• कथा-कहानी
  • उपासना की कहानी ‘एगही सजनवा बिनु ए राम!’

    आज पढ़िए युवा लेखिका उपासना की कहानी- एगही सजनवा बिनु ए राम!। समकालीन कहानी में उपासना की उपस्थिति बहुत अलग और ठोस है। ग्रामीण जीवन की एक से एक पेंचदार कहानियाँ लिखने वाली उपासना का कहानी संग्रह ‘दरिया बंदर कोट’ जानकी पुल शशिभूषण द्विवेदी स्मृति सम्मान के शॉर्ट लिस्ट में शामिल छह किताबों में एक है। यह संग्रह हिन्द युग्म प्रकाशन से प्रकाशित है। पुरस्कार की घोषणा 26 जुलाई को होने वाली है। उपासना को शुभकामनाएँ देते हुए आइये उनकी यह कहानी पढ़ते हैं- मॉडरेटर

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    मध्यम ऊँचाई वाले बाँस को (जिस पर गुब्बारे, प्लास्टिक की पिपिहिरी और खिलौने टँगे थे) सिलिंडर भइया ने पाकड़ से टिका कर खड़ा कर दिया और सोर पर बैठ कर सुस्ताने लगे।

    पाकड़ के ठीक सामने अभी भी हनुमान मन्दिर ही था। मन्दिर में हनुमान जी की मूर्ति थी। मूर्ति की उम्र जरा भी घटी बढ़ी नहीं दिख रही थी। जस का तस एक हाथ में पहाड़ तथा दूसरे हाथ में गदा लिए हनुमान जी अभी भी उड़ने को तैयार दिखते थे।

    नजर मन्दिर से आगे बढ़ी थी। सिलिंडर भइया की उम्र जब जवानी और अधेड़ावस्था के बीच ही थी, माने कि समझ लीजिए जवानी ज्यादा अधेड़पन बहुत कम, तभी मन्दिर के बाद फैले बबूल के सारे झाड़-झंखाड़ उखाड़ कर जमीन साफ कर दी गई थी। सरजू सुनार की बँसवारी उजड़ गई थी। उससे आगे एक अन्धा कुइयाँ था; वह भी एक दिन ईंट, मिट्टी से पाट कर चिक्कन कर दिया गया था। चिक्कन जगह पर ‘ज्ञानकुंज शिक्षण संस्थान’ की छोटी सी इमारत बन गई थी। जब कुइयाँ पाट दिया गया था, बबूल साफ कर दिए गए थे… तब की अपनी नई-नोचर कनिया से सिलिंडर भइया ने कहा था, ‘‘एगो बात पूछें?’’

    कनिया अबरक लगी चमकती चूड़ियों से खेलती बोली थी, ‘‘हूँम्म्म…!’’

             ‘‘अब तुम अपना गन्दा असुद्ध कपड़ा कहाँ फेंकोगी?’’

    कनिया हँसने लगी थी। हँसते हुए ही पूछी थी, ‘‘एकर चिन्ता रउआ काहें धर लिया है?’’

    सिलिंडर भइया चुप।

    कनिया तरस खाते हुए बताती थी, कि ‘‘अम्मा जी बोली हैं कि कागज में लपेट कर कौनो घूरा प फेंक देना।’’

    सिलिंडर भइया माचिस की तीली को मसाले पर घिसे थे। एक घर्षण से ही तीली भक् से जल उठी थी। काँपती हथेलियों से जलती तीली को आड़ करके बीड़ी जलाई थी उन्होंने। फिर, दो तीन दफे तीली हवा में फटके थे। बुझी हुई तीली को सिलिंडर भइया ने फेंक दिया था।

    सिलिंडर भइया ने भर मुँह धुआँ उगला था। लाल चींटियों की एक लकीर जड़ों से होती हुई, पाकड़ के तने से ऊपर जाकर कहीं गुम हो जा रही थी। जीवन को उसकी नंगई के साथ स्वीकार करते जाना दुरूह कार्य था, बेशक उसकी नंगई पर कोई सा भी झीना आवरण लगा कर जिया जा सकता था कम अज कम!

    सिलिंडर भइया तर्जनी और अँगूठे की पकड़ में फँसी बीड़ी का लम्बा कश लेते थे। कुछ भी करके दुख से छुटकारा पाया जा सकता था, और दुख था कि ससुरा कुछ करने ही नहीं देता था। खूब धुआँ निकाल कर सिलिंडर भइया ऊपर आसमान में ताकते थे। धूप कम थी, उमस ज्यादा।

    असल में पैंतालिस छियालिस के सिलिंडर भइया , नकल में पचपन छप्पन के दिखते थे। तब की नई-नोचर कनिया अब सोलह साल पुरानी हो गई है और टोला के चार-छः घरों में बर्तन माँजने जाती है।

    कनिया के एक लड़का और एक लड़की है।

    लड़का छोटा है।

    लड़की रजस्वला हो गई है।

    सिलिंडर भइया जबसे सुने थे कि लड़की रजस्वला हो गई है, तब से अंउजाए रहते। सोलह साल पुरानी कनिया को अपना मरद पूरा बउरहा लगता है। दस बोली रोज सुनाती है।

    कनिया मिट्टी के चूल्हे  में लवना लगाती थी। आँच लहलहा उठी थी। कनिया जीरा का फोरन देकर कटी हुई लौकी कड़ाही में डाल देती थी। सब्जी चलाते हुए धुएँ से बचने के लिए आँखें मिचमिचा कर कहती थी, ‘‘हमरो तऽऽ बाप रहुवन! बाप राम के कबउ पता भी न लागल कि कब बेटी सयान हुई, अउर हमारी बिदाई भी हो गई। तुम्हारे अइसा तो बाप ही नहीं देखे हम!’’

    सिलिंडर भइया, आईना लेकर बाल काढ़ते रहते थे। कनिया परात में आटा लेकर गूँथने लगी थी, ‘‘हम मर बिला गए हैं, कि इन्हीं को फिकिर धरा है बुचिया का लेगी, कहाँ फेकेगी! दू पइसा कमाना न धमाना, खाने पीने का हाय हाय और बेटी को देंगे तो मेमेसाहब वाला चीज देंगे… पुराना धुराना कपड़ा नहीं लेगी बेटी!’’

    बुचिया उठ कर अन्दर किसी कोने में टी.वी. देखने चली गई। सिलिंडर भइया जानते थे कि, उनको कहीं शरण नहीं मिलनी थी। खिलौनों वाला बाँस लिए वह बाहर निकल गए थे। सिलिंडर भइया अब निरगुन नहीं गाते, पिपिहिरी बजाते हैं। निरगुन गाने से कुछ नहीं मिलता था। पिपिहिरी बजाने से पिपिहिरी बिक जाती है, गुब्बारे व प्लास्टिक के खिलौने भी बिक जाते हैं। इसलिए मेहनत मजूरी के ऑफ सीजन में जब भी कहीं मेला लगता है या ‘नहान’ होता है तो सिलिंडर भइया पिपिहिरी बजाते हुए पहुँच जाते हैं। पिपिहिरी फूँक से शुरू होती हल्की बजती थी। फूँक से बजती पिपिहिरी में अचानक फूँक के अलावा छाती से उठता कोई उबाल भी शामिल हो जाता था। कोई बहुत पुराना लार, दुख, पीड़ा से भर्राया हुआ रुदन। हल्की बजती पिपिहिरी घिसघिसी, भारी और बेसुरी बजने लगती थी। बच्चे जो पिपिहिरी खरीदने आते थे बेसुरी कर्कश बजती पिपिहिरी सुन कर बढ़ते हाथ पीछे खींच लेते थे। सिलिंडर भइया तुरन्त मुँह से पिपिहिरी निकाल लेते थे। खँखार कर रुदन थूक देते थे। दुबारा होंठों में दबा कर पिपिहिरी बजाते थे। हल्की फूँक के साथ पिपिहिरी हल्की बजने लगती थी। हँसते मुस्कराते बच्चे पिपिहिरी मोल लेते थे।

    सिलिंडर भइया हमेशा सौ पचास बचा कर रखते थे और प्रत्येक महीने मेडिकल स्टोर से ‘सेनेटरी पैड’ अखबार में लपेट कर लेते आते थे… कनिया के लाख कलह कचाइन के बावजूद!

    तीन चार कश खींच लेने के पश्चात सिलिंडर भइया ने धीरे से तर्जनी को बीड़ी पर ठोंक कर राख नीचे गिरा दी थी। हवा भारी थी, राख हल्की! हवा, राख को अतीत में उड़ा ले गई…

    सतरोहन बो चाची लड़-लड़ कर सबका जी हलकान किए रहती थीं। रतनी दिदिया का ब्याह पक्का हो गया था। अट्ठाइस गुन मिले थे। लड़का था तो वैसे गाजीपुर का पर देखउकी के लिए जो फोटो आई थी वह पास वाले बाजार के रोशन स्टूडियो की थी। खिंची हुई सुन्दर, बड़ी आँखों वाले लड़के का चेहरा लमलोल था। ब्याह का लगन अगली गरमी व मानसून के संक्रमण काल में था।

    सतरोहन चाचा बड़े शान से बताते थे, ‘‘दस बीघा तो खेत है, चौखंडी बड़ा बगइचा है… और लरिका तो का बताएँ भइया बड़ा भारी पंडित है।’’

    पर… जब ब्याह पक्का होने की खबर आई ठीक तब ही अजामिल जी बाबा ने यह खुलासा किया था, कि ‘‘लरिका पंडित फंडित कुच्छु नहीं बकलोल है।’’

    अजामिल जी बाबा के साढ़ू की बहन की ससुराल उसी गाँव में थी जहाँ रतनी दिदिया का ब्याह तय हुआ था। अजामिल जी बाबा ने ही बताया था कि,  ‘‘लरिका सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय से शास्त्री कर चुका था। चुरकी रखता है। पंडितों की टोली के साथ रहता जरूर है पर उनका भोजन बनाता है, अर्थात रसोइया है।’’

    सतरोहन बो चाची दिन भर चूल्हा चौकी, घर दुआर में भिड़ी रहती थीं और बड़बड़ाती रहती थीं। गाँव के लौंडे लपाटों ने टोला की औरतों के विषय में एक सर्वमान्य निष्कर्ष पारित किया था ‘‘जिन जिन औरतों की ठुड्ढी और होंठ के आसपास का हिस्सा ललछाहुँ था, वे सब बेजोड़ ‘झगराहिन’ थीं। लेकिन सारे नाम गिनाने के पश्चात एक और सर्वसम्मत निष्कर्ष निकला था ‘‘चाहे कोई कितना हु तेज बनि ले, सतरोहन बो भौजाई तो सबकी अम्मा हैं।’’

    किसी सरकारी महकमे में स्टोरकीपर रहे मुनरिका सुकुल बहुत थोड़ी सी राशि के साथ जब गाँव आए थे तो सबसे पहला जरूरी काम जो उन्हें लगा, वह था आँगन के एक तरफ के हिस्से में कच्ची फर्श और पक्की दीवारों वाले दो कमरे संग पलानि बनवा लेना। इतना जरूरी काम निपटाने के मुट्ठी भर सालों बाद मुनरिका सुकुल अनजानी दुनिया में चले गए थे। आँगन के दूसरी तरफ के हिस्से उनसे छोटे भाइयों महेसर व रमेसर सुकुल के थे। मुनरिका सुकुल के एकमात्र पुत्र सतरोहन चाचा संस्कृत से एम.ए. पास थे और ठीकठाक नौकरी पा लेने के अपने अथक प्रयासों में थक जाने के पश्चात अब कलकत्ते में किसी मारवाड़ी सेठ के यहाँ पूजा पाठ करवाते थे। महेसर सुकुल को भी सतरोहन चाचा ने किसी मारवाड़ी सेठ से कह सुन कर कलकत्ते में ही एक ठाकुरबाड़ी में लगवा दिया था। महेसर  सुकुल साल छः महीने में कभी कभार घर आते थे।

    महेसर सुकुल को तीन बेटियों के पश्चात पिछड़े पछाड़े पुत्ररत्न की प्राप्ति हुई थी। रमेसर सुकुल लुधियाना में किसी ऊनी वस्त्र बनाने वाली कम्पनी में काम करते थे और साल के तीन चार महीने घर पर ही रहते थे। घर पर रहने वाले मौसम के दौरान रमेसर सुकुल साईत देखना, गणना मिलान, पोथी बाँचना जैसे छिटपुट पंडिताऊ कार्यों हेतु सर्वसुलभ रहते थे। रमेसर बो ईया जवानी के बीमार दिनों में ही गुजर गई थीं।

    ‘लक्ष्मी माता’ कहती हैं कि अगर सम्बन्ध बिगाड़ना है तो मुझे बीच में रख दो। आँगन के एक ओर मुनरिका सुकुल का हिस्सा था दूसरी ओर महेसर व रमेसर सुकुल का। महेसर बो ईया ने बीच आँगन में लक्ष्मी माता को रख दिया था।

    सतरोहन चाचा कभी नवरात्र तो कभी सावन में मारवाड़ी सेठ के यहाँ जब मंत्र उचारते होते थे तो रमेसर सुकुल, उनके हिस्से की भी जमीन में बोवाई कटाई करवा कर अनाज मुनाफा खुद रख लेते थे। प्रत्येक बार सतरोहन चाचा ट्रेन भर जनरल की खिड़की वाली सीट पर योजनाएँ बनाते आते थे कि इस बार तो खेत का बाँट बखरा करवा ही लेना है और खेती बटइया पर दे देनी है। किन्तु प्रत्येक बार एक दुलारे हुए शातिर आश्वासन के साथ उन्हें वापसी की ट्रेन पकड़नी पड़ती थी। रमेसर सुकुल अपने हक की अक्षुणता के प्रति इतने सचेत थे कि दूसरे के हक की कतरब्योंत कर अपने हक में जोड़ लेना भी उन्हें खूब आता था। किसी से भी नहीं डरने वाली सतरोहन बो चाची, रमेसर सुकुल से भी डरती नहीं थीं, लिहाज़  जरूर करती थीं। इस लिहाज की सबसे अहम वजह उनके अपने पुरुष का सिमसिमाह होना था।

    जवानी के दिनों में चार साल अज्ञातवास के संघर्षों से वापसी के पश्चात हर साल की तर्ज पर सतरोहन सुकुल घर आते थे। पुनः घर से जाते हुए जब सतरोहन सुकुल अपना सामान बाँधते होते थे तब ही, घर पर बनाया हुआ डब्बा भर शुद्ध घी चाची जबरन उनके झोला में ठूँस देती थी।

    सतरोहन बो चाची माथा पर लूगा सही करके पूछती थीं ‘‘बात कईलाऽऽ हाऽऽ चाचा जी से?’’

    ‘‘सबर कर।’’

    ‘‘तुम परधान से काहे नहीं बतियाते हो?’’

    सतरोहन सुकुल समझाते थे, ‘‘घर की बात घरई में रहने दो अबहीं!’’

             ‘‘घर की कौन सी बात हो? कुछ रखे हो हमारी लड़कियों के लिए? कइसे इनका ब्याह सादी करोगे?’’

    सतरोहन बो चाची सुबकती रहती थीं और सतरोहन चाचा कुछ नहीं बोलते थे। उनके ‘कुछ नहीं बोलने’ के प्रति सतरोहन बो चाची की खीस पीत चिड़चिड़ाहट बढ़ती जा रही थी… रोज ब रोज। वर्ष दर वर्ष! महेसर बो ईया मस्तानी थीं। ऐसी मस्त कि उनका नामकरण ही हो गया था ‘दरोगाइन’। ‘दरोगाइन ईया’ महेसर  सुकुल जैसा सुस्त तोंदियल बच्चा नहीं चाहती थीं। उन्हें रमेसर सुकुल जैसा तेज तर्रार खड़ी नाक वाला लड़का चाहिए था। और जैसी ईश्वर की अनुकम्पा कि उनका पुत्र ठीक रमेसर सुकल पर ही गया था। अक्सरहा दरोगाइन ईया की मस्ती और सतरोहन बो चाची की खीस पीत चिड़चिड़ाहट की आपस में ठन जाती थी।

    दारोगाइन ईया, सतरोहन बो चाची को सरापते हुए कहती थीं ‘‘तोर भतार के मुँहवा सड़ के चू जाए, तू राँड़ी हो जाए!’’

    दरोगाइन ईया अगर वीर थीं, तो सतरोहन बो चाची बावन वीर थीं, ‘‘हाँ रे हम तो राँड़ी होइए जाएँगे। एकई ठे न भतार है हमारा! तुम कबउ राँड़ी नहीं होओगी। क्या है… एक ठे भतार मूएगा तो दुसरका हो जाएगा, दुसरको मर गया तो तिसरका भतार कर लेना।’’

    एक सीधी एक तिरछी आँखों वाली ‘साढ़े चार फुटी’ रतनी दिदिया यानी कि उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा परिषद द्वारा प्रदत्त दसवीं के अंकपत्र के अनुसार ‘स्नेहलता शुक्ला’ तीन चार लड़कियों के साथ बैग लेकर जब ‘राजकुमारी देवी बालिका इंटर कॉलेज’ के लिए निकलती थीं, तो देखती थीं कि विपरीत दिशा से दो चार साइकिल सवार लड़के आ रहे होते थे। वो एक लड़की बाकी लड़कियों की तरह ही बातों में लगे हुए होने के बावजूद आँखों के किसी विशेष कोण से साइकिलों और पैदलों की निरन्तर घटती जा रही दूरी नापती थी। जब साइकिलों व पैदलों की दूरी न्यूनतम पर होती थी, लड़कियाँ सायास (हालाँकि अभिनय अनायास का ही होता था) साइकिल सवारों पर उड़ती सी नजर डाल लेती थीं। उस एक लड़की को धक्का सा तो नहीं ही लगता था (क्योंकि अब उसे इस सब की आदत सी पड़ती जा रही थी) लेकिन एक छोटी सी उम्मीद जो अब तब में जलने जलने को हुई रहती थी भक् से बुझ जाती थी। उन चार जोड़ी आँखों में से एक फूटी हुई नज़र भी लड़की के हिस्से में नहीं आती थी। किसी काज परोज, नेवता हकारी में नहीं जाने वाली लड़की को सतरोहन बो चाची जबरन ठेलठाल कर गरियाती हुई भेजती थीं। अब जाना तो था ही, सो रतनी दिदिया ठीक से जाती थीं। तब, जब बिजली नहीं होती थी, रतनी दिदिया चार इंच लम्बे चौड़े शीशे के बगल में लालटेन टाँग देती थीं। बोरोप्लस लगाने के बाद चेहरा ज्यादे तेलउँस लगने लगता था। रतनी दिदिया गमछा से एक बार चेहरा पोंछ कर हल्के हाथों से पाउडर लगा लेती थीं। वैसलीन वगैरह मिल जाए तो ठीक वरना गरी का तेल भी होंठों को चमका डालने के लिए काफी होता था। काजल आँखों में लगा लेने के पश्चात, बुझ चुकी अगरबत्ती की सींक को काजल में बोर कर रतनी दिदिया एक छोटी सी बिन्दी लगा लेती थीं। फिर नाक से पतली सींक निकाल कर छोटी सी ‘हाय रे नथुनिया’ पहन लेती थीं और लालटेन की अँजोरा शीशा के नजदीक जाकर देखती थीं। झल्ल से एक सुनहरी लकीर चमकती थी, और गायब हो जाती थी। रतनी दिदिया मुस्करा देती थीं।

    जयमाल के समय कन्यापक्ष की सीता जी सरीखी सारी सुन्दर लड़कियाँ दुल्हन (जो टैयरा टीका नथिया पहले नजरें झुका कर बैठी होती थी) के पीछे खड़ी होती थीं तथा वरपक्ष दुल्हे राजा के पीछे जमा होता था। लड़के मुस्किया कर ताकते थे। कन्यापक्ष से होने के बावजूद लड़कियों में एक अकड़ होती थी। बीच बीच में कोई लड़की सामने आकर दुल्हन का टीका सीधा कर देती थी या गिरी हुई लाल चुनरी के छोर को उठा कर कुर्सी के हत्थे पर रख देती थी। फोटोग्राफर दुल्हन को जरा चेहरा उठाने के लिए कहता था, और सारी स्थितियों, मुस्कराहटों को ओ.के. करने के पश्चात क्लिक कर देता था। सारे हँसते मुस्कराते खूबसूरत चेहरों के बीच कन्या पक्ष के सबसे आखिरी कोने में रतनी दिदिया का आधा चेहरा ही आ पाता था। आधे चेहरे की आधी आँख अपनी बगल वाली खूबसूरत लड़की को देखती होती थी जो पता नहीं जाने या अनजाने चेहरे पर झूल आई लट को बड़ी अदा से पीछे कर रही होती थी कि, तभी कैमरा क्लिक हो गया था। बाद में जब कभी शादी की विडियोज देखी जाती थी तो दूल्हा दुल्हन के अलावा भी बहुत सारे चेहरों पर कैमरा बार बार ठहरता था, लेकिन वहीं कहीं आसपास बैठ कर ब्याह के गीत गाती रतनी दिदिया के होते हुए भी कभी उनका पैर,कभी दुपट्टा, कभी पीछे की चोटी और कभी कभार आधा चेहरा क्षणांश भर को उनकी पहचान बता कर गायब हो जाता था। दुल्हन के घर वाले हँस कर मीठा उलाहना देते थे…

    ‘‘कितना कम आया है रतनी का, पता नहीं मुँहचोरनी कहाँ घुसी पड़ी थी!’’

    रतनी दिदिया के पास जो जवाब था वह किसी को दिया नहीं जा सकता था। रतनी दिदिया से अगर पूछा जाता कि ‘‘अपने बारे में बताओ जी लड़की!’’

