आज पढ़िए युवा कवि अविनाश कुमार की कविताएँ। बिहार के अररिया के रहने वाले अविनाश कुमार इंजीनियरिंग स्नातक हैं और वर्तमान में उड़ीसा कैडर के आईएएस हैं। आप उनकी कुछ कविताएँ पढ़िए- मॉडरेटर
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रेलवे प्लेटफार्म
फारबिसगंज स्टेशन का
वो रेलवे प्लेटफार्म,
और
उस प्लेटफार्म पर लगी
वो मेज़।
उस मेज़ पर बैठे
पिता–पुत्र —
लगभग शांत।
शून्य को ताकते दोनों —
आँखों में समाहित
भय और आस,
बीच-बीच में फूटते
कुछ शब्द-विन्यास।
पिता छोड़ने आए हैं
पुत्र को।
पुत्र छोड़ रहा है
पिता समेत कईयों को।
शाम साढ़े सात की ट्रेन के लिए
चार बजे से प्रतीक्षारत हैं दोनों।
तब से अब तक —
पटरी पर आ चुकी हैं
और आकर जा चुकी हैं
कई अन्य रेलगाड़ियाँ।
हर एक रेलगाड़ी के रुकने पर
उतरती है एक हड़बड़ाई हुई भीड़ —
जो समय के साथ
धीरे-धीरे
हो जाती है गायब।
देखते-देखते
अब क्षण आ चुका है —
पुत्र का
ट्रेन की भीड़ में समाने का,
ट्रेन का
प्लेटफार्म से चले जाने का।
पिता और पुत्र —
दोनों की आँखों में है पीड़ा।
पीड़ा वो,
जो समय के साथ
उनकी आँखों से
धीरे-धीरे
हो जाएगी गायब —
जैसे गायब हो जाती है भीड़।
फिर हवाओं में तैरती
वही पीड़ा
वहीं उतर जाएगी
उसी प्लेटफार्म पर बैठे
किसी और पिता–पुत्र की आँखों में,
जिनके हिस्से की ट्रेन भी
अब खुलने को है।
इस प्लेटफार्म पर
पिता–पुत्र आते हैं,
आ कर चले भी जाते हैं।
लेकिन पीड़ा?
पीड़ा तो यहीं रह जाती है।
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बादल स्वयं आये हैं
आज बादल मेरे कमरे में आए हैं।
मैं बादलों के पास नहीं गया —
बादल स्वयं आए हैं।
मैंने खिड़की अवश्य खोल रखी थी,
लेकिन उन्हें निमंत्रण नहीं दिया कभी —
वे स्वयं आए हैं।
मैंने नहीं रखी —
उनसे कभी कोई अपेक्षा,
उन्हें फिर भी आना पड़ा,
मेरे कमरे में।
मैंने अपना कमरा
पहाड़ की चोटी पर बनाया है।
चोटी पर कमरा बनाना कठिन है,
लेकिन बादल वहीं आते हैं —
अनायास,
अनिमंत्रित,
स्वप्रेरित!
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फोटोकॉपी वाले का भावशास्त्र
नकल के पन्नों का एक आदमी।
जादूगर-सी छवि —
एक को दो कर सकने की क्षमता,
पर विधाता होने का कभी कोई दंभ नहीं।
रचयिता,
पर रचना को
विदा कर सकने वाला
सबल हृदय।
दूसरों की अर्ज़ियों को वो दोहराता —
अपनी ओर से
बिना कोई शब्द जोड़े ।
हर दिन,
हर आगंतुक के पीछे
वह देखता है
एक नई सी हड़बड़ाहट —
पर उसकी उंगलियों में
कभी नहीं होती कोई थरथराहट ।
यह व्यक्ति,
सिर्फ़ एक साधारण फोटोकॉपीवाला नहीं —
वह दूसरों की आकांक्षाओं को दोहराने वाला,
एक मौन ऋषि है।
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दूधवाले का दर्शन
सुबह पाँच बजे,
खिड़की से झाँकता हूँ —
ओस से गीली सड़क,
और पेड़ पर बैठी गौरैया
दोनों प्रतीक्षा में है शायद।
उसकी साइकिल
हर रोज़ एक ही मोड़ से मुड़ती है।
पुराने पहियों के घर्षण में
एक चिरपरिचित, तालबद्ध आवाज़ —
जैसे ब्रह्मा की रची दिनचर्या का हिस्सा हो।
कभी 5:02,
तो कभी 5:20 —
बस इतना-सा अंतर होता है उसके आने में,
पर एक नियमितता भरा आश्वासन होता है
उसकी साइकिल की घंटी सुन पाने में ।
वह आता है —
साइकिल की कैरियर से टँगे
एल्युमिनियम के कनस्तरों में दूध लिए —
हमारी सुबह को
थोड़ा नियमित,
थोड़ा पूर्ण करने।
पर क्या वह हर दिन आएगा?
