कवि कृष्ण मोहन झा का कविता संग्रह प्रकाशित हुआ है- तारों की धूल। लगभग दो दशक बाद प्रकाशित हुए उनके इस कविता संग्रह पर यह समीक्षा लिखी है जाने माने कवि पवन करण ने। राजकमल से प्रकाशित इस संग्रह की समीक्षा आप भी पढ़ सकते हैं- मॉडरेटर
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आज़ादी हासिल किए कितना समय बीता है
और गुलामी कितनी जल्दी लौट आई है-
सरमद याद है न आपको। दिल्ली की सड़कों पर नंग-धड़ग घूमता, साथ रहते किसी व्यापारी घराने के अपने-गोरे-चिट्टे शिष्य को सबके बीच चूमता और शासक, शासन, मजहब और रियाया पर प्रश्न खड़े करता वही सरमद फ़कीर जिसे ओरंगजेब ने जामा मस्जिद की सीढ़ियों पर फांसी के फंदे पर लटका दिया। इस दौर के कुछ चेतनासंपन्न कवियों की कविताओं को पढ़कर ऐसा ही लगता है जैसे दिल्ली की जनता के बीच सरमद भी इन कवियों की कविताओं जैसी ही बातें करता होगा और उसका कहना बरास्ते जनता बादशाह और उसकी बादशाहत तक पहुंचता होगा। अखरता होगा।
जो कवि इस दौर में शासक और शासन के राजनैतिक-सामाजिक जनघाती क्रियाकलापों के सामने खुद को खड़ा रखकर कविता में आज की बात कह रहे हैं कृष्णमोहन झा उनमें से एक हैं। मगर तब और अब में बड़ा फर्क इतना है कि कवि की कही बात पर जनता का ध्यान नहीं है तो शासक और शासन भी अपनी बंधक शक्ति को लेकर आश्वस्त है कि वह जब चाहेगा कवि की गर्दन मरोड़ देगा। उसकी कारगुजारियों को छिपाते, सच को सब तक न पहुंचने देते, हर समय उसका गुणगान करने की चाकरी करते, उसके पास मौजूद माध्यम फिलहाल कवि का कहना दबाने में सफल है। फिर यह भी कोई कम नहीं कि कवि निर्भिक कहे जा रहा है। वह सदियों पुराने चीनी कवि ‘चू युआन’ की तरह जनता की दुर्दशा से झुब्ध होकर नदी में डूबकर आत्महत्या नहीं कर रहा।
यह आश्वस्तिकारक है कि दो दशक बाद आये कवि कृष्णमोहन झा के कविता संग्रह ‘तारों की धूल’ की कविताओं में, कवि-दृष्टि में कोई भटकाव नहीं है। उन्होंने अपनी कविता में पूंजीवादी प्रलोभनों, उत्सवधर्मी अवसरों से जन्मता कोई दोष पैदा नहीं होने दिया है। यही वजह है कि कवि पर, अपनी कविताओं में कहीं भी, अपने किसी अवसरवादी क्रियाकलाप का समर्थन करने का दबाव बनता नहीं दिखता। क्या यह कवियों-लेखकों का परीक्षण काल है। हम खोजेंगे तो इसका जबाव हमें हां में ही मिलेगा। वर्तमान में कवि की लिखी कविताएं कवि के सामने रखे आईने की तरह हैं जिसमें हम कवि अपना चेहरा देख सकते हैं। यह कविता-आईना यह बताने में स्पष्ट है कि हम विचार में क्या और व्यवहार में क्या हैं। पाठक की प्रथमिकता से छूटतीं अवसरवादी कवि की पकड़ से उसकी कविता भी उसका साथ छोड़ती जाती है।
इस संग्रह में शामिल कवि की कविताओं को मात्र स्मृति जीविता के आधार पर रेखांकित नहीं किया जा सकता। स्मृति जीविता यदि उनकी कविता में गुण की तरह मौजूद है तो वर्तमान उनकी कविताओं में उल्लेखनियता की तरह उपलब्ध है। फिर प्रेम से उत्पन्न व्यथा किस कवि का पीछा छोड़ती है। संग्रह में स्पस्ट तीन सुभावों में बटीं कविताओं में कृष्णमोहन अपनी स्मृतिजीविता में भावुक नहीं हैं, व्यवहारिक हैं, जहां भाषा उनकी मदद करती है। उनके बस चुके में उनसे छूट चुका स्वयं में बदलाव के साथ धड़कता है। स्मृतियों की समझ अच्छी हो तो संवेदना सकारात्मक रूप से सक्रिय रहती है। नकारात्मक स्मृतियां वर्तमान को अस्वस्थ कर सिवाय रुदन के कुछ नहीं देतीं।