    तो रतनी दिदिया को एक वाकया याद आता था। वाकया दुपट्टा सँभालने के टटका दिनों का था। सुबह के व्यस्त वाले समय में रतनी दिदिया मसाला पीस रही थीं, कि तभी दर्द से लबरेज किसी जीव की चीख गूँजी थी र्कियाँ ऽऽऽ र्कियाँ ऽऽऽ

    रतनी दिदिया को लगा जैसे कोई तीखी पीड़ा से बिलबिलाया हो। रतनी दिदिया ज्यों का त्यों अधपिसा मसाला छोड़ कर पूरे आँगन में देखने लगी थीं। दुनिया की हर आवाज बिना किसी सुर लिपि के भी स्वयमेव एक भाषा होती है। वही भाषा रतनी दिदिया को खींच रही थी। रतनी दिदिया छटपटा कर दुआर पर गईं… पर वहाँ पर कुछ नहीं था। वो वापस आँगन में आईं। फिर वही चीख गूँज रही थी। रतनी दिदिया ने दिशा पहचानी तो पाया कि आँगन के ठीक पीछे वाले नीम के पेड़ पर एक कौवा अपनी चोंच से एक नन्हें मेंढक को नोच रहा था। दर्द से बिलबिलाता मेंढक चीख रहा था। रतनी दिदिया जोर से चिल्लाई थीं। कौवे ने थोड़ी देर के लिए नोचना छोड़ कर इधर उधर देखा। कोई खतरा न पाकर वापस अपने शिकार को नोचने लगा। रतनी दिदिया ने पास पड़ा एक पत्थर उठा कर वहाँ निशाना लगाया। कौवा उछला और थोड़ी फड़फड़ाहट के बाद वापस वहीं आकर टिक गया। तभी एक और कौवा आ गया था। रतनी दिदिया बाहर भागीं। उन्होंने रमेसर सुकुल से कहा। रमेसर सुकुल बोले, ‘‘अब कुछ नहीं हो सकता। बस इतना होगा कि कौवे थोड़ी देर के लिए उसे छोड़ कर उड़ जाएँगे। बस! फिर तो चीटियाँ भी लग जाएँगी। किसी भी सूरत मेंढक का मरना तो तय ही है।’’ रतनी दिदिया नीम के पास गईं। चीखें बन्द हो चुकी थीं। इसलिए नहीं कि मेंढक की पीड़ा खत्म हो गई थी, इसलिए कि उसकी क्षमता खत्म हो चुकी थी। कुछ समय पश्चात जीवन समेत पीड़ा भी खत्म हो जानी थी। मेंढक छटपटा रहा था, तड़प रहा था… कराह रहा था। उसे कोई नहीं बचा पाया।

    रतनी दिदिया चाहती थीं, पर वो भी उसे नहीं बचा पाईं। ब्रह्मांड में उसका कहीं कोई ईश्वर नहीं था। उस दिन रतनी दिदिया ने साक्षात रूप में जाना था कि जीवन दरअसल यही था। रतनी दिदिया ने उस दिन स्वयं को एक मेंढक के मार्फत पहचान लिया था। वह भी अपने क्षत विक्षत नुचे हृदय के साथ जी रही थीं। बिना हल्की सी भी ‘आह’ किए। एक तरह से ये उनकी जिद थी कि वे आह नहीं करेंगी। यानी कि उन्होंने दुनिया को ठेंगा दिखा कर कह दिया था, ‘‘एहऽऽ जाओ न। तुम हमें भाव नहीं दोगे तो हमें ही तुमसे भाव पाने का कौन सा शौक चढ़ा है!’’ और इतना कह कर रतनी दिदिया ने स्वीकार्य रूप से खुद को छिपा लिया था और घठाहुर होती गई थीं। परन्तु ढीठ हो जाने के बावजूद घाव में गजबजाहट भी होती थी, और भयंकर पीड़ा भी! इस घाव की साफ सफाई बेहद जरूरी थी, अन्यथा यह घाव अन्दर ही अन्दर सड़ जाने वाला था। यह सड़ा हुआ घाव पूरी देह आत्मा में जहर फैला सकता था।

    मुक्ति बेहद जरूरी चीज थी। बाबा दादी वाले बेहद बचपने के दिनों में ही रतनी दिदिया ने बिना ‘मुक्ति’ को पहचाने ही उसका मार्ग तलाश लिया था। उन दिनों दीपावली के पहले ‘घरकुंडा’ बनता था। घरकुंडा बोले तो? बच्चे मिट्टी के छोटे छोटे घर बनाते थे और दीपावली के दिन उसमें लक्ष्मी गणेश की मूर्तियाँ रख कर पूजा करते थे। रतनी दिदिया अपनी छोटी छोटी हथेलियों से ही सबको चकित कर देने वाला सबसे खूबसूरत ‘घरकुंडा’ बनाती थी। यह सबका ‘चकित होना’, ‘मिट्टी के घर’ के अलावा मिट्टी के फूल, मिट्टी के गुलदान, मिट्टी की मूर्तियों पर भी टिकता जा रहा था। सबका चकित होना अच्छा लगता था बच्ची रतनी को, पर उससे ज्यादा अच्छा लगता था एक नई चीज का ‘गढ़ा जाना’। यह एहसास क्या था न रतनी दिदिया तब समझ पाई थीं, न अब। लेकिन यह था कि कुछ भी गढ़ लेने के पश्चात, दुनिया का दिया हुआ कोई भी घाव पहले की तरह मर्मान्तक नहीं रह जाता था।

    गाँव के बिल्कुल पास से ही एक छोटी नदी बहती थी। नदी के पास वाली मिट्टी बेहद चिकनी और मुलायम थी। रतनी दिदिया किसी भी बच्चे को एकाध रुपये थमा कर मिट्टी मँगवा लेती थीं। धूप में तपी मिट्टी पर जब पानी गिरता था तो एक सोंधी गन्ध के साथ हल्का धुआँ भी उठता था। रतनी दिदिया को लगता था कि इस गन्ध से उन पर एक उन्माद सा छा जाता है। रतनी दिदिया अपनी कराह व धैर्य को भी इस मादक गन्ध के साथ गूँथ कर लोइयाँ बना लेती थीं। पर, दुपट्टा सँभालने वाले टटका दिनों के बासी दिनों की ओर बढ़ने के पश्चात भी इस गन्ध के प्रति रतनी दिदिया का जारी रहा दीवानापन दुनिया के साथ साथ सतरोहन  बो चाची को भी खटकने लगा था। सतरोहन बो चाची सोचती थीं कि, ‘‘अगर मन ही लगाना है तो सिलाई करे, कढ़ाई बुनाई सीखे, वो भी न हो तो नाईगिरी वाला काम, क्या कहते हैं, ‘बुटिसियन’ सीख ले। ये मिट्टी की लोई से कइसी प्रीत भाई?’’ लेकिन दुनिया में यह एकमात्र ऐसा कोना था जहाँ रतनी दिदिया आत्मविस्मृत शान्त और सन्तुष्ट दिखती थीं। सतरोहन बो चाची चाह कर भी उन्हें रोक नहीं पाईं। रतनी दिदिया भूल जाती थीं कि आँखें हैं, नाक, कान होंठ हैं। उस वक्त रतनी दिदिया के पास कुछ नहीं रह जाता सिवाय मिट्टी और मिट्टी में सने हाथों के। गीली मिट्टी की लोई पर उँगलियों की रेखाएँ स्पष्ट दिखती थीं। रतनी दिदिया उँगलियों पर हल्का पानी लेकर चिकना देती थीं। रेखाएँ मिट्टी में धुँधली होकर गायब हो जाती थीं। एक जैसा आदमी, स्त्री, फूलदान, मेंढक जैसी चीजें रचते गढ़ते रतनी दिदिया उकता गई थीं। यह बेमजा लग रहा था। जैसे इकरसता सी… अधूरापन सा। रतनी दिदिया ने सोचा कि अब वो वह नहीं बनाएँगी जो दिखता है। रतनी दिदिया ने उस दिन वह बनाया था जो दिखता नहीं था… ‘खुरपा थामे एक हाथ!’ हाथ की उँगलियाँ गठीली थीं और उसकी नसें उभरी हुई सी दिखती थीं। दूसरी जो न दिखने वाली चीज रतनी दिदिया ने बनाई थी वह था ‘एक चेहरा’ जिस पर सिर्फ आँखें ही थीं। दो खूबसूरत आँखें बस।

    दुनिया हँसती थी और पूछती थी, ‘‘ईऽऽऽ का बना है? पगऽऽलीऽऽ!!’’

    मन ही मन दुनिया पर हँसती रतनी दिदिया उस दिन पक्के तौर पर आश्वस्त हो गई थीं, कि दुनिया क्रूर ही नहीं मूर्ख भी है। इस मूर्ख दुनिया को अपनी आत्मा से गढ़ी चीजें दिखाना न सिर्फ चीजों का बल्कि अपनी आत्मा का भी अपमान था। रतनी दिदिया ने रमेसर सुकुल से अनाज रखने वाली कोठरी का आधा कोना अपने लिए माँगा था… एक आक्रामक ज़िद के साथ! पहली बार उनके ‘मरखंडी गाय’ जैसे हाव भाव देख कर रमेसर सुकुल ने बिना किसी पूछताछ के साफ तौर पर वह आधा कोना दे दिया था। कोठरी का वह अँधेरा, सीलन भरा कोना बेतरह की न दिखाई पड़ने वाली चीजों से भरता गया था।

    रमेसर सुकुल एक जरसी गाय खरीदे थे। गाय के लिए एक अदद घर का होना निहायत जरूरी था। रमेसर सुकुल कार्तिक से पहले घर पूरा करवा लेना चाहते थे। रमेसर सुकुल फोन मिलाते थे तो एक मीठी जनाना आवाज उभरती थी ‘‘आपका एकाउंट कॉल करने के लिए बहुत कम है… टींऽऽ टींऽऽ टींऽऽ फोन कट।

    ‘‘परसउवें तो पइसा भरवाए हैं हम। ससुरी सब बैलेंसवा खा चबा जाती है।’’ रमेसर सुकुल उस मीठी आवाज़  पर खिसिया गए थे।

    रमेसर सुकुल खाँसते हुए आँगन में गए थे। सतरोहन बो चाची माथे पर आँचल खींच कर आटा गूँथने लगी थीं। रतनी दिदिया बर्तन माँज रही थीं।

    रमेसर सुकुल दरोगाइन ईया को सुनाते थे! ‘‘गाय का घर बनवाना है। कमकरवा के इहाँ गए तो पता चला कि बापे पूते कहीं बाहर गए हैं, फोन में बैलेंस भी खतम हो गया है।’’

    रमेसर सुकुल रतनी दिदिया से पूछे थे… ‘‘तुम्हारे फोन में बैलेंस है रतनी?’’

    रतनी दिदिया रे ‘हूँऽऽ’ करके हाथ धोया था। दुपट्टे से हाथ पोंछ कर रतनी दिदिया ने रमेसर सुकुल को फोन थमा दिया था। रमेसर सुकुल ने फोन लगाया ‘‘हलोऽऽ!’’

             ‘‘हाँ सिलिंडर… रमेसर सुकुल बोल रहे हैं!’’

             ‘‘परनाम पंडी जी!’’

             ‘‘कुसल रहो, ईऽऽ बतावऽ कहाँ हो?’’

             ‘‘अबहीं तो बाहर हैं। कौनो काम था बाबा?’’

             ‘‘हाँ भाई… गाय के लिए घर बनवाना है। कल तुम और बावन आ जाओगे?’’

             ‘‘हाँऽऽऽ…हाँऽऽऽ एकदम!’’

             ‘‘इ आपका नम्बर है?’’

             ‘‘सतरोहन का नम्बर है! ठीक है, आओ तब।’’

             ‘‘ठीक…।’’ फोन कट।

    सिलिंडर भइया ‘सतरोहन सुकुल’ के नाम से नम्बर सेव कर लिए थे।

    तीन पुत्रों व दो पुत्रियों वाले बावन कमकर को तीन कमरों का मकान विरासत में मिला था। ईंट का बिना पलस्तर वाला वह एक बेहद सकिस्त मकान था। एक इंच भी खुली जगह नहीं थी। मकान में एक मिट्टी का चूल्हा था। मकान के सामने बमुश्किल एक हाथ जमीन थी, उसके बाद नाली और नाली के बाद मकान शुरू हो जाते थे। सामने की खाली जमीन पर बकरियाँ बँधी रहती थीं। बावन कमकर मौसमी मजदूरी करते थे। कभी खेतों में, कभी मकान निर्माण में तो कभी मनरेगा तो कभी अन्य कोई मजदूरी मिल ही जाया करती थी। कभी कभी यूँ भी होता था कि कुछ नहीं मिलता था। ऐसे दिनों में बावन कमकर मनिहारी की चीजें बेचते थे। पता नहीं क्यों तो सिलिंडर भइया के दिमाग में एक चित्र बन गया था कि… मेहनत- मजूरी सब मर्द टाइप काम थे। लेकिन मनिहारी या फेरी लगाना, औरतों से मोलभाव को लेकर सारातोरी करना उन्हें मउगाही लगती थी। बावन कमकर जब तब इसी बात पर ठनक जाते थे, ‘‘हई ठेंस रही कि नाऽऽ सरऊ, तऽऽ भुक्खे मुअबऽऽ!’’

    सड़क की दाईं ओर अजामिल जी बाबा का अहाता था। जिसके चारों ओर ईंट की चहारदीवारी बनी थी। चहारदीवारी के एक कोने पर आसमानी पट्टी रंग कर काले रंग से लिखा रहता था – ‘आ गया नींबू की खुशबू के साथ नया एक्टिव व्हील! सफेदी की चमकार बार-बार!’

    चहारदीवारी के दूसरे कोने पर पीले रंग की पट्टी रंग कर काले रंग से लिखा था ‘मिला गाँव में ही रोजगार, शहरों में जाना है बेकार!’

    सड़क के बाईं ओर हाल-फिलहाल गेहूँ कटने के बाद की उदासी और खालीपन पसरा था। सुबह भी ऐसी लगती थी, कि जैसे किसी पुराने बासी दिन को वापस आसमान पर टाँग दिया गया हो। आसमान के एक कोने में धूप थी, तो ठीक बाजू में पीला पीला गँदला बादल छाने लगता था।

    कुछ दिन पहले ही प्रधान जी ने  ‘फलाना बैंक’ में बावन कमकर और उन जैसे बहुत से लोगों के एकाउंट खुलवाया था । नरेगा के ऑफिस में खंड विकास अधिकारी कुर्सी पर बैठे रहते थे। मुखिया जी ने पैसे निकलवाने की बैंक स्लिप पर साइन करवा कर सिलिंडर भइया और बावन कमकर को आठ आठ सौ रुपये थमा दिय।

    पता चला था कि बिधान सुकुल के खेत से दक्षिण की तरफ जमीन पर पोखरा खुदवाना था। सब कुछ कागज पत्तर पर हो हवा गया था।

    प्रधान जी कहते थे, ‘‘चलो तुम्ह लोगन का भी मेहनत जाँगर बच गया, इधर भी कुछ काम हुआ।’’

    अब, जब बिन जाँगर डुलाए सिलिंडर भइया को आठ सौ रुपये मिल ही गए थे तो उन्हें थोड़ी अय्याशी का खयाल आया था। यह कुछ अजूबा भी नहीं था। लेकिन अय्याशी के खयाल के साथ ही उन्हें मोबाइल का खयाल आया था। दरअसल देश की पहली मोबाइल फोन कम्पनी वाले गुरु ने कहा था कि, ‘देश के हर घर में एक फलाना मोबाइल होगा!’ और यही मोबाइल फोन की कम्पनी वाले गुरु जी हर रिक्शे, ठेले वाले को फलाना मोबाइल फोन थमाते जा रहे थे। फलाना टू फलाना मोबाइल पर लोकल काल एकदम फ्री फ्री फ्री। हाँ न के बीच डगराते मन को अय्याशी ने सीधा तर्क देकर – ‘मोबाइल फोन खाली अय्याशी नहीं, बहुत काम की भी चीज है। एतना सारे लोग उरुआ थोडे़ न हैं कि मोबाइल फोन खरीद रहे हैं!’ – गाँव की ही चट्टी पर बनी ‘मुस्कान मोबाइल शॉप’ पर पहुँचाया था।

    सिलिंडर भइया को सिर्फ फोन या मैसेज नहीं करना था, गाना सुनना था, विडियो भी देखना था। बलिहारी सिलिंडर भइया की किस्मत ; मात्र हजार रुपये में सेकेंड हैंड ‘फलाना’ मोबाइल फोन उपलब्ध था एम.पी.थ्री तथा विडियो की सुविधा के साथ। सोनू से कह कर सिलिंडर भइया चुनचुन कर गाना भरवाए थे। श्रीदेवी का नागिन वाला डांस तो सिलिंडर भइया को इतना अच्छा लगता था कि वो नागिन नगीना मणि सीरीज का सारा विडियो गाना भरवा लिए थे।

    सोनू बड़े भेद भरे गले से बताए थे, ‘‘एगो नया विडियो आया है। खूब मस्त! ऊऽऽ भी भर दें।’’

    हालाँकि सिलिंडर भइया कच्ची उम्र के तो नहीं थे, किन्तु चट् से उनके दिमाग में इसका अर्थ नहीं आया था। उन्होंने बिना बूझे ही हामी भर दी। घर वाले एकबारगी आडियो विडियो वाला रंगीन मोबाइल फोन देख कर खुश हो गए थे। बावन बो चाची पति की नजर बचा कर धीरे से सिलिंडर भइया को केहुनिया कर कहती थीं, ‘‘एहऽऽ सिलिंडरा तनि नानी के फोन लगइबे बाबूऽऽ?’’

    मोबाइल फोन खरीदने के बाद से ही सिलिंडर भइया में थोड़ी गुरु गम्भीरता आ गई थी। अब मोबाइल कोई छोटी मोटी चीज तो थी नहीं, सो लड़कपन से काम नहीं चलना था। बैठे हुए सिलिंडर भइया की पीठ और कन्धे एकदम से सीधे हो गए थे, ‘‘ढेर मत बतियाना। अबहीं टैरिफ नहीं है। ज्यादे पइसा कटेगा।’’ कह कर खट् खट् फोन मिला दिए थे।

    बावन बो चाची चिल्ला चिल्ला कर बतियाती थीं, ‘‘अम्मा नीक हऊऽऽ नऽऽ? हई हमार नम्बरवा सेभ क लीहऽऽ!’’

    सिलिंडर भइया बावन बो चाची को बरजते थे, ‘‘शीऽऽ माई धीरे बोल। धीरे बोलबे तबउ उहाँ सुना जाए।’’

    बावन बो चाची लजा जाती थीं। धीरे धीरे बोलने लगती थीं फिर क्रमशः तेज होती होती फुल पर पहुँच जाती थी, ‘‘हाँऽऽ हो अम्मा बकरीया गाभिन बाय!’’

    मार्च की सुबहें  – जो फुर्तीली और हल्की चुभन से शुरू होने वाली थी – के उलट आज सुबह अपनी प्याली में बादल इकट्ठे कर बड़ी फुर्सत व इत्मीनान से खेल रही थी। इत्मीनान से खेलती सुबह अपनी उम्र से कमसिन व मासूम लगती थी। आँगन वाला चापाकल अचानक से खूब बालू देने लगा था। बाल्टी में मैले कपड़े लिए रतनी दिदिया दुआर पर लगे सरकारी नल पर पहुँची थीं। दुआर के दाईं तरफ नल था। नल के बाद गाय की नाद थी। खूँटे से बँधी काली गाय जुगाली कर रही थी। दुआर के बाईं तरफ गाय के लिए घर बन रहा था। ईंट व मिट्टी से। मिट्टी एक ओर गूँथ कर रखी हुई थी। सिलिंडर भइया ईंट के ऊपर गीली मिट्टी रखते थे, मिट्टी पर ईंट रखते थे फिर ईंट पर गीली मिट्टी रखते थे। बावन कमकर पोखरा से मिट्टी ढोकर ला रहे थे। बारी-बारी से बाप बेटा काम अदल-बदल लेते थे। फिलहाल आज भर के लिए पर्याप्त मिट्टी हुई ही थी, कि तभी कहीं से बावन कमकर का बुलावा आ गया था। ‘‘थोड़ी देर में आते हैं’’ कह कर बावन कमकर चले गए थे।

    रतनी दिदिया सिलिंडर भइया के पीछे से आई थीं। इसलिए सिलिंडर भइया को रतनी दिदिया के आने का कुछ भी पता नहीं चला था। रतनी दिदिया दुपट्टे को लेकर असमंजस में थीं। दुपट्टा ओढ़ कर कपड़े धोने में दिक्कत होनी थी। दुपट्टा सीने से हटा कर रतनी दिदिया देखती थीं। औसत से भारी स्तन छोटी सी काया में ज्यादे भारी दिखते थे। रतनी दिदिया ने पीछे मुड़ कर देखा। सिलिंडर भइया ईंटें जोड़ने में मसरूफ थे।

    रतनी दिदिया ने तार पर दुपट्टा फैला कर टाँग दिया था और घुटनों तक सलवार चढ़ा कर कपड़े धोने लगीं। चापाकल से सुसुम पानी की धार गिर रही थी जिसके नीचे कपड़े धोना अच्छा लग रहा था। तार बहुत ज्यादे ऊँचा नहीं था। इस तरह अगर देखा जाए तो हल्के नीले फूलों की छपाई वाले पीले सूती दुपट्टे के उस तरफ सिलिंडर भइया ईंटें जोड़ रहे थे, इस तरफ रतनी दिदिया कपड़े धो रही थीं। सिलिंडर भइया कपड़े धोए जाने की आवाज तो सुन रहे थे पर ‘कौन’ पे न उनकी आँख गई थी न दिमाग, उन्होंने ने पैंट की पिछली जेब से हजार टकिया मोबाइल निकाला और प्लेलिस्ट से एक गाना प्ले कर दिया थे। थोड़ी देर तक इंस्ट्रूमेंटल धुन बजती रही थी…

    ट्रिंग ट्रिंग… टेंऽऽ टेंऽऽ
    ओढ़नी के रंग पीऽऽयर,
    ओढ़नीऽऽ के रंग पीऽऽयर,
    ओढ़नी के रंग पीयर,
    जादू चला रहल बा
    लागे कि जइसे खेतवा में…
    सरसो फुला रहल बाऽ!!

    रतनी दिदिया ने पलट कर अपनी ओढ़नी देखीं थीं। हल्की हवा से दुपट्टा धीमे धीमे हिल रहा था। रतनी दिदिया उम्र के उस पड़ाव पर पहुँच चुकी थीं जहाँ नए सिरे से नई  कोंपलों के खिलने का सोचना भी बचकाना लगने लगता था। उनके तईं यह सब एक महीन किस्म का छिछोरापन ही था। रतनी दिदिया वैसे भी अपनी गम्भीरता के प्रति अतिरिक्त रूप से सजग रहती थीं। उन्हें ऐसा लगा था जैसे कि इस गाने का बजते रहना उनके कड़े अभ्यास से साधी हुई ‘शुष्क परत’ में सेंधमारी का प्रयास था। जैसे कि गाना अपनी पूरी भव्यता के साथ उनकी गम्भीरता को मुँह चिढ़ा रहा हो। रतनी दिदिया ने तार से अपना दुपट्टा उतार कर सीने पर फैला लिया और थमथम कर चलती सिलिंडर भइया से तीन कदम दूर पहुँची थीं। सिलिंडर भइया ईंट से ईंटें जोड़ रहे थे। एक हथेली ने दो बार उनके कन्धों को थपथपाया। सिलिंडर भइया चौंक कर मुड़े थे ‘‘काम करने आए हो न इहाँ??’’

