आज हिंदी-मैथिली के सबसे विलक्षण कवि-कथाकार राजकमल चौधरी की जयंती है। इस मौक़े पर हम आपके लिए लेकर आए हैं उनकी एक कहानी दमयंतीहरण का हिन्दी अनुवाद। इस कहानी का अनुवाद किया है जाने-माने पत्रकार और लेखक पुष्यमित्र ने। हम आपके लिए यह कहानी उनके फ़ेसबुक वॉल से साभार लेकर आए हैं। आप भी पढ़िए: मॉडरेटर
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चाय की दुकान में सिगरेट के छल्ले के बीच जिस किस्म के पात्र का सृजन किया जाता है, मेरा पात्र वैसा नहीं है।
मेरा पात्र है बसंतगंज स्टेशन से चार कोस दूर बसा गांव रामपुर और उसकी किरदार है बंगाल के अकाल, कलकत्ता के दंगे, देश के बंटवारे, कोसी की बाढ़ और इन सबकी चिरसंगी मलेरिया की मारी- दमयंती, दम्मो या फिर कहिये दमिया।
नई मामी ने जब तीन बार लिफाफ और दो जोड़ा पोस्टकार्ड भेजा, तब मैं रामपुर आया था। बीए की परीक्षा निपट गई थी। बौराये सांढ़ की तरह पूरे रामपुर में मैं बौवाता रहता था। लेकिन एक दिन शाम के वक्त जैसे अपने ही कदम कहीं ठिठक गये।
शाम का वक्त था, नदी का किनारा, छह-छह करती नदी के घाट पर नाव में बैठी 23-24 साल की एक युवती, सूरज की अंतिम किरण वातावरण में सिंदूर बिखेर रही थी।
“फूल भैया, उस पार जायेंगे?” वेद व्यास की मत्स्यगंधा ने हंसते हुए मुझसे सवाल किया। प्रश्न की निर्भीकता, एकांत, काव्यमय हंसी और फूल भैया का परिचित संबोधन, यह सब सुनकर हर्ष ही नहीं भरपूर आश्चर्य भी हुआ।
कौन है यह, ऐसी मर्यादाहीन युवती?
“हम भी संथालों को टोले की तरफ जा रहे हैं, दूध लाने के लिए। रास्ता ही देख रहे थे कि कोई आये तो उस पार जायें। लौटते वक्त अंधेरा हो जायेगा न।”
“नहीं जाना हो, तब भी चलिए फूल भैया।” अपरिचिता ने फिर कहा।
“अंधेरा होने पर हमारे साथ लौटने में आपको डर नहीं लगेगा?” भरपूर उद्दंडता से हमने भी सवाल दाग दिया।
“पुरुषों से हमको डर नहीं लगता है।” इतना कह कर वह रेलगाड़ियों में भीख मांगने वाली लड़कियों की तरह निर्लज्ज हंसी हंसने लगी।
जैसे भक्क से नींद खुल गई। अब यहां एक क्षण भी ठहरना उचित नहीं, यही सोचकर उलटे पांव गांव की तरफ विदा हो गया। एक बार भी पलटकर नौका पर बैठी अप्सरा की तरफ देखने की न इच्छा हुआ और न साहस।
तो क्या अब गांव में भी यह सब होने लगा है? मन विचित्र वितृष्णा में सुलगकर धधकने लगा। आंगन में लौटकर चाय पीयी। दलान पर कुछ देर ताश खेलता रहा, लेकिन मन किसी तरह शांत नहीं हुआ…
गांव से कुछ ही दूर हटकर एक पुराना शिव मंदिर है। उधर ही विदा हो गया। मंदिर के बरामदे पर बैठा था कि अंदर से किसी स्त्री का स्वर सुना।
भीतर घुसा। अंजुरी में नया तोड़ा हुआ कनेर का फूल और बेलपत्र लिये वही नौका वाली अप्सरा, वही व्यास की मानसपुत्री मत्स्यगंधा पूजा कर रही थी। मुझे देखते ही लज्जा और वेदना से कुंठित होकर वह पूजा-गृह से बाहर हो गई। इस बार उसे नजदीक से देखने का अवसर मिला था। श्यामांगी, पीठ तक झूल रही केश-राशि, दुबला शरीर, हाथों में तीन-चार लाह की चूड़ियां। कोई गहना नहीं, किंतु मिट्टी के दीप जैसा आभामय रूप।
