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  • ज्ञानरंजन की कहानी ‘बहिर्गमन’: हमारे समय की सबसे गहरी बेचैनी

    कल रात हिन्दी की साठोत्तरी कहानी विधा के सबसे मज़बूत स्तंभ रहे ज्ञानरंजन जी का निधन हो गया। उनको याद करते हुए उनकी प्रसिद्ध कहानी ‘बहिर्गमन’ पर यह लेख लिखा है लेखक-पत्रकार शिरीष खरे ने। आइये इस लेख को पढ़ते हुए ज्ञानरंजन जी को याद करते हैं- मॉडरेटर 

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    आज का समय वह है जिसमें शहर बदलने से पहले आदमी अपनी भाषा बदलता है। पहली फेलोशिप, पहला मंच, पहली अंतरराष्ट्रीय स्वीकृति। इनके साथ ही अपने कस्बे, अपनी जगह और अपने अनुभव को ‘परिधि’ मान लेने की आदत विकसित हो जाती है। संघर्ष अब मोहल्ले में नहीं, प्रस्तुतीकरण की स्लाइडों में दिखाई देता है। पीड़ा आँकड़ों में बदल जाती है और अनुभव ‘केस स्टडी’ कहलाता है। लेखक, पत्रकार और अध्येता हवाई अड्डों, सेमिनार हॉलों और डिजिटल मंचों के बीच निरंतर गतिशील रहते हैं। वे हर जगह उपस्थित हैं, पर किसी एक जगह के नहीं हैं। सवाल पूछे जाते हैं, आलोचना की जाती है, पर इस सावधानी के साथ कि कोई स्थायी रिश्ता न टूटे, कोई भविष्य का अवसर खतरे में न पड़े।

    इसी बदले हुए संदर्भ में ज्ञानरंजन की रचनाओं की ओर लौटना यह समझने का अवसर देता है कि उन्होंने अपने समय से आगे किन प्रवृत्तियों को पहचान लिया था। कई दशक पहले लिखी गई कहानी ‘बहिर्गमन’ आज इसलिए विशेष अर्थ ग्रहण करती है क्योंकि वह इसी मानसिकता की आरंभिक पहचान है। यह कहानी अपने रचना-काल में सीमित नहीं रहती, बल्कि बदलते सामाजिक और बौद्धिक परिदृश्य में और अधिक स्पष्ट होती चली जाती है। समय बदला है, पर बाहर जाने, अवसर चुनने और जिम्मेदारी से मुक्त होने की प्रवृत्ति और सुदृढ़ हुई है। इसलिए ‘बहिर्गमन’ के प्रश्न आज पहले से अधिक प्रत्यक्ष और असहज रूप में हमारे सामने खड़े हो जाते हैं।

    कहानी का केंद्रीय तनाव मनोहर के विरोध में निहित है। वह व्यवस्था से असहमत है, सवाल उठाता है और आम आदमी की भाषा बोलता है, लेकिन धीरे-धीरे यह असहमति जोखिम से खाली होती जाती है। ज्ञानरंजन यहाँ किसी एक व्यक्ति की आलोचना नहीं करते, बल्कि उस प्रवृत्ति को उजागर करते हैं जिसमें विरोध एक सुरक्षित भूमिका बन जाता है। आज के समय में, जब आलोचना मंचों, लेखों और चर्चाओं तक सीमित रह गई है और उससे वास्तविक टकराव धीरे-धीरे गायब होता जा रहा है, ‘बहिर्गमन’ इस नैतिक संकट को बहुत पहले दर्ज कर लेती है।

    सोमदत्त का चरित्र आज के वैश्विक परिदृश्य में और अधिक पहचाना जा सकता है। वह किसी एक जगह, भाषा या समाज से नहीं जुड़ा हुआ है। उसके लिए संघर्ष एक विषय है और समाज एक संदर्भ। आज जब स्थानीय अनुभव को अंतरराष्ट्रीय भाषा में ढालकर प्रस्तुत किया जाता है, तब यह कहानी सवाल उठाती है कि इस प्रक्रिया में संवेदना कहाँ चली जाती है। ‘बहिर्गमन’ यह नहीं कहती कि वैश्विक होना गलत है, बल्कि यह दिखाती है कि जब अनुभव और विश्लेषण के बीच दूरी बढ़ जाती है, तब विचार खोखले होने लगते हैं।

    स्त्री के संदर्भ में यह कहानी आज भी असहज करती है। मनोहर का निजी जीवन यह स्पष्ट करता है कि सार्वजनिक प्रगतिशीलता और निजी आचरण के बीच कितना गहरा अंतर हो सकता है। विचारों की भाषा में बराबरी और व्यवहार में सुविधा—यह द्वंद्व आज के समाज में भी उतना ही जीवित है। ज्ञानरंजन इस विरोधाभास को किसी नारे की तरह नहीं, बल्कि जीवन की सामान्य प्रक्रिया की तरह दिखाते हैं, जिससे उसकी क्रूरता और स्पष्ट हो जाती है।

    कहानी का वाचक, जो न तो बाहर जाता है और न ही किसी वैचारिक मंच पर दिखाई देता है, आज के संदर्भ में विशेष महत्व रखता है। उसका ठहरना किसी असमर्थता का संकेत नहीं, बल्कि स्मृति और जिम्मेदारी को बचाए रखने का प्रयास है। ऐसे समय में जब निरंतर आगे बढ़ना ही सफलता मान लिया गया है, वाचक का चुनाव एक नैतिक विकल्प की तरह सामने आता है। वह उस दृष्टि का प्रतिनिधि है जो शोर के बीच भी देखने और याद रखने का साहस रखती है।

    इस प्रकार, ‘बहिर्गमन’ हमारे समय की सबसे गहरी बेचैनी को उजागर करती है। यह कहानी दिखाती है कि बाहर जाना जितना सहज होता जा रहा है, भीतर टिके रहना उतना ही कठिन। ज्ञानरंजन की यह रचना किसी बीते समय की टिप्पणी नहीं, बल्कि वर्तमान की कसौटी है, जो यह पूछती है कि हम किस दिशा में बढ़ रहे हैं और रास्ते में क्या-क्या छोड़ते चले जा रहे हैं। यही प्रश्न ‘बहिर्गमन’ को समय के साथ और अधिक प्रासंगिक बनाता है।

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