कल कवि-संस्कृतिकर्मी अशोक वाजपेयी कल 85 वर्ष के हो जाएँगे। कवि-संपादक पीयूष दईया क़रीब दो साल से उनसे लंबी बातचीत कर रहे हैं। उसी बातचीत का एक अंश आज पढ़िए जो प्रसिद्ध तबलवादक ज़ाकिर हुसैन को लेकर है। आइये पढ़ते हैं और अशोक वाजपेयी को जन्मदिन की शुभकामनाएँ देते हैं- मॉडरेटर
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युवा उपस्थिति
ज़ाकिर हुसैन से मेरी पहली मुलाक़ात आयोजक के रूप में हुई थी। वे युवा तबला-वादक के रूप में उभर रहे थे। उन दिनों—जब मैं भोपाल में था—अक्सर तबला-वादकों की तलाश रहती थी। अगर नये तबला-वादक मिल जाएँ तो अच्छा होता था। उसके दो व्यावहारिक पक्ष थे। एक, नये तबला-वादकों को इस बहाने प्रोत्साहन मिल जाता था। दूसरा, प्रतिष्ठित तबला-वादकों के बजाय उन पर ख़र्च कम आता था। इस मामले में उस्ताद अमजद अली ख़ाँ की भूमिका को भी याद करना चाहिए। अमजद अली ने बहुत सारे युवा तबला-वादकों को प्रोत्साहित किया, अपने साथ उनको बजवाकर। काफ़ी ढूँढ़-ढूँढ़कर लाते थे। बाद में, उसमें से कुछ तबला-वादक, बहुत प्रतिष्ठित और सफल भी हुए।
मक़बूल संगतकार
ज़ाकिर हुसैन में शुरू से ही, उनके स्वभाव और उनके वादन में, एक तरह का प्रसन्न भाव था। वे तबले पर जो बारीक काम या तालों का जटिल संगुंफन कर रहे थे, उसको लेकर उनके मन में प्रसन्नता का भाव जागता था जो दिखायी देता था। पिछले पचास बरसों में उनसे अधिक हँसमुख कोई शास्त्रीय संगीतकार नहीं हुआ। बहुत सारे संगीतकार आपसी बातचीत में विनोदप्रिय होते हैं, चुटकुले सुनाते हैं और मज़ाक़िया बातें करते हैं, लेकिन सार्वजनिक प्रस्तुति के समय ख़ासे गम्भीर नज़र आते हैं। गाते हुए उनमें से कईयों की मुखमुद्रा बहुत गड़बड़ा भी जाती थी। ज़ाकिर हुसैन के हँसमुख स्वभाव का श्रोताओं पर गहरा व बहुत अनुकूल प्रभाव पड़ता था—वे भी उस प्रसन्न भाव में शामिल हो जाते थे जो ज़ाकिर अपनी मुखमुद्रा से व्यक्त करते थे। ज़ाकिर बहुत विनयशील थे, ख़ासकर बुज़ुर्ग संगीतकारों के प्रति। गायन में और वादन में, पिछले पचास बरसों में, ऐसा कोई मूर्धन्य नहीं है जिसके साथ ज़ाकिर हुसैन ने संगत न की हो। वादन में पण्डित रविशंकर, उस्ताद विलायत ख़ाँ, अली अकबर ख़ाँ, पण्डित शिवकुमार शर्मा, पण्डित हरिप्रसाद चौरसिया आदि। गायन में पण्डित भीमसेन जोशी, गंगूबाई हंगल, पण्डित जसराज इत्यादि गायक। कथक में सितारादेवी, पण्डित बिरजू महाराज, दुर्गालाल—लगभग सबके साथ उन्होंने बहुत समरस संगत की है। ज़ाकिर हुसैन की संगत बहुत समझ-बूझ की संगत थी। कई बार संगतकार आक्रान्त होने की कोशिश करता है। वैसी कोई कोशिश ज़ाकिर नहीं करते थे। ज़ाकिर के यहाँ संगत में भी विनय, समझ और साहचर्य है जो गायन या वादन की मूल प्रस्तुति को ज़्यादा सुन्दर, ज़्यादा गतिशील बनाता है। इसलिए वे संगत के क्षेत्र में सबसे मक़बूल और सबसे वांछनीय संगतकार के रूप में उभरे।