क्या वो घंटी
कल भी बजेगी?
क्या यह शाश्वत नियमितता का आश्वासन —
केवल एक भ्रम नहीं?
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स्मृति से परे चेतना
स्मृतियाँ आवश्यक हैं —
पहचान की नींव,
संस्कृति की रेखाओं पर
अंकित आकांक्षाओं की प्रतिच्छवियाँ,
सदियों की गठरी में
बँधी हुई चेतावनियाँ।
पर कभी-कभी —
यही स्मृतियाँ
बन जाती हैं
एक अदृश्य बंदीगृह,
जहाँ विचार की परछाइयाँ
दीवारों से टकराकर
लौट आती हैं — निरुत्तर।
जो सभ्यताएँ
टिकी रहती हैं
केवल स्मृति पर,
वे धीरे-धीरे
खो देती हैं
अपनी जीवंत चेतना।
जकड़ी हुई अतीत में,
वे गँवा देती हैं
वे अनंत संभावनाएँ —
जिनसे जन्म ले सकती थी
कोमल, नवीन
और निर्भीक चेतना।
यदि स्मृति है
जीवन की जड़,
तो चेतना है
उसकी शाखा —
जो फैलती है
अनंत आकाश की ओर,
नई हवाओं की तलाश में।
हमें छोड़नी होंगी
बीते कल की सीमाएँ,
और बढ़ना होगा
उस ओर —
जहाँ उगता है
एक नया आलोक।
क्योंकि —
स्मृति में रह जाना
केवल अतीत को दोहराना है,
और
चेतना में प्रवेश करना —
भविष्य को गढ़ने का साहस।
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वृक्ष जो अड़े रहे
घने बड़े वृक्षों,
कब से खड़े हो तुम?
दस वर्ष पूर्व जब यहाँ आया था,
तब भी तुम ऐसे ही खड़े थे।
हाँ — तब तुम्हारे साथ
कई और भी अड़े थे।
थकते नहीं क्या तुम कभी?
कब तक रहोगे खड़े?
किसके लिए रहोगे खड़े?
उनके लिए —
जिनके कारण
अब कुछ कम
दिखते हो तुम?
आशा करता हूँ,
अगली बार जब आऊँगा,
तब भी तुम्हें
खड़े हुए पाऊँगा।
वृक्ष-सरीखे मनुष्य —
जो दूसरों के लिए
अड़े रहते हैं —
अब उनकी संख्या भी
थोड़ी-सी
कम ही
नज़र आती है।
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वृक्ष, तुम क्यों नहीं बहे?
“वृक्ष,
तुम क्यों नहीं बहे?
तुम पर हुआ इतना अत्याचार —
वर्षा का निरंतर प्रहार,
वर्षों तक लगातार…
तुम क्यों नहीं बहे, वृक्ष?
टूटते पत्तों का तुम
क्यों करते रहे पुनः सृजन?
टूटती शाखाओं को
क्यों बनाया तुमने अपनी बैसाखी?
लँगड़े पैरों से
तुम क्यों रहे खड़े?
वृक्ष, तुम क्यों नहीं बहे?”
“मनुज,
मैं नहीं बहा —
क्योंकि मेरे बहने से
बह गया होता अरण्य,
बह गए होते पहाड़ —
और बह गए होते तुम।
बहना सहज है, मनुज —
खड़े रहना कठिन।”
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आलाप्पुड़ा का वह नाविक
आलाप्पुड़ा के हाउसबोट वाला
वह नाविक —
शांत,
मृतप्राय।
नाव की लंबी डाँड़ लिए —
कभी इस पार,
कभी उस पार।
उदास? नहीं।
हताश? नहीं।
हर्षित? नहीं।
असंतुष्ट? नहीं।
निर्धन? नहीं।
चिंतित? नहीं।
अशांत? नहीं।
विचलित? नहीं।
अर्थहीन।
स्वाधीन ।
हाँ —
यही।
बिलकुल यही।