    रतनी दिदिया अपना चेहरा खुद नहीं देख सकती थीं, पर उन्हें ऐसा लगा कि यह कहते हुए उनकी दाईं भौंह की उठान नुकीली हो गई थी। सिलिंडर भइया एक नजर रतनी दिदिया को देख कर गाय को देखने लगे थे। गाय पूँछ से मक्खियाँ झाड़ रही थी। गाय की पीठ पर ठीक बीचोंबीच एक मक्खी बैठी थी। मक्खी ऐसी जगह पर थी, जहाँ न गाय की पूँछ पहुँच पा रही थी न उसका मुँह। रतनी दिदिया की भौंह की उठान कुछ ढीली पड़ गई थी।

             ‘‘या तो गाना ही सुन लो, या काम ही करो!’’

    सिलिंडर भइया ने मोबाइल निकाल कर गाना बन्द कर दिया था।

    रंगीन सेट में सब कुछ रंगीन था। स्क्रीन भी रंगीन, डिस्प्ले, थीम्स, श्रीदेवी का डांस सब कुछ रंगीन।

    पूरे घर में सुत्ता पड़ गया था। सिलिंडर भइया कान में इयरफोन लगा कर गाना सुन रहे थे। गानों की लिस्ट के बाद ‘पर्सनल’ नाम का आखिरी विडियो लिस्ट में दिखता था। सिलिंडर भइया प्ले दबाया और अजीब सी आवाजों के साथ विडियो शुरू हो गया था। सिलिंडर भइया डर कर चारों ओर देखते थे। उन्हें ये देख कर राहत हुई थी कि सारे लोग सोए हुए हैं और इयरफोन की वजह से ये सारी आवाजें सिर्फ वह ही सुन पा रहे हैं। पैताने एक पतली चादर थी, सिलिंडर भइया चादर ओढ़ कर विडियो देखने लगे थे। उसके बाद लगातार कई दिनों तक ऐसी विडियोज देखते रहे थे। सिलिंडर भइया अलग-अलग किस्मों की इतनी विडियोज डाउनलोड करवा कर देख लिए थे कि एकबारगी ही उनका मन अघा गया था। ‘शाश्वत चीजों’ के विषय में सोचने की जो न्यूनतम योग्यता थी, सिलिंडर भइया उसका 0.000001 प्रतिशत भी पूरा नहीं करते थे। सिलिंडर भइया अगर सोचते, तो यही सोच सकते थे, कि क्या कोई ऐसी चीज है दुनिया में जिससे कबउ मन ही न भरे? सिलिंडर भइया अगर अपने बारे में सोचें तो यही पाएँगे कि कोई भी चीज एकदम शुरुआत में जितनी चुहुलगर लगती थी, कुछ दिनों के संग साथ के पश्चात एकदम बासी और उबाऊ लगने लगती थी। उबाऊ और मित्रविहीन दुपहरिया में उनकी पहली संगी बनी थी ‘टन टन, टन टन टेलीफोन हल्लो हाँ जी बोलो कौन?’

    सिलिंडर भइया अकसर ‘फलाना कम्पनी’ के लोकल नम्बर्स को इधर उधर करके, मिला कर फ्री लोकल कॉल्स का लाभ उठाना चाहते थे।

    पता नहीं कब कौन सा संयोग जुट गया था कि तमाम तरह की महीन भारी कर्कश मर्दाना आवाजों के पश्चात एक शोख जनाना आवाज सुनाई पड़ी थी। ठीक से सुनने के लिए सिलिंडर भइया ने वाल्यूम बढ़ा दिया।

    ‘‘कौन बोल रहे हैं आप? राँग नम्बर! अब फोन मत कीजिएगा समझ गए? हम पुलिस में ये नम्बर दे देंगे…।’’ आदि इत्यादि जैसे बेसिक झाकाझुमर के पश्चात आखिरकार लड़की लाइन पर आ गई थी जिसने अपना नाम सानिया बताया था। गोरखपुर के किसी गाँव में रहने वाली सानिया के पति बी.एस.एफ. में थे और जम्मू में पोस्टेड थे। घर पर बस बूढ़ी सास थी। सिलिंडर भइया सोचते थे कि, ‘‘ससुरी सब नाम भी अपना टी.वी. सनीमा जइसा खूब बढ़िया बताती है… सानिया!’’

    सिलिंडर भइया भी खूब सोच विचार कर टी.वी. सिनेमा जैसा अपना भी एक नाम धर लिए थे ‘समीर… हवा का झोका!’ समीर कहते हुए सिलिंडर भइया यथासम्भव अपनी आवाज को भारी व गम्भीर बनाए रखे थे पर ‘हवा का झोंका’ पर आते आते उनकी आवाज शोख हो जाती थी। जवाब में देर तक फोन पर खिलखिलाहट गूँजती रही थी। सानिया ऐसी कुशल खिलाड़ी थी जिसके जिम्मे सिर्फ खेल खेलना ही नहीं, खेल सिखाना और जारी रखना भी होता था। तमाम खेल खेलने के दौरान जब झूठमूट की दुनिया में सचमुच की सानिया की साँसें धौंकनी की तरह तेज-तेज भागती थीं तो सिलिंडर भइया को लगता था कि वे उत्तेजना से उत्तेजित नहीं हो रहे हैं, बल्कि उत्तेजनाओं को पहचान रहे हैं। साँसों की बारीक भाषा पढ़ना सीख रहे हैं। क्रमशः वो जनाना आवाजों की इतनी किस्में सुन चुके थे कि उन्हें यही लगता था कि वह फोन पर आती स्त्री की इतनी सटीक पहचान कर सकते थे कि उसकी उम्र, उसकी देह, उसका चरित्र सब कुछ गिना जाएँगे। एकदम शुद्ध शुद्ध गणना। आवाजें क्या थीं? आवाजों की भी कोई शक्ल होती थी क्या? तीखी कोमल गोल तिकोनी, खुरदरी सपाट, तमामतर अलग अलग शक्लों से भरी एक दुनिया आवाजों की भी। सिलिंडर भइया चाह कर भी अपनी आवाज की शक्ल आज तक नहीं देख पाए थे। शायद इसीलिए उनकी खुद की पहचान भी खुद से बाकी थी। अपनी आवाज को पहचान लेने की छटपटाहट के साथ सिलिंडर भइया जब निरगुन की तान छेड़ते थे तो उन्हें एक धुँधली सी शक्ल नजर आती थी। सिलिंडर भइया उस शक्ल का पीछा करते परत दर परत गहराई तक उतरते गए थे। और आखीर में जब उन्हें लगता था कि बस अब वो और उनकी आवाज आमने सामने होने ही वाले हैं कि ठीक तभी शब्द चूक जाते थे। सिलिंडर भइया पहली परत पर लौट आते थे। सिलिंडर भइया को एक साथ दो चीजों का शिद्दत से एहसास होता था ‘गहरी सन्तुष्टि और गहरी प्यास का भी।’ पता नहीं यह कैसी प्यास थी जिसे तृप्त करने की कोशिश भर से सन्तुष्टि मिलती थी और पता नहीं यह कैसी सन्तुष्टि थी जो प्यास को लगातार गहरा करती जाती थी। तो हर आवाज के हिस्से में अलग शक्ल आई थी। फोन पर सानिया की गदराई आवाज उसके भरुका जैसे गालों वाली सुन्दर स्त्री होने का आभास देती थी। सिलिंडर भइया के मन में अचानक ही एक बात आई थी कि पता नहीं रतनी दिदिया की आवाज फोन पर कैसी लगती होगी? एक स्थायी थकावट की लकीर जो रतनी दिदिया की आवाज में नजर आती थी क्या वह फोन पर और गाढ़ी हो जाती होगी? या सिरे से गायब हो जाती होगी?

    सिलिंडर भइया मोबाइल में काँटेक्ट लिस्ट खोले थे। ‘सतरोहन  सुकुल’ के नाम से एक नम्बर स्क्रीन पर उभरता था। सिलिंडर भइया ने कुछ नहीं सोचा और फोन मिला दिए थे। घंटी जाने लगी थी। लेटे हुए सिलिंडर भइया एकबारगी ही उठ कर बैठ गए थे। घंटी बीच में रुक गई थी। आदत के विपरीत सिलिंडर भइया ने स्वयं को ‘हलो’ कहने से रोक लिया था। क्षण भर घिचपिच, चिचिर मिचिर की आवाज के पश्चात कोई ‘हलो’ कहता था। सिलिंडर भइया ‘हलो’ को पहचान गए थे। सेकेंड बढ़ता जा रहा था दो…चार…आठ। कोई फिर ‘हलो’ कहता था। सिलिंडर भइया को पहली बार कोई स्त्री आवाज सुन कर उत्तेजना हुई थी। रीढ़ से शुरू होती उत्तेजना। फोन पर एक थकी हुई और उतनी ही मासूम आवाज की शक्ल नजर आई थी। सिलिंडर भइया के होंठ चिपके थे। उन्हें अपने ही गले में तार जैसी लम्बी पतली आवाज महसूस हुई…। सिलिंडर भइया आवाज घोंट गए थे। फोन पर एक लम्बी खिंची साँस थी, फिर ‘हलो’ था। इस बार एक ऊबा हुआ विरक्त ‘हलो’ था। सिलिंडर भइया ने फोन काट दिया था।

    वैसे सच पूछा जाए तो सिलिंडर भइया, कभी रतनी दिदिया के बारे में ठीक से सोचते भी नहीं थे। हाँ ये था कि कभी कभी जब रतनी दिदिया सामने पड़ जाती थीं तो एक मोह सा उपजता था ‘बिचारी!’ हालाँकि सिलिंडर भइया उस समय मन में आने वाले शब्द ‘बिचारी’ पर भी यह तर्क कर सकते थे कि! ‘बिचारी’ कउन माने में रे? माँ बाप जिन्दा, घर परिवार कुशल… फिर बिचारी क्या? शायद ‘बिचारी’ उसका नेपथ्य में रहना, ‘बिचारी’ उसकी चुप्पी! तो बस जरा मरा ‘मोहा जाने’ भर नजर के अलावा सिलिंडर भइया ज्यादे आगे पीछे नहीं सोचते थे… चलिए मान लीजिए कम सोचते थे, पर सोचते तो थे ही!

    सिलिंडर भइया के कमरे की खिड़की चौड़ी कम थी। औसत लम्बी खिड़की में लम्बवत लोहे की तीन छड़े लगी थीं। खाट पर बैठे बैठे ही सिलिंडर भइया खिड़की के ताखा पर उँगलियों से टटोले कुछ। धातु जैसी एक चीज का उँगलियों से स्पर्श हुआ। सिलिंडर भइया ने धीरे से उसे उँगलियों से खींचा। शेव करके ऐसे ही कुछ दिनों बाद इस्तेमाल होने के लिए रखी हुई एक पुरानी पत्ती (ब्लेड) थी वह। पत्ती में एक तरफ से भूरा जंग लगा था। सिलिंडर भइया ने नाखून के भीतर पत्ती चलाया। नाखून सख्त थे। गाँठ की तरह। पत्ती ठीक ठाक काम कर रही थी। नाखून के छोटे-छोटे टुकड़े गिर रहे थे। टुकड़ों में जमी हुई काली मैल साफ दिखती थी। दुनिया में बेशुमार किस्मों की स्त्रियाँ थीं… लम्बी नाटी, साँवली गोरी, दुबली मोटी… लेकिन इन तमामतर स्त्रियों में ‘स्त्रीत्व’ दुर्लभ जैसी स्त्रियों में दिखता था। अधिसंख्य चेहरों के बीच वह भी दो आँखों, होंठों की दो फाँक, और एक नाक वाला इनसान का चेहरा ही तो था न? लेकिन क्या था जो खींचता था अपनी तरफ। सिलिंडर भइया की ओर से बार बार कुछ लपक कर बढ़ता था रतनी दिदिया की ओर। जैसे ही वह चीज रतनी दिदिया तक पहुँचने ही वाली होती थी कि रतनी दिदिया किनारे हट जाया करती थीं। वह शय, रतनी दिदिया को बिन छुए हवा में घुल कर गायब हो जाती थी। सिलिंडर भइया को लिफाफे में बन्द एक पुरानी शाम याद आई थी। सिलिंडर भइया लिफाफा खोले थे। बबूल के फूलों जैसी वह एक जर्द, खामोश और मामूली शाम थी। परिन्दे बहुत दूर आसमान में उड़ रहे थे। उनके पंखों की फड़फड़ाहट यहाँ नहीं सुनाई पड़ती थी। बिधान बो ईया चापाकल चला रही थीं। पानी भल्ल-भल्ल बाल्टी में भरता जा रहा था। कहीं से वापिस आ रहे सिलिंडर भइया रमेसर सुकुल के दुआर से गुजर रहे थे। वहाँ एक चीज अटकी थी। सिलिंडर भइया ठहर गए थे। एक गाय रमसेर सुकुल के दुआर पर चुपचाप खड़ी थी। दुआर पर और कोई नहीं था। गाय के आगे पुआल का एक छोटा सा गट्ठर था। रतनी दिदिया गाय की देह सहला रही थीं। गाय की देह में हड्डी थी और हड्डी पर बस चमड़ी थी। मांस कहीं नहीं था। चमड़ी से ढँकी हड्डियाँ नुकीली दिख रही थीं। रतनी दिदिया बहुत ममता से उसकी एक एक पसली टोह रही थीं। गाय के थन मरे हुए से सुन्न लटके थे। उसकी योनि का भाग एक मोटी पाइप जैसा लग रहा था घुप्प! काला! छितराया हुआ सा… वीभत्स। वहाँ सूखा हुआ गोबर चिपका था। रतनी दिदिया धीरे धीरे उँगलियों से गोबर हटा रही थीं। रतनी दिदिया ने गाय की गर्दन सहलाई… गाय ने सिर उठा लिया था। रतनी दिदिया सहला रही थीं। गाय लगातार सिर उठाती जा रही थी।

    दुख एक ऐसा आईना था जिसमें सिर्फ अपना चेहरा दिखता था। पर, अगर पहचानने की कोशिश करें तो दिखता था कि आईने में बहुत सी महीन दरारें पड़ी थीं। उन दरारों में देखने से अपना स्वयं का चेहरा भी कई टुकड़ों में बँटा हुआ सा दिखता था। लेकिन और नजदीक जाने पर एकदम साफ साफ दिखने लगता था। दरअसल सिर्फ वह हमारा चेहरा नहीं था। उस चेहरे के असंख्य टुकड़ों में एक टुकड़ा भर हमारा था। बाकी टुकड़े तो दुनिया के अनगिन चीन्हे-अचीन्हे चेहरों के थे। सिलिंडर भइया को लगा था कि आईने की इस हकीकत को पहचान लेने वाला चेहरा रतनी दिदिया के चेहरे जैसा ही होता है निरगुन जैसा! सच, रहस्यमयी, बेतरह पिघला हुआ सा। उस क्षण सिलिंडर भइया ने अपने आप से कहा था, ‘‘वो रतनी दिदिया को समूचे तौर पर पहचानते हैं… एकदम ठीक, हूबहू वही… जो वो हैं!’’ रतनी दिदिया की नजर उन पर पड़ी थी। हैरानकुन ढंग से बेतरह पिघला हुआ चेहरा ‘मरखंडी गाय’ के से भाव में तब्दील हो जाता था। रतनी दिदिया अन्दर चली गई थीं।

    अब जल्द ही ससुरइतिन हो जाने वाली रतनी दिदिया अपनी क्षमता से भी ज्यादा चुप रहने लगी थीं। रात की बारी थी। दाहिनी दीवार पर साठ वाट का बल्ब चमक रहा था। टी.वी. देखते हुए काम निपटा लेने की सुविधा के लिए रतनी दिदिया और सतरोहन बो चाची ने मिल कर गैस चूल्हा कमरे में ही रख लिया था। सतरोहन बो चाची का वश चलता तो कमरे में ही एक चापाकल भी लगवा लेतीं और टी.वी. देखते-देखते  बर्तन माँज धोकर फिट कर लेतीं। सतरोहन बो चाची और रतनी दिदिया ‘गोपी बहू’ वाला सीरियल बहुत मन से देखती थीं। चाची, गोपी बहू की मामी को चुड़इल कहती थीं। सीरियल में गोपी बहू खूब ढेर सारा गहना कपड़ा पहन कर खाना बनाती होती थी कि तभी, टी.वी. के बाहर रैक पर रखा मोबाइल फोन टनटनाने लगता था। सतरोहन बो चाची, अनसाते हुए फोन में रिसीव का बटन दबाती थीं। कुछ क्षण बाद ही चेहरे पर उल्लास आ जाता था।चाची, फोन पर बतियाते हुए ही छोटकी से टी.वी. का वाल्यूम कम करने को कहती थीं। फोन पर पहले रतनी दिदिया की सास थीं। फिर भावी नीलेश दूल्हा मोबाइल पर कहते थे ‘‘पड़नाम मम्मी जी!’’ सतरोहन बो चाची खुश होकर कहती थीं! ‘‘खुस रहो बबुआ! ठीक हो न?’’

    चाची झुक कर रतनी दिदिया के हाथ से बेलन ले लेती थीं और फोन थमाने लगती थीं। रतनी दिदिया कहती थीं, ‘‘ना!’’

    चाची फोन नीचे करके धीरे से चिरौरी करती थी, ‘‘ले बतिया ले!’’

    रतनी दिदिया ने भी धीमे पर दृढ़ स्वर में कहा ‘‘कहे न नहीं बतियाएँगे!’’

    असमंजस में घिरी सतरोहन बो चाची ने फोन कान के पास लगा कर कहा, ‘‘एह बबुआ रतनी तो बाहर गई है! बाद में फोन करना!’’ नीलेश दूल्हा अच्छा मम्मी जी कह कर फोन काट देते थे। सतरोहन बो चाची देर तक दुनिया भर का बड़बड़ाती रहती थीं।

    काम धाम खत्म करने के पश्चात रतनी दिदिया के पास कोई काम नहीं बचता था। पर, चूँकि बिजली रानी की पारी रात की थी, सो अधिक सोचने-विचारने की जरूरत नहीं पड़ती थी। विज्ञापन भी इतने बडे़ होते थे कि रतनी दिदिया को लगता था कि, ‘‘ई भी दस मिनट का कोई कार्यक्रम था!’’

    टी.वी. में अगड़म-बगड़म कुछ भी देखती थक गई आँखें खुद ब खुद नामालूम ढंग से मुँद जाती थीं। सतरोहन बो चाची दुनिया की सबसे सुखी प्राणी थीं, इसलिए बिछावन पर लेटते ही उनको नींद आ जाती थी। सतरोहन बो चाची की नींद कभी भी बीच में नहीं टूटती थी। उनकी देह में सवा तीन बजे का एक स्थायी अलार्म सेट हो गया था। सवा तीन बजे से ही कमरे में धीमी आवाज में खटर पटर शुरू हो जाती थी। एक ही कमरा जो चौड़ा कम लम्बा ज्यादा था। कमरे की छत इतनी नीची थी कि चौकी पर रतनी दिदिया भी खड़ी नहीं होती थीं। चौकी पर खड़े होते ही पंखे से सिर टकरा जाने का भय था। कमरे के बाएँ कोने पर टीन का एक बहुत बड़ा ट्रंक था जिसमें दुनिया भर की चीजें रखी हुई थीं। ट्रंक के ऊपर कथरी, गद्दे, रजाइयाँ तह लगाकर रखी थीं। ट्रंक के दाहिनी तरफ एक पटरे पर तीन अटैचियाँ एक के ऊपर एक थीं।