भारत भवन में
ज़्यादातर तबला संगत का वाद्य जाना-माना जाता रहा है, लेकिन ज़ाकिर हुसैन ने तबले को एकल वाद्य के रूप में प्रतिष्ठित करने में भी भूमिका निभायी। उसके पहले अल्लारखा ख़ाँ, किशन महाराज व औरों ने भी इस क्षेत्र में प्रयत्न किया है। ये प्रयत्न तबले को एक एकल वाद्य के रूप में पहचान दिलाते हैं। ऐसा कम होता था कि एक पूरी प्रस्तुति सिर्फ़ तबला-वादन की हो।
एक बार भारत भवन में मैंने ज़ाकिर की एकल प्रस्तुति रखी। इतनी भीड़ उमड़ी कि मंच की थोड़ी-सी जगह को छोड़कर सारी जगह लोग भर गये; उसमें ज़्यादातर युवा थे। उस समय मध्य प्रदेश विधानसभा में संगीत-प्रेमी सुन्दरलाल पटवा प्रतिपक्ष के नेता थे—जिन्हें भारत भवन नष्ट करने का दुःश्रेय जाता है—उनको जगह नहीं मिली। इतनी भीड़ थी।
शास्त्रीय संगीत की लोकप्रियता को बढ़ाने में ज़ाकिर हुसैन की भूमिका रही है। लोकप्रियता बढ़ाने में एक हिस्सा युवाओं को आकर्षित करने का भी रहा है। उन दिनों वे ख़ुद भी युवा थे। सुदर्शन और हँसमुख व्यक्ति थे। हँसी-मज़ाक़ भी करते थे। इस सबका बहुत गहरा प्रभाव पड़ता था; युवा लोग बहुत आकर्षित होते थे। भारत भवन मेंं, उनके वादन के समय, श्रोताओं में दो तिहाई तो युवा थे जो इंजीनियरिंग और मेडिकल कॉलेज वगैरह के छात्र थे। ज़ाकिर के वादन ने युवाओं के बीच जो लोकप्रियता हासिल की वह भी शास्त्रीय संगीत के क्षेत्र में दुर्लभ उपलब्धि है।
निरन्तरता का कल्पनाशील विस्तार
बाद में उनका एक पक्ष ज़्यादा उभरकर सामने आया। हमारे जिन शास्त्रीय संगीतकारों ने पश्चिमी संगीत के साथ कुछ संवाद और सहकार किया, उनमें पण्डित रविशंकर और उस्ताद अली अकबर ख़ाँ तो हैं ही, लेकिन ज़ाकिर हुसैन भी थे। ज़ाकिर हुसैन ने अपनी शास्त्रीयता को शिथिल या मन्द या कोई समझौता किये बिना पश्चिमी संगीत की दुनिया में अपनी जगह बनायी। उनसे पहले यह जगह सिर्फ़ पण्डित रविशंकर और उस्ताद अली अकबर ख़ाँ ने ही बनायी थी। उनकी अथक प्रयोगशीलता और कल्पना-शक्ति, संगीत-लय-ताल की उनकी गहरी समझ ने उन्हें विश्वसंगीत और भारतीय संगीत के बीच संवाद और सहकार का एक स्थपति बनाया। उन्होंने अपने पिता-गुरु उस्ताद अल्ला रक्खा ख़ां से जो विरासत में पाया था उसे बख़ूबी सहेजा, सजीव और सक्रिय किया और उसमें सर्जनात्मक इज़ाफ़ा और विस्तार भी किया। इसे परम्परा को आधुनिक और पुनर्नवा बनाने के जतन के रूप में देखा जा सकता है। ज़ाकिर जैसे संगीतकार ने हमें बताया कि शास्त्रीय परम्परा विजड़ित या रूढ़ नहीं है : वह जीवित है और नये प्रयोगों और विस्तार प्रति सहज उन्मुख है। आधुनिकता, ज़ाकिर के यहाँ, हस्तक्षेप नहीं है, वह निरन्तरता का कल्पनाशील विस्तार है—सहज और अनिवार्य।