मुझे देखते ही उसके भाग जाने की एक और वजह थी- मैं जब मंदिर में घुसा तो वह विह्वल स्वर में महादेव की प्रार्थना कर रही थी। संस्कृत का कोई मंत्र नहीं, विद्यापति की कोई नचारी नहीं, साधारण भाषा में इतने ही शब्द-
“हे महादेव! चार दिन से हमारे आंगन में चूल्हा नहीं जला है। आज हमारे ऊपर, हमारी मां पर दया कीजिये हे देव! भूख-प्यास अब सही नहीं जाती।”
उसने इतना कहा ही था कि अचानक उसकी निगाह मेरे ऊपर चली गई और वह कांप उठी। एक ही बार में उसने अंजुरी के सारे फूल-पत्ते शिवलिंग पर उझल दिये और चली गई।
एक बार तो मन में बड़ा क्रोध पनपा। मगर यह नहीं सूझा कि यह क्रोध किस पर उतारा जाये। क्या किया जाये।
इसका फल इतना ही मिला कि पूरी रात जागे रह गये। नींद नहीं हुई। रह-रह कर मन में ख्याल आता- उस पार जाने का आतुर निमंत्रण, खुले केशों के पाश, अंजुरी में भले कनेर के फूल और- “हे महादेव। भूख-प्यास अब सहा नहीं जाता।”
….
दूसरे दिन सुबह, अपने बाल-सखा जयभद्र के दालान पर चाय पीते-पीते शतरंज खेल रहा था। कुछ देर बाद कुएं की तरफ ध्यान गया। वही अपरिचिता पानी भर रही थी। जयभद्र से पूछ बैठा- “यह कौन है?”
“कोई हो, तुम्हे क्या काम है?” उसने अन्यमनस्य होकर जवाब दिया।
तो क्या? मेरी उत्सुकता बढ़ गई थी।
“अपनी आंख से तो मैंने कुछ नहीं देखा है। मगर क्या कहूं? लोक सब विचित्र-विचित्र बातें करते हैं।” शतरंज की चाल चलते-चलते जयभद्र ने कहा।
“लोग क्या कहते हैं?” शतरंज खेलना छोड़कर मैंने पूछा। फिर, काफी निहोरा करने के बद जयभद्र ने जो कथा सुनाई उसका सार यही था-
पचास वर्ष की अवस्था में गांव के लोअर स्कूल के शिक्षक श्री रघुदत्त पाठक स्वर्ग सिधारे तो उनकी पीछे रह गईं उनकी प्रौढ़ा पत्नी, अविवाहित कन्या और उन दोनों के सिर पर आठ-नौ सौ रुपये का कर्ज। स्वर्गीय पाठक जी की पत्नी तो उनके जीवित रहते ही कटिहार और पूर्णिया की हवा खाने लगी थीं, लेकिन उनके जाने के बाद उनकी बेटी भी रात-रात भर आंगन से बाहर रहने लगी है। यही बेटी है दमिया अथवा दम्मो अथवा दमयंती अथवा सांझ के अंधेरे में नाव से उस पार जाने वाली युवती।
यह दमयंती पहले बड़ी सुशील कन्या थी। लेकिन इसकी मां ने इसे भी चौपट कर दिया। और, मां का भी क्या दोष? न जमीन-जायदाद, न खेती-बाड़ी, न गहना-जेवर और न ही आंगन-कुल में कोई पुरुष। गांव के किसी व्यक्ति के हृदय में दया और माया का कोई लेश नहीं। फिर उदर-पूर्ति कैसे की जाय? फिर देह न बेचा जाये तो और उपाय ही क्या है?
जयभद्र की बातों से मन और व्यथित हो गया। दमयंती की कथा से हृदय पर दुख का आकाश गिर पड़ा।
तीन-चार दिन के पश्चात, कुछ स्थिर निश्चय करके दमयंती के आंगन की तरफ विदा हुआ।
आंगन में दमयंती अकेले बैठे धूप सेक रही थी। मुझे देखकर उठी नहीं, बैठी ही रही।
बातचीत की शुरुआत मुझे ही करनी पड़ेगी, यह सोचकर पूछा, “मां किधर गई हैं?”