    ट्रंक और अटैचियों से ज़रा आगे आने पर चार फुट चौड़ी दो चौकियाँ थीं। चौकी के बाद बस दो बित्ता जमीन बची थी। उसके बाद दीवार थी। दीवार में तीन रैकें थीं। सबसे ऊपरी रैक में विष्णु जी, लक्ष्मी जी, और भोले बाबा की फोटो थी। पूजा की एक डोलची थी जिसमें पूजन सामग्री के अलावा वृहस्पतिवार व्रत कथा, जिउतिया व्रत कथा, वैभवलक्ष्मी व्रत कथा के साथ तमाम तरह की कथाओं की किताबें थीं। बीच वाले रैक में छोटी सी रंगीन टी.वी., टी.वी. के ऊपर डी.टी.एच. की मशीन और बगल में एक छोटे से स्टैंड पर नोकिया बारह सौ रखा हुआ था। सबसे निचले रैक में कंघी, शीशा, सिन्दूर, आँवला तेल, लाल दन्त मंजन व लाल स्टोन वाले एक जोड़ी टॉप्स थे। कमरे में एक कोने से दूसरे कोने तक नॉयलान की रस्सी बँधी हुई थी। रतनी दिदिया अपने सलवार कुर्ते, सतरोहन बो चाची की साड़ियाँ, पेटीकोट ब्लाउज तथा छोटकी के फ्रॉक सब तहिया कर उसी पर टाँग देती थीं। कमरे में कहीं भी खिड़की नहीं थी। बाईं दीवार पर एक छोटा सा रोशनदान मात्र था। सूरज जैसे ही सर के ऊपर से गुजरने लगता था, कमरे में अँधेरा सा छा जाया करता था। जल्द ही अँधेरे  हो जाने वाले कमरे में चिड़ियों की चहचहाहट के बहुत पहले से ही खटर-पटर शुरू हो जाती थी। दरोगाइन ईया इस शाश्वत खटर=पटर को अब तक नजरअन्दाज करती आई थीं। लेकिन एक दिन उनका जी नहीं माना था। अपने कमरे से निकल कर दरोगाइन ईया चोर कदमों से चलती सतरोहन बो चाची के कमरे तक पहुँचीं। बहुत हल्के हाथों से उन्होंने दरवाजा खोला था। कमरे में बल्ब जल रहा था। रतनी दिदिया आँखों पर कुहनी रखे व छोटकी मुँह बाए सो रही थी। सतरोहन बो चाची सूती कपड़ा लिए साफ सफाई में भिड़ी थीं। कपड़े को बाल्टी के पानी में भिगोतीं, निचोड़तीं और उखड़ते रंग रोगन की पपड़ियों वाली दीवार को बहुत हल्के हाथों से आहिस्ता आहिस्ता पोंछ रही थीं। चौकी के चारों पाए पोछे जा रहे थे, रोशनदान की कड़ियाँ पोछी जा रही थीं। घड़ी, बल्ब, ट्रंक, अटैचियाँ पोछी जा रही थीं। दारोगाइन ईया के मन में हैरत और जलन एक साथ आई। हैरत इसीलिए कि ‘सफाई का अइसा जुनून!!’ और जलन भी इसीलिए कि ‘सफाई का अइसा जुनून!’ उन्हें अपना कमरा याद आया जहाँ बेतरह सामान, बक्से, अबाड़ कबाड़, टीन और एक चौकी ठुँसी हुई थी। कमरे से बराबर सीलन की बू आती थी। यद्यपि उनका कमरा सतरोहन बो चाची के हिस्से में आए कमरे से बीस ही था, किन्तु सब कुछ इस कदर अस्त व्यस्त था कि चौकी पर कपड़े लत्ते के ढेर को एक कोने में ठेल कर दरोगाइन ईया पुत्र समेत सोती थीं। देखा जाए तो दरोगाइन ईया के मन में आई जलन रचनात्मक प्रकार की नहीं थी कि वह भी झाड़न लेकर दीवार, मेज, कुर्सी, पोंछने बैठ जाएँ। यह जलन इस प्रकार की थी, कि दरोगाइन ईया भोर फूटने के कुछ पहले ही लोटा लेकर खेत की तरफ निकल जाएँ एवं जो भी चचिया सास, पतोह, दयादिन मिल जाएँ उन्हीं से कपार ठोंक ठोंक कर इस बात की चर्चा शुरू कर दें। औरतें भी कान लगा कर सुनती रहती थीं। कुल चर्चा परिचर्चा का लब्बोलुआब यह होता था कि लड़ाई और सफाई के अलावा तीसरा कोई काम सतरोहन बो चाची ज़िन्दगी  में सीख ही नहीं पाई थीं। नित्यक्रिया कर्म के पश्चात भी जो थोड़ी बहुत गर्द मैल औरतों के पेट में बची रह गई थी, वह इस प्रकार की परिचर्चाओं के पश्चात बिल्कुल साफ हो जाया करती थी। लेकिन एक शख्स ऐसा था जिसके पेट की गड़बड़ दरअसल अभी तो शुरू हुई थी। उस शख्स की सबसे बड़ी दिक्कत यह थी कि इस पेट की गड़बड़ को वह कहाँ जाकर साफ करे! अपने टोला की समस्त औरतें तो इस परिचर्चा को सुन ही चुकी थीं। तमाम गुणा भाग करने के पश्चात उन्हें सफाई अभियान के लिए ‘महुआ पर टोला’ ठीक लगा।

    अजामिल बो ईया की दिक्कत सिर्फ उनके पाचनतंत्र का कमजोर होना ही नहीं था। असल दिक्कत तो चीभ का चटोरी होना था। अजामिल बो ईया आँगनबाड़ी सेविका थीं। अजामिल बो ईया जैसे ही कहीं जाने के लिए मुड़ती थीं, तो बिधान बो ईया बोलती थीं ‘‘बरम्हा जी उनका दुन्ने कान सब कुछ सुन लेने के लिए तथा मुँह सुना हुआ सब कुछ उगल देने के लिए ही बनाए हैं।’’ तो अजामिल बाबा भी कुछ करते ही थे। सूद पर पैसा चलाते थे, गाय का सानी पानी करते थे तथा हर बियान के पश्चात बाछा बेचते थे। लेकिन इस बार अजामिल जी बाबा बहुत खुश थे। लगातार तीन बियान से भइया जी के पश्चात इस दफे बहिन जी आई थीं। बहिन जी की आँखों में राम जी ने काजल लगा कर भेजा था। अजामिल जी बाबा इतने खुश थे कि सब दर-दयाद के घर फेनूस के लिए दूध भिजवाए थे तथा ईया से ‘मेहरारू हई कि बनरे क पूँछ’ की बजाय ‘सुन तारु हो’ कहने लगे थे। कहने वाले तो यहाँ तक कहते थे कि ‘राम मिलइलन जोड़ी एक ठे अन्धा त एक ठे कोढ़ी’ वाली कहावत इन पति पत्नी पर एकदम सटीक बैठती है। जिस कुशलता से ब्रह्मा जी ने अजामिल बो ईया के कान, पेट, मुँह रचे थे उसी हुनर से उन्होंने अजामिल बाबा के भी उपरोक्त अंग रचे थे। अजामिल बो ईया मरदों के बीच खूब उठती बैठती थीं तो अजामिल बाबा को भी मेहरारुओं के बीच बैठना बोलना बतियाना बड़ा रसगर लगता था। अजामिल बो ईया रस लेने के लिए नहीं जवार भर की ब्रेकिंग न्यूज जानने के लिए मरदों के बीच बैठती थीं। अजामिल बाबा और अजामिल बो ईया में एक और सर्वज्ञात गुण था लगाई बुझाई का।

    भाई-भाई, बहिन-बहिन, ननद-भौजाई, सास-बहू, देवरानी-जेठानी जैसे रिश्तों में लहका लगाना तो अठारहवीं शताब्दी के आसान किस्से हैं जिनके लिए कई नई तकनीकें व औजार तो कमोबेश हर चौनल पर आ ही गए थे। अजामिल बाबा और अजामिल बो ईया का हुनर तो ये था कि ये दोनों ससुर व जेठ से दो हाथ का घूँघट करने वाली बहुओं का ससुर व जेठ से भीषण, गाली गलौज तक के स्तर का मार झगड़ा करवा देते थे। अजामिल बो ईया जहाँ ‘नदिया के पार’ वाली साधना सिंह सरीखी लम्बी व सुन्दर थीं, वहीं अजामिल बाबा ठीक उलट नाटे, थुलथुल व गंजे लाफिंग बुद्धा जैसे दिखते थे। अजामिल बाबा वैसे तो उम्र में काफी कम थे, स्पष्ट कहें तो बाबा कहलाने की उम्र नहीं थी उनकी लेकिन गाँव के पुराने धुराने पद व रिश्तों को जोड़ने घटाने के पश्चात उनके हिस्से में बाबा सम्बोधन ही आया था। यूँ तो टोला में बहुतों के पास मोटरसाइकिल थी, लेकिन अजामिल बाबा की मोटरसाइकिल विशेषतः समाज सेवा के काम आती थी। किसी की पतोह बीमार हो जाती थी, या किसी बिटिया को हाट बाजार करना हो या वे औरतें जिनके पति बाहर कमाने निकल गए हों व बच्चे छोटे हों तो उनका सौदा सुलफ लाने या गैस भरवाने जैसी बेसिक नीड्स के लिए अजामिल जी बाबा हाजिर! वर्षों बाद पता नहीं कैसे मुख्यमंत्री बहिन जी की दृष्टि प्रदेश के इस सर्वाधिक पिछड़े क्षेत्र पर पड़ गई थी और विकास की शुरुआत के तहत पहला काम हुआ यह कि गाँव से मुख्य बाजार तक की सड़क पक्की बना दी गई थी। बावजूद इसके अजामिल बाबा की बुलेट जब तब हिचकोले व झटके लेती चलती थी। लाख सचेत रहने के बावजूद पीछे बैठी बहुरिया या लड़की की देह झटके से जब तब अजामिल बाबा की देह से छुआ जाती थी। अजामिल बाबा इसी में खुश। दरअसल देखा जाए तो टोला की बहुओं, औरतों व अजामिल बाबा के बीच एक साईं गोटी थी। अजामिल बाबा के एक डेढ़ लीटर पेट्रोल की कीमत क्या थी? बस दो चार हँसी? दो चार बात? या कभी कोई पतोह घूँघट काढ़ कर दरवाजे की ओट से सब्जी का झोला व बचे हुए पैसे थामने के लिए हाथ बढ़ाती थी तो पैसा थमाते हुए अजामिल बाबा का, अपनी कनिष्ठा को नई नोचर हथेली पर धीरे से रगड़ दिया जाना… यही इतना ही भर सुख नऽऽ ? अकसर बहुएँ लजाने वाली व भीतु होती थीं इसलिए चुपचाप पैसा लेकर लिजलिजे स्पर्श को दिमाग से झटकती अन्दर चली जाती थीं। जरा तेज हुईं तो झनक कर दरवाजा बंद देती थीं। इससे ज्यादे बात कभी नहीं बढ़ी थी। तो औरतों का तो कुछ नहीं जाता था। जाता तो वैसे अजामिल बाबा का भी कुछ नहीं था।  पर पेट्रोल की बढ़ती हुई कीमतों के बीच मार्जिनल लाभ मिलने पर भी अजामिल बाबा मगन थे। इसी मगनपने में अजामिल बाबा यही मजा सतरोहन बो चाची से लेने की भूल कर बैठे। सतरोहन  बो चाची ने झोला नीचे पटक दिया था और हाथ नचा कर बोली थीं ‘‘ढेर गरमाईल बाड़ऽऽ कि ना, तऽऽ ध के तूर देब अँगुरिया!’’

    अजामिल बाबा के गले में कोई चप्पल नहीं लटकी थी, लेकिन उनका मुँह काला हो गया था। तबसे अजामिल बाबा, सतरोहन बो चाची का कोई भी काम करते हुए अनसाते थे। ऐसी कर्कशा स्त्री का काम कोई कर भी कैसे सकता था जो अगर भूले भटके कभी धन्यवाद भी कह बैठे तो लगता था कि लाठी मार रही है।

    अजामिल सुकुल के गुजर चुके भाई का एक पुत्र था, दीपक। वह नौवीं में पढ़ता था। गाँव में जब कहीं से न्यौता आता था तो सबके घर ‘मरद नामे सबहर’ आता था लेकिन अजामिल बाबा के यहाँ न्यौता ‘दीपक’ के नाम से आता था। वजह? वजह बड़ी अहम! दरअसल अजामिल बाबा को एक रोग था, रोग भी ऐसा वैसा साधारण किस्म का नहीं था। यह रोग इतना असाधारण था कि इसका नाम लेने पर भी दोष पड़ता था। उन्हें लाहौल वला कुव्वत ‘बरमदोष’ पड़ा था… शुद्ध शब्दावली में ‘सफेद दाग’। हालाँकि रोग तो बड़ा भारी था लेकिन फिर भी पूरी तरह से अजामिल बाबा को जाति बहिष्कृत नहीं किया गया था। इतना था, कि काज परोज में उनके बजाय उनके भतीजे दीपक महाशय बुलाए जाते थे। वैसे तो इस सामाजिक उपेक्षा से अजामिल बाबा तथा अजामिल बो ईया चिढ़ते तो बहुत थे किन्तु ज्यादा चूँ चपड़ करने, व पूरा पाने की उम्मीद में थोड़ा भी खो देने का भय था। बात ऐसी थी कि पूरी दुनिया से एक साथ बदला नहीं लिया जा सकता। टारगेट्स को छोटे-छोटे टुकड़ों में बाँट कर जल्द व पूरी तरह तोड़ा जा सकता है। टारगेट्स को तोड़ने के क्रम में अजामिल जी सुकुल की सबसे बड़ी कमजोरी ही उनका पहला हथियार बन गई थी। जिससे रार ठन गई हो यदि उसके यहाँ कोई विवाह पक्का हुआ हो तो अजामिल जी सुकुल दुश्मन के सम्भाव्य सम्बन्धी के यहाँ पहुँच जाते थे। चाय नाश्ता के पश्चात गोपनीयता की शपथ कार्यक्रम होता था। इन तमाम तामझाम के पश्चात अजामिल बाबा हथेली से रूमाल हटा कर अपना बरमदोष दिखाते थे। अजामिल बाबा सम्भाव्य सम्बन्धी से बताते थे कि! ‘‘फलाने गाँव में जहाँ आपके सुपुत्र/सुपुत्री का विवाह पक्का हुआ है वह हमारे ही खास दयाद हैं। अब आप तो जनबे करते हैं कि खानदान में एक बार बरमदोष लग गया तो फिर किसी को भी हो सकता है।

    ‘‘ई सब धोखाधड़ी करके ब्याह सादी करना हमको ठीक नहीं लगता है। आप सही आदमी लगे तो सोचे कि चलो आगाह कर देते हैं।… बाकी आप तो खुद ही समझदार हैं। जो आपको भला लगे!’’

    तत्पश्चात अपने दयाद के सुपुत्र/सुपुत्री के दो चार दुर्गुणों का गुणगान कर, बुलेट उड़ाते वापस आ जाते थे। ब्याह तो टूट ही जाता था व ऐसे दुश्मन बड़ी आसानी से पहाड़ के नीचे आ बैठते थे। कुछ ऊँट वैसे भी थे जिनके खानदान की कुछ कमजोरियों या उनके परिवार में चलने बनने वाले गुप्त सम्बन्धों पर हमला करते ही बिचारे पहाड़ के नीचे आ बैठते थे। पर एक ऊँटनी ऐसी तेज थी कि किसी भी तरह उसकी नकेल हाथ आती ही न थी। अजामिल बो ईया ने दुश्मन के दुश्मन को दोस्त बना लिया था।

    सतरोहन बो चाची एक हाथ में पानी से भरा लोटा लिए टार्च की रोशनी में रास्ता देखती हुई जा रही थीं। गर्मी के दिन बड़े उरेब थे। साँप, बिच्छू इत्यादि पचासों तरह के भय समेत। रास्ते में हनुमान जी का मन्दिर पड़ता था। सतरोहन बो चाची ने टार्च और लोटा नीचे रख दिया। फिर हाथ जोड़ कर प्रणाम किया। हनुमान जी ने मन ही मन उनको आशीर्वाद दे दिया होगा। मन्दिर के बाद बबूल की झाड़ियों का झुरमुट था फिर परती थी और उसके बाद फिर वन शुरू हो जाता था। सतरोहन बो चाची जैसे ही मन्दिर से आगे बढ़ी थीं उनकी भेंट अजामिल बो ईया तथा दरोगाइन ईया से हो गई थी। ईया लोगों के हाथ में भी लोटा और टार्च थी। ईया लोग आगे थीं, लेकिन अपनी चाल धीमी करके सतरोहन बो चाची के संग हो चली थीं। अजामिल बो ईया बिना टार्च जलाए आसमान की ओर देख कर बोली थीं ‘‘एक्को जोन्ही नहीं चमक रही है।’’ दरोगाइन ईया कहती थीं ‘‘बदरियाउस भईल बा!’’

    बबूल के झुटपुटे पास आ गए थे।

    सतरोहन बो चाची ने टार्च जला कर एक चिक्कन जगह देखी और वहाँ लोटा रख दिया। फिर दूसरी साफ जगह देख कर साड़ी समेटे चुक्का मुक्का बैठ गई थीं। अजामिल बो ईया तथा दरोगाइन ईया भी जगह देख कर बैठ गई थीं। अजामिल बो ईया ने खूब गहरी साँस भरकर कहा था ‘‘बताओ… सूमंत बो को तीसरी बार भी बेटी ही हो गई! …च्च..च!!’’

    दरोगाइन ईया ने हामी मिलाई ‘‘हाँ जी, एगो भी बेटा हो जाता तो कोई पानी पिलाने वाला तो हो जाता नऽऽ? हम तो ए जी डेढ़ किलो धान नाखून से छुड़ा छुड़ा कर शिव जी पर अच्छत चढ़ाए थे, तब जाके तो बबुआ पेट में आया था!’’

    अजामिल बो ईया बोलीं! ‘‘ई सब जानती हो पुरुब जनम के पुन परताप से मिलता है। देख लऽऽ फलनवा के भी बस दू गो बेटी ही हैं। चिलनवा को भी राम जी तीन गो बेटी ही दे दिए…’’

    सतरोहन बो चाची काँख में टार्च दबा ली थीं, और लोटा खींच कर पानी छूते हुए कही थीं, ‘‘हुँहऽऽ बेटवा रोज दू डंडा उठावना दे तबऊ नीक, और लइकी हाथ गोड़ मीसे, सेवा करे तबऊ खराब? ई कइसे जी ईया?’’

    अजामिल बो ईया बहुत स्नेह से समझाईं! ‘‘एहऽऽ दुल्हिन, साँवा कोदो कोनो अन्न हऽऽ? बेटी दामाद कोनो धन हऽऽ?’’

    दरोगाइन ईया साथ ही जोड़ी दी थीं ‘‘तिस पर भी डेढ़ अँक्खी धियरी!’’

    लोटा खाली हो गया था। सतरोहन बो चाची ने काँख से टार्च निकाला व कमर में खोंसकर और उठ गई थीं, ‘‘एगो दुगो कमी कौन आदमी में नहीं होता है? के इहाँ इन्दर के परी बाऽऽ जी? हमार बेटी आँख भाँजती है तो का हुआ, किसी दूसर का आँख माँग कर थोड़ी न देखने जाती है! जइसा भी है अपनी ही आँख से देखती है नऽऽ!’’

    दरोगाइन ईया और अजामिल बो ईया को ठाँय से जवाब देकर सतरोहन बो चाची झनकती हुई चली गई थीं। अजामिल बो ईया अक्सरहाँ सोचती थीं कि इस ऊँटनी को भी कभी न कभी तो पहाड़ के नीचे आना ही पड़ेगा।

    सतरोहन बो चाची लाल पीली चुनरी प्रिंट की साड़ी, सीधी पल्ला पहन कर जब माथे पर अँगूठा बराबर टिकुली लगाती थीं तो एकदम ‘जय संतोषी माँ’ की सत्यवती (कानन कौशल) सरीखी दिखती थीं। सूती की यह साड़ी किसी मारवाड़िन ने छू छाकर सतरोहन सुकुल को दान में दी थी।

    बड़ाई करने पर सतरोहन बो चाची खुश होकर बताती थीं, ‘‘पीऽऽऽयोर सूत्ती हऽऽऽ एजी!’’

    सतरोहन बो चाची बताती थीं ,कि जब उनका ब्याह हुआ था तो उनका मुख चनरमा (चन्द्रमा) की तरह था लेकिन अइसन पाड़ा आदमी के फेर में पड़ कर उनका रूप और भाग्य दुन्नो फुँका गए थे।

    सूर्य महाराज, माथा से थोड़ा नीचे बढ़ रहे थे। छत पर एक साड़ी को दुहरा तिहरा कर फैलाया गया था। उस पर पसारे हुए गेहूँ के एक छोटे से कोने में मुअनी छाँह घुस गई थी। सतरोहन बो चाची रतनी दिदिया को गेहूँ बटोर कर नीचे लाने के लिए बोल चुकी थीं। पक्की सीढ़ियाँ नहीं बनी थीं। रतनी दिदिया बाँस की सीढ़ी के ऊपरी सिरे को छत से टिका दिया और पहले से दूसरे पायदान पर पैर रखती चली गई थीं। मच्च मच्च की कराहती सी आवाज हुई थी। आँगन से छत पर जाने भर से दुनिया ज्यादा बड़ी और गझिन लगने लगी थी। छत पर जाने से ठीक सामने अजामिल बाबा का बिना पलस्तर वाला मकान था। अजामिल बाबा के मकान के दोनों तरफ पतली गलियाँ थीं।

    दाहिनी तरफ जो गली थी वह गाँव में बहुत अन्दर तक चली गई थी, गली के बाद गांधी बाबा का मकान था और इसी तरह क्रम से कई मकान थे। मकान के बाईं तरफ की गली सकिस्त और छोटी थी। गली की लम्बाई का अन्त द्वारिका सुकुल के दुआर पर होता था। गली के बाजू में ब्रिजमोहन सुकुल का अहाता था। जिसकी ईंट की पतली चहारदीवारी के घेरे से सटे हुए दो तीन शीशम के पेड़ थे। द्वारिका सुकुल का मर्दाना बइठका खूब बड़ा था। खूब बड़े मर्दाना बइठका वाले मकान के पीछे खेत और बागीचे थे। द्वारिका सुकुल के मकान के पीछे से सफेदा के खूब लम्बे लम्बे चिकने पेड़ों की शाख दिखती थी जिनकी फुनगी पर नुकीली पतली पत्तियाँ थीं। हवा बहती थी तो पत्तियाँ उलट पुलट कर लहराती थीं। उन पत्तियों के उड़ने का सुख बस यहीं तक था कि डाल से चिपकी फरफराती रहें बस्सऽऽ…। दूर वन की ओर इमली के पेड़ पर कोयल कूक रही थी। एक बच्चा लगातार उसकी नकल काढ़ रहा था। कोयल चिढ़ गई थी। खूब तेज तेज कूकने लगी थी। बच्चा भी उसके साथ तेज तेज कूकने लगा। खिसिया कर कोयल चुप्प हो गई थी। बच्चा फिर उसे कूऽऽऽ कूऽऽऽ कूऽऽऽ करके उकसा रहा था। लेकिन कोयल चुप्प तो चुप्प। ऊब कर बच्चा भी चुप हो गया। कुछ क्षणों बाद ही कोयल टोहने के लिए धीरे से कूकी थी। बच्चा शायद किसी दूसरे खेल में व्यस्त गया था। कोयल फिर कूकी थी… कहीं कोई नकलची नहीं था। कोयल खुश हो गई। अपनी स्वाभाविक लय में कूकने लगी थी। थोड़ी दूर पर बिधान बाबा के मकान की पिछली दीवार नजर आती थी। सुआपंखी रंग का चूना तकरीबन झर ही गया था। दीवार पर गोइंठा पाथा हुआ था। बिधान बो ईया टोह टोह कर सूखे हुए उपले उखाड़ लेतीं और टोकरी में रखती जाती थीं। दीवार पर उकाचे हुए उपले का निशान रह जाता था। बिधान बो ईया का मुँह नहीं दिखता था, साड़ी और देह की तराश पहचान में आती थी। उपले वाली दीवार की छत पर एक सिरे से दूसरे सिरे तक एल्युमिनियम का पतला तार बँधा रहता था। तार पर गाढ़ा बैगनी पेटीकोट और साड़ी फैली हुई थी। हवा के झोंके से पेटीकोट लहरा रहा था। वहीं बैगनी साड़ी सरक कर नीचे पड़ी थी। बस उसका एक छोर तार पर अटका हुआ था जो कभी भी सरक सकता था। बिधान बो ईया की छत से सटी हुई छत पर श्रीधर सुकुल की नातिन मुँह के पास फोन रख कर (और उसे दाईं हथेली से आड़ करके) लगातार बतिया रही थी।

    बिधान बो ईया अक्सरहाँ मुँह बिचका कर कहती थीं! ‘‘फोनवे पऽऽ भतार कइले बाड़ी सनऽऽ!’’

