, फ़ज़ा रौशन हुई
    चाहता हूँ उन को ऐसे में बुला कर देख लूँ

    9.

    सुन रहा हूँ उनका मिलना जुज़ फ़ना मुमकिन नहीं
    आज उन को ये तमाशा भी दिखा कर देख लूँ

    10.

    नमाज़-ए-इश्क़ तुम्हारी क़ुबूल हो जाती
    अगर शराब से तुम ऐ ‘रतन’ वज़ू करते

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