कृष्णमोहन पीछे रह चुके से जहां वे बार-बार लौटते हैं वहां से, जहां वे वर्तमान में हैं, वहां रहने के लिए आवश्यक हौसला हासिल करते हुए वहां की यादों, जिसमें प्रकृति का आधिक्य है, जैसे जल, जमीन, हवा मिट्टी, वृक्ष, घर-आंगन, परिवार, माता-पिता, भाई-बहन के पास लौटने की तीव्र इच्छा रखते हैं। इसके लिए वे प्रकृति के प्रकारों में भी उतनी ही तीब्र यात्रा करते हैं। मगर यह जानते हुए भी कि लौट पाना अब संभव नहीं उनकी यह कामना, तड़प में बदल जाती है और तड़प उनके कथन में। ठीक यही उनके साथ, उनकी कविता में, प्रेम के संदर्भ में होता है। जिसके पास भटकते हुए वे पहुंचते तो हैं मगर दोनों के बीच बस वे दोनों होते हैं, प्रेम नहीं। कूच कर जाने के बाद प्रेम करने वालों के बीच प्रेम नहीं बचता, प्रेम की स्मृति बचती है। स्मृति में बचा प्रेम लाजवाब होता है।
संग्रह की कविताओं में यह अनोखापन है कि कवि का जितना जुड़ाव मिट्टी से है उनका उतना ही लगाव हमें तारों से देखने को मिलता है। कृष्णमोहन भी दुनिया भर के कवियों की तरह तारों से खेलते और अपने हाथों से चांद को धकियाते हैं। कवियों ने अपनी कविताओं में चांद का एक मिथकिय पौराणिक आख्यान के अनुसार ‘पृथु’ की तरह दोहन किया है। क्या चांद को दुनिया भर के कवियों की इस प्रवृति का पता है। एक अति-कल्पना यह की चांद कभी धरती पर आकर स्वयं के बारे में सब कवियों से उनकी करतूतों पर बात करे। तब दुनिया का कोई कवि चांद की पकड़ से बस इसलिए बच सकेगा कि उसने उस पर कभी कोई कविता नहीं लिखी। अपनी प्रेमिका का चेहरा कभी उसे चांद की तरह नजर नहीं आया या उसने कभी चांदनी रात में रात भर आवारगी नहीं की।
क्या भाषा कवि का निवास है। कविताएं पढ़कर लगता तो यही है। जान पड़ता है कवि अपने घर और अपने से अधिक अपनी भाषा में रहता है वह जिस तरह ठहर-ठहर कर अपनी भाषा को याद करता है उसकी बात करते हुए, उससे बात करता है वह अलग से दिखाई देता है। कृष्णमोहन की कविता की भाषा समृद्ध है मगर भाषा की समृद्धि कवि-कथन को छिपने नहीं देती यह उसकी विशेषता है। जिस तरह काव्य-वैभव ढोती कविता इन दिनों भाषा की समृद्धि से लदी-फदी है और उसे रचने वाला कवि जिस तरह इस भाषा-लदान का चाबुक फटकारते चलता है, कृष्णमोहन की कविता पाठक को अपनी उस संपन्नता से आक्रांत नहीं करती। भाषा उनकी कविता में बादलों की तरह कथ्य को ढांपती-उघारती चलती है। उनकी कविता में भाषा का यह जीवन्त चलन पाठक की तन्मयता में बाधा उत्पन्न नहीं करता।
कवि कृष्णमोहन अपने जीवन और भाषा दोनों में अपनी कविता बचाने के उपक्रम में है। समय ने उसे बदल लिया है। मगर यह मानने को वह कभी तैयार होता है कभी नहीं होता। मगर इसका आंकलन वह स्वयं अपनी दो दशकों की कविता में आये, कविता की भाषा में आये, कविता में बिम्बों और प्रतीकों की आवाजाही में कमी अथवा देरी या दूरी से भी परख सकता है। इस बीच कविता में कथन की बढ़ती उपस्थिती से इंकार नहीं किया जा सकता। शायद कवि अपनी कविता के लिए नई उपमाओं की खोज में भटक रहे हैं। यही वजह है कि प्रचीन प्रतीक पीछे छूट रहे हैं। मगर कृष्णमोहन की कविता में, कवि की नये बिंबों की खोज को चुनौती देते, कविता के सबसे पुराने सारथी तारे और चांद अपनी पूरी ठसक के साथ मौजूद हैं। कविता में कुछ प्रतीक कभी फीके नहीं पड़ेंगे। उनकी चमक सदैव मौजूद रहेगी। चांद कविता में कभी प्रेमिका के चेहरे और कभी भूख से दूर दिखाई देती रोटी की तरह नजर आता रहेगा।