    फोन पर बतियाती लड़की ने धूप से बचने के लिए सिर पर दुपट्टा रखा था। अचानक रतनी दिदिया को लगा कि धूप बहुत तेज है और उनके सिर पर दुपट्टा भी नहीं है। रतनी दिदिया एक तरफ से दुपट्टा खींचती थीं, एक छोर उठाती थीं, लेकिन सिर पर न रख कर कन्धे से झुला कर नीचे ले आई थीं। रतनी दिदिया साँस लेती थीं तो लगता था कि छाती में या फेफड़ों के बीच कोई ठोस चीज अटक गई है। यह अटकी चीज ऐसी थी कि अगर रतनी दिदिया पानी पीतीं, तो पानी कंठ से नीचे नहीं उतर पाता। कितनी सारी छतें थीं, अलग अलग दृश्यों समेत। रतनी दिदिया नहीं जानती थीं कि उनकी छत कैसी दिखती है?एक बार, दूसरे छत की ऊँचाई से अपनी छत को देखना चाहती थीं। रतनी दिदिया ने नीचे आँगन में झाँका। आँगन के उत्तर तरफ कोई कमरा नहीं था। एक ऊँची सपाट दीवार थी। दीवार के ठीक उस पार एक खूब घना नीम का पेड़ था। पेड़ की छाया से आँगन का एक/पाँचवाँ हिस्सा ठंडा रहता था।

    दीवार के बिल्कुल पास ही ,नीम की छाँह में बिछी खाट पर हथकट्टी फ्रॉक पहने छोटकी सोई हुई थी। निरभेद। उसका सिर बाईं ओर लटका था। होंठ के बाएँ कोने से लार थी। लार की एक बूँद चाशनी की तरह गाल और खाट के उरीचन के बीच अघर में लटकी थी। सतरोहन बो चाची वहीं खटिया के बगल में बोरा बिछा कर बैठी पुराने सीयन उघरे कपड़ों को सुई से टाँक रही थीं। सतरोहन बो चाची ने छोटकी को देखा, अपने उसी पीऽऽयोर सूती की साड़ी के आँचल से उसकी लार और माथे पर इकट्ठा हुई पसीने की दो-चार बूँदों को पोंछ दिया था। सतरोहन बो चाची की हथेलियाँ बीच-बीच से फटी हुई व खुरदरी थीं, जिनकी मामूली दरारों में लगातार बर्तन माँजने, गोबर पाथने, लीपने पोतने से एक स्थायी कालापन बस गया था। अपनी उन्हीं खुरदरी हथेलियों से सतरोहन बो चाची छोटकी के बाल सहला रही थीं। गाय बहुत धीरे धीरे अपनी बछिया को चाट रही थी, बछिया और निरभेद सो जाती थी। उँगलियाँ छोटकी के बालों में पता नहीं क्या टोहती जोहती हेरा गई थीं। उनकी गति क्रमशः कम होती थम गई। सतरोहन बो चाची शायद थक गई थीं, या कहीं खो गई थीं। यह एक नई माँ होती थी, जो कभी-कभार ही नजर आती थीं। कभी-कभार नज़र आने वाली इस माँ को दिदिया हमेशा जी भर कर देखती थीं। अचानक पता नहीं क्यों,चाची ने छत की ओर देखा ।  ठीक रतनी दिदिया को ही। रतनी दिदिया गड़बड़ा गई और जल्दी-जल्दी गेहूँ एक जगह बटोरने लगी थीं। कि, तभी, सामने से दरवाजा खुलने की आवाज आई। गुब्बारे जैसे पेट पर बनियान खिसकाए अजामिल जी सुकुल अपने दरवाजे से निकले थे और बाईं गली में मुड़ गए थे। द्वारिका सुकुल के दुआर की ओर उचक कर देखने लगे थे। फिर इधर-उधर देख कर इत्मीनान कर लेने के पश्चात कान पर जनेऊ चढ़ा कर शीशम की छाँह में निवृत्त होने लगे थे। रतनी दिदिया सोच रही थीं कि अजामिल बाबा भी एक थेथर हैं। द्वारिका सुकुल से उनका कई बार इसी बात को लेकर झगड़ा हो चुका था।

    द्वारिका सुकुल गरियाते हुए कहते थे, ‘‘बाँसुरीवाले, तू हईजा हमरा दुआर के आगे कहे हगेले मूतेले? तुम्हारा हग मूत लाँघ कर आदमी आएगा जाएगा?’’

    अजामिल सुकुल बड़े ताव से पूछते थे ‘‘माखनचोर सरऊ देखे हउअऽऽ हमका करतऽऽ?’’

    यह सच भी था। यद्यपि प्रत्यक्षतः किसी ने भी अजामिल बाबा को निवृत्त होते नहीं देखा था, लेकिन अन्दर ही अन्दर सब जानते थे कि अजामिल जी सुकुल के अलावा टोला में और कोई भी यह नहीं कर सकता था। द्वारिका सुकुल देखे भी थे, बस उनको गली से मुड़ते हुए ही देखे थे। ऐसा नहीं था कि अजामिल जी का घर नहीं था, लेकिन बहुत पुराना घर होने के कारण शौचालय नहीं था। निवृत्त होने के लिए वन में ही जाना होता था। दुपहरिया में वन में जाने की जहमत से बचने के लिए, अजामिल जी आसपास का ही कोई कोना ढूँढ़ लेते थे। खूब हो हल्ला होने लगा था। द्वारिका सुकुल गली से बाहर आकर अजामिल जी को गरियाने लगे थे।

    रतनी दिदिया गेहूँ बटोर कर नीचे उतर गई थीं। छत की अपेक्षा झगड़े की आवाज आँगन तक बहुत कम आ रही थी। रतनी दिदिया चापाकल के नीचे हाथ मुँह धोकर लोटा में पानी व गुड़ लेकर नीम की छाँह में बैठ गई थीं। सतरोहन बो चाची ने फिलवक्त के लिए सीयन उधरे कपड़ों की मरम्मत का काम स्थगित कर दिया था। चाची आँखा लेकर गेहूँ आँखने लगी थीं। रतनी दिदिया ने गुड़ का एक टुकड़ा सतरोहन बो चाची की ओर सरकाया था।

    चाची ने  गुड़ देखा और अपने आप से पूछा , ‘‘तू खुस है नऽऽ रतन?’’

    रतनी दिदिया ने लोटा से एक घूँट पानी मुँह में भर लिया था। उन्होंने झट से ‘हाँ’ में सिर हिलाया फिर मुँह का पानी गले से नीचे उतरा।

    गुड़ थोड़ा-थोड़ा चिपचिपा रहा था उँगलियों पर! गुड़ मुँह में रखकर चाची ने उँगलियाँ चाट लीं ।

             ‘‘मोटा मोटी तो सब ठीकई है। खेतिहर भी हैं सब, बाग बगईचा भी ढेर है। ईहे एगो है कि लरिकवा पंडित है। तो तेरे बाप भी तो ईहे करवाते हैं। खाए पीये की कौन कमी है बोल?’’ रतनी दिदिया झूठमूट का नहीं, सचमुच का मुस्कराई थीं, खूब फैला कर! सचमुच की अम्मा के लिए।

    सतरोहन बो चाची पानी पीकर गेहूँ आँखने लगी थीं। आँखा में गेहूँ के बीच एक खूब बड़ा कंकड़ था। सतरोहन बो चाची कंकड़ आँखती नहीं थीं, हाथ से उठा कर फेंक देती थीं।

    ‘‘सब तो तू जानती ही है। नौकरिहा लरिका के लिए कोई दू लाख से नीचे मानता ही नहीं है।’’

    रतनी दिदिया तश्तरी में लोटा, लोटा में गिलास रख कर खटिया के नीचे सरका दीं। छोटकी नींद में भकुआई उठ के बैठी थी , फिर रतनी दिदिया को और बाल खुजला कर वापस सो गई।

    ‘‘जब तू छोट रहले हा न, तऽऽ हमसे हमेसा एगही गीतिया सुनावे के जिद करत रहले हा!’’

    रतनी दिदिया ने कोई जिद नहीं की। चाची ने आँखा बगल में रख दिया था। रतनी दिदिया को ऐसा लगा था जैसे पुराने किसी दिन में माँ ने एक छोटी हड्डही बच्ची को अँकवार में भर लिया है और बच्ची की गर्दन पर ठुड्डी टिका कर गुनगुनाने लगी है। चाची ने गेहूँ के ढेर पर हाथ फिराते हुए  गला साफ करके तान छेड़ दी ,

    ओरी तर… ओरी रे तऽऽऽऽर
    बइठे बरऽऽऽरेनेतिया (बाराती)।
    काढ़ नऽऽ सतरोहन  हो बाबा
    अपनीऽऽऽ हो पूऽऽतरीया (आँख की पुतली)।
    का हम काढ़ी सजन लोग
    अपनीऽऽ हो पूऽऽतरीयाऽऽ।
    हमरो रतनी हो बेटी
    आँखी के रे पूऽऽतरीयाऽऽ।
    दिनवाँ हरेलु हो बेटी
    भुखियाऽऽ रे पियसियाऽऽऽ।
    रतियाँ हरेलु हो बेटी
    बाबा के रे गियनवा (ज्ञान)।

    आवाज कहीं फँसती थी, कभी खूब महीन हो गई थी। रतनी दिदिया माँ के सामने नंगी ही पैदा हुई थीं, लेकिन जबसे पूरे कपड़े  पहनने लगी थीं, अम्मा के सामने भी नंगा होते या कपड़ा बदलते उनको लाज लगती थी। साँझ होने वाली थी। रतन बर्तन माँजने उठ गई थीं।

    छिटपुट सितारों के साथ जैसे ही चन्दा मामा काले मलमल के दुपट्टे पर आ गिरने को होते थे उससे जरा पहले ही दुआर पर, बाल्टी में पानी लेकर सतरोहन सुकुल हथेली से छींट देते थे। उड़ती हुई धूल खामोश होकर सोंधी महक में तब्दील हो जाती थी। सतरोहन सुकुल महीने भर से घर पर थे। आँगन से अगर बाहर की तरफ कदम बढ़ाया जाए तो एकपलिया दरवाजे के बाद ओसारा था। ओसारा यानी तीन ओर से ईंट की दीवार जोड़ कर ऊपर करकट (टीन की शेड) थी। दुआर पर ईंट की दीवार से सटा कर दो चौकियाँ खड़ी होती थीं। रमेसर और सतरोहन सुकुल मिल कर उन्हें बिछा देते थे। सतरोहन बो चाची दो लालटेनों के शीशे सूती कपड़े से साफ करके रखती थीं। एक लालटेन चुहानी पर रहती थी। रमेसर सुकुल दालान में एकपलिया दरवाजे के पास किसी खूँटी में धीरे धीरे काँपती लौ वाली दूसरी लालटेन टाँग कर साँझ को पुचकार देते थे। भूरी मटमैली शाम दुलार पाकर इतराती उतर जाती थी। एकपलिया दरवाजे के ठीक सामने ही दालान का दुआर की ओर खुलता मुँह था। लालटेन की रोशनी दुआर के बाहर एक सीध में बड़ी दूर तक लेटी हुई नजर आती थी। दालान की दीवार में कहीं कहीं छोटी मोटी खोखली जगह या छिद्र थे। पीली रोशनी उन छिद्रों से भी यहाँ वहाँ सरक कर बाहर आ जाती थी। लेकिन ऐसी सरकी हुई रोशनी के धागे निहायत ही दुबले और नन्हें थे। रात की पारी बिजली होने पर, बिजली आ जाने के पश्चात टेस पीली चमकती लालटेन की लौ बहुत धीमी कर दी जाती थी। बस इतना भर कि लालटेन का जिन्दा रहना मालूम चलता रहे।

    भीषण गर्मी की रातों में चौकी और खाटें बिछ जाती थीं। फिर लाठियों को चौकी या खाट के पायों में फँसा कर मच्छरदानी लगाने का इन्तजाम किया जाता था। कमरे के अन्दर पंखे से लू जैसी गर्म हवा आती थी। इसलिए रतनी दिदिया और सतरोहन बो चाची आँगन में सोती थीं।

    आधे कि.मी. की दूरी पर गाँव में शिवाला था। वहाँ ढोल मजीरा के साथ गवनई हो रही थी। रतनी दिदिया ओढ़नी गोल मोल करके कान ढँक ली थीं। लेकिन कोई फर्क नहीं पड़ा था। ढोल मँजीरे की आवाज बदस्तूर कानों तक पहुँच रही थी। सतरोहन बो चाची, छोटकी, दरोगाइन ईया उनके बच्चे सभी इस शोर के बीच सो गए थे। खाट, मच्छरदानी नीम की पत्तियाँ सुस्ता रही थीं। रतनी दिदिया ने चुहानी की तरफ देखा। गैस चूल्हा सो रहा था। कड़ाही, भगोना, थाली कटोरियाँ सब औंधे मुँह पुचकार कर सुलाए गए थे। गैस चूल्हा से थोड़ी दूर पर मिट्टी का चूल्हा था। चूल्हे पर गाय के लिए पखेव पकता था।

    रतनी दिदिया ने बाईं करवट ली।

    आँगन और ओसारा के बीच का एकपलिया दरवाजा बन्द था। बिजली नहीं थी। ओसारा में जलती लालटेन टँगी थी। दीवार में बीच बीच की दो चार ईंटें निकाल कर मोखा बनाया हुआ था। कभी बहुत पुराने दिन भी होते थे दुनिया में। उन्हीं किन्हीं पुराने दिनों में सतरोहन बो चाची किसी टूटी कटोरी में आलता ढार कर अपने पैर रँगती थीं। रँगने के बाद भी थोड़ा सा आलता बचा रह जाता था।चाची बचे आलता वाली कटोरी मोखा में रख देती थीं। चाची फिर उसे भूल जाती थीं। नए दिनों के आते आते आलता सूख कर चिपक जाता था कटोरी में। स्कूल जाने के दिनों में रतनी दिदिया अपने किसी टूट गए बैकपिन या ढीले हो चुके रबर को भी वहीं मोखा में खोंस देती थीं और जल्दी जल्दी बाल सँवार कर स्कूल भाग जाती थीं। उन सारी हड़बड़ाहट, स्कूल की महक, व एकाध टूटे बालों समेत धूल खाते बैकपिन, रबर, सूखी नेलपॉलिश की शीशियाँ अब भी वहीं मोखे में पड़ी थीं। फिर भी मोखे में जरा जरा सी खाली जगहें बच गई थीं। उन्हीं खाली जगहों से पीली उजास आँगन में भी पसरी थी।

    हर एक चीज, एक महक, एक समय, एक याद को गूँथे रखती थी। यादों पर उदासी फफूँद की तरह जमी चली जाती थी। जैसे पिता जब घर पर रहते थे, तो लगता था कि पिता हैं। पिता जब चले जाते तो याद उनकी जगह घेर लेती थी। उनके जाने के बाद उनकी शेविंग रेजर व झाग वाली टिकिया में याद रह जाती थी। उनके छूटे हुए लोटे में, चप्पल में याद यहीं छूट जाती थी। पिता पुराना जनेऊ निकाल कर कहीं किसी खूँटी में लपेट कर टाँग देते थे और नया जनेऊ पहन लेते थे। पुराना जनेऊ उनकी देह की गन्ध, मैल, याद में लिपटा टँगा रहता था कई दिनों तक खूँटी पर। जनेऊ के टँगे होने पर जैसे पिता की अनुपस्थिति, उनका न होना टँगा रहता था। रतनी दिदिया को अच्छा लगता था… जैसे एक पुराना, धूसर दृश्य टँगा था खूँटी पर। बाद में कभी ऐसा भी होता था कि सतरोहन  बो चाची कुछ बाँधने या जोड़ने के लिए वह पुराना जनेऊ इस्तेमाल कर लेती थीं। ऐसा होने पर वह खूँटी एकबारगी ही सूनी व रिक्त हो जाती थी।

    रतनी दिदिया सोचती थीं हम चीजें नहीं यादें पहनते थे। हाथों में चूड़ियाँ नहीं यादें खनकती थीं, बालों में रबर नहीं याद बँधी थी, सीने पर दुपट्टा नहीं याद फैली थी। लेकिन ये सब दिखती थीं, झट से सामने! पर, उन यादों का क्या जो मोखों में रखी रहती थीं। बहुत पुराने दिनों की यादें। उन यादों की याद कभी कभी ही आ पाती थी। जिनकी गन्ध पर सन्नाटा, धूल, नमी व फफूँद जम गई थी।

    रतनी दिदिया को एक बेतुका सा खयाल आता था। अगर वो मर जाएँ तो रोज ब रोज नजर आने, इस्तेमाल होने वाली यादों के अलावा क्या किसी को कभी किन्हीं बेहद पुराने दिनों की छुपी हुई यादों की याद आएगी? क्या कोई सोचेगा, कि उसके पास इन रोज की यादों के अलावा रतनी दिदिया की छुपी हुई बासी यादें भी हैं? जो अभी नजर नहीं आतीं, पर थीं कभी इसी दुनिया में…!

    चित्त लेटी रतनी दिदिया ने ऊपर देखा था। आधा टुक्की चाँद मच्छरदानी के पार ठीक सिर पर आ गया था। गवनई ढोल मँजीरे ठहर गए थे। कुत्ते भौंक-भौंक कर रात को जगा रहे थे, और रात थी कि अँधुआ-अँधुआ कर गिर रही थी। प्यास लगी थी। रतनी दिदिया चापाकल के मुँह पर लोटा अड़ा कर नल पेर रही थी। पानी भाग गया था। कुछ देर नल सिर्फ आवाज करता रहा था। माइक से हल्लो हल्लो की मर्दाना आवाज आ रही थी। फिर उँगलियों से माइक के मुँह पर हल्के हल्के ठोंके जाने की आवाज हुई थी। नल से पानी निकल आया था। दुबारा कोई हल्लो हल्लो कहता था। हल्लो कहने में साँस कम थी आवाज जियादा। कोई ज्यादा साँस के साथ माइक में गाने लगा था

    साड़ी चोलीऽऽऽ पेन्हनी गहनवा…
    आ देखली दरपनवा नऽ एऽऽऽ राम
    तबऊ न सूरत सुन्दर लागे
    तबऊ न सूरत सुन्दर लागेऽऽऽ
    एगही सेन्उरवा बिनऽऽ ए राम!

    रतनी दिदिया का रोंआ रोंआ कान हो गया था पर आवाज पूरी पहचान में नहीं आती थी। वो जो कोई भी था गले से नहीं नाभि से बल लगा कर गा रहा था। उदासी की सूखी पपड़ियाँ चिपकी थीं आत्मा से। यह आवाज थी जो नाखून से खुरच देती थी पपड़ी। खुरची हुई जगह से मवाद बहने लगा था। टूटे हुए तारों से बहती उदासी नाक पर आई थी, फिर बालिश में हेरा गई थी।

    सुबह उबासियाँ लेती हुई उठी थी। चादर की सिकुड़न में, तकिया के गिलाफ पर बालों में चिपड़े तेल का जो धब्बा बना था उसके स्याहपन में, पसीने से चिपचिपाए बालों के अधखुलते जूड़े में, मच्छरदानी से बाहर चिपके मच्छरों की भिनभिनाहट में, चापाकल के नीचे सूखे पड़े पत्थर की पटिया में, अलसा कर करवट बदलने पर पसीने की नन्ही नन्ही बूँदों से भरी छातियों के एक करवट से दूसरे करवट लुढ़क जाने में… अभी रात का बासीपन बचा था। पुरुवा देह को बिन छुए निकल जाती थी। गुजर चुकी रात के बासीपन को सतरोहन बो चाची ने आँगन के एक कोने से बुहारना शुरू कर दिया था। बुहारने की आवाज और गर्द की वजह से रतनी दिदिया ने आँखें खोली थीं। आँखों में नींद नहीं आलस था। बेशुमार आलस। रतनी दिदिया ने उठ कर ढीले जूड़े को कस लिया था। पास वाली चौकी के एक किनारे छोटकी मुँह बाए अब तक सोई हुई थी। आँगन में धूल का छोटा मोटा गुबार सा उठा हुआ था। रतनी दिदिया पैर सिकोड़ कर घुटनों को ठुड्ढी के पास लाई थीं। पैरों को छाती से चिपका कर दोनों हाथों से उन्हें बाँध लिया था। एक जोरदार जम्हाई आई और उसके साथ ही पेट से हूल जैसी उठी थी। मुँह में फेनिल खट्टा खट्टा सा आ गया था कुछ। रतनी दिदिया बिना प्रयास ही उस खट्टे लार को घोंट गई थीं। लेकिन जीभ में खट्टापन बरकरार था। रतनी दिदिया अपने दोनों हाथ पीछे समीज के अन्दर ले गई थीं और टटोल कर ब्रेसियर का हुक फँसा ली थीं।

    रमेसर सुकुल एक पलिया दरवाजे के पास आकर खाँस रहे थे। सतरोहन बो चाची ने सिर पर आँचल खींच लिया। रतनी दिदिया ने बालिश पर पड़ी ओढ़नी उठा कर छाती पर फैला लिया था। दरोगाइन ईया पीतल की छोटी छोटी थालियाँ, कटोरी व लोटकी चापाकल के पास माँज रही थीं। रमेसर सुकुल खाँसते हुए आँगन में आ गए थे। रतनी दिदिया ने पैरों में चप्पल डाल कर खाट में अटकाई लाठियाँ व मच्छरदानी खोल ली थी।

    पूर्व में नारंगी पंखुड़ियाँ खुलने लगी थीं। सतरोहन सुकुल भी दतुवन कूँचते आँगन में आए थे। सतरोहन सुकुल चहुआ दाँतों से दतुअन कूँचने के पश्चात उसकी कूँची को सामने के दाँतों पर रगड़ते थे। दरोगाइन ईया माँजे हुए बर्तन धोने लगी थीं। सतरोहन सुकुल दतुअन मुँह में दबाए एड़ी तक लटकी लुंगी को घुटनों तक मोड़ कर उसका फेंटा कस लिए थे।

    दरोगाइन ईया पनोहा के परिदृश्य से निकल गई थीं। रमेसर सुकुल अपने कमरे से कुछ कागज पत्तर लेकर दुआर पर चले गए थे। दुआर पर रामचन्दर बाबा एक लड़के का राशि नाम लेकर बैठे थे। रमेसर सुकुल जाँच रहे थे कि लड़के का रामचन्दर बाबा की पोती से कितना गुन मिलता है। सतरोहन सुकुल दतुअन को बीच से चीर लिए थे। जीभ साफ कर रहे थे। सतरोहन सुकुल की खोपड़ी का अगला भाग एकदम साफ सपाट था। कान व पीछे की तरफ काले सफेद थोड़े से बाल थे। हालाँकि कोई मतलब नहीं था, फिर भी पता नहीं रतनी दिदिया पूछती थीं या बताती थीं, ‘‘पिता जी चाय लेऽऽब नऽऽ?’’

