आज पढ़िए युवा कवि लखविन्दर की एक कविता- मौन की वेदना। लखविन्दर दिल्ली विश्वविद्यालय में इतिहास के छात्र रहे हैं। आप उनकी यह कविता पड़िये- मॉडरेटर
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मौन की वेदना
जब मौन चिंघाड़ता है,
तो केवल मौन ही चिंघाड़ता है।
मौन की वेदना कैसी होती है?
तब ध्वनि नही होती,
होता है भयभीत कंपन।
तब सती पति के तीसरे नेत्र से
भस्मसात तांडव होता है।
मौन की वेदना
पाषाणों भूधारों में दरार पैदा कर देती है,
परिपूर्ण सिंधु में ज्वाला रूपी ज्वार पैदा कर देती है,
पंचजन्य का भैरव स्वर तब कहा सुनाई देता है,
यमुना तट पर बंसी का स्वर भी विनाश को सहता है।
प्रकृति के हिस्से में भी ये अशुभ दिन आता है,
वेदना है मौन की कौन कहा बच पाता है,
कोटि कोटि हृदयों में भी अब विलाप का जन्म होगा,
जिसने जो बोया काटा है सबका अब हरण होगा।
जग की अम्बा को उसी के अंश की बलि चढ़ाई जाती है,
विलाप करती प्रकृति भी क्या कुछ कह पाती है,
तब जाकर मौन की वेदना अंदर अंदर जलती है,
पापियों के विनाश के लिए स्वयं भैरवी उतरती है।
अतृप्त प्यास से रणचंडी उठ कर क्या क्या झेलेगी
पापियों के “पाप” से मरघट पर होली खेलेगी,
अर्ध जले शवों के कंकालों को उखाड़ेगी,
कुचल नर मुंडो को पैर तले सिंहासन पर विराजेगी।
छिन्न भिन्न कर पंचतत्वों को ललकारा तुमने,
अहिंसा पर हिंसा को चुन कर तारा तुमने,
काल के आगे देवों की भी कहाँ चल पाती है,
वेदना है मौन की हस्तियां भस्म हो जाती है।
शत शत आघातों अहंकारियों का मेला आता है,
दानव मानव में भेद कहा सभी पाप कहलाता है,
चीख चीख कर गलत को क्या सही बतलाओगे,
मानो, नागपति के हिस्से में भी झुकना आता है।
देव, दानव, सुर, असुर, गंधर्व, नाग, किन्नर, नर, नारी,
मौन की वेदना पर पीटेंगे छाती विलय में बारी बारी,
श्री विष्णु को क्षीरसागर में निद्रा से अब जगना होगा,
कैलाश से भी दिनकर को व्याकुलता में उगना होगा।
विपत्ति और विध्वंस की रचना काल करेगा,
तब काल का विनाश स्वयं महाकाल करेगा,
विध्वंस पर संसार की रचना तब मौन करेगा,
कल्की के अवतार को भी तब मौन जनेगा।
मौन तो स्वयं ब्रह्म है, स्वयं विष्णु , स्वयं महेश,
शबरी के हिस्से में आता स्वयं विष्णु का भेष,
मानव को अपने स्वार्थ को अब समझना होगा,
दिनकर ढल चुका है करुणा की और मुड़ना होगा।


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