आज पढ़िए युवा कवयित्री गीता मलिक की कुछ कविताएँ। ऐसी कविताएँ जिनकी उपज का स्रोत दुख लगता है जो पढ़ने वालों को भी उसी भाव में ले जाता है- अनुरंजनी
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1. निर्वासन का दर्द
इन दिनों
इस रुके हुए दौर में
विश्वास का चाबुक
पीठ को लहूलुहान किए है
हमारी आशाएं जब्त कर ली गई हैं
हमारे सपनों के पैबंध
कटे हुए अंगों की तरह
नफरत से फेंक दिए गए है अंधेरे घने जंगल में
यह जंगल भेड़ियों के झुंड से घिरा हैं
नुकीले दातों से
टपकता हुआ खून
कौन देख पायेगा ?
मैंने ईश्वर को लड़खड़ाते हुए देखा है
वह छोटी बच्ची जो रोज मुझे मंदिर में ले जाती थी
उदास है
निर्वासन का अर्थ वह नहीं समझती
नफरत और विश्वासघात भी नहीं जानती क्या है
लेकिन उससे छीन ली गगईं वे दीवारें
जहां उसने सीखी आड़ी तिरछी रेखाएं खींचना
बनाना परिवार के चित्र
जहाँ एक वक्राकार रेखा से
बना देती है वह मुस्कान
दो चोटी वाला अपना स्केच
और लिखती है पापा पागल हैं
जिन दीवारों को
भर दिया था उसने
मांगलिक चिन्हों से,
निर्वासन सोती हुई बच्ची की आँख में एक तीर की तरह चुभा
और टपकने लगा खून
खाली कमरा अब चित्रों से नहीं
खून के छीटों से भरा हैं
बच्ची रो रही है
यह मेरे बचपन का घर है
मत निकालो!
2. बिना पुल की नदी
चल डूबें!
यह बिना पुल की नदी है
यह कहते हुए
उसने मेरा हाथ पकड़
नदी में छलांग लगा दी
मैं कश्तियों को
किनारे से बाँध आया था
वह छोड़ आई थी
घर की चौखट को
सदा के लिए
दो प्रेमियों को
नदी मिला भी सकती है
यह मर के जाना जाता है
3. अपरिजित भाषाओं का गूढ़
सबसे नुकीले सिरे
होने चाहिए कविताओं के
मैंने बरसों चिट्ठियां लिखी
हर बार पहुँच जाती
किसी अदृश्य पते पर
सुना था मौन अपरिचित भाषा का गूढ़ हैं
लेकिन कविताओं को तो मारक होना चाहिए
मीठे जहर और अच्छी बातों से मारे जाने
का दुःख दीर्घगामी होता हैं
अभिव्यंजनाओं के दुराग्रह में
एक उफनती नदी
एक मौन के पुल से गुजरती है
यह कितना बेमेल है
नदी चाहती है डूबना
पुल चाहता है पार होना!
4. आवाजें
मेरे पास कोई भी जगह शेष नहीं है अब
मैं स्मृतियों
घटनाओं और पुनरावृत्तियों में
गदागद भरी बैठी हूं
मेरे दोष और स्वप्न
मेरी ही गर्दन में धंसे है गहरे
देह एक भरा हुआ कुंआ है
वो सभी आवाजें जो डूब गई है इसमें
गुड़-गुड़ करती हैं
5. चुंबन
हमारे ज़हन में चुंबनों की खान ढहती हैं
समय बेसमय बरसते हैं
कलेजे पर पत्थर की तरह
तो कभी
हथौड़े की तरह
कभी मलाल तो कभी टीस की तरह
चुंबनों ने गाड़ दिए हैं स्तम्भ
बिना शिनाख्त वाली जगहों पर
बिना पते वाले रास्तों से आ जाते हैं
अपनी मर्जी से तय शुदा समय पर
वे नहीं जानते निर्जन भीड़ और कोलाहल
वे नहीं जानते धूप-छांव
भाव-अभाव
चुंबन गिर पड़ते हैं अथाह ऊंचाइयों से
उस दौर में जब कोई नहीं होता आस-पास
चुंबन संभाल लेते है आत्म हत्या जैसे दुर्विचार में
चुंबन पकड़ते है सबसे नाजुक नस
और ले जाते हैं धरती के और समीप
उछाल देते हैं कभी आसमान में
चुंबन कराते हैं अपने देह से प्यार
इन्द्रधनुष में समाहित है चुंबनों का रंग
सामिप्य में अतरंगी है
उल्लास में मधुमास
और दुर्दिन की एक कविता में
बन जाते हैं आलम्बन
बचा लेते है भीड़ में खोने से!
6. प्रेम प्रेम गा कर उसने
प्रेम प्रेम गा कर उसने
प्रेम को इतना बेजार बना दिया था
कि अब प्रेम
आवारा हथिनी का भारी पैर था
जहां पड़ता एक गहरा निशान छोड़ जाता
गड्ढों को पाटने का भार
पीठ पर कूबड़ की तरह उग आया था
चेहरे को ढकती है ब्रांड के किसी दूधिया रंग से
वह सुबह उठती और चाय चढ़ा देती
चीनी कम डालती और मिठास के बारे में अधिक सोचती
अवरुद्घ है उन्मुक्त दौड़
उबलती हुई चाय को लौटा दिया जाता है
छलनी की छपाक से
पैन की तलहटी में
कोई पुकार नहीं है आसपास
याद आती है रात की चीखें
वह जगाता है अपने आदिम पुरुष को
स्त्री की माद से अनभिज्ञ
जुझारू पुरुष दहाड़ता है
जीत के फर्जी दस्तावेजों पर
हस्ताक्षर करके
और भूल जाता है सुबह
वह एक भरी – पूरी स्त्री थी !