तपाक से बिजली की तरह घूमकर दयमंती खड़ी हो गई।
मेरी तरफ आते हुए बोल बैठी- “मां से क्या काम है? मां गई हैं रामबाबू के दालान पर, उनको निमंत्रण देने। आज रात रामबाबू का भोजन यहीं होगा, यहीं रात भर रहेंगे। आपको मां से क्या काम…”
फिर मेरी तरफ देखते हुए दमयंती चुप हो गई। पूरी बात मेरी समझ में आ गई। रामबाबू गांव के जमींदार थे, अब कांग्रेस के वयोवृद्ध नेता हैं। दमयंती की तरह असहाय, दुखी, पतित की रक्षा करना तो उनका ही धर्म है।
फटी हुई साड़ी से आंखों के कोर को पोछती दमयंती ने कहा, “उस दिन महादेव मंदिर में आपने मेरी प्रार्थना सुनी थी न, फूल भैया? आपको भी क्या महादेव ने हमें भोजन देने, पैसा देने ही भेजा है?”
मैं क्या उत्तर देता, स्तब्ध होकर उसकी तरफ ही देखता रहा।
उसने आगे कहा, “आप लोग पुरुष हैं न। निस्सहाय नारी जाति पर दया करने में आप लोग गौरव का अनुभव करते हैं। लेकिन हम स्त्री नहीं हैं फूल भैया! हम तो मिट्टी की फूटी हुई हांडी हैं। हमारे ऊपर दया करने का कोई प्रयोजन नहीं है। आप जाइये…”
बोलते-बोलते दमयंती अपने रसोई घर में चली गई। हिचुक-हिचुक कर उसके रोने का स्वर देर तक वज्र बनकर मेरे हृदय पर गिरता रहा।
चुपचाप मैं अपने आंगन की तरफ लौट आया।
शाम के वक्त फिर उसी शिव मंदिर के पास गया। वहां दयमंती से प्रायः मुलाकात हो जाती थी, यह अनुमान फिर सच साबित हुआ। रास्ते में ही वह मिल गई, कनेर के गाछ से फूल तोड़ती। लेकिन, टोकने का साहस नहीं हुआ। बिना उनकी तरफ देखे आगे बढ़ने लगा कि वह बायें हाथ से धरती पर गिरे आंचल को संभालती हुई खिलखिला उठी, कनेर के किसी विकसित फूल की तरह। इस अप्रत्याशित हंसी में कोई व्यंग्य नहीं था, आत्मीयता थी, स्नेह था, यह समझ में आया तो मैं वहीं ठहर गया। उनका फूल तोड़ना हो गया।
पास आकर बोली, “आजकल बड़े शिव भक्त हो गये हैं, फूल बाबू! नित्य महादेव का दर्शन करने आ रहे हैं।”
इस अकस्मात स्नेह प्रदर्शन से बड़ी प्रसन्ना हुई। कहा, “भक्ति तो एक तरह का संक्रामक रोग है। आपकी भक्ति को देखकर मैं भी भोले बाबा की तरफ आकर्षित हो गया हूं।”
फिर वही खिल-खिल, मृदु हंसी, वही अपराजित मुस्कान…
कुछ ही दूरी पर गांव के कुछ परिचित लोगों के आने का आभास हुआ, उनकी तरफ इशारा करते हुए दमयंती बोली, “अब आप जाइये, वे लोग देखेंगे तो झूठ-मूठ की बातें बनायेंगे।”
और, बिना किसी उत्तर की प्रतीक्षा किये वह मंदिर के भीतर चली गई। मैं भी जयभद्र के आंगन की तरफ चला गया। जब जयभद्र की पत्नी चाय देकर चली गई और हम दोनों मित्र शतरंज की बिसात बिछाने लगे, तो जयभद्र ने हंसते हुए पूछा, “मित्र, दयमंती पसंद आ गई है क्या?”
“नहीं, ऐसा क्यों?”- मैंने लजाते हुए उत्तर दिया।
शतरंज की बिसात बिछाते हुए उसने कहा, “मित्र, रात के अंधेरे में तो कहीं जायें, कुछ भी करें इसमें कोई बुराई नहीं। लेकिन अगर दिन-दहाड़े आप दमियां से बतियाते नजर आयेंगे तो लोग बुरा ही कहेंगे।”
इसी बीच जयभद्र का नौकर कुंजा खबास दौड़ते हुए आया। हांफते-हांफते कहने लगा, “जयभद्र मालिक, जल्दी चलिये। महादेव मंदिर के पास बड़ा तमाशा हो गया है।”
जयभद्र ने पूछा, “क्या तमाशा हुआ है रे?”
