वरिष्ठ कवि पवन करण के कविता संग्रह ‘स्त्री मुग़ल’ पर यह टिप्पणी लिखी है दूसरे वरिष्ठ कवि बोधिसत्व ने। ‘स्त्री मुग़ल’ की कविताएँ मुग़ल वंश की स्त्रियों को लेकर है। राधाकृष्ण प्रकाशन से प्रकाशित इस किताब पर यह टिप्पणी आप भी पढ़ सकते हैं- मॉडरेटर
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जब मैं इलाहाबाद रहता था तब से पवन करण मित्र हैं। इस मित्रता को लगभग पैंतीस बरस हो गये! हम एक दूसरे को पढ़ते रहते हैं और रचना के स्तर पर सुझाव सलाह भी देते हैं! स्त्री मेरे भीतर से उन्होंने अपनी कविता को एक नया स्वर दिया वही स्वर विकसित होकर स्त्री शतक के दो खंडों में पल्लवित हुआ और अब स्त्री मुगल के रूप में एक काव्य उपवन बन कर सामने है!
जिस वक्त में मुगल गॉर्डन का नाम अमृत उद्यान किया जा रहा है उस वक्त में पवन करण स्त्री मुगल शीर्षक दे कर और उसी क्रम में काव्य लिख कर अपना पक्ष भी समाज में रख रहे हैं! कवि का कथन केवल कवियों तक नहीं सीमित रहता वह उन सरकारों तक भी जाता है जो नामों के बदलने को ही अपना हासिल मानते हैं ऐसे में। स्त्री मुगल नाम को ही मैं सरकार और एक वर्ग विशेष के लिए चुनौती मानता हूँ!
यह किताब लेकर मैं महीनों यात्रा में रहा इसे पढ़ते हुए एक ऐसी दुनिया का हाहाकार और कोलाहल सुनाई देता है जो अब लौट कर नहीं आने वाली! लेकिन कवि उसे कविता में संभव करते हैं। जैसे थेरी गाथा में बौद्ध भिक्षुणिओं का जीवन मरण दर्ज है लेकिन उनका वह आध्यात्मिक संसार खो गया है। स्त्री मुगल ऐश्वर्य और दीनता के बीच की एक शोक यात्रा है। लगभग आठ नौ पीढ़ियों के मध्य एक वंश से जुड़ी स्त्री दुनिया को कविता में संभव करना केवल कवि हृदय नहीं इतिहास वेत्ता के लिए भी चुनौती पूर्ण कार्य है।
निराला जी की एक पंक्ति है-
‘रानियाँ अवरोध की घेरी हुई’
अवरोध अंतःपुर के लिए एक शास्त्रीय पद है। इसका अनुवाद किया जाये तो अर्थ बाड़ा निकलेगा। इसे हरम या जनानखाना भी कहा गया और मात्र भोग लिप्सा के रहस्यमय संसार की तरह इसे पेश किया गया! पवन करण ने उसी भोग लिप्सा के रूप में प्रचारित दुनिया के भीतर धड़कने वाले दुःख और उल्लास को कविता में संभव किया है! बाड़े के रूप में प्रचारित घेरे में पुलकित जीवन को उजागर किया है।
वे न केवल कविता में स्त्री जीवन को अंकित करते हैं बल्कि समकालीन नारीवादी कवि कवयित्रियों के लिए एक चुनौती भी पेश करते रहते हैं। अगर मैं विनम्रता से कहूँ तो कह सकता हूँ कि हिन्दी की नारीवादी कविता के श्रेष्ठ कवि हैं पवन करण।
‘स्त्री मुगल’ कविता संग्रह नहीं एक जिल्द में गूँथी हुई गाथा है। पवन करण इसके द्वारा हिंदी कविता में एक नई संवेदनात्मक दुनिया तैयार करते हैं। वे इसके पहले के दो कविता संग्रहों में इस काम को एक नई ऊँचाई पहले ही दे चुके हैं। स्त्री शतक में पौराणिक स्त्रियों का रुदन शोक विलाप सब अंकित है। नामावली गिनाने से बेहतर है मैं उन पक्षों की बात करूँ जिसे ये कविताएँ या पवन करण हिन्दी कविता और पौराणिक ऐतिहासिक अध्ययन और सृजन से जोड़ते हैं। स्त्री शतक में आयी रावण की उपपत्नी चित्रांगदा की व्यथा कथा मंदोदरी आदि के अपमान भरे जीवन को नया विस्तार देती है। ऐसी कविताएँ बिना श्रम, बिना अध्ययन और महाकवि होने की मेधा रखे रच पाना संभव नहीं! चित्रांगदा का दुःख यह है-
लाख चातुरी के बाद भी
वागव्रता भी नहीं हो सकी!