पश्चिमी संगीत सारे संसार के संगीत को निगल गया—न चीनी संगीत बचा, न जापानी संगीत। थोड़ा-बहुत बचा होगा, पर अब वहाँ भी टोक्यो फ़िल्हार्मोनिक और बीजिंग फ़िल्हार्मोनिक हैं। हमारे यहाँ नहीं हैं। एक तरह से हमारे शास्त्रीय संगीत ने पश्चिमी शास्त्रीय संगीत के बरक्स अपने को प्रतिष्ठित किया। यह इस बात से भी ज़ाहिर है कि दशकों से विदेश में रहने के बावजूद ज़ाकिर ने अपनी शास्त्रीयता को शिथिल या मन्द नहीं होने दिया। वे उस पर जमे रहे और उसका पश्चिमी शास्त्रीयता से संवाद और सहकार कराने में अग्रणी रहे।
अभिव्यक्ति की सम्भावनाएँ
तबले पर अभिव्यक्ति की सम्भावना उतनी नहीं है जितनी गायन में है। शायद उतनी भी नहीं है जितनी सितार और सरोद में है। तबले में जो अभिव्यक्त हो सकता है उसकी सीमा है, क्योंकि ताल और लय में ही सब कुछ व्यक्त करना उसकी लगभग विवशता है। इस विवशता को भी बड़े तबला-वादकों ने अतिक्रमित किया, जिनमें किशन महाराज, अल्लारखा ख़ाँ, अहमद जान थिरकवा, सुरेश तलवलकर जैसे लोग रहे हैं। यह अतिक्रमण ज़ाकिर ने भी किया; उन्होंने दोनों तरह के अनुभवों का बहुत ही सृजनात्मक लाभ उठाया—एक ओर हमारी अपनी शास्त्रीय परम्परा में अभिव्यक्ति की गहराई को जानते हुए, उसके साथ संगत करते हुए, और, दूसरी तरफ़, पश्चिमी संगीत में जो वितान और एक तरह का विस्तार है, उससे प्रतिकृत होते हुए। इसका तकनीकी विश्लेषण करने में मैं सक्षम नहीं हूँ, लेकिन मुझे लगता है कि तबला जो कुछ बोल सकता है, उसके बोलने का जो भूगोल है, उसको भी ज़ाकिर हुसैन ने विस्तृत किया। उनके यहाँ तबला ऐसी चीज़ें और ऐसी अभिव्यक्ति करने लगा जो उसने शायद पहले नहीं की होगी। या बहुत कम की होगी। कई बार तबला बजाते हुए ज़ाकिर कई तरह के बिम्बों से (—जैसे, बारिश हो रही है या हवा चल रही है—) अपने ताल की छवि को समझाते थे।
बैतूल में
याद आता है कि एक बार मैंने उनको बैतूल भेजा। हमने ‘ज़िला उत्सव’ भी शुरू किये थे; उसमें किसी ‘उत्सव’ में हमने उन्हें भेजा था। बैतूल जैसी छोटी जगह में ज़िला प्रशासन के लोगों को संगीत के आयोजन करने और संगीतकारों से व्यवहार करने का कोई अनुभव नहीं था, हालाँकि, मैंने एक छोटी-सी नियमावली भी बना रखी थी—क्या करना चाहिए, क्या नहीं करना चाहिए। यह नियमावली सबको भेज रखी थी। शायद कोताही हुई या कुछ कमी रह गयी होगी। वहाँ से लौटकर उन्होंने कहा, ‘‘वहाँ बड़ा मज़ा आया।’’ मैंने पूछा, “कैसे मज़ा आया।” उन्होंने कुछ इस तरह के क़िस्से बताये कि जब वे तबला बजा रहे थे तो फ़र्श भी बोलता था! शायद नीचे लकड़ी का कुछ तख़्त होगा। स्थानीय अधिकारियों को यह सब अन्दाज़ नहीं था कि तख़्त के ऊपर गद्दा या कुछ होना चाहिए। ज़ाकिर ने उसका बहुत मज़ा लिया; उनके बताने में शिकायत का भाव नहीं था कि आपने यह कैसी जगह भेज दिया! उनके मन में श्रोताओं के प्रति भी एक तरह की कृतज्ञता होती थी जो व्यक्त हो जाती थी। जैसे, बैतूल जैसी जगह में उनका तबला-वादन होना।
