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  • ‘शोर’ फ़िल्म का गीत ‘इक प्यार का नग़मा है’

    युवा रंगकर्मी, अभिनेता नवल किशोर व्यास फ़िल्मों पर, ख़ासकर फ़िल्मी गीतों पर बहुत अच्छा लिखते हैं। आज उन्होंने मनोज कुमार की फ़िल्म ‘शोर’ के गीत ‘इक प्यार का नगमा है पर यह टिप्पणी लिखी है। बहुत पठनीय लगी तो सोचा आप लोगों से भी साझा किया जाये- मॉडरेटर 

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    जीवन की थकी शामें और उदास रातें हम सबकी साझी थाती हैं। यहाँ असफलता, निराशा और हार बार-बार आकर टकराती हैं। हर मोड़ पर कोई न कोई अपना छूटता है। कभी दोस्त, कभी प्रियजन, कभी कोई ऐसा जिसे खोने की कल्पना तक नहीं की थी। समय अपनी चाल से आगे बढ़ता रहता है, पर स्मृतियाँ वहीं ठहर जाती हैं, ठीक उस जगह, जहाँ से हमारा मन आगे बढ़ने से हिचकता है।
    अकेले बैठे हम उन्हीं स्मृतियों को टूटे मन से टटोलते हैं—उनसे जुडी किसी बात पर हँसी आ जाती है तो कभी कुछ याद करके आँखें भीग जाती हैं। ऐसे अकेले उदास समय में हिन्दी फ़िल्मी गीत दोस्त बन जाते हैं। ऐसे दोस्त, जो सवाल नहीं पूछते, सलाह नहीं देते, बस पास बैठ जाते हैं। “इक प्यार का नग़मा है” ऐसा ही एक गीत है। मनोज कुमार की फिल्म ‘शोर’ का यह गीत लिखा संतोष आनंद ने और संगीत दिया लक्ष्मी-प्यारे ने। यह पूरा गीत बात तो आशा, उम्मीद और आगे बढ़ने की करता है, पर सुनते-सुनते मन उदासी में डूबने लगता है। यही इस गीत का सबसे सुंदर, सबसे मानवीय विरोधाभास है—शब्द आगे की राह दिखाते हैं, संगीत पीछे छूटे जीवन को पकड़ लेता है।

    गाने में एक मां है, एक बेटा है और एक बाप है जो काम से लौट कर शामिल हुआ है। समुन्दर का किनारा है, ढलती हुई शाम है। यह किसी असाधारण क्षण का चित्र नहीं, बल्कि एक साधारण मिडिल क्लास परिवार का वीकेंड है, जहाँ सुविधाएँ सीमित हैं, पर सुख भरपूर है। कोई बड़ी महत्वाकांक्षा नहीं, कोई भारी सपने नहीं, बस साथ है और शायद यह साथ ही जीवन का सबसे बड़ा वैभव है। यह गीत उसी साधारण सुख का उत्सव है जिसकी कीमत हमें तब पता चलती है जब अक्सर वो हमारे हाथ से फिसल जाता है।

    लता के करूण स्वर में दर्शन है – “कुछ पाकर खोना है, कुछ खोकर पाना है -जीवन का मतलब तो आना और जाना है” यह पंक्ति जितनी सीधी है, उतनी ही भीतर से खुरदरी भी है। यह सांत्‍वना देती है, पर उसी सांत्‍वना में एक टीस छिपी रहती है। क्योंकि हम जानते हैं, जो खो गया, वह लौटकर नहीं आएगा और उसे खोकर जो पाया है, वह बस एक समझ है। उस समझ को लेकर चलने की सलाह हमें हर जगह मिलती है। गीता के श्लोकों में, दर्शन की पुस्तकों में, और आजकल इंस्टा रीलों में भी। पर यह समझ खुशी नहीं देती। कभी-कभी यह शांति भी नहीं देती। यह बस हमें एक रास्ते पर ला छोड़ती है। एकान्त के रास्ते पर। चुप्पी के रास्ते पर। जहाँ शोर कम है, पर मन भारी है।

    “इस प्यार का नग़मा है” उन लोगों का गीत है जो बहुत कुछ खो चुके हैं, फिर भी कड़वे नहीं हुए। जिन्होंने जाना कि लोग चले जाते हैं, पर उनकी परछाइयाँ रह जाती हैं। और उन्हीं परछाइयों के साथ जीना सीख लेना ही शायद जीवन है।

    पूरे गीत में सबसे महत्वपूर्ण तकनीकी हस्तक्षेप है—वायलिन।
    यह वायलिन हर समय मौजूद नहीं रहता। वो इंट्रो में है और बाद में मुकेश के दुखी स्वर के लिए आता है। मुकेश के दुखी स्वर में थकान है, बीता हुआ समय है और हार का मौन स्वीकार है। वायलिन यहाँ मेलोडी नहीं बजाता, वह दुख का जोड़ीदार बन जाता है।

    फ़िल्म ‘शोर’ खोने की गाथा है। मनोज कुमार का किरदार यहाँ किसी नायक की तरह नहीं, बल्कि हमारे-आपके जैसे एक साधारण आदमी की तरह सामने आता है। परिवार के सुख के लिए कमाई की जुगत में लगा, मेहनती ज़िम्मेदार आदमी। उसका पूरा संसार उसका छोटा-सा परिवार है। यही उसका सुख है, यही उसकी महत्वाकांक्षा। फिर जीवन एक झटके में सब कुछ बदल देता है। एक दुर्घटना में पत्नी की मृत्यु हो जाती है। उसी दुर्घटना में बेटा अपनी आवाज़ खो देता है। यहाँ ‘शोर’ का असली अर्थ जन्म लेता है। बाहरी शोर थम जाता है और एक पिता के भीतर का कोलाहल शुरू हो जाता है। बेटे की आवाज़ वापस लाने के लिए वह अपनी ज़िंदगी को एक ही लक्ष्य में समेट लेता है। हर सांस, हर मेहनत, हर अपमान, सब कुछ उस ऑपरेशन के लिए पैसे जुटाने में झोंक देता है। आख़िरकार बेटे का ऑपरेशन होता है। बेटे की आवाज़ लौट आती है और ठीक उसी समय, एक दूसरी दुर्घटना में पिता अपनी सुनने की शक्ति खो देता है। बेटे की जिस आवाज़ को सुनने के लिए इतने जतन किये, अब वो आवाज़ वो पूरी जिंदगी नहीं सुन पायेगा। यहाँ कोई सुखांत नहीं है। बेटे की आवाज़ अब है तो सही पर अपने बाप के लिए वह हमेशा खामोश रहेगी।

    यह मौन ही इस फिल्म का सबसे बड़ा ‘शोर’ है।

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