7. मेरे कौतुक में
मेरे कौतुक में
जीवित रही अज्ञात यात्राएं
ध्वनियों के पीछे
छिपी रहीं अनुगूंज
और पैरों में पदचाप के चिन्ह
स्वप्न में अक्सर उतरती हैं
निराकारी परछाई
और बिखरती हैं
चहुँ ओर
पिता की किसानी का हल
छाती पर नहीं
टिका है मजबूत पीठ पर
और रीढ़ की हड्डी में भरी है
माँ के हौसलों की मज्जा
मेरी घ्राण की शक्ति में
फसलों की गंध भरी हैं
और मेरी आँखों की
सबसे सुन्दर तस्वीरों में
उभरती हैं धान रोपती हुई
स्त्रियों की तस्वीरें
बच्चों की तन्मयता छिपी हैं
उनकी हंसी के पीछे
कितना कुछ है
जो कहने के लिए कभी बना ही नहीं
तुम जानते हो वसंत फाग का मौसम है
मेरे कौतुक में
आ बैठता है वसंत बिन बताए
और दौड़ता मेरी नसों में
हंसता बचपन देखकर
खिलते चेहरे देखकर
लहराती फसलों में!
8. बेखबर
रात बिजली के खंभे से गिर कर
मर गया एक आदमी
एक पुल से नीचे गिरी है कार
एक निर्वाचित व्यक्ति पिछड़ गया एक वोट से
एक युवा हार गया है पहला क्रिकेट मैच
एक मजदूर गिर गया है गश खाकर जमीन पर
एक लड़की पकड़ी गई है सरेआम प्रेमी के साथ
एक शहर में घुमाया गया औरतों को निर्वस्त्र
एक देश में फैल गया है पानी का अकाल
और एक अखबार कहता है भ्रष्टाचार के इंडेक्स में अस्सीवें स्थान पर है भारत
जहां दुनिया की तमाम घटनाओं को लगभग चीखती आवाज में बतलाते हैं तमाम टीवी चैनल्स
उसी दुनिया के एक कोने में
तमाम घटनाओं से बेखबर
एक छोटा बच्चा
दीवार पर लिखता है ‘पतंग’
और मांझे की जगह बांधना चाहता है मजबूत मोटी रस्सी
ताकि भगवान के पास गई हुई मां को उतार लाए नीचे!
9. अजायबघर
मेरे पास एक अजायबघर हैं
एक अपार्टमेंट के दो कमरे
कटहल का पुराना पेड़
एक दीवार पर टंगी है उन्नीस सौ सत्तानवे की एक रात
एक टेबल पर पड़ा है छत्तीस साल की डायना की मृत्यु की खबरों से भरा हुआ अख़बार
एक कच्ची उम्र का नीला धुंआ
जो पहली माहवारी की तरह दर्दनाक और डरावना था
और उससे भी अधिक डरावना था एक अधेड़ का जंघा पर घृणित स्पर्श
एक ऊभ-चुभ की कौंध से भरी लेजर लाइट
कमरे की अलमारी में बिछे
अखबार की तह में छिपी
प्रेम की पहली पाती
जो तलाश रही थी प्रेमी का पता
सपने में आकर डरातीं
वह सहपाठिन
जिसकी कंठी टूट गईं थी खेल खेल में
और कितना डर गई थी मैं
उसके रोने से
कभी कभी अजायबघर की छत पर
उल्टा चलता हुआ दिखता है
दुनिया की सबसे सुंदर चाल वाला वह लड़का
जिसकी अंत्येष्टि की गई थी
मात्र सोलह की उम्र में
दिसंबर की एक सर्द रात में
एक कपटी साया उतर आता
स्याह घने कटहल तले
और अजायबघर में फैलाना चाहता हैं
काला धुआं
अजायबघर भर रहा हैं
और भरता ही जा रहा हैं
दिन प्रति दिन!
10. डोरबेल की आवाज़
मैंने डोरबेल भी बजाई है
उसके घर के दरवाज़े की
बारहा पूछा है
बताओ ना दुःख कितने समय के बाद आता है
कितने समय के बाद लगती है
भूख प्रेम की
जवाब दो मुझे
कितनी हिंसा के बाद लौट कर आती है
एक उम्मीद
चिनगारियाँ कितनी देर तक सुलगा सकती है
मुर्दाघरों को
संवेदनाओं के तलवे कब थक कर हो जाते है
लहू-लुहान
बताओ मुझे
कौन पूछता है अब आईने में उभरे अक्ष की ख़्वाहिश
कौन सी किताब में दर्ज़ है
खुरंड से पहले की टीस
क्यों आत्मा के नुकीलें सवालों पर देर तक हँसता है तुम्हारा शीघ्रपतन
जवाब दो मुझे
क्यों सबसे बड़ा है नंगा होने का डर
क्यों पढ़ नहीं पाते हम इतना पढ़ने के बाद भी एक दूसरे को
क्या हम इतने कठिन दौर में है कि हमारे हँसने से फैल सकता है विष
लोहे की पटरियों की तरह बज रहीं है मुझमें
धड़ धड़ धड़ धड़
कितने बहरे हो गए हो
कब से सुन नहीं पा रहे डोरबेल की आवाज
परिचय –
नाम – गीता मलिक
जन्म – 10 जुलाई (उत्तरप्रदेश)
शिक्षा- परास्नातक (गृहविज्ञान) बी.एड, बी टी सी
व्यवसाय – शामली जनपद (उत्तरप्रदेश) में परिषदीय विद्यालय में अध्यापिका
ई- मेल
geetasmalik44@gmail.com