संगीतकारों का एक समूह
उनसे थोड़ा परिचय और बढ़ा जब मैं दिल्ली आ गया था। अरविन्द पारेख ने संगीतकारों का एक समूह बनाया था जो साल में एक-दो बार यह विचार करने के लिए मिलता था कि शास्त्रीय संगीत को बढ़ावा देने के लिए, उसका विस्तार करने के लिए, क्या कुछ किया जाये। उस समूह में पण्डित जसराज, पण्डित शिवकुमार शर्मा, पण्डित हरिप्रसाद चौरसिया, पण्डित राजन-साजन मिश्र, विजय किचलू, बालमुरली कृष्ण, कर्नाटक के कुछ संगीतकार और ज़ाकिर हुसैन भी सदस्य थे। मैं उसका ग़ैर-संगीतकार सदस्य था। बाक़ी सब संगीतकार ही थे। वहाँ हमारी मुलाक़ात होती थी। ज़ाकिर हुसैन में विनोद भाव था। प्रसन्नता और विनोद, दोनों, एक साथ चलते थे। कई बार समूह में इस तरह के प्रश्न उठते थे कि क्या शास्त्रीय संगीत की प्रस्तुति का फ़ार्मेट बदला जाना चाहिए? इस पर ज़ाकिर का इसरार होता था कि पहले से जो फ़ार्मेट चला आ रहा है, जिसकी प्रतिष्ठा-सी है, उसमें फेरबदल करना ठीक नहीं होगा। हमको अपनी शर्तों पर ही श्रोताओं को अभिभूत करना चाहिए। उनके हिसाब से अपने फ़ार्मेट में कुछ परिवर्तन/फेरबदल नहीं करना चाहिए। इस मामले में कर्नाटक संगीत में प्रस्तुति का रूपाकार अधिक रूढ़ है, पर अधिक मान्य भी है। हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत में वह फ़ार्मेट रूढ़ तो है, लेकिन इतना मान्य नहीं है। उस पर तरह-तरह के आयोजकों और तरह-तरह के लोगों का दबाव पड़ता रहता है कि इसको थोड़ा बदला जाए। मसलन, छोटा ख़याल, बड़ा ख़याल के गाने की अवधि कम कर दी जाए, कुछ क्षिप्रता बढ़ा दी जाए, द्रुतगति बढ़ा दी जाए इत्यादि। ये थोड़े गम्भीर प्रश्न हैं, क्योंकि इससे शास्त्रीय संगीत की अपनी संरचना में भी परिवर्तन होने लगेंगे। संगीतकारों के उस समूह में इन बातों पर जब-तब विचार होता था। ज़ाकिर हुसैन से यह अपेक्षा की जाती थी कि वे प्रयोगशीलता को अधिक समर्थन देंगे, क्योंकि वे पश्चिम में प्रयोगशील रहे थे, लेकिन वे फ़ार्मेट को लेकर इसरार करते थे कि जो है, उसको क़ायम रखना चाहिए।
जाड़ों में
ज़ाकिर हुसैन कैलिफ़ोर्निया में रहने लगे थे लेकिन जाड़ों में भारत आ जाते थे, जैसे कि रविशंकर और अली अकबर ख़ाँ भी। जाड़ों में ही सबसे अधिक संगीत सम्मेलन/समारोह होते हैं, जिनमें इनको बुलाया जाता है। एक तरह से अपनी धरती से फिर से रस पोषण पाने के लिए और अपनी शास्त्रीयता को वहीं प्रकट करने के लिए जहाँ से वह उपजी है।