“तमाशा क्या होगा मालिक। दम्मो दीदी पकड़ा गई हैं, मंदिर के पीछे… ”
इतना कह कर वह भाग गया। उसके पीछे हमदोनों मित्र भी भागे।
रामबाबू के दरवाजे पर सूई रखने की भी जगह नहीं थी। मंदिर से पकड़कर दमयंती को यहीं लाया गया था।
गांव के प्रतिष्ठित लोग बीच में बैठे थे- गांव के सरपंच महगूबाबू, मिड्ल स्कूल के प्रधानाध्यापक यादव जी, ग्रामसेवक बोकाई झा, वैद्यराज मतिराम झा, पूरबी टोले के संत चौधरी और पछियारी टोले के रामजी मिश्र और ऐसे ही कई लोग।
छप्पर के नीचे लटक रहे पांच-छह लालटेन और उसके नीचे बेहोश पड़ी दमयंती। खून से भीगे केश, पूरे चेहरे पर बिखरे हुए थे। सीप की तरह बंद आंखें, केहुनी, घुटना और कई और जगह से खून रिस रहा था।
हमदोनों मित्र जाकर रामबाबू के पास बैठ गये। रामबाबू बोले, “फूल बाबू, आप तो जानते ही हैं, दमयंती का चरित्र कैसा है। अभी मंदिर के पीछे पकड़ी गई है। इतनी मार पड़ी फिर भी नहीं कहती है कि साथ में कौन पुरुष था…”
बोकाई झा कहने लगे, “यह विचार भी नहीं किया कि धर्मस्थल है। धन्य है महारानी।”
वैद्यराज बोले, “तुम भी खूब हो। वेश्याओं के लिए तो धर्मस्थल ही असली कर्मस्थल होता है।”
चौधरी जी कहने लगे, “घोर कलयुग आ गया है, तुलसीदास ने ठीक ही लिखा था…”
और फिर तुलसीदास की चौपाई से धर्म-सभा का कार्यक्रम शुरू हुआ। मुखिया जी ने कहा, “सवाल तो यह है कि दमिया का क्या विचार किया जाये। ऐसी पापिष्ठा को गांव में रहने का कोई अधिकार नहीं है। मेरे विचार से…”
बीच में ही जयभद्र ने पूछ लिया, “लेकिन दमिया के साथ था कौन?”
महगूबाबू ने कहा, हां, यह बात भी विचारणीय है। जब तक यह पता नहीं चलता है तब तक कुछ भी करना कठिन है।
इतने में ही दमयंती को होश आ गया। वह उठकर खड़ी हो गई- “हमारे साथ कोई नहीं था। हम तो मंदिर में पूजा कर रहे थे। आपलोग झूठे हैं।” यह कहते-कहते दमयंती फिर से बेहोश होकर धरती पर गिर गई। मुझसे रहा नहीं गया। उठकर, कुंजा खबास से पानी लाने कहा। पानी से दमयंती का मुंह धुलवा दिया। उनको होश आ गया।
अंत में, निर्णय हुआ कि कल दिन के वक्त गांव के लोग जमा होकर दमयंती के बारे में पंचायती करेंगे।
इतनी ही रामायण।
पूरी रात नींद नहीं आई। चार बजे सुबह नदी किनारे गया। चारो तरफ अंधेरा था। घाट पर नाव खड़ी थी, उस पर जाकर बैठ गया। सिगरेट जला ही रहा था कि घाट पर से किसी ने आवाज दी, “उस पार जा रहे हैं फूल बाबू?”
अकस्मात भय से देह में सिहरन हुई। लेकिन, फिर वही खिल-खिल हंसी, वही अपराजित मुस्कान, वही सु-मधुर स्वर लहरी। यह तो अपरिचिता नहीं, चिरपरिचिता है।
आज दो महीने से पटना में हूं। सचिवालय में नौकरी मिल गई है। नया-टोला में पच्चीस रुपये में किराये का घर मिल गया है।
रोज सोचता हूं कि जयभद्र को चिट्ठी भेज दूं…
लेकिन, वेद-व्यास की मत्स्यगंधा का जीवन, हंसी और संगीतमय स्वर में सारे काम भूल जा रहा हूं…
और, मत्स्यगंधा अब पुष्पगंधा हो गई है।