वागव्रता मुख्य प्रेमिका का पद होता है! स्त्री शतक की कविताओं में भी अंतःपुर की एक नई दुनिया थी लेकिन उसमें ऋषिकाओं और तपस्विनी स्त्रियों का संसार भी था और युगों के विभाजन थे! परिव्रता और वाग्व्रता जैसे पदों का शोधन भी कवि ने किया था! उसी तरह स्त्री मुगल में भी हरम के विभिन्न ओहदों पर विराजती स्त्रियाँ देखी जा सकती हैं!
स्त्री शतक का केवल विस्तार ही नहीं बल्कि उसके आगे की कविताएँ हैं स्त्री मुगल। यह संग्रह हमें इतिहास के उस अंधकार में ले जाता है जिसने उजालों का पैरहन पहना हुआ है। पवन ने उन दीवारों की सिसकती सीलन के लुप्त स्वर को शब्द दिये हैं। जो औरतें बोल नहीं पाईं कवि ने उनको वाणी दी है और ऐसे वक्त में दी है जब उनके वंश की चर्चा भी देश द्रोही घोषित किए जाने के लिए पर्याप्त है!
मैंने पहले भी कहा कि संख्या पर न जाकर कविता में दर्ज मर्म पर बात होनी चाहिए। स्त्री मुगल में उपस्थित स्त्रियाँ अन्दीजान से भारत की ओर प्रस्थान के पहले से अपना होना दर्ज करा रही थीं! मुगलों की भारत यात्रा केवल शस्त्रों और युद्धों की यात्रा नहीं वह हरम के जीवन और संस्कृति की भी यात्रा रही है! इतिहास की यात्रा में ओहदे ही नहीं ओहदों के साथ लिपटे उन औरतों के उन दुःखों को लिखा है जो जीवन में आकर ठहर गये। वे असमाप्त दुःख, वे अपूर्ण प्रेम, वे असंकलित सुख, वे अप्रतिम प्रतिरोध और वे खण्ड खण्ड होकर भी न बिखरे स्त्री स्वाभिमान के पृष्ठ इन कविताओं की उल्लेखनीय उपलब्धि हैं!
ये कविताएँ अतीत की बात होकर भी अतीत राग नहीं बल्कि समकालीन समाज की बंद दुनिया में स्त्री की पीड़ा को समान रूप से प्रकट करती हैं।
पहली कविता ख़ानज़ादा बेगम पर है। ये कविता सिर्फ उन पर नहीं है बल्कि हर उस स्त्री के दुःख से संलिप्त है जो अपने मायके की रक्षा में दाव पर लगा दी गई हो!
इस तैमूर शहज़ादी को हारे हुए बाबर की जान बचाने के लिए उज़्बेक सुल्तान मोहम्मद शैबानी के हरम में जाना पड़ा! जिसने बाबर को हराया उससे निकाह करना पड़ा! बाबर की उस बड़ी बहन की व्यथा को संसार की सभी बहन बेटियों की व्यथा के रूप में पवन करण ने अंकित किया है!