अप्रत्याशित
अच्छे शास्त्रीय संगीत में अप्रत्याशित का तत्त्व हमेशा होता है। यह संगतकार के लिए इस अर्थ में अप्रत्याशित नहीं होता कि उसने सोचा नहीं था कि ऐसा अप्रत्याशित होगा। वह जानता है कि अप्रत्याशित तो होगा। उसकी सतर्कता और तत्परता इस बात में है कि जैसे ही अप्रत्याशित प्रकट हो, वैसे ही वह उसको पकड़ ले और आगे बढ़ा दे। संगतकार के एक काम को अक्सर ध्यान में नहीं लिया जाता। वह सिर्फ़ स्वरों में घटित हो रहे को ताल में घटित करना या सुरों के संयोजन के बरक्स एक समकक्ष और समान्तर साहचर्य संयोजन पैदा करना भर नहीं है। कई बार अच्छा संगतकार (ज़ाकिर हुसैन बहुत अच्छे संगतकार थे ही) ताल में भी कुछ अप्रत्याशित करता है, जिससे मुख्य संगीतकार को भी अनपेक्षित का अनुभव होता है —उससे भी यह अपेक्षा होती है कि वह इस अप्रत्याशित को ग्रहण करके आगे ले जाए। एक तरह से अच्छी संगत तब होगी जब दोनों ही अपने-अपने अप्रत्याशित को, एक दूसरे के पाले में, उसी तरह से व्यक्त होते देख सकें। अन्ततः अप्रत्याशित, स्वरों में ही, सम्भव है। स्वर से मुक्त होकर कोई अप्रत्याशित नहीं होने वाला। स्वरों की पकड़ और समझ अगर पूरी है, गहरी है और तत्पर है तो अप्रत्याशित का साथ देने में या अप्रत्याशित को साथ लेने में बहुत जोखिम नहीं है, बहुत कठिनाई नहीं होगी।
जतन और जगह
पश्चिमी वर्चस्व की अवधारणा और उसके विश्व-व्यापीकरण के चलते इतना ही मुमकिन हो पाया है कि पश्चिम ने भारतीय शास्त्रीय संगीत को एक स्वतन्त्र संगीत के रूप में थोड़ा-बहुत पहचानने का जतन किया है। जिन भारतीय शास्त्रीय संगीतकारों ने अपने संवाद, अपनी प्रयोगशीलता, अपने खुलेपन के कारण पश्चिम में थोड़ी-बहुत जगह बनायी है, और उसके कारण उनको जो थोड़ी-बहुत जगह मिली है, वह जगह बहुत कम है। वह कोई ऐसी जगह नहीं है जिसने संगीत को वैसे बदल दिया हो जैसे अफ्रीकी संगीत ने ‘जैज’ के रूप में अपनी पैठ बना कर पूरे दृश्य को बदल दिया। ऐसी पैठ हमारी नहीं बनी। इसके कारणों में जाया जा सकता है। यह कुछ-कुछ वैसा ही है जैसे हमारे उत्कृष्ट आधुनिक साहित्य ने पश्चिमी साहित्य जगत में वैसी जगह नहीं बनायी, जैसी जगह भारत से अंग्रेज़ी में लिखने वालों ने बना ली। उसके परिणाम या दुष्परिणाम का एक पक्ष यह है कि संसार भर में ऐसा भ्रम फैल गया है कि भारत का श्रेष्ठ साहित्य अंग्रेज़ी में लिखा जाता है, कि भारत के श्रेष्ठ लेखक अंग्रेज़ी में लिखने वाले लेखक हैं। हम जानते हैं कि ये दोनों ही बातें निराधार हैं, सिरे से ग़लत हैं। पश्चिमी संगीत में अपने संगीत से बिल्कुल अलग क़िस्म के संगीत को जगह देने की कोई इच्छा या आकांक्षा नहीं है, न पहले रही है : यह रेखांकित भर किया जा सकता है, इसका कोई उपाय नहीं है।