    सतरोहन सुकुल आखिरी बार नल पेर कर अँजुरी के पानी से आँखों पर छपका मारते थे।

    गमछी से मुँह पोंछ कर पूछे थे, ‘‘बन गईल?’’

    रतनी दिदिया ने गैस की आँच तेज कर दी, ‘‘कल रात शिवाला पर गवनई हो रहा था?’’

    पिता गमछी से मुँह पोंछ कर बेना डुलाने लगे थे, ‘‘हुम्मऽऽ!!’’

    रतनी दिदिया ने नीम की एक सूखी पत्ती उठाई। पत्ती को नीली आँच के पास ले गई थीं। भक् से पत्ती पूरी जल गई थी। राख भी नहीं बची। रतनी दिदिया उदास हो गई थीं। घुटने के तख्त पर ठुड्ढी टिका कर धीरे से पूछी थीं, ‘‘निरगुन कौन गा रहा था पिताजी?’’

    सतरोहन सुकुल शाबाशी से भौंहे उचकाए थे, ‘‘अरे ऊऽऽ… कमकरवा के लरिका रहे। बहुत बढ़िया निरगुन गाता है। गला सधा है ओकर।’’

    रतनी दिदिया ने चायछन्नी को लोटे के मुँह पर दो तीन बार ठकठकाया। बची खुची चाय भी लोटा के अन्दर चली गई थी। पिता और माँ को चाय थमा कर रतनी दिदिया अपनी चाय लेकर छत पर चली गई थीं। अजामिल बो ईया अपने दरवाजे के सामने खाट बिछा कर बैठी चाय पी रही थीं। अजामिल बाबा के मकान के बाएँ तरफ की गली के बाद जो ब्रिजमोहन सुकुल का अहाता था वह ईंट की दीवार से घेरा हुआ था। दीवार के पास तीन चार शीशम के पेड़ थे। एक बेर का पेड़ था, सूखा हुआ। बहुत कम और भूरी पत्तियों वाला वह पेड़ मुर्दा मालूम होता था। जब कभी हवा हिलती थी, तो पेड़ पर अटकी कुछ एक पत्तियों के हिलने डुलने से पेड़ का जिन्दा रहना जी उठता था।

    मकान की दाहिनी तरफ वाली गली से सिलिंडर भइया सिर पर खंचिया में उपले लेकर द्वारिका सुकुल के घर पहुँचाने निकले थे। रतनी दिदिया चाय का घूँट लेकर सिलिंडर भइया को देख रही थीं। देखने का फिलहाल कोई अर्थ नहीं था। अगर यह दृश्य किसी फिल्म का एक हिस्सा था तो वे रोजमर्रानुमा ढंग से फिल्म के एक पात्र को एक कोने से दूसरे कोने तक जाते हुए देख रही थीं। सूरज की लगातार तपिश से झुलस कर गहरी साँवली हो चुकी खाल पर पसीने की नन्ही नन्ही बूँदें चमक रही थीं। निकर भीग कर किसी लिफाफे की पतली परत की तरह चिपक गई थी। रतनी दिदिया सिलिंडर भइया के सिर पर रखी खंचिया देख रही थीं, उनकी बाँह की मछलियों पर चमकती पसीने की बूँदें देख रही थीं, नंगे तलुवों का जमीन पर पूरे वजन से टिकता जमाव देख रही थीं।

    रतनी दिदिया को शुष्क दिनों में बजने वाला गाना याद आया था! ‘‘ओढ़नी के रंग पीऽऽयर…’’

    रतनी दिदिया अभी हरे रंग का सूट पहने थीं और सावन आने में अभी काफी समय था।

    रतनी दिदिया की नज़र इधर-उधर भटकती अजामिल बो ईया पर ठहरी थी। अजामिल बो ईया उन्हीं को देख रही थीं। रतनी दिदिया ने मुँह फेर लिया था। मुँह फेरने पर सामने घर का पिछला हिस्सा था जो बेवजह की झाड़ियों और घास से गजबजाया हुआ जमीन का एक लावारिस टुकड़ा था। मकान और जमीन के बीच ईंट की आधी टूटी ढही एक दीवार थी। दीवार पर जंगली कोहड़े की लतरें चढ़ी और फैली हुई थीं। जमीन के दूसरे कोने पर मदार के फूल आहिस्ता आहिस्ता हिल रहे थे।

    थोड़ी दूर पर शिवाला की शंक्वाकार छत नजर आ रही थी। जहाँ शंकु खत्म होता था, वहाँ लाउडस्पीकर जोड़ा हुआ था। लाउडस्पीकर से कभी कभार बिजली आ जाने के दिनों में ‘ऊँ नमः शिवाय’ बजा करता था। उसके ऊपर लगातार तीन चार छोटे छोटे गुम्बद थे। आखिरी गुम्बद पर एक छोटा सा त्रिशूल धँसा था। त्रिशूल की बाईं नोंक पर एक नन्ही चिड़िया बैठी झूठमूठ ही ठोर मार रही थी। कई सालों की बारिश से मन्दिर का रंगरोगन बेरंग हो चुका था। नीचे से मन्दिर की दीवार काली पड़नी शुरू हो गई थी। पलस्तर झर गया था। झरे हुए पलस्तर की जगह ईंटें दिखती थीं।

    रतनी दिदिया को लगा था कि ठीक अभी मन्दिर की दीवार से चिपकी इक्का दुक्का पलस्तर की परतों में से कोई एक परत झर कर नीचे सूखी हुई पत्तियों के ढेर में गिर गई। कुछ दिनों पहले जब रतनी दिदिया के दुपट्टा सँभालने वाले टटका दिनों ने बासी दिनों की तरफ एक कदम बढ़ाया ही था कि तब, वह गहरे बादलों से ढँकी और नन्हें बच्चों की चुहल से मुस्कराती एक शाम थी वह। मन्दिर के पीछे पतली गली थी। गली के इस तरफ मन्दिर और उस तरफ बेहया की बेशुमार झाड़ियाँ थीं। जब बारिश शुरू ही होती थी कि नंगधड़ंग बच्चे कच्छी उतार कर कमर पर काले धागों में पिरोई काली लाल मोतियों वाली करधन लपेटे दौड़े आते थे और बेहया की झाड़ियों में फारिग होकर जल्दी-जल्दी भाग जाते थे। बासी दिनों की ओर पहला कदम और सावन का सोमवार एक साथ पड़ा था। सतरोहन बो चाची ने रतनी दिदिया को दस पाँच गालियाँ देकर शिवाला पर साँझ का दिया दिखाने भेजा था। हल्की बारिश के बीच रतनी दिदिया सर पर ओढ़नी रखे और हाथ में पूजा की थाल लेकर निकली थीं। शाम थी, पर बादल थे इसलिए लगता था जैसे रात हो गई हो। शिवाला सूना पड़ा था। इक्का दुक्का घरों से लालटेन की रोशनी चमक रही थी। बच्चे भागा दौड़ी का खेल खत्म कर भागने की फिराक में थे।

    शिवाला के आँगन में मिट्टी गीली थी। शिवलिंग के पास दीया जला कर रतनी दिदिया मन्दिर के आँगन में बने गणपति महाराज की मूर्ति के पास भी दीया जलाने गई थीं। मूर्ति पर काई जमी थी। उनमें पुराने कच्चे चावल अटके थे। मूर्ति की सूँड़ सिन्दूर से लाल हो गई थी। रतनी दिदिया मूर्ति के पास जलता हुआ दीया रख कर उठी ही थीं कि तभी दो मजबूत हाथों ने उन्हें धकेल कर उघड़े पलस्तर और झरते रंगरोगन वाली दीवार से चिपका दिया था। थाली नीचे गिर गई थी। बारिश तेज हो गई थी। लड़खड़ाई हुई रतनी दिदिया ने उल्टे हाथों से दीवार पर सहारा लिया था। नाखून में पलस्तर और झरते चूने के टुकड़े फँस गए थे। मजबूत हथेलियों को रतनी दिदिया के होंठों पर सख्ती से चिपका कर कोई धीरे से गुर्राया था! ‘‘चुप्प!’’

    रतनी दिदिया सोनू को पहचान गई थीं। डरी हुई रतनी दिदिया की आँखों में आँसू आ गए थे जो बारिश में दिखे नहीं थे। एक जोड़ी बदबूदार साँसें उनके कान के पास थीं। भय, पीड़ा व घिन की एक लहर ने पूरी ताकत से प्रतिरोध किया था। इस प्रतिरोध को कुचल देने के लिए वह शख्स दोगुना बलप्रयोग करता, इससे पूर्व ही मन्दिर का गेट बजा था। सोनू रतनी दिदिया को धकेल दिए थे और गरियाए थे ‘‘कुतिया!’’

    सोनू फिर मन्दिर के दूसरे कोने में टूटी हुई दीवार फाँद कर भाग गए थे। रतनी दिदिया सँभल नहीं पाई थीं और गिर गई थीं। उठने की कोशिश करती थीं तो लगा जैसे उनके दोनों पैर काँप रहे हों, व उनसे खड़ा नहीं हुआ जा रहा था। रतनी दिदिया वहीं मिट्टी कीचड़ पानी में बैठ कर रोने लगी थीं। गाँव की कोई औरत साँझ बत्ती करने आई थी। वह जब गणेश महाराज को दीया दिखाने आई तो रतनी दिदिया को रोता देख कर, दौड़ कर पास आ गई थी।

    ‘‘क्या हुआ बुची गिर गई क्या?’’

    रतनी दिदिया के पास ‘हाँ’ में सिर हिलाने के अलावा कोई चारा नहीं था। औरत सहारा देकर उन्हें उठाया, ‘‘च्च…ऽऽ च्चऽऽ! ज्यादे चोट तो नहीं लगा न।’’

    रतनी दिदिया ने नहीं में सिर हिला दिया था।

    ‘‘देखो सँभल कर चलो। बड़ा बिछलहर है!’’

    गर्मी के साथ साथ हवा भी तेज हो गई थी। सूखी पत्तियाँ, कागज मन्दिर के आँगन में छितरा गए थे।

    ईश्वर कहाँ नहीं था?

    उखड़े फर्श और टूटते झरते पलस्तर की दीवारों वाले मन्दिर में बना पत्थर का लिंग भी ईश्वर कहलाता था। सूखी धूप व धूल के मौसम में यह ईश्वर सूखी पत्तियों व धूल की मोटी परत से सराबोर हो जाता था।

    एक वह भी ईश्वर कहलाना पसन्द करते थे जो भक्त से भगवान को मिलाने वाले सेतु थे। हालाँकि रतनी दिदिया जानती थीं, कि पिता भी किसी सेठ के यहाँ पुजारी थे। सेठ खुश होता था और पिता पर दया करता था तो अच्छा खासा दान देता था। यह सारा व्यापार इतना लाभप्रद था कि पिता, रतनी दिदिया के ब्याह के पश्चात दामाद को अपना उत्तराधिकारी बना देने की फिराक में थे।

    कैसी अकर्मण्यता थी। कितना पाखंड!!

    कितनी लचक थी रीढ़ की हड्डी में!!

    चायपत्ती जीभ पर आई थी, और मुँह कड़वा हो गया था। रतनी दिदिया गिलास की तली को बाईं हथेली पर धीरे धीरे घिसने लगी थीं।

    अभी अभी थोड़ी देर पहले सिलिंडर भइया की बाँह पर चमकता तीसरा ईश्वर याद आया था रतनी दिदिया को। साँवली, गठीली, मछलियों पर चमकता नमकीन पारदर्शी ईश्वर…!! ईश्वर जो खेत कोंड़ता था, घर बनाता था, धरती नापता था, चट्टान तोड़ता था, नाभि की गहराई से निरगुन गाता था और अगर नजर मिल जाए तो बहुत छोटा सा मुस्किया कर नजर जमीन पर धँसाए चला जाता था।

    रतनी दिदिया को उस ईश्वर पर बहुत दुलार आया था। नामालूम ढंग से उनकी जिह्वा पर एक गहरी लालसा जागी थी, कि वो साँवली मछलियों पर चमकते सारे पारदर्शी ईश्वर को अपने होंठों से एक एक कर चुन पातीं।

    चख पाती उस ईश्वर का स्वाद…!

    लू नहीं लेकिन गर्म हवा तो चल ही रही थी। बरफ वाला साइकिल के कैरियर पर लकड़ी की पेटी को काली रबर के पाइप से बाँध कर चिल्लाता जाता था, ‘बरफ बरफ बरऽऽऽफ’।

    छोटकी लरिया गई थी और पैर पटक पटक कर रोने लगी थी। घर में खुदरा अठन्नी भी नहीं थी। सतरोहन बो चाची ने कोठिला में से कटोरी भर चावल निकाल कर दिया था और रतनी दिदिया से बोली थीं, ‘‘जा बरफ ले आ!’’ छोटकी बनेच्चर थीं एक बार छोड़ दिया जाता तो दुपहरिया भर धूप में कूदती फाँदती रहती।

    बरफ वाला शायद चिल्लाते चिल्लाते थक गया था। इसलिए अब पाकड़ की छाँह में खड़ा साइकिल की घंटी टुनटुना रहा था। रतनी दिदिया लकड़ी की पेटी पर चावल की कटोरी रख कर बोली थीं, ‘‘तीन गो बरफ दऽऽ।’’ बरफ वाले ने अपने थैले में कटोरी खाली करके रतनी दिदिया को थमा दिया और बरफ निकालने लगा था।

    ज़िन्दगी  संयोगों का ढेर है। मैं आपसे कहूँ कि ‘ऐसा हुआ… या वैसा हुआ…’ आप यकीन नहीं करेंगे। पर अगर मैं आपसे कहूँ कि ‘संयोऽऽग से ऐसा हुआ कि…’ तो आपको मेरी बात पर यकीन करने में रत्ती भर भी शंका नहीं रह जाएगी।

    तो चलिए यकीन करने के लिए तैयार हो जाइए। कि आज (मेरे हिसाब से उस दिन) ‘भी’ संयोग से रतनी दिदिया ने सूती का पीला सूट और हल्के नीले फूलों की छाप व पतली जरी की किनारी वाला पीला दुपट्टा पहना था।

    पाकड़ के सोर पर टोला के लथेरवों के साथ सिलिंडर महाराज भी बैठे थे। रतनी दिदिया का दिमाग चुटकी भर चौंक कर खामोश हो गया था। दरअसल ‘लथेरवा’ और सिलिंडर भइया की संगत टोला में विरोधाभासी समझी जाती थी।

    सिलिंडर भइया पाकड़ के सोर से उठ कर आए थे और उन्होंने एक एक के चार सिक्के बरफ की पेटी पर लुढ़का दिए, ‘‘हमें भी चार गो बरफ दो!’’ सिलिंडर भइया के कान से फोन चिपका था। सिलिंडर भइया पूछते थे, ‘‘तुम भी बरफ खाओगी?’’ रतनी दिदिया ने देखा। लाउडस्पीकर तो ऑन नहीं था, लेकिन मोबाइल की आवाज ऊँची थी। फोन पर खिलखिलाहट के साथ सुनाई पड़ा था, ‘‘खिलाओ!’’

    बरफ वाले ने मुस्किया कर सिलिंडर भइया को देखा और बाँस की छोटी छोटी सींक पर चीनी, पानी व चूरा का जमाया हुआ बरफ रतनी दिदिया को थमा दिया था। रतनी दिदिया की नाक के ठीक नीचे और ऊपरी होंठ से ऊपर की जगह पर पसीने की नन्ही नन्ही बूँदें इकट्ठा हो गई थीं। दोनों हाथों में बरफ थामे रतनी दिदिया ने कन्धे को जरा ऊँचा करके और चेहरे को कन्धे के पास झुका कर होंठ, गाल और ललाट पोंछ लिया था। रतनी दिदिया चली गईं। सिलिंडर भइया फोन काट कर ‘लथेरवों’ को बरफ थमाए थे। सोनू बरफ थामने से पूर्व जोर की अंगड़ाई लिए थे, ‘‘स्सालाऽऽ एकदम्मे सूक्खा पड़ गिया है गाँव में!’’

    लांगा बरफ थाम कर बोले थे, ‘‘काहें मरदवा अभी अभी तो हरियर देखे हो!’’

    सोनू दया भाव से हँस दिए थे। सिलिंडर भइया चुपचाप बरफ खा रहे थे। मोबाइल ठकठक, ठकठक पकड़ी के सोर पर बज रहा था। सोनू फुसफुसाते हुए बोले थे, ‘‘फिर भी जो भी कहो भाई, ई डेढ़अंक्खियों कब्बो कब्बो जान मारती है!’’

    सिलिंडर भइया देख रहे थे। बरफ पिघल कर उँगलियों से बहती नीचे चू रही थी। थोड़ा सा बरफ बचा था अभी। सिलिंडर भइया बरफ समेत डंडी फेंक दिए थे। चिंटू और लांगा फिंके हुए बरफ को देख रहे थे। सोनू, सिलिंडर भइया को। सिलिंडर भइया के गाल का निचला हिस्सा व कान सुर्ख हो गए थे। हालाँकि तुरन्त ही सिलिंडर भइया समझ गए कि अभी अभी उनसे एक गलती हो चुकी है। उन्हें यह तो पता था ही कि ताड़ने वाले कयामत की नजर रखते थे। वह सामने वालों की आँखों की चमक देख कर यह भी भाँप ही गए थे कि उनकी इस चूक ने सामने वालों को यहाँ से कुछ मिर्च मसाला मिल जाने की उम्मीद जगा दी थी। बहुत कम और कभी कभी (कुछ खास कारणों से) लथेरवों से हँस बोल लेने वाले सिलिंडर भइया इनकी शानदार व चमकउआ पृष्ठभूमि से भलीभाँति परिचित थे। सिलिंडर भइया सचेत हो गए थे। उन्हें सफाई देना जरूरी लगा था। सानिया को फोन लगा कर स्नेह से बतियाते हुए सिलिंडर भइया ने पूछा, ‘‘हमारे कुछ मित्र लोग हैं, बतियाओगी उनसे?’’

    और बारी बारी से सोनू, लांगा व चिंटू फोन वाली सानिया से बतियाते थे। सिलिंडर भइया को कॉम्प्लीमेंट मिला था, ‘‘लगे रहो बेटा, बढ़िया पटाये हो!’’ सिलिंडर भइया निन्यान्नबे प्रतिशत निश्चिन्त हो गए थे।

    चिंटू, लांगा और सोनू की यह तिकड़ी गाँव में लथेरवा के नाम से जानी जाती थे। गाँव की चट्टी पर सोनू की सिमकार्ड, स्क्रैच कार्ड और मोबाइल फोन की एक छोटी सी दुकान थी ‘मुस्कान मोबाइल फोन शॉप’। सोनू का बड़ा सिम्पल फंडा था। सोनू बड़ी अदा से बाईं आँख दबा कर कहते थे, ‘सब लागी चाची तऽऽ केकरा ओर ताकी?’

    लांगा और चिंटू चूँकि ओवर एज नहीं हुए थे तो इसलिए भर्ती की तैयारी के तहत सुबह शाम सड़क पर दौड़ने जाते थे। छिटपुट रोजगार, खेती बटाई, तैयारी के अलावा इस तिकड़ी का मुख्य काम था गाँव में चलने बनने वाले गुप्त कार्यक्रमों की टोह में लगे रहना। अब तक का रिकार्ड था कि हमेशा उन्हें अपने इन खोजी अभियानों में सफलता मिलती आई थी। शत प्रतिशत! इन मिलने वाली सफलताओं के दोहरे लाभ थे। पहला लाभ, कि ऐसे ऐसे किस्से हाथ लगते थे कि पाकड़ की छाँह में होरहा छुड़ा कर खाने के लिए थोड़ी सी मिर्ची व मसाला मिल जाता था। आठ दस चनों के साथ जीभ पर चुटकी भर मसाला मिर्च रख लेने भर से ही ‘होरहा’ और लम्बी नीरस दुपहरिया दोनों का स्वाद खूब चटपटा हो जाता था। दूसरा लाभ दूसरे किस्म का स्वाद था। लथेरवा पहले मजबूत पक्ष को पकड़ते थे, ‘‘का रे? सब मजा अकेले लेगा?’’