तारों की धूल की कविताएं अच्छे मनुष्य की तरह आगे बढ़कर अपने पाठक से हाथ मिलाती हैं। उसके पास बैठकर उसकी बात सुनती हैं। उससे संवाद करती हैं। भले ही उसे एक कवि ने कहा अथवा लिखा हो मगर ये कथन उसके ही बारे में है और उसी का है इस बात का भरोसा अपने साथ बैठे व्यक्ति को दिलाने में वह कामयाब होती हैं। आगे बढ़कर बात करने वाली कविता की पाठक को भी प्रतीक्षा होती है। उस कविता को स्वीकार करने के लिए पाठक सदैव तैयार रहता है जो अपनी गलती स्वीकार करते हुए अपनी चाल को ठीक करती है। कविता समाज के लिए तो भूल सुधारने। प्रश्न करना सिखाने। आगे राह बताने की पाठशाला होती ही है। ‘तारों की धूल’ ऐसी ही कविताओं से भरा-बुना एक संग्रह है।-
पागलों की आबादी कहीं सूचकांक तो नहीं
हमारी प्रगति का, पता नहीं,
एक विकासशील देश को
विकसित राष्ट्र बनाने में
कितने पागलों की ज़रूरत होती होगी
*
आपके भी चेहरे पर नहीं है शर्म
आपकी भी आंखों में बेचैनी नहीं
आपके भी लहजे में लाचारी नहीं
इन सब में कहीं आप भी तो शामिल नहीं
*
अमेरिका ही हमारा सबसे बड़ा तीर्थस्थल
उसके झंडे की चड्डी चढ़ाकर
पड़ोसी पर जब-तब टूट पड़ो
तो अलौकिक पुण्य प्राप्त होता है
*
अपनी दिल्ली को ही देखिए
कितने शांतिपूर्ण तरीक़े से दोनों तरफ़ के लोग
शवगृह के बाहर कर रहे शवों के आने की प्रतीक्षा!
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रोज़-रोज़ सिकुड़ती इस दुनिया में
एक-एक कर छीन लिए गए हैं मुझसे मेरे प्रिय रंग
मेरे पास बच गई है अब सिर्फ मेरी नग्नता
*
श्मशान चलकर बस्ती में आ गया है ख़ुद
क़ब्रिस्तान में जगह कम पड़ रही है
अपनी बारी की प्रतीक्षा में, अस्थियों पर
और ताबूतों में शव उदास लेटे हैं
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एक और पागल है जो दिन में 25 बार
बदलता है कपड़े और मंत्रालयों से मूत्रालयों तक
अपनी तस्वीरें लगाने के देता है आदेश
*
मरने से बचने के लिए जहां जीवितों ने
मृतकों के कपड़े पहन लिए हैं
वहीं मारे गए तमाम लोग थोड़ा और जीने के लिए
जीवितों की आंख में छुप गए हैं
*
जिनकी पोर-पोर में भरा था सुख
भीतर कहीं कोई पछतावा नहीं था
अपने आखेट का चयन कर लिया उन्होंने
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मैं जिसे पसंद करता हूं, जिसे चाहता हूं
प्यार करता हूं जिससे
वह टूट जाता है या छूट जाता है
या ख़त्म हो जाता है हमेशा के लिए
*
बिना किसी अपराध के शाप की मर्मांतक छाया
एक फटी हुई कथरी को कई सालों से
अपना जीवन कहती आ रही है
*
सूरज ने अपनी चरखा पर किरणों को समेट लिया है
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एक बेबसी दरवाज़ा खोलती है धीरे से
एक लाचारी याचना में डबडबाती है
एक पराजित नज़र अंतिम बार देखती है उसकी तरफ़
एक गीली सांझ उस गली में बेदम लड़खड़ाती है
*
तुम्हारी पीठ पर जो एक मोहक पुल बना है
उसके ऊपर तुम्हारी गर्दन को एकदम छूता हुआ
स्थायी रूप से जो टिका है नवमी का एक चांद
*
महानगर में गुमशुदा की तलाश में निकले
बड़े भाई-सा जर्जर चांद
चांद का धूसर विज्ञापन लगता है
*
मुझसे दूर किनारे पर बंधी रहती है मेरी नाव
*
जो चेहरे अपनी यात्राओं को छुपाने की
फ़िराक में रहते हैं, दरअसल
वे अपने पैरों के साथ विश्वासघात करते हैं
*
ख़ुद इस जीवन ने मुझे बताया है
कि मात्र जीवितों पर नहीं, दिवंगतों की अस्थि
और उम्मीद पर भी टिकी रहती है दुनिया
*
जो लोग मर चुके हैं उनसे निवेदन है
कि थोड़ा धीरज बनाये रखें, बस
उनकी बारी आने ही वाली है
अभी तो बहुत से क़ब्र खोदने को बाकी हैं
अभी तो असंख्य चिताओं के लिए
जगह बनाना है बचा हुआ।
पवन करण
कविता संग्रह का नाम — तारों की धूल
कवि — कृष्ण्मोहन झा
प्रकाशक — राजकमल प्रकाशन
प्रकाशन वर्ष—2025
मूल्य—250/— रूपये