प्रसन्नता, विस्मय और रहस्य
रविशंकर में यह गुण था कि उन्होंने बहुत सारे प्रतिभाशाली युवतर लोगों को आगे बढ़ाया। इसका एक कारण यह रहा कि शुरू में रविशंकर के साथ चतुरलाल संगतकार थे; उनके साथ उनका बहुत अच्छा तालमेल था। दुर्भाग्य से, चतुरलाल की मृत्यु हो गयी। फिर एक तरह से अल्लारक्खा ख़ाँ, और उनके थोड़े वयोवृद्ध हो जाने के बाद ज़ाकिर हुसैन की संगत मिली। इस तथ्य को भी ध्यान में रखना चाहिए।
मैंने पण्डित बिरजू महाराज के साथ ज़ाकिर हुसैन की जुगलबन्दी देखी-सुनी है। एक बार पण्डित दुर्गालाल के साथ भी देखी है। बिरजू महाराज के साथ ज़ाकिर हुसैन की जुगलबन्दी ख़ास होती थी। दोनों ही कलाकार लय के अधिपति। बिरजू महाराज को ‘लय का सम्राट’ कहा जाता था और ज़ाकिर हुसैन में भी लय की पकड़ बहुत ज़बरदस्त थी। इसका एक अनिवार्य परिणाम यह था कि दोनों में साथ होते हुए उपज अंग बहुत प्रबल हो जाता था—ऐसा कुछ करना जो अप्रत्याशित के अहाते में जाता है। जैसे, यकायक कुछ सूझ जाना। बिरजू महाराज में लय के साथ खेलने का बड़ा प्रबल भाव था। और ज़ाकिर को खेलना आता था। उनके साथ भी खेलना, फिर उनको अपनी अप्रत्याशित लयात्मक उपज से खिलाना। मुझ पर जितना प्रभाव बिरजू महाराज की प्रस्तुति का पड़ा था, उससे कम प्रभाव ज़ाकिर हुसैन की संगत का नहीं पड़ा था। आयु में ज़ाकिर हुसैन, बिरजू महाराज से, कोई दस-पन्द्रह बरस युवतर थे। दोनों जिस एक और चीज़ का साझा करते थे वह था—विस्मय का भाव। जब उपज अंग में अप्रत्याशित घटित होता था, तो बिरजू महाराज को भी विस्मय होता था कि वाह! क्या घटित हो गया, और उतना ही विस्मय ज़ाकिर हुसैन को भी होता था। दोनों के चेहरे पर विस्मय का भाव होता था। अपेक्षाकृत अधिक व्याकरण-ग्रस्त होने के बावजूद प्रसन्नता, विस्मय और रहस्य के भाव जागते थे। इस अर्थ में रहस्य का भाव कि अब आगे क्या होगा, कहाँ से कौन क्या निकाल लायेगा, यह रहस्य के पर्दे में है। पता नहीं कि अब आगे क्या होगा। दूसरी तरफ़, जो हो रहा है उस पर विस्मय हो रहा है। विस्मय और रहस्य का भाव मिलकर प्रसन्नता के भाव में लीन हो रहे होते। इससे प्रस्तुति की उज्ज्वलता, सजलता आकर्षण और उसका प्रभाव बहुत बढ़ जाते थे।
तबले के घराने
तबले के कई घराने हैं। ज़ाकिर हुसैन पंजाब घराने से थे। शास्त्रीय संगीत में, ख़ासकर गायन और वादन के, जो बड़े घराने बने और जिनके नाम उन शहरों पर हैं जहाँ वे पले-बढ़े, उन घरानों में शायद ही कोई तबले का घराना हुआ। तबले के घराने अन्यत्र हुए। जैसे, पंजाब और पटियाला घराना बना, उनमें आपस में कोई सम्बन्ध नहीं है; वे स्वतन्त्र रूप से विकसित हुए। कुल मिलाकर, तबले के घराने खुले हुए घराने थे—इस अर्थ में खुलापन था कि उनके अपने घराने को विशिष्टता और उनकी पहचान देने वाली चीज़ें तो थीं, लेकिन उनमें दूसरे घराने की किसी चीज़ को करने लिए भी खुलापन था। हर एक घराने में था। इनमें से ज़्यादातर को शायद उस समय इस बात का ख़्याल भी नहीं था कि तबले को एकल वाद्य के रूप में स्वीकार किया जा सकता है। ज़्यादातर इन घरानों में संगत का भाव ही केन्द्रीय था। संगत करने के लिए खुलापन और दूसरे घरानों के साथ संवाद व साहचर्य की सम्भावना को ध्यान में रखना ज़रूरी हो जाता था। मसलन, बनारस का तबले का घराना सिर्फ़ बनारस की गायकी के साथ ही नहीं था। बनारस का दूसरा प्रमुख वाद्य, सारंगी या शहनाई, कई घरानों की गायकी या वादन के साथ होता ही था। किशन महाराज, गुदई महाराज और जो तबलावादक थे, उनको याद किया जा सकता है।
संगत के पक्ष
ऐसा होता रहा है कि किसी गायन या वादन की प्रस्तुति में मुख्य कलाकार संगतकार को भी बीच-बीच में स्वतन्त्र रूप से कुछ करने की जगह या अवकाश देता रहे। यह दक्षिण में लगभग उनके पारम्परिक रूपाकार का ही हिस्सा है। हमारे यहाँ ऐसा रूपाकार का हिस्सा नहीं है, पर व्यवहार में ऐसा होता ही है। अक्सर “घरानेदारी गायकी”, अपने घराने के प्रति वफ़ादार रहते हुए, दूसरे घरानों के तत्त्व का भी इस्तेमाल करती है—कभी सुन्दरता, कभी अलंकरण, कभी किसी नाटकीयता के लिए। अक्सर गायक-वादक कहते हैं यह रामपुर की चीज़ है या यह ग्वालियर से आया है वगैरह। भले ही वे किराना घराने के गायक हों या वादक। मुख्य गायन या वादन में भी दूसरे घरानों की कुछ न कुछ छवियाँ, अन्तर्ध्वनियाँ समाहित होती हैं। जैसे गायन या वादन में दूसरे घरानों की अन्तर्ध्वनियाँ हैं, वैसे ही संगत में भी होता है। मसलन, तबले के घराने अलग हैं, साथ में एक और घराने की संगत है और इन दोनों में तालमेल सम्भव होता है। अच्छी या बुरी संगत कही ही जा सकती है, लेकिन संगत की अपनी कोई “शैली” बनती हो, ऐसा नहीं कह सकता। ‘अच्छी संगत’ वह होगी, जिसमें संगतकार मूल वादन या मूल गायन को अतिक्रान्त न करे और उसके साथ चलते हुए जब-तब उसमें कुछ दिलचस्प या रोचक या सुन्दर जोड़ दे। जैसे ज़ाकिर हुसैन करते थे। हो सकता है कि कई बार बीच में गायक या वादक थकने लगे या कुछ अलसा जाए, तो उस समय संगतकार सहारा भी बन सकता है। संगत करने की विद्या जटिल है; वह सतर्कता और तत्परता की माँग करती है। सार्वजनिक मंच पर इतना समय नहीं है कि बहुत सोच-विचार का अवकाश मिल सके, कि यह करेंगे, यह नहीं करेंगे : सब एक साथ होता है, पल भर में करना होता है। उस पल भर की पकड़ और उस पल को समझना ज़रूरी है।
सभी तबला-वादकों ने नृत्यकारों के साथ संगत की है, ऐसा मुझे नहीं लगता। लेकिन लगभग सभी प्रसिद्ध तबला-वादकों ने की है, जिनमें किशन महाराज, गुदई महाराज और ज़ाकिर हुसैन आदि शामिल हैं। हमारे यहाँ नृत्य की कम से कम आठ “शैलियाँ हैं और बाक़ी शैलियों में उनके अपने वाद्ययन्त्र हैं—पखावज और मृदंगम्; वहाँ तबले की जगह नहीं हो सकती। कथक में इन सभी बड़े तबला-वादकों ने कथक के बड़े कलाकारों के साथ संगत की है, चाहे वे किसी घराने के हों। जैसे, दुर्गालाल जयपुर के थे, बिरजू महाराज लखनऊ के और सितारादेवी बनारस की।
परस्परता
ज़ाकिर हुसैन और शिवकुमार शर्मा की भी बड़ी जोड़ी रही थी। ये लोग एक ही मण्डली के थे। इस मण्डली को साथ लाने में बहुत तक विजय किचलू की भूमिका है। वे हर वर्ष, तीन-चार महीने के लिए, बहुत सारे संगीतकारों को लेकर अमरीका जाते थे। वहाँ एक बस में ये सब लोग शहर-दर-शहर सफ़र करते थे और कार्यक्रम देते थे। एक तरह का चलता-फिरता शास्त्रीय समागम। इस मण्डली के प्रमुख संगीतकारों में शिवकुमार शर्मा, हरिप्रसाद चौरसिया, ज़ाकिर हुसैन आदि थे। एक कारण यह भी है कि पश्चिम को हमारा गायन समझना थोड़ा मुश्किल है, क्योंकि वह शब्द-भाषा अलग है। वादन अपेक्षाकृत अधिक सम्प्रेषणीय है; वहाँ शब्द की बाधा नहीं है। इन लोगों के साथ ज़ाकिर की बहुत अच्छी दोस्ती भी हुई। वे इनके लिए सिर्फ़ संगतकार ही नहीं हुए, बल्कि दोस्त भी हुए। जब दोस्ती होती है, तो फिर संगत एक और ऊँचे स्तर पर पहुँच जाती है, जहाँ एक नये क़िस्म की परस्परता विकसित हो जाती है। परस्परता संगत से थोड़ा ऊँचे उठकर है, जिसमें एक दूसरे का सिर्फ़ एहतराम भर नहीं है, बल्कि ख्याल भी है, जगह और अवसर भी। मैंने देखा है कि शिवकुमार शर्मा और हरिप्रसाद चौरसिया के प्रति ज़ाकिर हमेशा बहुत विनयशील रहते थे। इनको बड़ा कलाकार मानकर इनके प्रति जो आदर होना चाहिए, वह उनके व्यवहार में बहुत सहज भाव से व्यक्त होता था।
संवाद और सहकार
ज़ाकिर हुसैन ने हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत और कर्नाटक संगीत की परम्पराओं को पश्चिमी संगीतकारों को समझाने में भी भूमिका निभायी, कि इस संवाद और सहकार में कितनी सम्भावना हो सकती है। ऐसा नहीं है कि यह बिल्कुल नयी पहल है, लेकिन जितने व्यावहारिक रूप से उन्होंने इस सहकार को न केवल ठोस रूप दिया, बल्कि सफल भी बनाया, वह ध्यान देने योग्य है। उसके लिए उनको ग्रैमी अवार्ड आदि कई पुरस्कार मिले हैं। उनकी यह भूमिका बहुत महत्त्वपूर्ण है। पश्चिमी संगीत की व्यापक दुनिया में ये प्रयोग इधर-उधर थोड़े-बहुत रोचक ढंग से होते रहे हैं और सराहे भी जाते हैं, बल्कि पुरस्कृत भी हो जाते हैं, लेकिन पश्चिमी संगीत में अभी तक कोई बहुत बड़ा हस्तक्षेप सम्भव नहीं हुआ है। ज़ाकिर का जाना इसलिए और दुखदायी है कि शास्त्रीय संगीत में मूर्धन्यता लगातार उतार पर है और उनका देहावसान शास्त्रीयता और मूर्धन्यता दोनों की समान क्षति है।