    मजबूत पक्ष राम रहीम कुछ नहीं बोलता था। देखा जाए तो उसे इस बात से भी गरज नहीं थी, कि ‘लथेरवा’ इस गुप्त कार्यक्रम को पूरे गाँव टोला में उड़ा देंगे। मजबूत पक्ष को बस एक बात का अफसोस होता था कि गुप्त कार्यक्रम के लिए सहभागी की तलाश नए सिरे से करनी पड़ेगी। अब ‘लथेरवा’ दूसरे पक्ष यानी कमजोर पार्टी को पकड़ते थे। चूँकि कमजोर पार्टी की कमजोर नस ‘लथेरवों’ के हाथ में होती थी तो अक्सरहाँ थोड़ा डराने धमकाने पर काम बन जाता था। पर कभी कभी थोड़ी जबरदस्ती भी करनी पड़ती थी।

    लेकिन सिलिंडर भइया फिर एक गलती कर गए थे। वो यह नहीं समझ पाए थे कि ताड़ने वालों की नजर इस कदर कयामत थी कि बिना कुछ के ही ताड़ जाते थे।

    ‘बिना कुछ’ का मतलब क्या था? ‘कुछ भी नहीं…’ यही नऽ? लेकिन क्या कभी कभार शब्दकोशों में फेरबदल की गुंजाइश नहीं आ जाती? तब, जब कुछ कुछ का मतलब कुछ नहीं, अपरिचय का मतलब सर्वाधिक परिचित तथा ‘कुछ भी नहीं’ का अर्थ ‘सब कुछ’ से प्रतिस्थापित हो जाता।

    दुपहर कच्चे आम के टिकोरा की तरह होती थी। इसके उलट रात का गुदाजपन मादक और हैरतअंगेज होता था। चाँद पूरा था। उस पर धुएँ का गुच्छा लदा था। हवा ठंडी थी। पसीने से गीली गर्दन पर चिपके बाल फरफराए थे। रात आज चुप थी। पानी के बुलबुलों जैसी कुछ अस्पष्ट धीमी आवाजें थीं। जो थीं, लेकिन नहीं थीं। यह कुछ रहस्यमयी फुसफुसाहटें थीं। फुसफुसाहटें नामालूम ढंग से रतनी दिदिया के साथ ही रहती थीं, हमेशा से… हमेशा ही। रतनी दिदिया को लगता था कि प्रतिक्षण कोई कुछ न कुछ उनसे कहता ही रहता है। अक्सरहाँ रतनी दिदिया चूल्हे पर दूध का भगोना रख देती थीं। रतनी दिदिया के साथ किसी की फुसफुसाहट चलती रहती थी। रतनी दिदिया प्रतिउत्तर देती रहती थीं। दूध गरम होने लगता था। रतनी दिदिया की नजर दूध के भगोने पर ही थी। एक वार्तालाप निरन्तर चलता ही जा रहा था। दूध उफन कर ऊपर आ जाता था।

    रतनी दिदिया जानती थी कि अब बस, दूध गिरने ही वाला था। उन्हें कुछ करना चाहिए था। वह गैस की नॉब कम या बन्द कर सकती थीं, दूध में पानी की बूँदें छिड़क सकती थीं, फूँक सकती थीं… या ‘उतरना’ से पकड़ कर भगोना नीचे रख सकती थीं। दूध उफन कर नीचे गिरने लगता था। रतनी दिदिया चुपचाप देखती रहती थीं। कानों के पास कोई बुदबुदाहट चलती रहती थी। अचानक सतरोहन बो चाची की नजर गिरते हुए दूध पर पड़ती थी। वो झटपट आकर ‘नॉब’ बन्द कर देती थीं। सतरोहन बो चाची कहती थीं, ‘‘मूऽऽ गइल बाड़े का रे?’’

    रतनी दिदिया सचेत हो जाती थीं।

    रतनी दिदिया जानती थीं कि यह आवाजें भ्रममात्र हैं। कहीं कोई नहीं है। लेकिन रतनी दिदिया प्रतिक्षण प्रतिउत्तर देती रहती थीं।

    रतनी दिदिया ने तर्जनी को कान की गुफा के पास रख कर जोर से हिलाया था। साँय साँय की आवाज थी… कुछ क्षण की गाढ़ी चुप्पी। फुसफुसाहटें फिर शुरू हो गई थीं। उकता कर रतनी दिदिया ने करवट फेर ली।

    स्त्री होना, इनसान होने से कई मायनों में इतर था। वृहद था। स्त्री होना एक गम्भीर रहस्य था… महीन, इकदम गझिन। स्त्री होना दरअसल सस्पन्द होना था। जीवन के लिए, फूल के लिए, मेंढक के लिए, पत्ती के लिए, स्वयं अपने लिए! रतनी दिदिया को लगता था कि इनसान को ‘स्पन्दनहीन होने के लिए एक बार माफी दी जा सकती थी… किन्तु स्त्री की ‘स्पन्दनहीनता’ के लिए रतनी दिदिया के हृदय में कहीं क्षमा नहीं थी। रतनी दिदिया के पास क्या था? एक देह थी नऽऽ स्त्री की? स्त्री जिसके स्तन थे (जिन्हें दुपट्टे से ढँकना पड़ता था), योनि थी, रजोधर्म था। स्त्री जिसकी नाभि के पास रोंए कभी सिहरे नहीं थे। स्त्री जिसके लम्बे बाल थे। जिसकी एड़ी के पास एक गाढ़ा काला तिल था…। यह देह थी स्त्री की। देह जिसके रहस्य छुपा कर रखने होते थे दुनिया से, बावजूद इसके दुनिया जान जाती थी कि यह स्त्री की देह है। रतनी दिदिया सोच रही थीं कि क्या हर स्त्री की देह के भीतर भी स्त्री रहती होगी? सूक्ष्म स्त्री?? रतनी दिदिया टटोलना चाहती थीं कि उनके अन्तस में स्त्री है या नहीं, …वृहद, गझिन रहस्यमयी, सूक्ष्म!

    चाँद पर लदा धुएँ का गुच्छा सरक कर पूरे आसमान पर बिखर गया था। चाँद अकेला चमक रहा था। साफ शफ्फाक, नहा धोकर बैठा हुआ सा! मच्छरदानी के अन्दर भी टुकड़ों में चाँद था। सब कुछ झक सफेदी में नहाया हुआ था। यह रात, आसमान, ठंडी हवा, यह बिछावन, आँगन, दीवारें… यह सब सच था। रतनी दिदिया हमेशा से हर सच को पूरा पूरा जीकर देखना चाहती थीं। लेकिन पूरा सच कहाँ जिया जा सकता था हर रात का, हर दिन का? और हर बीता हुआ दिन ‘वह’ दिन और बीती हुई रात ‘वह’ रात बन जाती थी।

    अतीत चाहे कोई भी हो, कैसा भी हो कहीं नहीं जाता था। हमारी देह में घर बना कर रहने लगता था।

     तो हर ‘वह’ भी कहीं नहीं गया था। था हमारे पास ही। रतनी दिदिया ‘वह’ का सारा सच नहीं, तो सच का कोई न कोइ अंश तो सहेज ही लेती थीं और रख लेती थीं कोठरी के अँधेरे सीलन भरे कोने में।

    रतनी दिदिया ने अपने आप से पूछा था ‘‘आज का सच क्या है?’’

    मच्छरदानी के बाहर एक भकजोगनी थी। रतनी दिदिया मच्छरदानी से बाहर निकलीं। रतनी दिदिया ने भकजोगनी को दो हथेलियों के बीच ले लिया। उन्होंने उँगलियों की सुराख से हथेलियों के बीच झाँका। अन्दर पीली गुलाबी रोशनी टिमटिमा रही थी। बाहर सफेद अँधेरा था। रतनी दिदिया भकजोगनी को हथेलियों के बीच लिए हुए ही अँधेरी कोठरी में गई थीं। रतनी दिदिया ने अँधेरे की सघनता टटोली । फिर उन्होंने खोल दी मुट्ठी। ठोस लदलद अँधेरे के बीच नन्ही सी भकजोगनी टिमटिमाने लगी थी। रतनी दिदिया को लगा… मुस्कराहट इतनी मुश्किल चीज भी नहीं है। मुस्कराहट मतलब? मतलब सुख ही नऽऽ? रतनी दिदिया ने बहुत पहले सुना था कहीं, या शायद पढ़ा था कि! कोई किसी के सुख दुख का दाता नहीं होता। इनसान स्वयं ही इसका प्रणेता है। सुख दुख तो माया है, झूठ है।

    यानी कि क्या? आदमी जो एक था उसे कोई सुख नहीं दे सकता था, उसी आदमी को कोई दुख भी नहीं दे सकता था। आदमी क्या स्वयं ही स्वयं को सुख देता था और दुख भी? यदि ‘हाँ’ तो ऐसा कुछ क्या था और कहाँ था आदमी के अन्दर वह अज्ञात अपरिचित द्वीप? क्या आदमी स्वयं खुद को रुला कर स्वयं ही स्वयं को कन्धा बढ़ा देता था? रतनी दिदिया को हँसने का मन करता था… कितना बकलोल है नऽऽ आदमी? स्वयं के साथ ही छल कपट करता है!!

    तो एक बात, क्या वाकई दुनिया का कोई मतलब नहीं था? इन शिकायतों, इन पीड़ाओं का क्या इसलिए ही कोई अर्थ नहीं बनता था क्योंकि यह स्वयं ही स्वयं से आई थीं? हवा बहे न बहे… पीपल की पत्तियाँ स्वयं फरफराएँगी एवं स्वयं ही शान्त भी हो जाएँगी? इसके उलट यह भी कहा जा सकता था कि हवा के बहने पर भी पत्तियाँ शान्त बनी रह सकती हैं, और हवा के न बहने पर भी फरफरा सकती हैं क्योंकि यह बस हवा की वजह से नहीं पत्तियों के अन्दर छुपे अज्ञात अपरिचित द्वीप के कारण ऐसा होता है? अचानक रतनी दिदिया को खयाल आता था कि अगर यह सच है कि आदमी के अन्दर की माया ही सुख दुख है तो इस अँधेरी कोठरी के सीलन भरे कोने में बरस दर बरस इकट्ठे होते रहे वे ‘सच’ क्या थे? क्या वे सच जैसे दिखते झूठ हैं? क्योंकि इस हिसाब से दुनिया का तो कोई मतलब ही नहीं है नऽ? सारा खेल तो उस अज्ञात अपरिचित द्वीप की माया का रचा हुआ था। रतनी दिदिया को खूब कस के डर लगा था। नाऽऽ नाऽऽ ऐसा कैसे हो सकता है? अगर ऐसा होता… तो फिर क्या मतलब ही रह जाएगा रतनी दिदिया के होने का भी? नहीं जी यह सच हो सकता था, परन्तु पूरा सच नहीं था। यह तो है कि खेल तो उस अज्ञात अपरिचत द्वीप का ही है, लेकिन सारी कमान उसके हाथ में नहीं है यह इस तरह हो सकता है कि एक बूँद सुख और एक बूँद दुख दोनों थे अन्दर। बाहर से अगर एक बूँद दुख आता था तो दुख का आयतन बढ़ जाता था। बाहर से एक कतरा सुख आता था तो सुख का आयतन बढ़ जाता था। पर ये दोनों कतरे कभी सूखते नहीं थे अन्दर! रतनी दिदिया जो एक बात समझ पा रही थीं वो यह कि दुनिया एकदम सच थी और सच वह अज्ञात अपरिचित द्वीप भी था। आदमी को दोनों के साथ ही रहना था। दोनों का ही कोई विकल्प नहीं था… और भाग जाने का रास्ता तो सरासर था ही नहीं।

    बिजली की पारी रात की थी। पर रतनी दिदिया का विज्ञापन देखने का बिल्कुल भी मन नहीं था। रतनी दिदिया ने अन्दाज से टटोल कर स्विच दबा दिया। लदलद अँधेरा हल्का होकर छँट गया। निंदियाई हुई सुस्त पीली रोशनी थी। कमरे के आधे हिस्से में बड़े बड़े चार ड्रम थे जिनमें गेहूँ और चावल रखे थे। कमरे की बाईं तरफ बड़े रैक थे जिन पर उपले सहेज कर रखे हुए थे। कमरे के दूसरे कोने की दीवार पर सीलन थी। सीलन भरे कोने में चार फुट चौड़ी एक चौकी थी। चौकी के ऊपर धूल थी। रतनी दिदिया ने दुपट्टे से झाड़ कर धूल साफ कर दिया। कुछ था जो रतनी दिदिया को अन्दर बेचैन कर रहा था। रतनी दिदिया बेचैनी, मिट्टी और पानी लेकर बैठ गई थीं। मिट्टी की लोई इतनी नर्म हो गई थी कि हल्के से भी दबाव से फूली हुई लोई पिचक सकती थी। पिचकी हुई लोई को गोल किया जा सकता था। रतनी दिदिया की उँगलियाँ गीली मिट्टी में सनी थीं। उँगलियों ने दुनिया को नहीं नजर आने वाली एक चीज बनाई। एक सख्त हथेली में एक स्तन था। स्तन में हथेली के नाखून गहरे तक धँसे थे। स्तन पर एक खूबसूरत उदास आँख थी। दूसरी आँख के स्थान पर एक नन्हा खिला हुआ फूल था। आखिरी चिकनाई लपेट कर रतनी दिदिया ने उसे अलग रख दिया। रतनी दिदिया के होंठों पर गहरे सन्तोष से पगी मुस्कराहट थी। हृदय के अन्तरतम कोने से कुछ उठ कर आँखों पर पसर गया था।

    रतनी दिदिया ने आज रात का सच शायद पा लिया था। अब तक का सबसे खूबसूरत सच। साँसें लेती हुई एक उचाट, निर्जन, अँधेरी गली थी अन्दर। रतनी दिदिया ने अनगराहित सी गली में दोनों पाँव रख लिए थे। गली में दोनों तरफ सपाट खड़ी दीवारें थीं। रतनी दिदिया चुपचाप एक दीवार से टिक कर खड़ी हो गई थीं। गली में ठंडापन था। दीवार भी ठंडी थी, अनछुई सी। रतनी दिदिया को एक गुलाबी भकजोगनी दिखी थी। रतनी दिदिया को लग रहा था कि इस गली में वो अकेली नहीं हैं। गली में कोई और भी था। इसी ‘किसी और’ ने उन्हें उनके अन्दर की रहस्यमयी गली का पता बताया था। गली में एक धुन थी

             ‘ओढ़नी के रंग पीयर…’

    रतनी दिदिया विचित्र ढंग से एक पैर फैला कर चल रही थीं। सतरोहन बो चाची पूछती थीं ‘‘हुआ है?’’

    रतनी दिदिया ने ‘हाँ’ में सिर हिला दिया था।

    रतनी दिदिया ने सतरोहन बो चाची से सूती कपड़े का टुकड़ा माँगा। सतरोहन बो चाची खिसिया गईं, ‘‘रोज रोज तोहें सूती कपड़ा कहाँ से लाकर दें?’’

    रतनी दिदिया ठीक ठीक नहीं समझ पाई थीं कि यह क्रोध दरअसल किसके लिए था? रतनी दिदिया के लिए सूती कपड़े के प्रति या हर माह की इस आफत के प्रति! सतरोहन बो चाची ने अटैचियाँ, और बक्से खंगाल लिए पर सूती का कोई अतिरिक्त बेकार पुराना बचा टुकड़ा नहीं मिला था। सतरोहन बो चाची ने रतनी दिदिया से अपना ही कोई पुराना धुराना कुर्ता दुपट्टा इस्तेमाल करने के लिए कह दिया। रतनी दिदिया बड़ी मुश्किल में! सम्पन्नता इतनी नहीं थी कि, किसी अच्छे खासे कपड़े को इस आफत के लिए नष्ट कर दिया जाए। कुल जमा एक ही तो सूती का सूट था। पर रतनी दिदिया जानती थीं कि वो इस गाँव में बहुत थोड़े दिनों की अतिथि हैं। कुछ महीनों बाद जिस नई दुनिया में उन्हें जाना है वहाँ स्त्री को चार गज की साड़ी में उतनी ही ‘फरहरई’ से सारे काम निपटाने होते हैं जिस तेजी से वो सलवार कुर्ते में निपटाती हैं। रतनी दिदिया ने तार पर तहिया कर रखा हुआ दुपट्टा ले लिया।

    दुपट्टा देख कर रतनी दिदिया को कोई धुन याद आई थी। होंठों का फैल जाना वाजिब था। रतनी दिदिया उसे नाक के पास लाई थीं। धुले हुए दुपट्टे में ‘वाशिंग पाउडर’ की गन्ध थी। रतनी दिदिया ने दुपट्टे की तहें खोल लीं। दुपट्टा फाड़ कर रतनी दिदिया ने एक टुकड़ा इस्तेमाल कर लिया।

    कुछ पहर बाद रतनी दिदिया बदलना चाहती थीं। सूरज सिर के ठीक ऊपर नहीं आया था अभी। रतनी दिदिया बाकी दुपट्टे की पट्टी छाती के पास छुपा कर घर से निकली थीं। हनुमान मन्दिर के पास पाकड़ की सूखी पत्तियाँ बिखरी हुई थीं। हवा बहती थी तो पत्तियों का छितराव विस्तृत हो जाता था। रतनी दिदिया ने ‘हनुमान जी’ को प्रणाम किया। पाकड़ के सोर पर बैठे लांगा उनकी पीठ देख रहे थे। रतनी दिदिया बिना उनको देखे आगे बढ़ गई थीं। बबूल की झाड़ियाँ जहाँ से आरम्भ होती थीं वहाँ झाड़ियों की सघनता कम थी। रतनी दिदिया सघन झाड़ियों के बीच चली गई थीं। घबराई हुई लड़की ने बबूल की ओट में एक सुरक्षित कोना तलाश किया। लड़की ने उचक कर चारों ओर देखा। आश्वस्त होने के पश्चात ‘पुराने’ को वहीं फेंक कर रतनी दिदिया ने ‘नया’ ले लिया। रतनी दिदिया जल्दी से भाग आई थीं।

    पीपल के पेड़ पर लगातार हुदहुद बोलता रहता था और नीरस दुपहरिया टस से मस नहीं होती थी। मुन्ना सुकुल के भीटा पर अटकी रहती थी। भीटा के सबसे दाहिने छोर पर खूब घना पीपल का पेड़ था, फिर मोजर से गदराया हुआ आम का पेड़, फिर बेशुमार बबूल की झाड़ियों के बीच भाट की तितर बितर झाड़ियाँ थीं। उसके बाद शीशम व नीम के पेड़ थे और तब था एक ट्यूबवैल। ट्यूबवैल का कमरा ईंट का बना था। ऊपर टीन की छत थी। ईंट के कमरे से सटे हुए तूत व अमरूद के पेड़ थे। सड़े पके तूत, सूख कर काले पड़ चुके नन्हें नन्हें अमरूद, सूखी हुई लकड़ियाँ और पत्तियाँ टीन की छत पर बिखरी रहती थीं। हवा बहती थी तो सूखी हुई पत्तियाँ उड़ कर ट्यूबवैल के कमरे के सामने बिछ जाती थीं। ट्यूबवैल लगातार एक लयबद्ध आवाज के साथ चलता रहता था। कमरे से सटे चौड़े मुँह वाले लोहे के पाइप से लगातार ठंडे पानी की मोटी धार गिरती रहती थी जो पतली नालियों के रास्ते दूर खेतों तक बहती चली गई थी। ट्यूबवैल की गति वीराने में किसी धड़कन की तरह लगती थी धकधक धकधक! बीच में कभी बिजली गुल हो जाने से ट्यूबवैल थम जाता था तो जीवन ही खत्म हो गया सा लगता था। पास ही नीम के चारों तरफ सीमेंटेड गोल चबूतरा था। जिस पर सिलिंडर भइया लेटे हुए थे। काँख में और छाती के बालों की जड़ में ढेर सारा पसीना इकट्ठा हो गया था। देह में चुनचुनाहट हुई थी। सिलिंडर भइया ने शर्ट उतार कर चबूतरा साफ किया और उसे मोड़ कर सिर के नीचे रख लिया।

    चरवाहों को और कोई काम नहीं मिलता था तो वे झूठमूट बीच बीच में भैसों को साटा जमा देते थे। सीधे रास्ते चलती भैंस को भी चरवाहे आदतवश गरिया देते थे, ‘‘रहिए पे चल ससुरी!’’ मुन्ना सुकुल किसी प्रकार का नेवता पुरवाने पुत्र की ससुराल गए थे, सिलिंडर भइया को चाबी थमा कर कि, ‘‘बिजली आने पर पानी छोड़ देना।’’

    बिजली आ जाने से ट्यूबवैल अपनी पुरानी गति पर लौट आया था और सब कुछ वापस जिन्दा हो गया सा लग रहा था। हवा गर्म थी। अधटूटी नींद का बोझ बहुत महसूस हो रहा था। खुली आँखों में नींद चुभ रही थी, बन्द आँखों से गायब हो जा रही थी। सिलिंडर भइया ने हथेलियों में पानी लेकर आँखों पर छपका दिया तो राहत महसूस हुई थी। कुछ दबाव महसूस हुआ था। सिलिंडर भइया ट्यूबवैल चलता छोड़ और ईंट वाले कमरे में ताला लटका कर वन की ओर निकल गए।

    भीटा से उतर कर वन जाते हुए रास्ते में ही हनुमान मन्दिर था। पाकड़ का पेड़ था। लथेरवों की तिकड़ी अपने अघोषित अड्डे पर बैठी थी। सोनू अरहर की आठ दस सूखी झाड़ियों को रस्सी से एक साथ बाँधते हुए आखिरी गाँठ लगा रहे थे। सोनू ने सिलिंडर भइया की ओर चम्मच भर मुस्की सरकाई। दुआ सलाम के बाद सिलिंडर भइया आगे बढ़े। बीस पच्चीस कदम की दूरी पर जहाँ से बबूल की झाड़ियाँ शुरू हुई थीं वहीं पगडंडी के बीचोंबीच एक हल्का पीले रंग का और हल्के नीले फूलों की छाप वाला कपड़े का टुकड़ा फैला पड़ा था। कपड़े के बीचोंबीच एक छोर से दूसरे छोर तक आयताकार आकार में गाढ़ा लाल (जो कहीं कहीं से काला भी पड़ गया था) रंग लगा था। सिलिंडर भइया बड़ी तेज घिनाए। वह सावधानीपूर्वक बच कर आगे निकलने ही वाले थे कि तभी उन्हें कपड़े का वह टुकड़ा कुछ जाना पहचाना सा लगा। शायद कुत्तों ने झाड़ियों से खींच कर कपड़ा बीच राह पर गिरा दिया था। पर ठीक इसी क्षण ठक ठक दिमाग में कुछ बजा था। कुत्ते कपड़े को खींच कर रास्ते पर गिरा सकते थे लेकिन बीच राह पर ऐसे फैला कैसे सकते थे। और इतने सारे कपड़ों के बीच यही? दिमाग में यह स्पष्ट होते ही सिलिंडर भइया पीछे मुड़कर देखे थे। पकड़ी के सोर पर बैठी वह तिकड़ी उन्हीं को देख रही थी। सिलिंडर भइया कुछ क्षण सोचते रहे थे। सोचे यह थे कि ‘‘गाँव भर की रजस्वला हुई लड़कियों के रहस्यों को ढँकने तोपने का जिम्मा उनका नहीं है।’’ सिलिंडर भइया आगे बढ़ गए थे। लेकिन ज्यादा आगे नहीं गए थे। थोड़ी दूर पर सरजू सुनार की बँसवारी थी। सिलिंडर भइया बाँस की एक लम्बी, सूखी टहनी तोड़ कर वापस आ गए थे। सोनू वहीं से चिल्लाए थे, ‘‘का हुआ सिलिंडर?’’

    सिलिंडर भइया ने उनको देखा। ‘कुछ नहीं’ में मुंडी हिलाए और बाँस की छड़ी में उस कपड़े को लपेट लेने का प्रयास करने लगे थे। बहुत सारे असफल प्रयासों के पश्चात सिलिंडर भइया कपड़े के उस टुकड़े को बाँस की छड़ी में लपेट लेने में सफल हुए थे। उसे छड़ी में यूँ ही लपेट कर सिलिंडर भइया सरजू सुनार की बँसवारी से भी बहुत आगे तक गए थे। वहाँ एक अन्धा कुआँ था। सिलिंडर भइया ने छड़ी समेत कपड़ा उसी में गिरा दिया और वन की ओर निकल गए।

    अपने मुट्ठी भर बाल में बैकपिन लगाए अजामिल बो ईया जब, अजामिल बाबा की बुलट पर बैठ कर टीकाकरण अभियान या अस्पताल से वापिस आती थीं तब तक सूरज दरोगाइन ईया की छत के पार बस डूबने ही वाला होता था।

    अजामिल बो ईया ने सामने दुआर पर खटिया बिछा दिया और अन्दर जाकर चाय बनाने लगीं। अजामिल बाबा गाय की नाद में खली चूनी सान रहे थे। अजामिल बो ईया ने लोटा भर चाय और दो तीन गिलास लेकर दुआर पर अजामिल बाबा को आवाज लगाई! ‘‘आवऽऽ हो!’’

    अजामिल बाबा हाथ धोकर बैठ गए थे। अजामिल बो ईया ने बाबा को चाय थमाई। ईया ने अजामिल बाबा की उँगलियों के एकदम ऊपरी सिरे पर सफेद हो चुकी चमड़ी की ओर इशारा करके पूछा, ‘‘दवईया खाए हो?’’

    अजामिल बाबा ने नाक सिकोड़ कर तर्जनी बाएँ छेद में लगाई। जब उन्होंने तर्जनी निकाली तो बड़ी सी नकटी थी। अजामिल बाबा ने हाथ नीचे करके नकटी खाट के पायों में पोंछ दी और कहा, ‘‘हूँऽऽ!’’

    अजामिल बो ईया ने इधर उधर देखा कि कोई नजर आए जिससे टोला का समाचार लिया जा सके। कोई नहीं दिखा था। अजामिल बो ईया ने पूछा, ‘‘चाह में मीठा कम है नऽऽ?’’

    ‘‘हाँ!’’

    अजामिल बो ईया बता रही थीं, ‘‘उ दिन जब द्वारिका सुकुल से झगड़ा हुआ नऽऽ, उसके बाद हम दरोगाइन से बता रहे थे कि का हुआ? कइसे हुआ? दरोगाइन बोलीं! द्वारिका सुकुल असली लंगटा आदमी है।’’

    चाय में मच्छर पड़ गया था। अजामिल बाबा ने उसे उँगली से निकाल लिया। चाय कम गर्म थी। मच्छर बेहोश था। अजामिल बाबा ने उँगली झटक दी।

    ‘‘तबई ई डेढ़अंक्खी बीच में टोक कर बोली, ‘ना ईया हम भी देखे रही बाबा के करत!’ ए जी हमको तो खुब्बे गुस्सा आया।’’

    अजामिल बाबा अपनी उँगलियों के पोर देखने लगे थे। सफेद रंग ज्यादे सफेद हो गया सा लगता था। अजामिल बो ईया को गरमी लगने लगी थी। ईया घुटनों तक साड़ी उघार कर पैर खुजलाने लगी थीं। गली के कोने से सोनू और लांगा आते हुए दिखे थे।

    सोनू बोले ‘‘का चाची… ठीक है नऽऽ?’’

    अजामिल बो ईया ने मुस्करा दिया था। वहीं खाट पर बैठे बैठे ही उन्होंने पास में रखी फाइबर की कत्थई कुर्सियाँ आगे सरका दी। लांगा और सोनू की नजरें नंगी पिंडलियों पर ठहर सी गईं। रोम रहित मांसल उजले पैर। सोनू ने कहा, ‘‘एगो नया खबर है।’’

    अजामिल बाबा ने मन ही मन गरिया दिया था, ‘‘लदभेसर नाय तो, बइठने का भी सहूर नहीं है।’’

    फिर उन्होंने धीरे से घुटनों तक उघरी साड़ी को एड़ी तक खींच दिया। सोनू ने समझ लीजिए कि चुटपुटिया सा कोई बम ही फोड़ दिया था।

    अजामिल बाबा ने अपने जखीरे की गणना की, तो पता चला एक हथियार बढ़ गया था।

    रतनी दिदिया को लग रहा था कि झूठ ही शाश्वत था। सच तो दरअसल कुछ था ही नहीं। झूठ ही था जिसके लिए उनकी जमी हुई शुष्कता में दरार पड़ी थी और उनके निजीपन के दायरे में एक और तत्व शामिल हो रहा था।

    वैसे अगर देखा जाए तो रतनी दिदिया के निजीपने में इक्का दुक्का चीजें ही थीं। मसलन आँखों की भागती रहने वाली पुतली, सूखी पत्तियों सरीखी कुछ स्मृतियाँ और जिनमें अब बाँह की साँवली मछलियों पर उगी पसीने की कुछ बूँदें भी जुड़ने लगी थीं। रतनी दिदिया को पसीने की ये बूँदें उतनी ही निजी लगती थीं जितना निजी सतरोहन बो चाची की हथेलियों की दरारों में जमा कालापन लगता था, या जितनी निजी उनके हाथों में लिसड़ी रहने वाली गीली चिपचिपी मिट्टी लगती थी। हालाँकि रतनी दिदिया जानती थीं कि उनसे किसी ने भी नहीं कहा था विश्वास करने को। इस तरह बिना किसी के कहे, खुद विश्वास करने के पश्चात, विश्वास का टूट जाना ज्यादे पीड़ादायक था। दरअसल स्वयं को माफ करना असम्भव लगने लगा था। असम्भव तो खैर सिलिंडर भइया के लिए भी हो गया था, कुछ भी समझा पाना। बात देर से और टुकड़ों में पहुँची थी उन तक। बात, गाँव में किस तरह, किस रूप में धुआँई थी इसका सहज अनुमान लगाया जा सकता था। एक चीज सिलिंडर भइया ने सीख ली थी कि अत्याचार में हिस्सेदारी न करने का दंड, अत्याचार का पीड़ित हो जाना था। आखिर कैसे समझाया जा सकता था कि सारी बात ही उल्टी तरह से थी। सब अपने अपने निष्कर्ष काढ़ कर खुद ही में मगन थे।

    मगन तो दरोगाइन ईया भी खूब थीं। बड़े दिन बाद आज उनके पास बेहद नुकीले मारक, तेज हथियार आए थे जिनके सहारे वो सारे पुराने हिसाब बराबर कर रही थीं। सतरोहन बो चाची की तलवार निरी भोथरी साबित हो रही थी। रतनी दिदिया हर पुराने दिन की तरह आज भी बिना कुछ में शामिल हुए भिंडियाँ कुतरती रही थीं। दरोगाइन ईया आवारा, चरित्रहीन, ब्याहकटना के गोले दाग रही थीं। सतरोहन बो चाची बस बचाव करती रह गई थीं।

    लपलपाई हुई आग बहुत देर बाद मद्धम हुई थी।

    सतरोहन बो चाची सूखे पत्ते की मानिन्द काँपती हुई आई थीं। उन्होंने लात से मार कर थाली उलट दी, ‘‘तोर छुअल केहु ना खाई!’’

    रतनी दिदिया हतप्रभ रह गई थीं। छोटकी, चौकी पर रख कर गणित हल कर रही थी। चाची ने उसकी किताब, कापी और लालटेन बन्द करके परे सरका दी था, ‘‘हो गई पढ़ाई, चल सुत्ते!’’

    चाची छोटकी को अपनी चौकी पर लेकर लेट गई थीं। रतनी दिदिया के अन्दर से रुलाई का बगूला उठा था। पर फूटा नहीं था। रतनी दिदिया धीरे से बुदबुदाई थीं, ‘‘अम्मा… तुम भी?’’

    रतनी दिदिया को कुछ नहीं सूझ रहा था। सतरोहन बो चाची छोटकी को धीरे धीरे थपथपा रही थीं। थपथपाहट में दुलार नहीं रूखापन था जो देह में चुभता था। छोटकी ने चाची का हाथ अपनी देह से हटा कर करवट फेर लिया। रतनी दिदिया आँगन में खाट बिछा कर लेट गई थीं। पास ही स्टूल पर लालटेन रखी हुई थी। दरोगाइन ईया, दुआर पर रमेसर सुकुल को दूध देने गई थीं। ईया बहुत देर में वापस आई थीं। फिर एकपलिया दरवाजा बन्द करके मच्छरदानी में सो गई थीं।

    रतनी दिदिया सोच रही थीं कि मर जाना कितना आसान है नऽऽ? आसान काम करना लेकिन मुश्किल था। मर जाने का सबसे आसान तरीका फाँसी लगा लेना था, पर रतनी दिदिया को फाँसी की गाँठ लगानी नहीं आती थी। सन्नाटा था। बिजली नहीं थी। लालटेन वैसे ही धीमी लपलपाहट के साथ जल रही थी। जलती लालटेन में तेल कम लग रहा था। रतनी दिदिया धीरे से उठ कर गईं और लालटेन हिला कर सुनने लगीं। तेल वाकई कम बचा था। पिता होते तो बिना यह देखे कि लालटेन अपना है या किसका है, किरोसीन भर कर व शीशा साफ करके लालटेन जला देते। उनके हिसाब से घर दुआर में रोशनी रहनी चाहिए। चाहे वो जैसे हो, जिससे हो! पिता के खयाल से उन्हें अगला खयाल आया था… क्या पिता को दुख होगा? होगा! रतनी दिदिया सोचती थीं कि पिता को किस बात से ज्यादे दुख होगा? रतनी दिदिया मर गईं इसलिए या जवान रतनी दिदिया मर गईं इसलिए? या इसलिए कि जवान रतनी दिदिया आत्महत्या करके मर गईं? कैसी मुश्किल थी… कि ठीक ठीक यही नहीं बताया जा सकता था कि दुख क्यों हो रहा था? और दरअसल कहाँ हो रहा था? रतनी दिदिया को लग रहा था कि दुखी रहते रहते दुखी रहने की आदत पड़ जाती है। फिर दुख का अभ्यस्त हो जाने के पश्चात दुख तो रहता ही है बस नयापन खत्म हो जाता है। लेकिन पीड़ा गड़बड़ चीज थी, पीड़ा ऐसी चीज थी जो हर पुरानी चीज को लेकर नए सिरे से आती थी। पीड़ा का अभ्यस्त नहीं हुआ जा सकता था।

    समय बहुत कम था।

    मर जाने का सहज, सुलभ व शत प्रतिशत परिणाम देने वाला विकल्प था ‘सल्फास की गोलियाँ’। रतनी दिदिया ओसारा में गेहूँ के ड्रम के पास गई थीं। पास में ताखा पर सल्फास की पुड़िया रखी हुई थी। रतनी दिदिया ने एक गोली उठाई। रतनी दिदिया के मन में एक बात आई थी कि परिणाम शत प्रतिशत ही होना चाहिए। अगर रतनी दिदिया बच गईं तो? रतनी दिदिया को यह सोच कर हँसी आई थी कि बच जाने की स्थिति में दुनिया उन्हें इतनी बोली बानी सुनाएगी कि उन्हें दुबारा सल्फास की अनगिन गोलियाँ खाकर पक्के रूप से मर जाना तय करना होगा। मुस्कियाते हुए ही रतनी दिदिया ने दो और गोलियाँ ले लीं। रतनी दिदिया ने शत प्रतिशत जीने के लिए कभी योजना नहीं बनाई थी। सब कुछ जबरदस्ती थोपा गया था उनके हिस्से में। रतनी दिदिया क्रोध या आवेश में नहीं थीं, बस उकता गई थीं। पेट खाली था। पानी के साथ गोलियाँ निगलने पर पानी अन्दर बजता था। रतनी दिदिया नहीं जानती थीं कि मरने के बाद क्या होता है? रतनी दिदिया ने बस सुना था कि अकालमृत्यु से मरने वालों को प्रेतयोनि मिलती है। प्रेतयोनि में टट्टी खाना पड़ता है। मूत्र पीना पड़ता है। रतनी दिदिया के कान के पास रोंए सिहर उठे थे।

    रतनी दिदिया ने अपनी उँगलियाँ देखीं। औसत उँगलियाँ, मांस से ऊपर तक पीले नाखून। बाँह पर चमड़ी से ज्यादे बाल थे। रतनी दिदिया सब जानती थीं। मरी हुई देह पर घी चभोरा जाता था। घी चभोरने से लाश जल्दी जलती थी। पहले बाल जलते थे, फिर चमड़ी, फिर मांस… अन्त में हड्डी बच जाती थी। उकताए हुए लोग एक पैर के पश्चात दूसरे पैर पर बल देकर खड़े होते थे, लाश की सामने रखी स्मृतियों को ताजा करते थे और देह के हड्डी हो जाने की प्रतीक्षा करते रहते थे। रतनी दिदिया कभी अपनी हड्डी नहीं देख पाई थीं। अभी उनको अपनी आँख, अपना चेहरा देखने का मन कर रहा था। आईना ले पाना मुश्किल था अभी। उन्हें याद आया कि दीवार के किसी मोखा में बहुत पुराने किसी आईने का टूटा हुआ आधा टुकड़ा पड़ा था। रतनी दिदिया ने हाथ से टटोला। शीशे का टुकड़ा मिल गया था।

    रतनी दिदिया सूट के नीचे सूती का लम्बा टेप पहनती थीं। सूट के नीचे से टेप का थोड़ा सा हिस्सा लेकर उन्होंने शीशे पर जमी हुई धूल साफ की। धूल साफ हो गई थी पर एकाध दाग चिकट गए थे। जो नाखून से खुरचने पर भी नहीं छूटे थे। रतनी दिदिया लालटेन के पास घुटनों के बल बैठ गई थीं। आईने में उनका अक्स था। शीशे के पीछे का गाढ़ा नारंगी पेंट कहीं कहीं से छूट गया था। जहाँ पेंट छूट गया था वहाँ आरपार दिखता था। जहाँ पेंट बाकी था वहाँ शीशे में रतनी दिदिया को अपनी आँखों की पुतली, भौंहें, होंठ व गाल की गेहुँआ चमड़ी दिख रही थी। एक आँख सीधी आईने में देख रही थी, दूसरी पुतली कोने में अटक कर रह गई थी। कभी दौड़ती थी, कभी स्थिर हो जाती थी। रतनी दिदिया ने सोचा कि अगर उनके पास एक साथ एक ही चीज को देखने वाली भली आँख होती तो भी वो जी पातीं शायद…! है नऽऽ? छोटकी कई बार अपनी आँखें बना कर भाँजती थी। रतनी दिदिया की नकल उतारती थी और कहती थी,

    ‘‘अरऽऽरे! दू…गो अम्मा, दूऽऽ गो दीदी, दूऽऽ गो चिड़िया…!’’

     रतनी दिदिया देख रही थीं तो उन्हें एक ही अम्मा, एक ही छोटकी, एक ही चिड़िया और फिलवक्त आईने का एक ही टुकड़ा नजर आ रहा था।

    दरअसल आईना उतना ही पुराना था जितना कि रतनी दिदिया खुद। इस आईने ने हर दृश्य सँजो कर रख लिए थे अपने अन्दर। आज रतनी दिदिया देख रही थीं तो यह दिखा रहा था। एक आईने से आधा टुकड़ा आईना यह तब बना जब ओसारा में टीन की करकट के बजाए फूस की पलानि हुआ करती थी। रतनी दिदिया चड्ढी पहन कर दिन भर खेलती रहती थीं। उन दिनों किसी घनी दुपहरिया में टुटहा सूटकेस लिए सतरोहन सुकुल चार साल पश्चात पलानि में प्रकट हुए थे, मय ट्रेन व ट्रेकर की धूल गर्द थकन समेत। ईया बेना हाँकती थीं और हूँऽऽ हूँऽऽ करके रो रही थीं। मुनरिका सुकुल समझाते थे, ‘‘चुप रहुऽऽ… रोउ मत!’’

    मुनरिका सुकुल, सतरोहन चाचा से पूछ रहे थे, ‘‘कहाँ रहे, कइसे रहे…!’’

    सतरोहन बो चाची, एकपलिया दरवाजे के पास आधा घूँघट काढ़े खड़ी थीं। सतरोहन  चाचा सब बता रहे थे और एक चोरनज़र सतरोहन बो चाची को देख लेते थे। सतरोहन बो चाची बिना आवाज रो रही थीं और बेआवाज ही मुस्करा रही थीं। सतरोहन बो चाची के पीछे से कान तक छोटे झबरैले बालों वाली रतनी दिदिया ने झाँका। सतरोहन चाचा उन्हें देख कर मुस्कराए थे। रतनी दिदिया ने भी मुस्करा दिया था। मुनरिका सुकुल ने भी एकपलिया दरवाजे के पास देखा और रतनी दिदिया से बोले, ‘‘इधर आओ!’’

    रतनी दिदिया ने हँस कर गर्दन हिला दी थी, ‘‘नाऽऽ!’’

    सतरोहन बो चाची, रतनी दिदिया की पीठ थपथपा दी थीं, ‘‘जाओ। बाबा बुला रहे हैं न!’’

    रतनी दिदिया लजा कर अन्दर भाग गई थीं। चौकी पर बैठ कर पैर झुलाती रतनी दिदिया ने पूछा था, ‘‘ईऽऽ कौन है अम्मा?’’

    गुड़ और दही का रस घोलती सतरोहन बो चाची ने कहा, ‘‘तोर बाप हउवन!’’

    ‘‘बाप माने?’’

    सतरोहन बो चाची ने अच्छे से समझा कर बताया, ‘‘बाप माने तुम्हारे पिताजी हैं!’’

    खुश हो गईं रतनी दिदिया ने आँख नचा कर कहा, ‘‘हमारे भी पिताजी…!’’

    नंगी चौकी पर बैठीं रतनी दिदिया गुड़िया के पुराने कपड़े खोल कर नए कपड़े पहना रही थीं। सतरोहन सुकुल ने अटैची में से प्लास्टिक की एक बड़ी सी पुतुल निकाल कर दिखाई। रतनी दिदिया हैरान रह गई थीं, ‘‘इतनी बड़ी पुतुल?’’

    सतरोहन चाचा ने पूछा, ‘‘लेना है?’’ रतनी दिदिया ने हाँ में मुंडी हिला दी थी। सतरोहन चाचा ने कहा, ‘‘पहले गोदी आओ?’’

    असमंजस में घिरी रतनी दिदिया कभी पुतुल देख रही थीं, कभी सतरोहन  चाचा को। रतनी दिदिया ने सतरोहन बो चाची को देखा। सतरोहन बो चाची ने इशारा किया था। रतनी दिदिया, सतरोहन चाचा की गोद में बैठ गई थीं। सतरोहन चाचा ने रतनी दिदिया को दुलार कर पुतुल थमा दी उन्हें। रतनी दिदिया खेलने लगी थीं। सतरोहन बो चाची ने चाचा को गिलास में रस थमाया था। चाचा ने कलाई थाम कर सतरोहन बो चाची को अपने पास ही बिठा लिया। सतरोहन बो चाची की आँख से एक बहुत मोटा आँसू गिरा। सतरोहन चाचा ने उसे उँगलियों से पोंछ दिया। दुबारा एक मोटा लोर गिरा था। सतरोहन चाचा ने लोर वाली आँखें चूम लीं। रतनी दिदिया मुँह बाकर ताक रही थीं। सतरोहन चाचा को रतनी दिदिया का खयाल आया तो हड़बड़ा गए थे। चाची भी हड़बड़ा गई थीं। सतरोहन चाचा ने रतनी दिदिया को दो सिक्के थमा कर कहा, ‘‘लेऽऽ बुच्ची! जा फोंफी खा ले!’’

    भकुआना भूल कर रतनी दिदिया सिक्के खनकाती भाग गई थीं।

    हवा ने दुलारा लेकिन देह में गर्मी बढ़ती जा रही थी।

    रतनी दिदिया सोच रही थीं कि अभी इस क्षण इन स्मृतियों के साथ दुनिया कितनी प्यारी लग रही थी। इतनी कोमल, प्यारी स्मृतियों के साथ कोई कैसे मर सकता था? लेकिन दुनिया दरअसल इसीलिए अच्छी थी क्योंकि रतनी दिदिया को मरना था। यह तय था कि जिस भी पल रतनी दिदिया जीने के विषय में सोच लेतीं दुनिया उसी क्षण से निर्मम, क्रूर व हत्यारी हो जाती।

    सतरोहन बो चाची को रात में साफ साफ नहीं दिखता है। टोटा कर काम निपटा लेती हैं किसी तरह। रात में काम निपटाने के दौरान कोई टोक दे तो बुरी तरह चिहुँक जाती हैं। उस वक्त कोई उनकी चौंकी हुई आँखें देखे तो उनमें हैरत नहीं भय दिखता है। भय से आक्रान्त, फटी हुई आँखें। फटी हुई आँखों से लगातार पानी गिरता रहता है। लगातार पानी गिरने के कारण आँखों की कोर में लस लस कीचड़ जमा रहता है। उस वक्त अगर यह पूछ लिया जाए कि, ‘‘काहें रोअ तारू चाची?’’ तो सतरोहन बो चाची की भय व हैरत से तनी आँखें कुछ ढीली पड़ जाती हैं। इधर उधर भागती पुतलियाँ वहाँ देखने लगती हैं जहाँ कुछ नहीं होता।

    ‘‘नाऽऽ रोअब काहें?’’

    सतरोहन बो चाची फिर तुरन्त ही कोई काम धाम ढूँढ़ लेती हैं। उनकी आँखें, चेहरा, आवाज सब इतने सामान्य हो जाते हैं कि यह मान लेने में कोई शंका नहीं होती है कि, ‘वह वाकई रोती नहीं हैं। महज पानी लगातार आँखों से बहता रहता है।’

    बाकी सब तो ठीक ही है दुनिया में। बस, आज भी तमाम रंग के दुपट्टे हवा में उड़ते दिख जाते हैं कभी कभी!

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