पिछले क़रीब एक दशक में सोशल मीडिया के माध्यम से जिन शायरों को जाना-सराहा उनमें संजू शब्दिता का नाम मेरे ज़ेहन में सबसे पहले आने वाले नामों में है। इस साल पुस्तक मेले में उनकी शायरी का संकलन राजपाल एंड संज प्रकाशन से आया है, जिसकी एक भूमिका प्रसिद्ध शायर शारिक़ कैफ़ी साहब ने लिखी है। आइये ‘साये से मुख़ातिब’ नामक उस संकलन की भूमिका पढ़ते हैं- मॉडरेटर
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आजकी शायरी, इंसान के दाख़िली अनासिर की लफ्ज़ी तस्वीर है ।
आज इंसान को बेशतर ऐसे मसाइल दरकार हैं जिनका सरोकार उसके रोज़ो शब से, उसके दर्द ओ कर्ब से, उसकी मःआशी तग ओ दौ से, उसकी सैर ओ तफ़रीह से, उसके लतीफ़ जज़बात की तशकीले नौ से है। वह हर आन हर नये मसःअले से नबर्द आज़मा है, अपने शःऊर के साथ और अपने अपने तमाम तर वसाइल के साथ। यह सब कुछ किसी फ़नकार के यहां तख़्ययुल की दुनिया आबाद किये हुए है। ऐसी दुनिया जिसमें उसके अफ़कार के ताने-बाने तैयार होते हैं, रंग बनाए जाते हैं, तस्वीरों के ख़ाके खींचे जाते है। यह सारे अनासिर किसी ख़ाम शक्ल में फ़नकार के ज़हन से अल्फ़ाज़ की मदद से कशीद किये जाते हैं।
आज की शायरी अल्फ़ाज़ की हुस्ने तरतीब का नाम नहीं, भारी भरकम अल्फ़ाज़, तराकीब से सजे हुए शेर को आज के क़ारी / सामेअ ने क़रीब क़रीब ख़ारीज कर दिया । याद रहे मैं महज़ हुस्ने तरतीब यानी कोरी लफ़्फ़ाज़ी की बात कर रहा हूँ, ज़ाहिर है अल्फ़ाज़ के बेहतरीन इस्तेमाल से किसे एतराज़ हो सकता है।
नये शायरो / शायरात की फ़हरिस्त बनाई जायेगी तो संजू शब्तिदा की शायरी सरे फ़हरिस्त होगी। आपने गहरी समझ, और ख़ूबसूरत लहजे को अपना शियार बनाया। वैसे तो ग़ज़ल की फ़िज़ा हर क़िस्म के मज़मून के लिये बड़ी वुसःअत रखती है, मगर इन मज़ामीन से आफ़ाक़ी और नफ़सियाती रब्त पैदा करना और उसको मुसतक़िल मिज़ाजी के साथ निभाना बड़ी बात है। एक संजीदा फ़नकार जिसको अपने इतराफ़ से भी आगाही हो और अनफ़ुस से भी वही सुख़न की यह राह तय कर सकता है।
मुझे नसीब मिला है किसी जज़ीरे सा
ख़ुशी के बीच में रह कर उदास रहना है
अब मज़कूरा बाला शेर में जिस क़दर तख़्ययुल की बुलंदी को सराहा जाना चाहिये, उतनी ही अलामतों की दाद देनी चाहिये। यानी क़िस्मत को जज़ीरे से मनसूब कर, ख़ुशी और उदासी को उसके गिर्द hand in hand रखने का तस्व्वुर दिया है। जज़ीरा ऐसा टापू है जो पानी से घिरा रहता है। यहां हमा वक़्त पानी की मौजूदगी फ़रहत और ख़ुशी की अलामत है तो टापू का सन्नाटा और अकेला पन, उदासी की अलामत है, यहां उदास रहने की माक़ूल वजह जिस ख़ूबी से बयान की है उस पर शायरा की क़ुदरते तख़्ययुल का बड़ा दख़्ल है। इस तरह अलामतों, तख़्ययुल, तस्व्वुर और ज़ाती तजुर्बात ने शायरा के फ़न को जिला बख़शी है।
कुछ मिसालें और मुलाहिज़ा हों –
ख़ुद ही प्यासे हैं , समंदर तो फ़क़त नाम के हैं
भूल जाओ कि बड़े लोग किसी काम के हैं
तुम फ़क़त इस जिस्म तक ही रह गये ना
मैं तुम्हें ख़ुद से मिलाना चाहती थी
ज़मीर बेच के आए हो , कोई बात नहीं
जो चीज़ बदले में लाये उस से ख़ुश हो ना ?
हम डूबने के खौफ में दरिया से दूर थे
लेकिन ये क्या कि घर में ही सैलाब आ गया
मेरी तस्वीर आई बच्चों सी
कैमरा दिल की उम्र जान गया
अचानक रुक गई तो देखती हूं
मेरे चलने से रिश्ता चल रहा था
मेरे बाद कोई नया आ गया
सुना है वो ख़ाली जगह भर गई
मेरी सदा में वो ताक़त नहीं बची शायद
कि मैं पुकारूँ उसे वो खिंचा चला आए
शायरा के कलाम में मासूमियत, अपनाईयत, सदाक़त, फ़रहत और मोहब्बत के जज़बात के अलावा भोला पन, बे ज़मीरी के शिकवे, तन्हाईयों के ग़म जगह जगह मिलते हैं। मैं ख़ास तौर पर एक शेर की तरफ़ इशारा करता हूँ जिस में बला की नफ़सियात और विजदान मौजूद है –
तुम्हारे भेजे हुए फूल मैं क़ुबूल करूं
या अपने पांव का कांटा निकाल लूं पहले
उम्मीद है इस बेहतरीन शायरा की किताब अदब की दुनिया में क़द्र और इज़्ज़त की निगाह से पढ़ी जायेगी ।