ये स्त्रियाँ मुग़ल बादशाहों, शाहजादों, सिपहसालारों, वजीरों और अमीरों की बेकाबू दुनिया में साँस लेती इतिहास हैं! जिन्होंने किसी भी स्थिति में अपनी ख़्वाहिशों ख़्वाब मुहब्बत और इज्जत पाने की तड़प को मिटाने के लिए जब मजबूर हो जाती हैं तब भी कहीं किसी कोने में दुबकी स्नेह की सिसकी को कवि सुन लेता है। वह सिसकी जिसे इतिहासकारों ने अनसुनी कर दी पवन करण ने उसे एक ग्रंथ में लिपि बद्ध किया!
जिन लोगों ने ख़्वाजा हसन निज़ामी की किताब बेगमात के आंसू पढ़ी होगी वे पवन करण की गहरी अध्ययन प्रवृत्ति और कवि हृदय की शक्ति को समझ पायेंगे! यह किताब नये कवियों के लिए एक प्रेरणा की तरह भी काम करता है कि कैसे एक कवि अछूते काव्य संसार का सृजन करता है! कैसे एक कॉन्सेप्ट कविता के लिये एक नई भावभूमि का उद्घाटन कर देता है! अपनी काव्यात्मक संकल्पनाओं में भी पवन बेजोड़ हैं!
यह कविता संकलन इतिहास, राजनीति की अंतर्कथाओं और घटनाओं को केवल सूचना की तरह नहीं बल्कि जीवन की तरह देखने के लिए नजरिया भी देता है! मैं स्वीकार करता हूँ कि मैं इतिहास का विद्यार्थी हूँ मेरे स्थान पर किसी इतिहासकार को इन कविताओं का विशेष अध्ययन करना चाहिए! इतनी बारीकी से व्याख्यायित कविताएँ जहां इतिहास वर्तमान की धुंधली लकीर अदृश्य हो जाये उसमें से इतिहास और कविता को अलग अलग करना वैसे मैं आवश्यक नहीं मानता!
अकबर की हिन्दू पत्नी हरकाबाई का दुःख औरंगजेब की ईरानी बेगम दिलरस बेगम, औरंगजेब की बेटी जेबुनिस्सा सब बंधी और लगभग मुक्त स्त्रियों की वेदना सब मिल कर एक स्त्री मुगल गाथा का सृजन करते हैं जो कविता में अपूर्व है और हिन्दी साहित्य को समृद्ध करते हैं!
पवन करण हिंदी कविता के अनेक प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित हैं जिनमें रामविलास शर्मा पुरस्कार, रज़ा पुरस्कार, वागीश्वरी पुरस्कार, केदार सम्मान आदि से सम्मानित हैं और उनका सृजन अपने सम्मानों को वैधता प्रदान करता है! मैं इस तरह के और संग्रहों की प्रतीक्षा करने पर विराम नहीं देना चाहता!
इस आकलन का अंत गुलबदन बेगम कविता के एक अंश से करना चाहूँगा, जिसने हुमायूँनामा लिख कर मुगलों के इतिहास प्रेम में एक नया अध्याय जोड़ा। यह अकबर की बुआ और हुमायूँ की बहन थी। संपूर्ण ऐश्वर्य की अधिकारिणी इस स्त्री की पीड़ा देख कर हम एक परिणाम निकाल सकते हैं-
मैंने भुला दिया कि चलते वक़्त
तलवार भले ही ठिठक जाती हो मगर क़लम की धार
अपनी ओर से कोई चूक नहीं करती
चाहे दुश्मन की हो या दोस्त की
उसके लिए सभी शख़्सियतें एक सी होती हैं
तलवार का मज़हब आँख मूँदकर चलना होता है
तो क़लम का धर्म आँख खोलकर लिखना
फिर मेरी क़लम मुग़लिया मरदों की
ख़्वाबगाहों के पर्दे कैसे नहीं उठा सकी
गुलबदनबानो की असमर्थता एक दर्पण है मुगल स्त्रियों की त्रासदी और वैभव दोनों की।
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कविता संग्रह : स्त्री मुग़ल
कवि: पवन करण
प्रकाशन वर्ष: 2023
प्रकाशक: राधा कृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली

